Wednesday, September 2, 2026

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का पतन का इतिहास


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भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का विस्तृत ऐतिहासिक प्रतिवेदन (1885 से वर्तमान तक)

1. स्थापना और स्वतंत्रता-पूर्व का कालखंड (1885–1947)

  • स्थापना (1885): भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना 28–31 दिसंबर 1885 को बॉम्बे के गोकुलदासतेजपाल संस्कृत कॉलेज में एक सेवानिवृत्त ब्रिटिश सिविल सेवक एलन ऑक्टेवियन ह्यूम (A.O. Hume) द्वारा की गई। इसमें दादाभाई नौरोजी और दिनशा वाचा की प्रमुख भूमिका रही। पहले अधिवेशन कीअध्यक्षता व्योमेश चन्द्र बनर्जी (W.C. Bonnerjee) ने कीजिसमें 72 प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
  • उदारवादी चरण (1885–1905): प्रारंभिक नेतृत्व ने याचिकाओंसंवैधानिक सुधारों और प्रशासनिकप्रतिनिधित्व पर बल दिया। दादाभाई नौरोजी ने 'ड्रेन ऑफ वेल्थ' (धन निष्कासनसिद्धांत के जरिए ब्रिटिशआर्थिक शोषण को उजागर किया।
  • उग्रवादी चरण और सूरत विभाजन (1905–1916): 1905 के बंगाल विभाजन के विरोध में बाल गंगाधरतिलकबिपिन चंद्र पाल और लाला लाजपत राय (लाल-बाल-पालने स्वदेशीबहिष्कार और पूर्ण स्वराजका आह्वान किया। कार्यशैली के मतभेदों के चलते 1907 के सूरत अधिवेशन में दल विभाजित हुआजिसका पुनः एकीकरण 1916 के लखनऊ अधिवेशन में हुआ।
  • गांधीवादी युग (1919–1947): रॉलेट एक्ट और जलियांवाला बाग नरसंहार (1919) के बाद महात्मागांधी के नेतृत्व में कांग्रेस एक अभिजात्य मंच से बदलकर जनआंदोलन बनी:
    • असहयोग आंदोलन (1920–1922)
    • सविनय अवज्ञा आंदोलन और दांडी मार्च (1930–1934)
    • भारत छोड़ो आंदोलन (1942)
  • प्रांतीय चुनाव (1937 और 1946):
    • भारत सरकार अधिनियम 1935 के तहत 1937 के चुनावों में कांग्रेस ने मद्राससंयुक्त प्रांतमध्यप्रांतबिहार और उड़ीसा में पूर्ण बहुमत पाया।
    • 1946 के प्रांतीय चुनावों में सामान्य सीटों पर कांग्रेस का दबदबा रहा (1,585 में से 923 सीटें जीतीं), जिसके आधार पर भारत की संविधान सभा का गठन हुआ।

2. लोकसभा आम चुनावों का संपूर्ण चुनावी प्रदर्शन (1951 से 2024)

1. 1951–52 (प्रथम लोकसभा)

  • नेता / प्रधानमंत्री चेहराजवाहरलाल नेहरू
  • सीटें जीतीं / कुल सीटें: 364 / 489
  • मत प्रतिशत: 44.99%
  • परिणामभारी बहुमत से सरकार का गठन

2. 1957 (द्वितीय लोकसभा)

  • नेता / प्रधानमंत्री चेहराजवाहरलाल नेहरू
  • सीटें जीतीं / कुल सीटें: 371 / 494
  • मत प्रतिशत: 47.78%
  • परिणामपूर्ण बहुमत से सरकार का गठन

3. 1962 (तृतीय लोकसभा)

  • नेता / प्रधानमंत्री चेहराजवाहरलाल नेहरू
  • सीटें जीतीं / कुल सीटें: 361 / 494
  • मत प्रतिशत: 44.72%
  • परिणामपूर्ण बहुमत से सरकार का गठन

4. 1967 (चतुर्थ लोकसभा)

  • नेता / प्रधानमंत्री चेहराइंदिरा गांधी
  • सीटें जीतीं / कुल सीटें: 283 / 520
  • मत प्रतिशत: 40.78%
  • परिणामबहुमत प्राप्तलेकिन कई राज्यों में पहली बार सत्ता गंवाई

5. 1971 (पांचवीं लोकसभा)

  • नेता / प्रधानमंत्री चेहराइंदिरा गांधी
  • सीटें जीतीं / कुल सीटें: 352 / 518
  • मत प्रतिशत: 43.68%
  • परिणाम: 'गरीबी हटाओके नारे पर दो-तिहाई प्रचंड बहुमत

6. 1977 (छठी लोकसभा)

