यह नोट इस पूरे विवाद को बेहद सरल शब्दों में समझाने के लिए तैयार किया गया है, ताकि एक आम इंसान भीसमझ सके कि असली मामला क्या है, क्या आरोप लगाए गए हैं और उनमें कितनी सच्चाई है:
विवाद क्या है? (सरल शब्दों में)
दिगंबर जैन मुनि (संत) अपने पास मोर के पंखों से बनी एक छोटी झाड़ू जैसी संरचना रखते हैं, जिसे पिच्छी यापिच्छिका कहा जाता है। इसका उपयोग वे बैठने या चलने से पहले जमीन पर मौजूद छोटे-छोटे कीड़े-मकौड़ों कोबिना चोट पहुँचाए अत्यंत कोमलता से हटाने के लिए करते हैं। वरिष्ठ भाजपा नेता और पशु अधिकार कार्यकर्ता मेनका गांधी ने आरोप लगाया कि इन पिच्छियों को बनाने के लिए हर साल लाखों मोरों को मारा जा रहा है, जिसका जैन समाज ने कड़ा विरोध किया है।
क्या आरोप लगाया गया है? (What is Alleged)
लाखों मोरों की हत्या का आरोप:आरोप है कि जैन संतों की पिच्छी की मांग को पूरा करने के लिए देश में हर साल15 से 20 लाख मोरों की बेरहमी से हत्या कर दी जाती है।
व्यापार का दरवाजा खोलना: आरोप है कि 1972 के वन्य जीव संरक्षण कानून (Wildlife Act) में जैन समाज केदबाव के कारण मोर पंखों के व्यापार को जो छूट मिली, उसी के कारण आज मोरों के शिकार का यह बड़ा धंधाचल पड़ा है।
संतों को नसीहत: यह आरोप/नसीहत दी गई कि जब जैन संतों ने कपड़े तक त्याग दिए हैं, तो उन्हें पिच्छी (मोरपंख) का लालच भी छोड़ देना चाहिए क्योंकि ये 'मारे हुए मोरों की लाशें' हैं।
✅ क्या सच है? (What is True)
जैन धर्म का सिद्धांत पूरी तरह अहिंसक है:
जैन मुनि या जैन समाज का इरादा कभी भी किसी जीव को मारना नहीं होता। शास्त्रों के अनुसार, पिच्छी के लिएकेवल उन्हीं पंखों का उपयोग करने का नियम है जो मोर हर साल प्राकृतिक रूप से (खुद-ब-खुद) गिराते हैं।
पंखों में वैज्ञानिक अंतर होता है: खुद गिरे हुए पंख और जबरदस्ती नोचे गए पंख में साफ अंतर होता है। प्राकृतिकरूप से गिरे पंख की जड़ (Calamus) गोल और साफ होती है, जबकि नोचे गए पंख की जड़ टूटी हुई होती है याउस पर मांस/खून के अंश होते हैं। पिच्छी बनाने वाले पारखी इस अंतर को पहचानते हैं।
बाजार में अवैध शिकार एक कड़वी सच्चाई है: यह बात सच है कि बाजार में मोर पंखों के बढ़ते कमर्शियलउपयोग (जैसे घरों की सजावट, फैशन डिजाइनिंग, बैग और विदेशों में एक्सपोर्ट) के कारण कुछ लालची शिकारीऔर बिचौलिए मोरों का अवैध शिकार करते हैं।
कानूनी संरक्षण: मोर भारत का राष्ट्रीय पक्षी है। इसे कानूनन वही संरक्षण प्राप्त है जो बाघ या शेर को है। इसकीहत्या करना एक गंभीर और गैर-जमानती अपराध है।
❌ क्या झूठ या बेबुनियाद है? (What is Untrue)
जैन मुनियों के लिए 15 लाख मोर मारे जाते हैं— यह दावा बेबुनियाद है:
प्रतिवर्ष 15 लाख मोरों की हत्या का यह आंकड़ा अत्यधिक बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया है और इसका कोईआधिकारिक या वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।
