Between 2010 and the post-AQR/COVID lows of 2018–2020, public sector bank shares suffered devastating value erosion as aggressive post-2008 loan expansion, Corporate Debt Restructuring (CDR), and evergreening gave way to asset quality recognition, soaring provisions, and ballooning gross NPAs.
Once legacy bad debts were fully provisioned, the Insolvency and Bankruptcy Code (IBC) began recovering corporate dues, and banks were consolidated into 12 capitalized lenders, public sector bank earnings rebounded to record highs—propelling share prices back to multi-year and all-time highs.
What Drove the Collapse (50% to 90% Destruction)
The Forbearance Illusion (2010–2014): Heavy credit disbursement toward power, steel, infrastructure, and telecom assets went unpaid. Rather than forcing recovery, CDR mechanisms permitted banks to defer recognition, capital was starved, and book values appeared artificially inflated.
The Truth Unveiled (2015–2018): When RBI Governor Raghuram Rajan ordered the Asset Quality Review (AQR) and outlawed forbearance restructuring mechanisms, loans migrated en masse to Gross NPAs.
Erosion of Net Worth & PCA: Eleven out of 21 public sector banks breached capital adequacy thresholds and were placed under RBI's Prompt Corrective Action (PCA) framework, which barred them from lending or opening branches. With provisioning absorbing 100%+ of operating profits, institutional investors exited en masse, driving stocks down 70% to 90%.
What Fueled the Decade-Long Turnaround
Clean-Slate Accounting & Legal Muscle: The introduction of the Insolvency and Bankruptcy Code (IBC) in 2016 shifted leverage from defaulting corporate promoters to lending banks, enabling resolution of mega-accounts (such as Essar Steel, Bhushan Steel).
Massive Recapitalization & Mergers: Over ₹3 lakh crore was infused through recapitalization bonds, repairing bank balance sheets. In 2019–2020, 10 state-run lenders were consolidated into four anchor banks (e.g., PNB absorbing OBC and United Bank; BoB absorbing Vijaya and Dena Bank; Canara absorbing Syndicate Bank), creating stronger balance sheets and economies of scale.
Profitability Milestones: Gross NPAs across public sector banks tumbled from over 14.6% in March 2018 to under 3% by 2024–2025. Aggregate annual net profit across the remaining 12 public sector banks crossed ₹1.4 lakh crore to ₹1.5 lakh crore, turning these institutions into high-dividend, high-ROA (Return on Assets) leaders and sending market capitalizations to fresh record highs.
सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की ऐतिहासिक यात्रा: छुपाए गए एनपीए, शेयरों का महा-पतन और 2014 के बाद का कायाकल्प
1. पृष्ठभूमि: 'एवरग्रीनिंग' और रीस्ट्रक्चरिंग का भ्रमजाल (2008–2014)
