आचार्य प्रशांत के कई वीडियो यू ट्यूब में प्राप्त है लाखो इनके फॉलोवर्स भी है लेकिन इनका प्रेजेंटेशन या प्रस्तुतीकरण कभी कभी नकारात्मकता को बढ़ावा देनेवाला भी होता है और कभी हमारी सदियों पुरानी आस्था विश्वास और प्रेम पर चोट करने वाला होता है ।
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आइए जरा और इन्हें समझते है
पृष्ठभूमि और कार्यशैली आचार्य प्रशांत (प्रशांत त्रिपाठी) का शैक्षिक आधार अत्यधिक सुदृढ़ रहा है—आईआईटीदिल्ली, आईआईएम अहमदाबाद और सिविल सेवा परीक्षा उत्तीर्ण।
उनकी कार्यशैली शास्त्रीय और अकादमिक स्तर पर अद्वैत वेदांत (उपनिषद, श्रीमद्भगवद्गीता) और संत परंपरा(मुख्यतः कबीर) को तर्क और आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर परखने की है।
उनके समर्थकों में प्रमुखतः युवा, कॉलेज छात्र, तकनीकी-पेशेवर और बौद्धिक वर्ग हैं, जो पारंपरिक धर्म के कर्मकांडों और अंधविश्वासों से ऊबचुके हैं। वहीं, उनके आलोचकों में पारंपरिक धर्माचार्य, रूढ़िवादी समाज और वे सामान्य लोग हैं जिनकी पारंपरिकआस्था पर उनके सीधे प्रहार होते हैं।
वे कहाँ सही प्रतीत होते हैं (तार्किक पक्ष)
ढोंग और पाखंड पर प्रहार: उनका सबसे मजबूत पक्ष यह उजागर करना है कि समाज में ‘मां’ शब्द का प्रयोगकेवल भावनात्मक आवरण बन चुका है। हम गाय को ‘गौमाता’ कहते हैं, पर दूध न देने पर उसे सड़कों परप्लास्टिक खाने छोड़ देते हैं; गंगा को ‘मां’ कहते हैं, पर उसे नालों से पाट देते हैं; स्त्री को ‘देवी’ कहते हैं, परउसे केवल प्रजनन और घरेलू दायित्वों तक सीमित रखते हैं। इस दोहरे चरित्र (Hypocrisy) को उजागरकरने में वे पूरी तरह सही हैं।
जलवायु और जीव-दया: उनका पशु अधिकारों, पर्यावरण और शाकाहार/वीगनिज़्म का समर्थन आधुनिकवैज्ञानिक संकटों के बिल्कुल अनुकूल है।
आत्म-ज्ञान का आग्रह: भय, लोभ और सामाजिक दबाव में जीने के बजाय व्यक्ति को विवेकपूर्ण निर्णय लेनेके लिए प्रेरित करना उनका वास्तविक दार्शनिक योगदान है।
वे कहाँ पूरी तरह चूकते हैं या गलत साबित होते हैं (व्यावहारिक पक्ष)
लोक-चेतना की उपेक्षा: भारत का बहुसंख्यक समाज (ग्रामीण, कम पढ़ा-लिखा या भावनात्मक रूप से जुड़ावर्ग) वेदांत की शुष्क बौद्धिकता से नहीं, बल्कि ‘भाव’ और ‘श्रद्धा’ से संचालित होता है। जब वे मातृत्व यापरंपराओं को केवल "बायोलॉजिकल प्रोग्राम" या "हार्मोनल खेल" कहते हैं, तो वे उस मानवीय संवेदना, त्याग और पारिवारिक ताने-बाने को पूरी तरह नकार देते हैं, जिसके सहारे यह समाज सदियों से जीवित रहाहै।
सहानुभूति की कमी (Lack of Empathy): वे एक कठोर प्रोफेसर की तरह बात करते हैं, जो यह भूलजाता है कि क्लासरूम में बैठा हर छात्र एक स्तर का नहीं है। अस्पताल में मरीज को कड़वी दवा दी जाती है, पर उसे जहर कहकर नहीं परोसा जाता। उनका लहजा सुधारक से अधिक विध्वंसक जान पड़ता है।
भारतीय जनमानस पर संभावित नकारात्मक प्रभाव भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में, जहाँ अधिकांश आबादी केपास दार्शनिक परिपक्वता नहीं है, उनकी यह शैली गंभीर दुष्प्रभाव डाल सकती है:
पारिवारिक अलगाव और भावनात्मक टूटन: कच्ची उम्र के युवा जब उनके तर्कों को आधा-अधूरा सुनते हैं, तोवे अपने माता-पिता के स्वाभाविक स्नेह को "शोषण" और "अहंकार" मानने लगते हैं। इससे परिवारों मेंसम्मान और संवाद समाप्त होकर विद्रोह और एकाकीपन बढ़ रहा है।
निराशावाद और शुष्कता (Cynicism): बिना वेदांत के गहरे अभ्यास के, पारंपरिक मान्यताओं (गाय, नदी, मां) से श्रद्धा का उठ जाना समाज को प्रबुद्ध नहीं बनाता, बल्कि असंवेदनशील और कठोर बना देता है।
सांस्कृतिक जड़ों से कटाव: श्रद्धा समाज को बांधने वाला गोंद (social glue) है। यदि आप विकल्प दिएबिना किसी की सहज श्रद्धा छीन लेंगे, तो वह व्यक्ति दिशाहीन होकर पहचान के संकट में गिर जाएगा।
अंतिम निष्पक्ष निष्कर्ष आचार्य प्रशांत न तो 'मानवता के प्रेमी' हैं और न ही 'मानवता के शत्रु'; वे मूल रूप से एककठोर, समझौताहीन बुद्धिवादी (Radical Intellectual Iconoclast) हैं।
उनकी त्रासदी यह है कि उनकी दवा सही है, पर खुराक और देने का तरीका घातक है। एक परिपक्व, दार्शनिकमस्तिष्क के लिए उनका प्रहार आत्म-मंथन का माध्यम हो सकता है, लेकिन 140 करोड़ के उस भारत के लिए, जोप्रेम, मातृत्व और लोक-श्रद्धा की डोर से बंधा है, उनका यह आक्रामक तरीका सुधार लाने के बजाय समाज मेंकड़वाहट, पारिवारिक बिखराव और सांस्कृतिक अराजकता पैदा करने का बड़ा जोखिम रखता है।
कबीर ने भीपाखंड पर चोट की थी, लेकिन कबीर के पास "ढाई आखर प्रेम" का मरहम था; आचार्य प्रशांत के पास तर्क की तलवार तो बहुत तेज है, पर उसमें जन-संवेदना का मरहम नदारद है।

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