भारतीय न्यायपालिका में लंबित मामलों का संकट: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य, कारण और समाधान
भारतीय न्यायिक व्यवस्था में "तारीख पर तारीख" और मुकदमों का दशकों तक खिंचना न्याय प्रणाली के मूल सिद्धांत—न्याय में देरी, न्याय से वंचित होना है (Justice delayed is justice denied)—पर गहरा आघात करता है। वर्तमान में देश की विभिन्न अदालतों में 5 करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं, जिनमें से हजारों मामले ऐसे हैं जो तीन से सात दशकों (30 से 70+ वर्ष) से अंतिम फैसले की प्रतीक्षा कर रहे हैं या हाल ही में तीन दशकों के संघर्ष के बाद सुलझे हैं।
भाग 1: 30 से 70+ वर्षों तक लंबित रहे/रहने वाले 25 प्रमुख ऐतिहासिक मामले
(क) आपराधिक व नरसंहार से जुड़े मामले (Criminal & Disaster Trials)
* हाशिमपुरा नरसंहार (Hashimpura Massacre, 1987): 42 निर्दोषों की हत्या के मामले में आरोप तय होने, ट्रायल और अपील पूरी होने में 31 वर्ष लगे (अंतिम सजा 2018 में दिल्ली हाईकोर्ट से)।
* भोपाल गैस त्रासदी आपराधिक मुकदमेबाजी (1984): दुनिया की सबसे भीषण औद्योगिक त्रासदी; आपराधिक लापरवाही के ट्रायल कोर्ट के फैसले में ही 26 वर्ष (2010) लगे और मुआवज़ा व सुधारात्मक याचिकाएं 40 वर्षों तक खिंचती रहीं।
* ललित नारायण मिश्र हत्याकांड (L.N. Mishra Assassination, 1975): केंद्रीय रेल मंत्री की हत्या का ट्रायल निचली अदालत में 22 जजों के बदलने के बाद 39 वर्ष (2014) में पूरा हुआ।
* 1984 सिख विरोधी दंगे मामले (Anti-Sikh Riots): सज्जन कुमार सहित कई प्रमुख आरोपियों की दोषसिद्धि में 34 वर्ष लगे (2018); कई विशेष मामलों की सुनवाई अब भी जारी है।
* मलियाना नरसंहार (Maliana Massacre, 1987): मेरठ के मलियाना में हुए दंगों और हत्याओं की सुनवाई ट्रायल कोर्ट में 36 वर्ष तक चली और 2023 में साक्ष्यों के अभाव में आरोपी बरी हुए।
* बाबरी मस्जिद विध्वंस आपराधिक ट्रायल (1992): विशेष सीबीआई अदालत को अंतिम निर्णय सुनाने में 28 वर्ष लगे (सितंबर 2020)।
* मुंबई 1993 सीरियल ब्लास्ट ट्रायल: टाडा (TADA) कोर्ट और अपीलीय प्रक्रिया में मुख्य मुकदमे का निपटारा होने में 20 से 25 वर्ष लगे; कई आरोपियों के ट्रायल 30 साल बाद भी अलग-अलग चलते रहे।
* रायचंद कोरशी शाह बनाम मलशी मेघजी चार्ला (Raichand Korshi Shah Case): सुप्रीम कोर्ट में आपराधिक अपीलों में से एक, जो 32 वर्ष से अधिक समय तक लंबित सूची में दर्ज रही।
* उphaar सिनेमा अग्निकांड (1997): 59 लोगों की मौत के मामले में सेशन कोर्ट, हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट की क्यूरेटिव पिटीशन तक 25 से 28 वर्ष का सफर तय हुआ।
* संसदीय हमला (2001) से जुड़े कुछ सह-मामले व पुलिस जांच ट्रायल: हालांकि मुख्य केस फास्ट-ट्रैक हुआ, परंतु उनसे जुड़े संपार्श्विक सिविल व संपत्ति विवाद दशकों लटके रहे।
(ख) संवैधानिक और विनियामक मामले (Supreme Court Constitution Benches)
* दाऊदी बोहरा समुदाय मामला (Central Board of Dawoodi Bohra Community v. State of Maharashtra): बहिष्कार (Excommunication) की संवैधानिक वैधता पर 9-जजों की संविधान पीठ के समक्ष यह मामला 38 वर्ष से अधिक समय तक लंबित रहा (1986 से)।