  • नेता / प्रधानमंत्री चेहराइंदिरा गांधी
  • सीटें जीतीं / कुल सीटें: 154 / 542
  • मत प्रतिशत: 34.52%
  • परिणामआपातकाल के बाद ऐतिहासिक पराजयमोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकारबनी

7. 1980 (सातवीं लोकसभा)

  • नेता / प्रधानमंत्री चेहराइंदिरा गांधी
  • सीटें जीतीं / कुल सीटें: 353 / 529
  • मत प्रतिशत: 42.69%
  • परिणामजनता पार्टी के पतन के बाद भारी बहुमत से वापसी

8. 1984 (आठवीं लोकसभा)

  • नेता / प्रधानमंत्री चेहराराजीव गांधी
  • सीटें जीतीं / कुल सीटें: 404 / 514 (1985 में पंजाब  असम के चुनाव बाद कुल 415)
  • मत प्रतिशत: 49.01%
  • परिणामभारतीय संसदीय इतिहास का सबसे बड़ा बहुमत (सहानुभूति लहर)

9. 1989 (नौवीं लोकसभा)

  • नेता / प्रधानमंत्री चेहराराजीव गांधी
  • सीटें जीतीं / कुल सीटें: 197 / 529
  • मत प्रतिशत: 39.53%
  • परिणामसबसे बड़ा दल बनने के बावजूद विपक्ष में बैठीवी.पीसिंह के नेतृत्व में नेशनल फ्रंट सरकार बनी

10. 1991 (दसवीं लोकसभा)

  • नेता / प्रधानमंत्री चेहरापी.वीनरसिम्हा राव
  • सीटें जीतीं / कुल सीटें: 232 / 521 (बाद में उपचुनावों सहित 244)
  • मत प्रतिशत: 36.50%
  • परिणामअल्पमत सरकार बनीऐतिहासिक आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत

11. 1996 (ग्यारहवीं लोकसभा)

  • नेता / प्रधानमंत्री चेहरापी.वीनरसिम्हा राव
  • सीटें जीतीं / कुल सीटें: 140 / 543
  • मत प्रतिशत: 28.80%
  • परिणामदूसरे स्थान पर खिसकीसंयुक्त मोर्चा सरकार को बाहर से समर्थन दिया

12. 1998 (बारहवीं लोकसभा)

  • नेता / प्रधानमंत्री चेहरासीताराम केसरी
  • सीटें जीतीं / कुल सीटें: 141 / 543
  • मत प्रतिशत: 25.82%
  • परिणामविपक्ष में बैठीअटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में राजग (NDA) सरकार बनी

13. 1999 (तेरहवीं लोकसभा)

  • नेता / प्रधानमंत्री चेहरासोनिया गांधी
  • सीटें जीतीं / कुल सीटें: 114 / 543
  • मत प्रतिशत: 28.30%
  • परिणामउस समय तक का न्यूनतम आंकड़ाराजग सत्ता में वापस आया

14. 2004 (चौदहवीं लोकसभा)

  • नेता / प्रधानमंत्री चेहरासोनिया गांधी / मनमोहन सिंह
  • सीटें जीतीं / कुल सीटें: 145 / 543
  • मत प्रतिशत: 26.53%
  • परिणामसंप्रग-1 (UPA-I) गठबंधन बनाकर डॉमनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने

15. 2009 (पंद्रहवीं लोकसभा)

  • नेता / प्रधानमंत्री चेहराडॉमनमोहन सिंह
  • सीटें जीतीं / कुल सीटें: 206 / 543
  • मत प्रतिशत: 28.55%
  • परिणामसंप्रग-2 (UPA-II) की वापसी और सीटों में बढ़ोतरी

16. 2014 (सोलहवीं लोकसभा)

  • नेता / प्रधानमंत्री चेहराराहुल गांधी
  • सीटें जीतीं / कुल सीटें: 44 / 543
  • मत प्रतिशत: 19.31%
  • परिणामइतिहास का सबसे निचला स्तरआधिकारिक नेता प्रतिपक्ष का दर्जा पाने में भी असमर्थ

17. 2019 (सत्रहवीं लोकसभा)

  • नेता / प्रधानमंत्री चेहराराहुल गांधी
  • सीटें जीतीं / कुल सीटें: 52 / 543
  • मत प्रतिशत: 19.49%
  • परिणाममात्र 8 सीटों की बढ़तलगातार दूसरी बार नेता प्रतिपक्ष का 10% कोटा हासिल करने से चूकी

18. 2024 (अठारहवीं लोकसभा)