जैन समाज पर दोष मढ़ना गलत है:यदि कहीं मोरों का अवैध शिकार हो भी रहा है, तो उसके लिए देश का कानून, वन विभाग और वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो (WCCB) जिम्मेदार हैं, जिन्हें उन अपराधियों को पकड़नाचाहिए। इसके लिए पूरी तरह अहिंसक जैन समाज को बदनाम करना या दोषी ठहराना गलत है।
सरकारी तंत्र की चुप्पी का तर्क:यदि इतने बड़े पैमाने पर (लाखों की संख्या में) मोरों की हत्या हो रही होती, तो हरसाल सैकड़ों शिकारी रंगे हाथों पकड़े जाते। ऐसा न होना यह साबित करता है कि यह आरोप पूरी तरह तथ्यहीनहै।
आम आदमी के लिए निष्कर्ष (Takeaway)
जैन संत जीवों की रक्षा के लिए पिच्छी का उपयोग करते हैं, न कि जीवों की हत्या के लिए। असली समस्या जैनसमाज की परंपरा नहीं, बल्कि बाजार के वो लालची अपराधी और बिचौलिए हैं जो पैसे कमाने के लिए मोरों काअवैध शिकार करते हैं। सरकार की जिम्मेदारी उन शिकारियों को पकड़ने की है, न कि एक अहिंसक धार्मिकपरंपरा पर उंगली उठाने की।
भारत में मोरों की मृत्यु (प्राकृतिक और अवैध शिकार) और सरकारी कार्रवाई पर व्यापक स्थिति रिपोर्ट
1. मुख्य सारांश (Executive Summary)
भारत का राष्ट्रीय पक्षी, भारतीय मोर (Pavo cristatus), वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची-I (Schedule I) के तहत अत्यधिक संरक्षित है। हालांकि वैज्ञानिक अनुमानों के अनुसार भारत में मोरों की संख्या 15 लाख से कई मिलियन (कई लाख) के बीच है, लेकिन यह प्रजाति इंसानी गतिविधियों और प्राकृतिक संकटों के कारण लगातार गंभीर खतरों का सामना कर रही है।
यह रिपोर्ट मोरों की प्राकृतिक और जानबूझकर की जाने वाली मौतों का विश्लेषण करती है। इसके साथ ही, दो अलग-अलग अवधियों (2001–2013 और 2014–2026) के दौरान सरकारी एजेंसियों द्वारा की गई कानूनी और प्रवर्तन कार्रवाइयों का विवरण प्रस्तुत करती है।
2. मृत्यु दर का आकलन: मौतों के मुख्य कारण
भारत में मोरों की मौत को मोटे तौर पर दो श्रेणियों में बांटा जा सकता है: जानबूझकर की जाने वाली हत्या (अवैध शिकार) और प्राकृतिक या आकस्मिक कारण।
जानबूझकर की जाने वाली हत्या और मानव-वन्यजीव संघर्ष
• फसलों में जहर देना: कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे राज्यों के कृषि क्षेत्रों में मोरों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है। इस वजह से किसान इन्हें फसलों को नुकसान पहुंचाने वाला जीव मानने लगे हैं। किसान अक्सर मक्का और मूंगफली जैसे बीजों पर जहरीले रसायनों या चूहे मारने की दवा का लेप लगाते हैं। जब मोर इन बीजों को खाते हैं, तो बड़े पैमाने पर उनकी मौत हो जाती है। कई बार एक ही खेत या इलाके में 15 से 50 मोर मृत पाए जाते हैं।
• व्यावसायिक अवैध शिकार: भूमिगत आपराधिक गिरोह मोरों का मांस, उनकी चर्बी (पारंपरिक तेलों के लिए) और उनके खूबसूरत पंखों के लिए उनका शिकार करते हैं। हालांकि कानूनन प्राकृतिक रूप से गिरे हुए पंखों को पास में रखना अपराध नहीं है, लेकिन बाजार में अत्यधिक मांग के कारण शिकारी मोरों को मारकर उनके पंख जबरन नोच लेते हैं। राजस्थान जैसे राज्यों के आंकड़ों के अनुसार, हर साल 3,000 से अधिक मोरों का अवैध शिकार किया जाता है।
