Monday, June 22, 2026

भोपाल और इंदौर मेट्रो को मुनाफे

 मेट्रो जैसे बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को मुनाफे (Profit) में लाने के लिए सरकार दो मुख्य रणनीतियों पर कामकर रही हैपहलानेटवर्क का विस्तार  (ताकि यात्री बढ़ेंऔर दूसरानॉन-फेयर रेवेन्यू  (टिकट के अलावा अन्यजरियों से कमाई)


मध्य प्रदेश सरकार और मध्य प्रदेश मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन (MPMRCL) का पूरा प्लान और समय-सीमा(Timeline) इस प्रकार है:


1. सरकार का 'मुनाफा और व्यवहार्यताप्लान (Profit Strategy)

 रूट का विस्तार (Connecting Major Hubs):


   अधूरे रूट पर मेट्रो हमेशा घाटे में रहती है। सरकार का मुख्य प्लान मेट्रो को शहर के उन व्यस्त और रिहायशीइलाकों से जोड़ना है जहाँ वास्तविक ट्रैफिक है। 


  इंदौर में बड़ा बदलावइंदौर मेट्रो के जिस  11.5 किलोमीटर के नए एक्सटेंशन (फ़ेज़ 2) का काम चल रहा थाउसका कमिश्नर ऑफ मेट्रो रेलवे सेफ्टी (CMRS) द्वारा सुरक्षा ऑडिट पूरा हो चुका है। यह नया ट्रैक सुपरकॉरिडोर से आगे बढ़कर विजयनगरबापट चौराहा और रेडिसन स्क्वायर जैसे इंदौर के सबसे प्रमुख कमर्शियलऔर आईटी हब्स को जोड़ेगा। इससे मेट्रो सीधे शहर के बीचों-बीच पहुँच जाएगीजिससे रोजाना यात्रियों कीसंख्या (Ridership) में भारी उछाल आने की उम्मीद है।


  भोपाल में विस्तार:भोपाल मेट्रो नेटवर्क को भी बढ़ाकर 30.8 किलोमीटर करने की योजना पर काम चल रहा हैताकि शहर के प्रमुख घने रिहायशी और व्यापारिक इलाके आपस में जुड़ सकें।


 ट्रांजिट-ओरिएंटेड डेवलपमेंट (TOD Policy): 


     प्रोजेक्ट को आर्थिक रूप से व्यावहारिक बनाने के लिए इंदौर और भोपाल मेट्रो में TOD पॉलिसी लागू की जारही है। इसके तहत मेट्रो स्टेशनों के 500 मीटर के दायरे में हाई-डेंसिटी (घनीकमर्शियल बिल्डिंग्समॉलऑफिस स्पेस और रेजिडेंशियल टाउनशिप की री-ज़ोनिंग की जा रही है। इससे स्टेशनों के पास ही रोजगार औरफुटफॉल पैदा होगाजो सीधे मेट्रो की सवारी बढ़ाएगा।


 नॉन-फेयर रेवेन्यू (टिकट के बिना अन्य कमाई):


   चूंकि केवल टिकट की बिक्री से ₹8 लाख रोज़ाना का मेंटेनेंस खर्च और ₹4,500 करोड़ से अधिक केअंतरराष्ट्रीय लोन का ब्याज चुकाना नामुमकिन हैइसलिए सरकार निम्नलिखित तरीकों से राजस्व बढ़ा रही है:


   स्टेशन कमर्शियलाइजेशनस्टेशनों के अंदर और बाहर रिटेल दुकानेंएटीएमऔर फूड कोर्ट्स के लिए जगहलीज़ पर देना।


   विज्ञापन अधिकार (Co-branding): मेट्रो ट्रेनों और पूरे स्टेशनों की ब्रांडिंग के अधिकार निजी कंपनियों कोबेचना।


  सेलिब्रेशन ऑन व्हील्सचलती मेट्रो या स्टेशनों को प्री-वेडिंग शूटबर्थडे और किटी पार्टी के लिए किराए पर देना(जिसकी चर्चा वीडियो में भी की गई है)


2. इसमें कितना समय लगेगा? (Target Timeline)

