Wednesday, August 19, 2026

सम्मेद शिखरजी (पारसनाथ पर्वत, झारखंड)

 


सम्मेद शिखरजी (पारसनाथ पर्वत, झारखंड) जैन धर्म का सर्वोच्च और पवित्रतम महातीर्थ है, जहाँ 24 में से 20 तीर्थंकरों ने मोक्ष प्राप्त किया था। इसके प्रबंधन, पूजा के तौर-तरीकों और स्वामित्व को लेकर दिगंबर और श्वेतांबर जैन समाज के बीच लंबे समय से कानूनी और प्रशासनिक विवाद चल रहा है।  

विवाद का मुख्य कारण

 स्वामित्व और प्रबंधन का दावा: श्वेतांबर समुदाय (सेठ आनंदजी कल्याणजी पेढ़ी) का दावा है कि उन्होंने 1918 में पालगंज के राजा से पहाड़ के अधिकार खरीदे थे, इसलिए इसका प्रबंधन उनके पास होना चाहिए।  


 समान अधिकार और मूल स्वरूप: दिगंबर समुदाय (भारतवर्षीय दिगंबर जैन तीर्थक्षेत्र कमेटी) का कहना है कि यह पर्वत अनादि काल से संपूर्ण जैन समाज की आस्था का केंद्र है। 


किसी एक फिरके का इस पर एकाधिकार नहीं हो सकता, और पर्वत पर पूजा-पद्धति व टोंकों (चरण छत्रियों) के मूल स्वरूप में कोई एकतरफा बदलाव नहीं होना चाहिए।


विवाद की शुरुआत और कानूनी इतिहास

 19वीं सदी के अंत में: विवाद की शुरुआत 1880-1890 के दशक में पालगंज राजा द्वारा जमीन के पट्टों और पहाड़ पर निर्माण को लेकर शुरू हुई।


 प्रिवी काउंसिल फैसला (1933): ब्रिटिश काल में 'हुकुमचंद बनाम महाराज बहादुर' केस में प्रिवी काउंसिल (लंदन) ने फैसला दिया कि पहाड़ की मिल्कियत पालगंज राजा के पास थी, लेकिन सभी जैनियों को अपनी पद्धति से पूजा करने का अधिकार है।


 स्वतंत्रता के बाद (1950-1960 के दशक): 'बिहार भूमि सुधार अधिनियम, 1950' के तहत पहाड़ राज्य सरकार में निहित हो गया। 1965 में श्वेतांबर ट्रस्ट और बिहार सरकार के बीच एक करार हुआ, जिसके विरोध में 1967-1968 में गिरिडीह अदालत में नए मुकदमे (Title Suit No. 10 of 1967 और 23 of 1968) दायर हुए।  


मुख्य पक्षकार (Contestants)

 श्वेतांबर पक्ष: सेठ आनंदजी कल्याणजी पेढ़ी (अहमदाबाद) / जैन श्वेतांबर सोसाइटी।

 दिगंबर पक्ष: भारतवर्षीय दिगंबर जैन तीर्थक्षेत्र कमेटी और संबंधित दिगंबर प्रतिनिधि।

 अन्य पक्षकार: झारखंड राज्य सरकार (राजस्व एवं वन विभाग)।  


वर्तमान कानूनी स्थिति

 उच्च न्यायालय का निर्णय (2004): झारखंड/पटना उच्च न्यायालय ने श्वेतांबर समाज के एकाधिकार वाले दावे और 1965 के सरकारी समझौते को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि 46 एकड़ भूमि राज्य सरकार में निहित है और पर्वत की व्यवस्था के लिए एक संयुक्त समिति बनाई जाए जिसमें दिगंबर, श्वेतांबर और प्रशासन शामिल हों।


 सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court): इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई, जहाँ यह मामला अभी भी विचाराधीन/अपील में है। वर्तमान में दोनों पक्षों को अपनी-अपनी मान्यताओं के अनुसार शांतिपूर्ण दर्शन-वंदन की अनुमति है।


सरकारी हस्तक्षेप का इतिहास

 बिहार सरकार (1965): राज्य सरकार ने प्रबंधन को लेकर समझौता करने का प्रयास किया था, जिसे बाद में अदालतों ने चुनौती के दायरे में लिया।