2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद देश के बैंकिंग क्षेत्र में एक खतरनाक चलन शुरू हुआ। बड़े कॉरपोरेट घरानों को इंफ्रास्ट्रक्चर, बिजली, स्टील और दूरसंचार जैसे क्षेत्रों के लिए अंधाधुंध कर्ज बांटे गए। जब ये परियोजनाएं अटकने लगीं और उद्योगपति किस्तें चुकाने में नाकाम रहे, तब कर्ज वसूली के कड़े कदम उठाने के बजाय एक 'कृत्रिम व्यवस्था' तैयार की गई।
कॉरपोरेट डेट रीस्ट्रक्चरिंग (CDR) का खेल: डूबे हुए खातों को एनपीए (NPA) घोषित करने के बजाय बैंकों ने उन्हें बार-बार रीस्ट्रक्चर किया। नए कर्ज देकर पुराने कर्ज की किस्तें भरी गईं—जिसे वित्तीय शब्दावली में 'Evergreening' (डूबे कर्ज को कागजों पर हरा-भरा बनाए रखना) कहा जाता है।
छिपा हुआ कर्ज (Hidden Bad Debts): नियमों में दी गई छूट का फायदा उठाकर बैंकों ने लगभग 4 से 5 लाख करोड़ रुपये के डूबे कर्ज को अपनी बैलेंस शीट में 'Standard Assets' (सामान्य चालू खाते) के रूप में दर्ज रखा।
कागजी मुनाफा और रेटिंग्स का दिखावा: इससे बैंकों का वास्तविक घाटा छिप गया और कागजी मुनाफा दिखता रहा। हालांकि, अंदर ही अंदर बैंकों की वास्तविक पूंजी खत्म हो रही थी। रेटिंग्स को बचाने के लिए करदाताओं के ₹80,000 करोड़ से अधिक की पूंजी झोंकी गई, लेकिन बीमारी का इलाज करने के बजाय केवल लक्षणों को दबाया जाता रहा।
2. शेयरों का महा-पतन: जब सच सामने आया (2015–2020)
2014 में सरकार बदलने के बाद भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने 2015 में 'एसेट क्वालिटी रिव्यू' (AQR) शुरू किया। इसके तहत बैंकों को आदेश दिया गया कि कालीन के नीचे दबाए गए सारे खराब कर्जों को पारदर्शी तरीके से बैलेंस शीट पर दर्ज किया जाए।
जैसे ही छुपा हुआ कचरा बाहर आया:
1. सरकारी बैंकों का कुल एनपीए मार्च 2018 तक बढ़कर ₹8.95 लाख करोड़ के पार चला गया।
2. 21 सरकारी बैंकों में से 11 बैंक इतने कमजोर हो गए कि आरबीआई को उन पर Prompt Corrective Action (PCA) लगाना पड़ा, जिससे उनका नया कर्ज बांटना रुक गया।
3. भारी प्रोविजनिंग के कारण बैंक भारी नुकसान में चले गए, जिसके चलते शेयर बाजार में निवेशकों का भरोसा पूरी तरह टूट गया और सरकारी बैंकों के शेयर 50% से लेकर 90% तक क्रैश हो गए।
3. शीर्ष 10 बैंकों की स्थिति: शिखर से खाई तक और फिर रिकॉर्ड रिकवरी
(नोट: ऐतिहासिक कीमतों को स्टॉक विभाजन / स्प्लिट के अनुसार समायोजित किया गया है)
1. भारतीय स्टेट बैंक (State Bank of India - SBI)
पतन का दौर: 2010 के आसपास लगभग ₹350 पर ट्रेड करने वाला एसबीआई खराब कर्जों की प्रोविजनिंग और बट्टे खाते के दबाव में मार्च-मई 2020 तक गिरकर लगभग ₹150 के निचले स्तर पर आ गया। इसमें लगभग 57% की गिरावट दर्ज की गई।
पुनरुद्धार: बैलेंस शीट के शुद्धिकरण और कॉर्पोरेट रिकवरी के बाद एसबीआई देश का सबसे मजबूत बैंकिंग इंजन बनकर उभरा। इसका शेयर ₹150 के निचले स्तर से लगभग 6 गुना बढ़कर ₹850–₹915 के पार पहुंच गया और बैंक ने ₹60,000 करोड़ से अधिक का वार्षिक शुद्ध मुनाफा दर्ज किया।
2. पंजाब नेशनल बैंक (Punjab National Bank - PNB)
पतन का दौर: 2010–11 में लगभग ₹260 पर रहने वाला पीएनबी बड़े घोटालों और अनसुलझे एनपीए के चलते ऐतिहासिक रूप से टूट गया। 2020 तक इसका शेयर ₹26–₹28 के स्तर तक आ गिरा, यानी इसमें करीब 89% से 90% की भारी वेल्थ इरोजन हुई।
पुनरुद्धार: ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स और यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया के सफल विलय और आक्रामक वसूली के बाद पीएनबी ने शानदार वापसी की। इसका शेयर अपने निचले स्तर से लगभग 5 गुना सुधरकर ₹130–₹145 के दायरे में पहुंचा।