कोई भी मेट्रो सिस्टम शुरू होते ही मुनाफे में नहीं आताइसके लिए नेटवर्क का एक न्यूनतम 'सर्कलया 'लूपपूराहोना जरूरी होता है।


 अल्पकालिक सुधार (2026-2027):


   इंदौर में विजयनगर और रेडिसन स्क्वायर वाले 11.5 किमी के नए कॉरिडोर के जुड़ने से आने वाले कुछ महीनों मेंयात्रियों की संख्या बढ़ने लगेगी। सरकारी अनुमानों के अनुसारइन प्रमुख व्यावसायिक केंद्रों के जुड़ने से दैनिकयात्रियों की संख्या तेजी से बढ़कर 2.5 लाख प्रतिदिन तक पहुँचने की उम्मीद है। इससे दैनिक मेंटेनेंस का घाटाकाफी हद तक कम होना शुरू हो जाएगा।


 अंडरग्राउंड कॉरिडोर (2028):


     इंदौर में शहर के सबसे घने अंदरूनी हिस्सों को जोड़ने वाले 8.5 किलोमीटर के अंडरग्राउंड (भूमिगतरूट केलिए टनल बोरिंग का काम शुरू होने जा रहा हैजिसे  दिसंबर 2028 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।


 पूर्ण वित्तीय स्थिरता / ऑपरेशनल प्रॉफिट (2030):


     इंदौर मेट्रो के फ़ेज़ 1 (31.55 किमी की पूरी रिंग लाइनऔर भोपाल मेट्रो के पूरे नेटवर्क को पूरी तरह चालूकरने की आधिकारिक समय-सीमा दिसंबर 2030 तय की गई है। हाल ही में मध्य प्रदेश कैबिनेट ने इंदौर मेट्रो केसंशोधित बजट को बढ़ाकर ₹19,472 करोड़ की मंजूरी दी हैताकि फंड की कमी के बिना पूरा लूप तैयार होसके।


निचोड़:मेट्रो को पूरी तरह से आत्मनिर्भर (Breakeven) होने और अपने लोन का ब्याज स्वयं निकालने की स्थितिमें आने के लिए कम से कम 2028 से 2030 तक का समय लगेगा ,जब तक कि शहर के अंदरूनी हिस्सों औरअंडरग्राउंड लाइनों का काम पूरी तरह संपन्न नहीं हो जाता।




बिल्कुल ऐसा ही भारत के लगभग हर शहर में हुआ है। जब भी किसी शहर में मेट्रो की शुरुआत होती हैतो उसकाशुरुआती दौर ठीक वैसा ही होता है जैसा अभी हम भोपाल और इंदौर में देख रहे हैं।


दुनिया भर के परिवहन विशेषज्ञों का एक बुनियादी नियम है: "एक कटी-फटी या अधूरी मेट्रो लाइन हमेशा खालीदौड़ेगी और भारी घाटा देगी।"


भारत के अन्य बड़े शहरों में मेट्रो की शुरुआत और उनके मुनाफे/घाटे की कहानी को हम तीन मुख्य श्रेणियों मेंसमझ सकते हैं:


 1. शुरुआती दौर में सबका हाल 'सफेद हाथीजैसा था

 

दिल्ली मेट्रो (DMRC): आज दिल्ली मेट्रो भारत की सबसे सफल मेट्रो हैलेकिन जब **दिसंबर 2002 में इसकेपहले फेज़ का उद्घाटन हुआ थातो यह केवल 8.3 किलोमीटर  (शाहदरा से तीस हज़ारीके छोटे से टुकड़े परचलती थी। उस समय लोग इसे सिर्फ "मनोरंजनऔर "राइड का मज़ालेने के लिए देखते थेक्योंकि यह शहरके मुख्य कमर्शियल हब्स (जैसे कनॉट प्लेस या गुड़गांवसे नहीं जुड़ी थी। जब 2006-2010 के बीच इसका पूरानेटवर्क फैलातब जाकर यह दिल्ली की लाइफलाइन बनी।