 केंद्र व झारखंड सरकार (2022-2023): जब पारसनाथ क्षेत्र को पर्यावरण-पर्यटन (Eco-Tourism) क्षेत्र के रूप में अधिसूचित किया गया, तो देशव्यापी जैन आंदोलन के बाद केंद्र सरकार ने हस्तक्षेप कर पर्यटन गतिविधियों पर रोक लगाई और तीर्थ की पवित्रता बनाए रखने का निर्देश दिया।


आपसी समझौते (Amicable Settlement) की संभावना

चूंकि दोनों ही परंपराएं भगवान महावीर और 24 तीर्थंकरों के 'अहिंसा', 'अनेकांत' और 'अपरिग्रह' के सिद्धांतों का पालन करती हैं, इसलिए शांतिपूर्ण समाधान की पूरी संभावना है:


 दोनों पक्षों के शीर्ष मुनि भगवंतों और वरिष्ठ सामाजिक नेताओं द्वारा समय-समय पर साझा प्रबंधन मॉडल (Joint Management Board) बनाने के प्रयास हुए हैं।  


 समाधान का सबसे व्यावहारिक मार्ग यह माना जाता है कि बिना किसी मालिकाना हक के अहंकार के, पहाड़ की प्राकृतिक और आध्यात्मिक पवित्रता की रक्षा करते हुए दोनों संप्रदायों का एक संयुक्त ट्रस्ट गठित हो, ताकि यह महातीर्थ विवादों से मुक्त रह सके।


संदेश: श्री सम्मेद शिखरजी महातीर्थ के शांतिपूर्ण समाधान हेतु समग्र जैन समाज से विनम्र आह्वान


1. सभी पक्षकारों एवं मुकदमेबाजों (Litigants) के नाम:

"जितेन्द्रिय भाव ही जिन-शासन का आधार है। न्यायालयी विवादों से तीर्थ की मर्यादा और प्रभावना को ठेस पहुँचती है। कानूनी लड़ाइयों में व्यर्थ ऊर्जा और संसाधन लगाने के बजायबड़े हृदय से वार्ता की मेज पर आएं और भगवान महावीर के 'अनेकांत 'परस्परोपग्रहो जीवानाम्के सिद्धांत को अपनाते हुए इस ऐतिहासिक मुकदमेबाजी को समाप्त करने की दिशा में ठोस कदम उठाएं।"


2. विभिन्न स्थानीय जैन समाजों के नाम:

"स्थानीय स्तर पर किसी भी प्रकार के मतभेद या विवाद को बढ़ावा  दें। सभी मंदिरसंस्थाएं और स्थानीय ट्रस्ट परस्पर सौहार्द का माहौल बनाएं। सम्मेद शिखरजी हम सभी के तीर्थंकरों की तपोभूमि और मोक्षभूमि हैइसकी रक्षा और सम्मान में समग्र समाज को एक मंच पर खड़े होकर एकता का परिचय देना चाहिए।"


3. भारतवर्षीय दिगंबर जैन तीर्थक्षेत्र कमेटी के नाम:

"सम्मेद शिखरजी के अनादि गौरवटोंकों के मूल स्वरूप और संपूर्ण जैन समाज के समान अधिकारों की रक्षा करते हुएश्वेतांबर प्रतिनिधियों के साथ एक संयुक्तपारदर्शी और सर्वसमावेशी प्रबंधन व्यवस्था स्थापित करनेकी दिशा में सकारात्मक संवाद का नेतृत्व करें।"


4. श्वेतांबर जैन समाज / सेठ आनंदजी कल्याणजी पेढ़ी नेतृत्व के नाम:

"तीर्थों के संरक्षण में आपका योगदान ऐतिहासिक है। वर्तमान समय में इस पावन भूमि को केवल स्वामित्व या अधिकार के दृष्टिकोण से  देखकरसमग्र जैन समाज की भावना का सम्मान करते हुए दिगंबर समाज के साथ संयुक्त प्रबंधकीय समन्वय बनाकर विवाद को सदा के लिए शांत करने की पहल करें।"


5. आम जैन धर्मावलंबियों (Common Followers) के नाम:


"सोशल मीडिया या सार्वजनिक मंचों पर किसी भी प्रकार की कटुता या भड़काऊ बयानों से बचें। 