3. बैंक ऑफ बड़ौदा (Bank of Baroda - BoB)
पतन का दौर: 2010 में लगभग ₹215 का स्तर छूने वाला बैंक ऑफ बड़ौदा छुपे हुए एनपीए बाहर आने के बाद 2020 के संकट में मात्र ₹36–₹40 तक गिर गया। इसमें 82% से अधिक की गिरावट आई।
पुनरुद्धार: देना बैंक और विजया बैंक के विलय के बाद बैंक ऑफ बड़ौदा ने तकनीक और रिटेल लोन पर ध्यान केंद्रित किया। बैंक का शेयर अपने निचले स्तर से लगभग 7 से 8 गुना उछलकर ₹270–₹295 तक जा पहुंचा।
4. केनरा बैंक (Canara Bank)
पतन का दौर: 2010 में (स्प्लिट-एडजस्टेड) लगभग ₹160–₹165 पर चलने वाला यह बैंक एवरग्रीनिंग के खुलासे के बाद गहरे संकट में फंसा। 2020 में इसका शेयर गिरकर मात्र ₹15–₹16 रह गया, यानी निवेशकों की पूंजी में 90% तक का सफाया हो गया।
पुनरुद्धार: सिंडिकेट बैंक के विलय और बेहतर अंडरराइटिंग के बल पर केनरा बैंक का नेट एनपीए रिकॉर्ड निचले स्तरों पर आ गया। इसका शेयर निचले स्तर से 7 से 8 गुना बढ़कर ₹115–₹130 के स्तर को छू गया।
5. यूनियन बैंक ऑफ इंडिया (Union Bank of India)
पतन का दौर: 2010 में करीब ₹75–₹80 पर ट्रेड करने वाला यह शेयर कॉरपोरेट डिफॉल्ट की मार झेलते हुए 2020 में ₹19–₹22 तक फिसल गया। इसमें 73% से अधिक का नुकसान दर्ज हुआ।
पुनरुद्धार: आंध्रा बैंक और कॉर्पोरेशन बैंक के समावेशन के बाद यूनियन बैंक ने कॉरपोरेट बुक को दुरुस्त किया और इसका शेयर 7 से 8 गुना चढ़कर ₹150–₹175 के पार निकल गया।
6. बैंक ऑफ इंडिया (Bank of India - BoI)
पतन का दौर: 2010 में लगभग ₹115–₹120 की ऊंचाई पर रहने वाला बैंक ऑफ इंडिया आरबीआई के पीसीए फ्रेमवर्क में फंस गया था। 2020 में इसका भाव गिरकर ₹28–₹30 रह गया था (लगभग 75% की गिरावट)।
पुनरुद्धार: सख्त रिकवरी उपायों और सरकारी बॉन्ड के जरिए पूंजी मिलने के बाद यह पीसीए से बाहर आया और शेयर 4.5 से 5 गुना सुधरकर ₹140–₹155 के पार पहुंचा।
7. इंडियन ओवरसीज बैंक (Indian Overseas Bank - IOB)
पतन का दौर: 2010 में ₹80–₹90 के बीच बिकने वाला आईओबी सबसे ज्यादा बीमार बैंकों में गिना जाने लगा था। इसका ग्रॉस एनपीए 25% से ऊपर चला गया था और शेयर 2020 में गिरकर मात्र ₹6–₹7 का 'पेनी स्टॉक' बन गया (92% की तबाही)।
पुनरुद्धार: वर्षों के कड़े वित्तीय अनुशासन और गैर-निष्पादित संपत्तियों की वसूली के बाद यह बैंक पूरी तरह मुनाफे में लौटा। शेयर ने निचले स्तर से 10 से 12 गुना की अभूतपूर्व छलांग लगाई और ₹70–₹85 तक पहुंच गया।
8. सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया (Central Bank of India)
पतन का दौर: 2010 में ₹55–₹60 के स्तर पर रहने वाला यह बैंक लगातार भारी नुकसान में रहा और वर्षों तक पीसीए के प्रतिबंधों में जकड़ा रहा। 2020 में इसका शेयर गिरकर ₹10–₹12 रह गया (80% की गिरावट)।
पुनरुद्धार: परिचालन दक्षता और रिकवरी के चलते यह अंततः पीसीए से बाहर निकला और इसका शेयर 5 से 6 गुना बढ़कर ₹65–₹75 के स्तर तक पहुंचा।
9. यूको बैंक (UCO Bank)
पतन का दौर: 2010 के समय लगभग ₹45–₹50 के स्तर पर बिकने वाला यूको बैंक कॉरपोरेट कर्ज के डूबने से पूरी तरह लड़खड़ा गया था। 2020 में इसका भाव गिरकर मात्र ₹9–₹10 रह गया था (लगभग 80% का नुकसान)।
पुनरुद्धार: आक्रामक लोन रिकवरी और खुदरा कर्ज विस्तार के दम पर यूको बैंक ने लगातार तिमाही मुनाफा कमाना शुरू किया और शेयर अपने निचले स्तर से 5 से 6 गुना बढ़कर ₹55–₹65 के दायरे में आ गया।