  • नेता / प्रधानमंत्री चेहरामल्लिकार्जुन खड़गे / राहुल गांधी
  • सीटें जीतीं / कुल सीटें: 99 / 543
  • मत प्रतिशत: 21.19%
  • परिणाम: 'इंडियागठबंधन के साथ 99 सीटें जीतकर वापसीलोकसभा में नेता प्रतिपक्ष का आधिकारिकदर्जा पुनः प्राप्त किया

3. प्रमुख राज्यों की विधानसभाओं में कांग्रेस का क्षरण

उत्तर प्रदेश (कुल सीटें: 403)

  • 1980: 309 सीटें
  • 1985: 269 सीटें
  • 1989: 94 सीटें
  • 1991: 46 सीटें
  • 1996: 33 सीटें
  • 2007: 22 सीटें
  • 2012: 28 सीटें
  • 2017: 7 सीटें
  • 2022: 2 सीटें (मात्र 2.33% मत प्रतिशत)

बिहार (कुल सीटें: वर्ष 2000 से पूर्व 324, झारखंड बनने के बाद 243)

  • 1980: 241 सीटें
  • 1985: 196 सीटें
  • 1990: 71 सीटें
  • 1995: 29 सीटें
  • 2005: 9 सीटें
  • 2010: 4 सीटें
  • 2015: 27 सीटें (महागठबंधन का हिस्सा बनकर)
  • 2020: 19 सीटें (राजद के कनिष्ठ सहयोगी के रूप में)

पश्चिम बंगाल (कुल सीटें: 294)

  • 1972: 216 सीटें
  • 1977: 20 सीटें (वाममोर्चा का उदय)
  • 1987: 40 सीटें
  • 1996: 82 सीटें
  • 2001: 26 सीटें (ममता बनर्जी द्वारा तृणमूल कांग्रेस बनाने के बाद)
  • 2011: 42 सीटें (तृणमूल कांग्रेस के साथ गठबंधन में)
  • 2016: 44 सीटें (वाममोर्चा के साथ चुनावी तालमेल में)
  • 2021: 0 सीटें

तमिलनाडु (कुल सीटें: 234)

  • 1962: 139 सीटें (अंतिम बार स्वतंत्र बहुमत)
  • 1967: 51 सीटें (द्रमुक से पराजितइसके बाद कभी अपने दम पर सत्ता में नहीं  सकी)
  • 1989: 26 सीटें
  • 2006: 34 सीटें (द्रमुक सरकार को बाहर से समर्थन दिया)
  • 2016: 8 सीटें
  • 2021: 18 सीटें (द्रमुक गठबंधन के कनिष्ठ सहयोगी के रूप में)

आंध्र प्रदेश (कुल सीटें: विभाजन से पूर्व 294, 2014 के बाद 175)

  • 2004: 185 सीटें
  • 2009: 156 सीटें
  • 2014: 0 सीटें (राज्य विभाजन के भारी विरोध के कारण)
  • 2019: 0 सीटें
  • 2024: 0 सीटें

4. पार्टी की लोकप्रियता और जनाधार में गिरावट के बुनियादी कारण

क. वंशवादी वर्चस्व और जनमानस से अलगाव (Dynasty Dominance & Psychological Alienation)

  • योग्यता बनाम वंश का द्वंद्व: कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व पर एक ही परिवार के दशकों लंबे एकाधिकार ने यहसंदेश दिया कि पार्टी में सर्वोच्च पद केवल जन्म के आधार पर तय होते हैंकार्यक्षमता या योग्यता से नहीं।इसने करोड़ों महत्वाकांक्षी और योग्यता-आधारित सोच रखने वाले युवाओं को पार्टी से भावनात्मक मानसिक रूप से काट दिया।
  • आंतरिक लोकतंत्र का खात्मा: शीर्ष पर वंशवादी नियंत्रण के चलते पार्टी के अंदर संगठन चुनावों की जगह'हाई कमान संस्कृतिने ले ली। जमीनी कार्यकर्ताओं और प्रतिभाशाली मध्यवर्गीय नेताओं के आगे बढ़ने केरास्ते बंद हो गएजिससे पार्टी में चाटुकारिता को बढ़ावा मिला और ज़मीनी संघर्ष करने वाले नेता दरकिनारहोते चले गए।
  • बदलते भारत की आकांक्षाओं से असंपर्क: 1990 के दशक के बाद का भारत आर्थिक सुधारों और शिक्षा केप्रसार से अधिक महत्वाकांक्षी हुआ। जनता 'पुराने बलिदानोंऔर 'परिवार के एहसानोंके भावनात्मकआख्यान से आगे निकलकर सीधे प्रदर्शनत्वरित निर्णय और जवाबदेही की मांग करने लगी। इस नएमिजाज को समझने में वंशवादी नेतृत्व काफी पीछे रह गया।
  • कमजोर राजनीतिक संप्रेषण और स्थायी विकल्प का अभाव: राष्ट्रीय स्तर पर मजबूतचौबीसों घंटे सक्रियरहने वाले और जमीन से जुड़े नेताओं के सामने जब भी वंशवादी नेतृत्व अनिर्णयलंबे अवकाशों या निरंतरचुनावी असफलताओं से जूझता दिखातो आम मतदाताओं ने इसे नेतृत्व की अनिच्छा और विशेषाधिकारमानकर पार्टी को अपने प्राथमिक विकल्पों से पूरी तरह बाहर कर दिया।