दोनों संप्रदायएक ही जिनवाणी और तीर्थंकर परंपरा के अनुयायी हैं। तीर्थ यात्रा के दौरान परस्पर आदरशांति और अनुशासन बनाए रखें और इस महातीर्थ को विवादमुक्त बनाने के लिए सामूहिक प्रार्थना एवं सद्भाव का वातावरण बनाएं।"


शासकीय हस्तक्षेप एवं मध्यस्थता हेतु प्रारूप पत्र (Draft Letter to Government Authorities)


प्रेषक: समग्र जैन समाज प्रतिनिधिमंडल

प्रति:

  1. माननीय केंद्रीय गृह मंत्री / अल्पसंख्यक कार्य मंत्रीभारत सरकारनई दिल्ली
  2. माननीय मुख्यमंत्रीझारखंड सरकाररांची

विषय: श्री सम्मेद शिखरजी (पारसनाथ पर्वतसे संबंधित दशकों पुराने विवाद के सौहार्दपूर्ण समाधान एवं उच्चस्तरीय मध्यस्थता समिति के गठन बाबत।


महोदय/महोदया,


सादर 'जय जिनेंद्र'


श्री सम्मेद शिखरजी (गिरिडीहझारखंडजैन धर्म का सर्वोच्च एवं अत्यंत पवित्र महातीर्थ है। विगत कई दशकों से इसके प्रबंधन और अधिकारों को लेकर दिगंबर और श्वेतांबर जैन समुदाय के बीच विभिन्न न्यायालयों में मुकदमे विचाराधीन हैंजिससे दोनों पक्षों के समयसाधन और सामाजिक सौहार्द पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।


अतः शासन से विनम्र अनुरोध है:

  1. उच्चस्तरीय मध्यस्थता समिति: केंद्र  राज्य सरकार की निगरानी में एक उच्चस्तरीय समिति (High-Level Mediation Panel) गठित की जाएजिसमें दोनों समुदायों के वरिष्ठ कानूनी विशेषज्ञआचार्य/विद्वान और सरकारी प्रतिनिधि शामिल हों।
  2. संयुक्त प्रबंधन बोर्ड: तीर्थ की आध्यात्मिक पवित्रतापर्यावरण और मूल स्वरूप की रक्षा हेतु एक वैधानिक'संयुक्त तीर्थ प्रबंधन ट्रस्ट/बोर्ड' (Joint Shrine Board) का प्रारूप तैयार कराया जाए।

जैन समाज देश के कानून और संविधान के प्रति पूर्ण समर्पित है। शासन की निष्पक्ष मध्यस्थता से यह विवाद सदैव के लिए समाप्त होकर सामाजिक शांति और तीर्थ की गरिमा को पुनर्जीवित कर सकता है।

भवदीय(समग्र जैन समाज के प्रतिनिधिगण)


From:

Delegation of the United Jain Community


To:

1. The Hon’ble Union Minister of Home Affairs / Minister of Minority Affairs, Government of India, New Delhi

2. The Hon’ble Chief Minister, Government of Jharkhand, Ranchi


Subject: Representation for the amicable resolution of the prolonged dispute regarding Shri Sammed Shikharji (Parasnath Hill) and the constitution of a High-Level Mediation Committee.


Respected Sir / Madam,


Greetings (Jai Jinendra).


Shri Sammed Shikharji (Giridih, Jharkhand) is the supreme and sacred pilgrimage shrine (Maha-Tirth) of the Jain faith. For several decades, legal disputes concerning administrative rights, management, and worship practices have remained pending before various courts between the Digambar and Shwetambar Jain communities, causing a substantial drain on resources and straining community harmony.


We therefore respectfully urge the government to consider the following measures:


1. High-Level Mediation Panel: Constitute an independent mediation committee under the oversight of the Central and State Governments, comprising senior legal jurists, revered scholars, and official representatives from both traditions.

2. Statutory Joint Shrine Board: Draft a legislative framework to establish a 'Joint Shrine Management Board' to safeguard the spiritual sanctity, ecological balance, and historical integrity of the sacred hill.


The Jain community remains deeply committed to the Constitution of India and the rule of law. Impartial governmental mediation will bring a definitive closure to this prolonged litigation and restore enduring peace and dignity to this holy shrine.


Yours sincerely,

(Representatives of the United Jain Community)