10. बैंक ऑफ महाराष्ट्र (Bank of Maharashtra)
पतन का दौर: 2010 में लगभग ₹30–₹35 पर ट्रेड करने वाला बैंक ऑफ महाराष्ट्र बढ़ते एनपीए के चलते 2020 में ₹8–₹9 तक गिर गया था (75% की गिरावट)।
पुनरुद्धार: कायाकल्प के बाद यह बैंक आज देश के सबसे बेहतरीन वित्तीय अनुपात (Lowest Net NPA और Highest Credit Growth) वाले बैंकों में शुमार हो गया। इसका शेयर निचले स्तर से 7 से 8 गुना उछलकर ₹60–₹70 के पार पहुंच गया।
4. 2014 के बाद का बदलाव: बैंकिंग तंत्र का पुनर्जन्म
यह बदलाव केवल बाजार की तेजी नहीं, बल्कि ठोस नीतिगत सुधारों का परिणाम था:
1. इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC, 2016): देश के इतिहास में पहली बार यह कानून बना कि यदि कोई प्रमोटर जानबूझकर कर्ज नहीं चुकाएगा, तो उसकी कंपनी छीन ली जाएगी। भूषण स्टील, एस्सार स्टील जैसे विशाल डिफॉल्टरों से लाखों करोड़ की वसूली इसी कानून से संभव हुई।
2. समेकन और मजबूती (Bank Consolidation): दर्जनों कमजोर और आपस में प्रतिस्पर्धा करने वाले सरकारी बैंकों का विलय कर 12 मजबूत, बड़े और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बैंक बनाए गए।
3. पारदर्शी और स्वायत्त गवर्नेंस: लोन देने में राजनीतिक हस्तक्षेप को पूरी तरह समाप्त किया गया। बैंक बोर्ड्स ब्यूरो (अब FSIB) के माध्यम से शीर्ष पदों पर पारदर्शी नियुक्तियां की गईं।
4. ऐतिहासिक मुनाफा: जो सरकारी बैंक 2015 से 2018 के बीच कुल मिलाकर लाखों करोड़ रुपये के सामूहिक घाटे में थे, वे वित्तीय वर्ष 2023-24 और 2024-25 में ₹1.4 लाख करोड़ से ₹1.5 लाख करोड़ से अधिक का रिकॉर्ड सामूहिक वार्षिक शुद्ध लाभ कमाने लगे।
5. एनपीए का न्यूनतम स्तर: ग्रॉस एनपीए जो कभी 14% से 15% के पार चला गया था, वह घटकर 3% से भी नीचे आ गया और नेट एनपीए 1% से कम के ऐतिहासिक सुरक्षित स्तर पर पहुंच गया।
निष्कर्ष
2008–2014 के दौरान अपनाई गई रीस्ट्रक्चरिंग और एवरग्रीनिंग की नीतियों ने सरकारी बैंकों को दिवालियापन के मुहाने पर ला खड़ा किया था, जिसके कारण निवेशकों के लाखों करोड़ रुपये डूब गए थे और शेयरों में 90% तक की गिरावट आई थी।
2014 के बाद अपनाई गई सख्त नीति—पहचान (Recognition), समाधान (Resolution), पुनर्पूंजीकरण (Recapitalisation), और सुधार (Reforms)—ने न केवल इन बैंकों को वेंटिलेटर से बाहर निकाला, बल्कि उन्हें फिर से देश की अर्थव्यवस्था की सबसे मजबूत रीढ़ बना दिया।
जब शेयरों की कीमत बढ़ती है, तो इससे पता चलता है कि मौजूदा शासन के दौरान स्थिति में कितना सुधार हुआ है। जब शेयरों की कीमत बढ़ती है, तो बैंक कर्मचारियों सहित सभी हितधारकों को फायदा होता है।
बैंक के वही कर्मचारी, जो पहले बैंक प्रबंधन और कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व वाली तत्कालीन UPA सरकार को कोस रहे थे - जब उनके बैंक शेयरों की कीमत 60 से 80 प्रतिशत तक गिर गई थी - वे अब महसूस करते हैं कि उन्हें अपना खोया हुआ पैसा वापस मिल गया है।When value of shares grow it reveals how much health improved during current regime.whdn share value grows all stake holders including bank staff are gainer in value.
Same staff of the bank who were cursing bank management and the thrn UPA government led by Congress Party when value of their bank shares fell sharply by 60 to 80 percent and now these staff feel they have gained their lost money.