* प्रॉपर्टी ओनर्स एसोसिएशन मामला (Property Owners’ Association v. State of Maharashtra): क्या निजी संपत्ति अनुच्छेद 39(b) के तहत समुदाय का संसाधन है? यह प्रश्न सुप्रीम कोर्ट की 9-जजों की पीठ के समक्ष 32 वर्ष से अधिक (1992 से 2024) तक अनिर्णीत रहा।
* खनिज क्षेत्र विकास प्राधिकरण (MADA v. SAIL): खनिजों पर राज्य कर लगाने की शक्ति पर 9-जजों की पीठ का संदर्भ 34 वर्षों तक सुप्रीम कोर्ट में अटका रहा (1989/1990 से 2024)।
* शंभलपूर मर्चेंट्स एसोसिएशन / अर्जुन फ्लोर मिल्स बनाम ओडिशा राज्य: बिक्री कर पर राज्य की विधायी क्षमता पर 7-जजों की संविधान पीठ का मामला 30 वर्ष से अधिक समय तक लंबित रहा (1994 से)।
* अभिराम सिंह बनाम सी.डी. कोमाचेन (Abhiram Singh Case): जनप्रतिनिधित्व कानून (RPA 1951) की धारा 123(3) के तहत चुनाव में धर्म के उपयोग की व्याख्या का मामला 31 वर्ष तक लंबित रहने के बाद 7-जजों की पीठ द्वारा 2017 में तय हुआ।
* एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ (गंगा व दिल्ली प्रदूषण रिट): जनहित याचिका (PIL) जो सतत परमादेश (Continuing Mandamus) के रूप में 38 वर्षों से अधिक समय से सुप्रीम कोर्ट में सक्रिय रूप से चल रही है।
* असम राज्य बनाम भारत संघ (State of Assam v. Union of India): अंतर-राज्यीय सीमा और केंद्र-राज्य वित्तीय अधिकारों का विवाद सुप्रीम कोर्ट में 41 वर्षों से अधिक समय से लंबित रहा।
* कावेरी जल विवाद (Cauvery Water Dispute): राज्यों के बीच जल बंटवारे की कानूनी लड़ाई ट्रिब्यूनल से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक 30 वर्ष से अधिक (1990 से 2018) चली।
(ग) सिविल, संपत्ति और शाही विवाद (Civil, Land & Royal Disputes)
* बलराम कश्यप बनाम भागीरथी गंजू (खूंटी कोर्ट, झारखंड - PS 90 of 1951): भारत का सबसे पुराना सक्रिय विभाजन वाद (Partition Suit), जो 73 वर्षों से अधिक (1951 से) समय से सिविल कोर्ट में अंतिम डिक्री के लिए लंबित है!
* अयोध्या राम जन्मभूमि - बाबरी मस्जिद टाइटल सूट: 1949–1950 में फैजाबाद सिविल कोर्ट में दायर मूल मुकदमों का अंतिम निपटारा सुप्रीम कोर्ट से नवंबर 2019 में हुआ—लगभग 70 वर्ष का समय लगा।
* मेवाड़ राजघराना संपत्ति विवाद (Maharana Mahendra Singh Ji v. Arvind Singhji): उदयपुर के महाराणा भगवत सिंह (1984) के निधन के बाद संपत्ति का विवाद 36 वर्ष से अधिक समय तक अदालतों में खिंचता रहा।
* मालदा (पश्चिम बंगाल) एवं बरहामपुर (ओडिशा) विभाजन वाद: नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड (NJDG) पर दर्ज 1951–1952 के संपत्ति और बंधक विवाद, जो वादियों की 3 पीढ़ियों के गुजरने के बाद भी 70 वर्षों तक फाइलों में अटके रहे।
* हैदराबाद निजाम फंड केस (लंदन/भारतीय अदालतें): 1948 में लंदन के बैंक में जमा धन को लेकर भारत, पाकिस्तान और निजाम के वारिसों के बीच कानूनी लड़ाई 70 वर्ष बाद 2019 में सुलझी।
* शामराव बाजीराव पवार बनाम हौसाबाई (सुप्रीम कोर्ट): संपत्ति और उत्तराधिकार से जुड़ी सिविल अपील जो सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार के समक्ष 35 वर्ष से अधिक समय तक पेंडिंग रही।
