यह बहुत ही हास्यास्पद है और मुझे हंसी आती है कि सौ साल से भी पुरानी कांग्रेस पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल जैसी मजबूत क्षेत्रीय पार्टियां, और साथ ही 'आम आदमी पार्टी' (जो अन्ना हजारे के नेतृत्व में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से पैदा हुई थी) - ये सभी अब CJP के बैनर तले काम करने वाले कुछ नए और बदनाम लोगों पर निर्भर हो गई हैं।
आप सोच सकते हैं कि ये पुरानी पार्टियां कितनी खोखली और नेतृत्वहीन रही हैं और आज भी हैं। ये लगातार चुनाव हारती रही हैं, और अब सत्ता में वापसी के लिए एक नए 'प्रेशर ग्रुप' (दबाव समूह) के सहारे और मार्गदर्शन की उम्मीद कर रही हैं।
मेरी राय में, ये बस ख्याली दुनिया में जी रही हैं। हो सकता है आप मुझसे सहमत न हों, लेकिन मेरा पक्का मानना है कि हर शांतिप्रिय भारतीय को देश में चल रहे गलत इरादों वाले विरोध-प्रदर्शनों के बारे में पता होना चाहिए।
हमें खुद को और अपने देश को ऐसे लोगों से बचाना चाहिए, जो विदेशी एजेंसियों के उकसावे पर भारत को अस्थिर और विभाजित करने की कोशिश कर रहे हैं—ठीक वैसे ही, जैसा बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका और अन्य जगहों पर हुआ था।कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने भारत के चुनाव आयोग के पास खुद को एक राजनीतिक दल के रूप में पंजीकृतनहीं कराया है।
इसके संस्थापक अभिजीत दिपके और मुख्य नेतृत्व ने कई बार स्पष्ट किया है कि CJP का इरादा एकआधिकारिक चुनावी राजनीतिक दल बनने के बजाय, एक स्वतंत्र जन-दबाव समूह और सामाजिक आंदोलन केरूप में बने रहने का है।
Cockroach Janta Party (CJP) has not registered itself as a political party with the Election Commission of India.
Founder Abhijeet Dipke and the core leadership have repeatedly clarified that the CJP intends to remain an independent public pressure group and social movement rather than transitioning into an official electoral political party.
कई नागरिकों और विश्लेषकों द्वारा विपक्ष और इस तरह के आंदोलनों की कार्यप्रणाली पर उठाया जाता है।आपके द्वारा उठाए गए बिंदुओं को आम जनता की भाषा (हिंदी) में समझने के लिए इसे नीचे सरल रूप में समझाया गया है:
- कानूनी मान्यता का न होना (No Legal Status): इस समूह (CJP) का कोई कानूनी वजूद या चुनावीपंजीकरण नहीं है। यह सिर्फ सोशल मीडिया और इंटरनेट के जरिए बनाया गया एक दबाव समूह(Pressure Group) है, जिसके पास देश को चलाने के लिए कोई गंभीर या लिखित नीति (Declared Policy) नहीं है।
- संविधान की आड़ में दबाव की राजनीति (Pressure Tactics vs. Constitution): आलोचकों कामानना है कि ये समूह और कुछ विपक्षी दल बात तो 'संविधान बचाने' की करते हैं, लेकिन वास्तव में वे देशकी संवैधानिक न्याय प्रणाली पर भरोसा नहीं दिखाते। जब कोर्ट या एजेंसियां उनके मनमुताबिक फैसला नहीं देतीं, तो वे सड़कों पर या डिजिटल माध्यमों से दबाव बनाकर सरकार को अस्थिर करने का प्रयास करतेहैं।
- संवैधानिक संस्थाओं पर अविश्वास (Attacking Democratic Institutions): लोकतांत्रिकव्यवस्था में चुनाव आयोग (ECI), सर्वोच्च न्यायालय (CJI), जांच एजेंसियां (CBI, ED, IT) और देश के शीर्ष पद (प्रधानमंत्री और गृहमंत्री) रीढ़ की हड्डी होते हैं। विपक्ष और इन दबाव समूहों द्वारा इन सभी संस्थाओं पर लगातार सवाल उठाना और उन्हें 'बिक चुका' या 'पक्षपाती' बताना, संस्थाओं के प्रति आम जनता का भरोसा कम करता है।
- जनता के बीच काम करने के बजाय शॉर्टकट (Lacking Groundwork): लोकतंत्र में सत्ता पाने का एकमात्र वैध रास्ता चुनाव जीतना और जनता का दिल जीतना है। इसके लिए जमीन पर रहकर मतदाताओं के साथ मजबूत संबंध बनाने पड़ते हैं। आलोचकों के अनुसार, चुनावों में लगातार मिल रही हार के कारण विपक्ष जमीन पर मेहनत करने के बजाय ऐसी शॉर्टकट राजनीति और संस्थाओं को बदनाम करने का रास्ता चुन रहा है।
- अराजकता का माहौल (Creating Instability): लोकतांत्रिक मर्यादाओं को ताक पर रखकर हर व्यवस्था को 'मैनिप्युलेटेड' (प्रभावित) बताना देश में एक तरह की अस्थिरता और भ्रम का माहौल पैदा करता है, जो देश के विकास और लोकतांत्रिक ढांचे के लिए सही नहीं माना जाता।
यह दृष्टिकोण समाज के एक बड़े वर्ग और आम नागरिकों का है, जो विरोध प्रदर्शनों के कारण होने वाली दैनिक समस्याओं से परेशान होते हैं। इस बिंदु को आम जनता की भाषा (हिंदी) में नीचे स्पष्ट रूप से समझाया गया है:
- कानूनी अधिकार के बिना जनजीवन बाधित करना (Disrupting Life Without Legal Authority): एक गैर-पंजीकृत दबाव समूह (Unregistered Pressure Group) होने के नाते, इससंगठन के पास ऐसा कोई कानूनी अधिकार या विशेषाधिकार नहीं है जिसके तहत वे सड़कों को रोक सकेंया आम जनता की शांति में खलल डाल सकें।
- आम नागरिकों के व्यापार को नुकसान (Impact on Common Man's Business): जब भी ऐसेआंदोलनों के कारण रास्ते बंद होते हैं या विरोध प्रदर्शन होते हैं, तो इसका सीधा असर रोज कमाने-खाने वाले दुकानदारों, रेहड़ी-पटरी वालों और छोटे व्यापारियों पर पड़ता है। उनका व्यापार ठप हो जाता है, जिससे आम आदमी की आर्थिक स्थिति प्रभावित होती है।
- जनता के पैसे की बर्बादी (Waste of Public Money): इन आंदोलनों के दौरान कानून-व्यवस्था (Law and Order) बनाए रखने और शहर की शांति की रक्षा के लिए बड़े पैमाने पर पुलिस बल और सुरक्षा एजेंसियों को तैनात करना पड़ता है। इसमें लगने वाला भारी-भरकम खर्च वास्तव में देश के ईमानदार टैक्सपेयर्स (Taxpayers) का पैसा होता है, जो विकास कार्यों में लगने के बजाय इन प्रदर्शनों को संभालने में बर्बाद हो जाता है।
- शांतिप्रिय नागरिकों की सुरक्षा को खतरा (Threat to Peace and Tranquility): देश का बहुसंख्यकवर्ग शांति और सुरक्षा से रहना चाहता है। बिना किसी कानूनी जवाबदेही के किए जाने वाले ऐसे प्रदर्शन न केवल शहर का माहौल खराब करते हैं, बल्कि आपातकालीन सेवाओं (जैसे एम्बुलेंस या दमकल गाड़ियों) केरास्ते में भी बाधा बनते हैं, जिससे निर्दोष नागरिकों की सुरक्षा खतरे में पड़ती है।
सुप्रीम कोर्ट (सर्वोच्च न्यायालय) ने आम नागरिकों की सुविधा, सामाजिक शांति और विरोध प्रदर्शन के अधिकारके बीच संतुलन बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण फैसले और दिशानिर्देश दिए हैं। आपके समझने के लिए इन्हें नीचेसरल हिंदी में समझाया गया है:
- सार्वजनिक स्थानों पर अनिश्चितकालीन कब्जा नहीं (Public Places Cannot Be Occupied Indefinitely): प्रसिद्ध शाहीन बाग मामले (2020) में फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया थाकि विरोध प्रदर्शन के नाम पर सार्वजनिक रास्तों, सड़कों या जगहों को अनिश्चितकाल के लिए नहीं घेरा जासकता। कोर्ट ने कहा कि विरोध का अधिकार अपनी जगह है, लेकिन इसके कारण आम जनता केआने-जाने के अधिकार का हनन नहीं होना चाहिए।
- प्रदर्शन के लिए तय की गई जगहें (Designated Areas for Dissent): न्यायपालिका के अनुसार, कोई भी संगठन अपनी मर्जी से किसी भी सड़क या राष्ट्रीय राजमार्ग (Highway) को बंद करके नहीं बैठसकता। प्रशासन और पुलिस द्वारा प्रदर्शनों के लिए जो जगहें तय (Designated Areas) की गई हैं, आंदोलन सिर्फ वहीं होना चाहिए ताकि आम जनजीवन प्रभावित न हो।
- सरकारी और निजी संपत्ति को नुकसान की भरपाई (Protection of Property): कानून के तहत, यदिकिसी आंदोलन या प्रदर्शन के दौरान किसी दुकान, वाहन या सरकारी संपत्ति (जैसे बस, रेलवे या सड़क) कोनुकसान पहुंचता है, तो उसकी पूरी वित्तीय भरपाई आंदोलन के आयोजकों (Organizers) से की जासकती है। इसके लिए उन्हें व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।
- रास्ता साफ कराने की प्रशासन की जिम्मेदारी (Duty of the Administration): अदालतों ने यह भीसाफ किया है कि सार्वजनिक रास्तों को खुला रखना और यातायात सुचारू रूप से चलाना स्थानीय पुलिसऔर प्रशासन की जिम्मेदारी है। अवैध रूप से लगाए गए जाम या ब्लॉकेड को हटाने के लिए पुलिस को हरबार कोर्ट के आदेश का इंतजार करने की जरूरत नहीं है।
- अधिकारों की सीमा (Balance of Rights): भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(b) शांतिपूर्ण ढंग सेइकट्ठा होने का अधिकार देता है, लेकिन यह अधिकार असीमित (Absolute) नहीं है। सार्वजनिकव्यवस्था (Public Order) और देश की सुरक्षा के हित में इस पर 'उचित प्रतिबंध' लगाए जा सकते हैं।
They are nothing but wondering in dreamland ,this is my view, you may differ or not I do not know, But I am of strong conviction that every peace loving Indian must be aware of ill motivated protest going on ine country. We must protect us and our country from people who under provocation from foreign agencies are trying to disturb and disintegrate India in line with what happened in Bangladesh,Nepal, Sri Lanka and elsewhere.