प्राकृतिक, जलवायु और आकस्मिक मौतें
• महामारी और बीमारियां: जंगली मोर वायरस जनित बीमारियों के प्रति बेहद संवेदनशील होते हैं। घातक H5N1 एवियन इन्फ्लूएंजा (बर्ड फ्लू) के प्रकोप के कारण कई बार कुछ ही दिनों में दर्जनों मोरों की अचानक मौत हो जाती है।
• गंभीर मौसम: गर्मियों में चलने वाली अत्यधिक लू और प्राकृतिक जल स्रोतों के सूखने के कारण सूखे इलाकों में डिहाइड्रेशन (पानी की कमी) और हीटस्ट्रोक से मोरों की मौत हो जाती है।
• बुनियादी ढांचे के खतरे: ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली की हाई-वोल्टेज लाइनें मोरों के उड़ते समय उनके करंट लगने का कारण बनती हैं। इसके अलावा, जंगलों के पास से गुजरने वाले हाईवे पर तेज रफ्तार वाहनों की टक्कर से भी मोरों की मौत होती है।
• त्योहारों का प्रभाव: गुजरात और राजस्थान जैसे राज्यों में मकर संक्रांति के दौरान इस्तेमाल होने वाले कांच के धारदार मांझे से कटकर हर साल दर्जनों मोर दम तोड़ देते हैं।
3. सरकारी प्रवर्तन और कानूनी कार्रवाइयों का घटनाक्रम
प्रथम चरण: 2001 से 2013 – नीतिगत बदलाव और कानूनी खामियों को बंद करना
इस अवधि के दौरान सरकार का मुख्य ध्यान उन कानूनी खामियों को दूर करने पर था, जिनका फायदा उठाकर शिकारी पकड़े जाने पर यह दावा कर देते थे कि पंख "प्राकृतिक रूप से गिरे हुए" थे।
• पंखों के व्यापार पर प्रतिबंध का प्रस्ताव (2010–2012): पर्यावरण और वन मंत्रालय (MoEF) ने स्वीकार किया कि प्राकृतिक रूप से गिरे पंखों के व्यापार की अनुमति का दुरुपयोग शिकार छिपाने के लिए किया जा रहा था। साल 2012 में, सरकार ने इस पूरी प्रक्रिया पर रोक लगाने और इस कानूनी खामी को खत्म करने के लिए मोर के पंखों के व्यापार पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव कैबिनेट के सामने रखा।
• निर्यात पर सख्त रोक: सीमा शुल्क (कस्टम) और सीमा सुरक्षा एजेंसियों ने विदेश व्यापार नीति के तहत मोर के पंखों के निर्यात पर पूर्ण प्रतिबंध को सख्ती से लागू किया और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तस्करी की जाने वाली कई बड़ी खेपों को जब्त किया।
• न्यायिक सख्ती (2013): अदालतों ने वन्यजीव अपराधियों की जमानत पर सख्त रुख अपनाना शुरू किया। 'जी. कुमार बनाम भारत संघ' (2013) जैसे मामलों में कानूनी प्रणाली ने यह स्पष्ट कर दिया कि मोर जैसे अनुसूची-I के जीवों के खिलाफ अपराध अत्यंत गंभीर हैं, जिससे आरोपियों को आसानी से जमानत मिलना बंद हो गया।
द्वितीय चरण: 2014 से 2026 – खुफिया जांच और फोरेंसिक तकनीक का उपयोग
यह दौर केंद्रीय खुफिया एजेंसियों, जैसे सीबीआई और वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो (WCCB), द्वारा अंतरराष्ट्रीय तस्करी सिंडिकेट को पकड़ने और आधुनिक फोरेंसिक तकनीकों के इस्तेमाल का गवाह बना।
• केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की बड़ी कार्रवाइयां:
• साल 2021: दिल्ली हवाई अड्डे पर सीमा शुल्क अधिकारियों द्वारा चीन भेजी जा रही 2,565 किलोग्राम अवैध मोर पंखों की एक विशाल खेप जब्त किए जाने के बाद सीबीआई ने इस अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क के खिलाफ जांच शुरू की थी।
• साल 2024: सीबीआई ने एक बड़े अखिल भारतीय तस्करी गिरोह का भंडाफोड़ किया, जिसमें तीन मुख्य सरगनाओं को गिरफ्तार किया गया और अंतरराष्ट्रीय ब्लैक मार्केट के लिए ले जाई जा रही 125 किलोग्राम उच्च गुणवत्ता वाली पंखों की खेप बरामद की गई।
• राज्य स्तर पर गिरफ्तारियां और जमीनी कार्रवाई:
• साल 2015 (मध्य प्रदेश): इंदौर वन विभाग ने वन्यजीव अधिनियम की धारा 51 के तहत पांच शिकारियों को मोरों के शवों और हथियारों के साथ रंगे हाथों गिरफ्तार किया और उन्हें जेल भेजा।
• साल 2023 (कर्नाटक): तुमकुरू में वन अधिकारियों ने एक मोर को मारने और उसका मांस पकाने के आरोप में तीन लोगों को गिरफ्तार किया और उन्हें अनुसूची-I के कड़े प्रावधानों के तहत न्यायिक हिरासत में भेजा।
• साल 2026 (हालिया कार्रवाइयां): वर्ष 2026 के शुरुआती महीनों में कई राज्यों में समन्वित छापेमारी की गई। फरवरी 2026 में उत्तर प्रदेश प्राधिकारियों ने स्थानीय शिकार नेटवर्कों को ध्वस्त किया। इसके बाद जून 2026 में मध्य प्रदेश के मंदसौर में पुलिस ने दो शिकारियों को गिरफ्तार कर उनके पास से हथियार और मोर का शव बरामद किया।
• फोरेंसिक प्रयोगशालाओं का उपयोग: सरकार ने वन्यजीव प्रयोगशालाओं को निर्देश दिया कि वे माइक्रोस्कोपिक और रासायनिक परीक्षणों के जरिए यह साबित करें कि जब्त किए गए पंख "जबरन नोचे गए" थे या "प्राकृतिक रूप से गिरे" थे। इसने अदालतों में तस्करों के सबसे बड़े झूठे बहाने को हमेशा के लिए खत्म कर दिया।
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4. कानूनी रूपरेखा और दंड के प्रावधान
वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत मोर को बाघ और हाथी के समान ही सर्वोच्च सुरक्षा रेटिंग यानी अनुसूची-I (Schedule I) में रखा गया है। इस कानून के तहत किसी भी मोर का शिकार करना, उसे नुकसान पहुंचाना या उसके अंगों का व्यापार करना एक गैर-जमानती अपराध है। दोषी पाए जाने पर अपराधी को कम से कम 3 से 7 साल की जेल और न्यूनतम ₹10,000 का जुर्माना भुगतना पड़ता है। बार-बार अपराध करने पर जुर्माने और सजा की अवधि को और बढ़ा दिया जाता है।
5. निष्कर्ष और सिफारिशें
हालांकि भारत में मोर के शिकार के खिलाफ कानूनी ढांचा बेहद मजबूत है, लेकिन ग्रामीण इलाकों के बड़े भूगोल के कारण इसे पूरी तरह लागू करना हमेशा एक चुनौती रहा है। भविष्य में मोरों की मृत्यु दर को कम करने के लिए, सरकार को शिकारियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई जारी रखने के साथ-साथ किसानों के लिए सामुदायिक फसल बीमा योजनाएं और गैर-घातक निवारक उपाय उपलब्ध कराने होंगे। किसानों को ऐसे विकल्प देने से फसलों को बचाने के लिए मोरों को अनजाने में या जानबूझकर जहर देने की घटनाओं पर प्रभावी रूप से रोक लगाई जा सकेगी।