* बैंक पेंशनर्स अपडेशन विवाद (M.C. Singla आदि): 1993 के समझौते और 1995 रेगुलेशंस के आधार पर 2008 में हाईकोर्ट में दायर याचिका अब 2026 में सुप्रीम कोर्ट में अंतिम बहस तक पहुंचते-पहुंचते 18 वर्षों से अधिक समय ले चुकी है।
भाग 2: अत्यधिक देरी के 5 मुख्य कारण (Brief Reasons)
* जजों की भारी कमी और रिक्तियां: भारत में प्रति 10 लाख आबादी पर केवल लगभग 21 जज हैं (विधि आयोग की सिफारिश कम से कम 50 की थी)। उच्च न्यायालयों और जिला अदालतों में 20% से 35% पद लगातार खाली रहते हैं।
* "तारीख पे तारीख" संस्कृति (बार-बार स्थगन): प्रक्रिया संहिता (CPC Order XVII) में तीन स्थगनों की सीमा के बावजूद अदालतों द्वारा बिना वास्तविक हर्जाने (Costs) के तारीखें दे दी जाती हैं।
* सरकार स्वयं सबसे बड़ी वादी: कुल मुकदमों का लगभग 50% हिस्सा सरकार और सरकारी उपक्रमों का है। ऑडिट और विभागीय जवाबदेही से बचने के लिए अधिकारी छोटी-छोटी बातों पर सुप्रीम कोर्ट तक अंधाधुंध अपीलें दायर करते हैं।
* अपीलों और स्टे (Stay) का मकड़जाल: निचली अदालत के हर अंतरिम आदेश के खिलाफ रिवीजन या रिट याचिका दायर कर ऊपरी अदालत से वर्षों के लिए स्टे ले लिया जाता है, जिससे मूल ट्रायल पूरी तरह ठप हो जाता है।
* पुराना केस-फ्लो मैनेजमेंट और फॉरेंसिक देरी: एक जज की दैनिक कॉज लिस्ट में 100-120 मामले होते हैं। आपराधिक मामलों में फॉरेंसिक रिपोर्ट (FSL) आने में ही 3 से 5 साल लग जाते हैं।
भाग 3: संभावित स्थायी समाधान (Possible Remedies)
* अखिल भारतीय न्यायिक सेवा (AIJS) और तदर्थ जज (Ad-hoc Judges):
* अनुच्छेद 312 के तहत यूपीएससी की तर्ज पर राष्ट्रीय स्तर पर मेधावी जजों की पारदर्शी भर्ती की जाए।
* अनुच्छेद 128 और 224A का उपयोग करके सेवानिवृत्त जजों की विशेष अदालतें बनाई जाएं, जिनका काम केवल 10 वर्ष से पुराने मामलों का तेजी से निपटारा करना हो।
* सरकारी मुकदमों पर कड़ा अंकुश:
* राज्य और केंद्रीय स्तर पर 'मुकदमा स्क्रीनिंग कमेटियां' बनें। जो विभाग स्थापित कानून के खिलाफ गैर-जरूरी अपील दायर करे, उस पर व्यक्तिगत रूप से भारी हर्जाना लगाया जाए।
* प्रक्रियागत अनुशासन और स्टे का स्वतः अंत (Sunset Clause on Stays):
* किसी भी स्थगन (Stay) की अधिकतम अवधि 6 महीने तय हो; यदि उचित कारण से स्टे नहीं बढ़ाया जाता तो वह स्वतः समाप्त हो जाए।
* वकीलों की मौखिक बहस के लिए 30-45 मिनट की अधिकतम समय सीमा तय की जाए और लिखित दलीलों को अनिवार्य बनाया जाए।
* वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) को अनिवार्य बनाना:
* मध्यस्थता अधिनियम, 2023 के तहत संपत्ति, पारिवारिक और वाणिज्यिक विवादों में मुकदमा दायर करने से पहले अनिवार्य प्री-लिटिगेशन मीडिएशन (Pre-litigation Mediation) लागू किया जाए।
* चेक बाउंस (Sec 138 NI Act) और मोटर दुर्घटना दावों को नियमित अदालतों से हटाकर पूरी तरह स्थायी लोक अदालतों में स्थानांतरित किया जाए।
* ई-कोर्ट्स फेज-3 और एआई आधारित छंटाई:
* समन तामील करने की सदियों पुरानी व्यवस्था हटाकर व्हाट्सएप, एसएमएस और डिजिटल माध्यमों को पूर्ण वैधानिक मान्यता दी जाए।
* आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का उपयोग समान कानूनी बिंदु वाले सैकड़ों मामलों को एक साथ क्लब (Tag) करने के लिए किया जाए, ताकि एक फैसले से हजारों मामले एक दिन में हल हो सकें।