 बेंगलुरु मेट्रो (Namma Metro): जब 2011 में बेंगलुरु मेट्रो का पहला हिस्सा (बायप्पनहल्ली से एमजी रोड - केवल 6.7 किमीखुलातो यह भी भारी घाटे में थी। लोग कहते थे कि इतनी कम दूरी के लिए कौन स्टेशन कीसीढ़ियां चढ़ेगा। लेकिन जैसे ही पर्पल और ग्रीन लाइनों का विस्तार हुआकहानी बदल गई। साल 2023-2024 और 2024-25 में बेंगलुरु मेट्रो ने ₹130 करोड़ तक का रिकॉर्ड ऑपरेशनल प्रॉफिट (कार्यकारी मुनाफाकमाया।


2. 'ऑपरेशनल प्रॉफिटबनाम 'नेट प्रॉफिटका अंतर


यहाँ एक तकनीकी पेंच समझना ज़रूरी हैजो हर शहर की मेट्रो पर लागू होता है:


 1. ऑपरेशनल प्रॉफिट (Operational Profit): इसका मतलब है कि रोज़ का टिकट का कलेक्शन औरविज्ञापन की कमाईरोज़ के मेंटेनेंस और बिजली के खर्च (जैसे भोपाल/इंदौर का ₹8 लाख रोज़ का खर्चसेज़्यादा है। दिल्लीबेंगलुरु और कोच्चि जैसी मेट्रो इस मामले में मुनाफे में  चुकी हैं।


 2. नेट प्रॉफिट (Net Profit): मेट्रो बनाने के लिए जो हज़ारों करोड़ का लोन (जैसे जापान की JICA या अन्यविदेशी बैंकों सेलिया जाता हैउसका ब्याज (Interest) चुकाने के बाद जो बचता है। ब्याज का बोझ इतना भारीहोता है कि इस मामले में दिल्ली जैसी बड़ी मेट्रो भी कागज़ों पर नेट लॉस (Net Loss) में दिखती है।


3. हैदराबाद मेट्रोप्राइवेट मॉडल की नाकामी और सरकारी टेकओवर


हैदराबाद मेट्रो भारत का इकलौता ऐसा प्रोजेक्ट था जिसे PPP (पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिपमॉडल पर 'लार्सनएंड टुब्रो' (L&T) कंपनी ने बनाया था।


 यहाँ रोज़ाना 4 से 5 लाख लोग सफर करते हैं और ट्रेनें खचाखच भरी रहती हैंफिर भी भारी-भरकम लोन के ब्याज(सालाना करीब ₹940 करोड़ का ब्याजके कारण यह प्रोजेक्ट भारी घाटे में चला गया।


 हालत यह हुई कि 2025-2026 में इसका घाटा बढ़कर  ₹750 करोड़ तक पहुँच गया। नतीजतननिजी कंपनी(L&T) ने हाथ खड़े कर दिए और अब सरकार करीब ₹15,000 करोड़ देकर इस पूरे मेट्रो सिस्टम को पूरी तरहअपने नियंत्रण (Government Takeover) में ले रही है।


4. कोच्चि मेट्रोछोटे शहरों के लिए एक उम्मीद

केरल की कोच्चि मेट्रो देश के टियर-2 (छोटेशहरों के लिए एक बेहतरीन उदाहरण है। लगातार सही प्लानिंगऔर नेटवर्क विस्तार के कारण कोच्चि मेट्रो ने लगातार पिछले तीन सालों (2023 से 2025-26) से लगातारऑपरेशनल प्रॉफिट दर्ज किया है।


निष्कर्ष (Takeaway)

भोपाल और इंदौर की स्थिति कोई अनोखी नहीं है। कोई भी मेट्रो प्रोजेक्ट पहले दिन से पैसेंजर नहीं ला सकता।मेट्रो पानी की पाइपलाइन की तरह होती हैजब तक पाइपलाइन पूरी तरह आपके घर (शहर के केंद्रतक नहींजुड़ेगीतब तक पानी (यात्रीनहीं आएगा। मध्य प्रदेश की मेट्रो का असली इम्तिहान 2028 से 2030 के बीचहोगाजब इनका पूरा रिंग रूट और अंडरग्राउंड नेटवर्क तैयार हो जाएगा।