ख. सामाजिक छत्रछाया (Umbrella Coalition) का विखंडन

  • मंडल आंदोलन और पिछड़ी जातियों का उभार: 1990 में मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद उत्तरभारत की पिछड़ी जातियों ने कांग्रेस से नाता तोड़कर अपने स्वतंत्र क्षेत्रीय दलों (सपाराजदजदयू आदिकागठन किया।
  • दलित मतों का छिटकना: कांशीराम और मायावती के नेतृत्व में बहुजन समाज पार्टी (बसपाके उदय नेकांग्रेस के पारंपरिक दलित वोट बैंक को पूरी तरह छीन लिया।
  • सवर्ण मतदाताओं का भाजपा की ओर झुकाव: आरक्षण विरोधी असंतोष और राम जन्मभूमि आंदोलन केप्रभाव में हिंदी भाषी राज्यों के सवर्ण मतदाता कांग्रेस छोड़कर भाजपा के स्थायी आधार बन गए।
  • अल्पसंख्यकों का भरोसा टूटना: 1986 में बाबरी मस्जिद का ताला खोलने, 1989 के शिलान्यास और1992 के विध्वंस के बाद मुस्लिम समुदाय क्षेत्रीय दलों (सपाराजदतृणमूलकी ओर मुड़ गया।

ग. क्षेत्रीय क्षत्रपों की उपेक्षा और दल का टूटना

  • इंदिरा गांधी के समय से ही राज्यों में मजबूत जनाधार वाले मुख्यमंत्रियों को कमजोर कर दिल्ली से'कठपुतलीनेता थोपने का चलन शुरू हुआ। इसके परिणामस्वरूप क्षत्रपों ने अलग पार्टियां बना लीं औरकांग्रेस का कैडर अपने साथ ले गए:
    • पश्चिम बंगाल (1997): ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस (TMC) बनाई।
    • महाराष्ट्र (1999): शरद पवार ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) बनाई।
    • आंध्र प्रदेश (2011): वाई.एसजगन मोहन रेड्डी ने वाईएसआर कांग्रेस (YSRCP) बनाई।
    • असम (2015): हिमंत बिस्वा सरमा के पार्टी छोड़ने से पूर्वोत्तर का ढांचा बिखर गया।

घ. 1985–1986 के दोहरे आत्मघाती नीतिगत फैसले

  • शाह बानो मामला (1986): सर्वोच्च न्यायालय के प्रगतिशील फैसले को संसद में कानून बनाकर पलटने सेकांग्रेस पर "तुष्टिकरणऔर मध्यकालीन सोच को बढ़ावा देने का आरोप लगा।
  • बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाना (1986): शाह बानो मामले में लगे आरोपों की भरपाई के लिए विवादितपरिसर का ताला खुलवाया गया। इससे हिंदू समुदाय का स्थायी समर्थन तो नहीं मिलालेकिन दशकों सेसाथ खड़ा मुस्लिम मतदाता पूरी तरह छिटक गया और राम मंदिर आंदोलन का पूरा चुनावी लाभ भाजपा कोमिला।

ङ. भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप और सत्ता-विरोधी लहर

  • बोफोर्स घोटाला (1987–1989): तोप सौदे में दलाली के आरोपों ने राजीव गांधी की 'मिस्टर क्लीनकीछवि को ध्वस्त किया और विपक्षी दलों को एकजुट होने का अवसर दिया।
  • संप्रग-2 के घोटाले (2009–2014): 2जी स्पेक्ट्रमकोयला ब्लॉक आवंटन और कॉमनवेल्थ गेम्स जैसेबड़े विवादोंबेकाबू महंगाई और नीतिगत पंगुता ने भारी जन-असंतोष पैदा किया। 2011 के 'इंडिया अगेंस्टकरप्शनआंदोलन ने इस माहौल को एक निर्णायक राष्ट्रीय लहर में बदल दियाजिसका लाभ उठाकर2014 में भाजपा पूर्ण बहुमत के साथ केंद्र में आई।