Tuesday, September 29, 2026

तत्वार्थसूत्र के द्वितीय अध्याय

 


तत्वार्थसूत्र के द्वितीय अध्याय पर आधारित यह प्रवचन जीवों के विभिन्न प्रकार, भावों, इंद्रियों, शरीरों और गतियों की विस्तृत व्याख्या प्रस्तुत करता है।

Listen Dr Sanjeev Godhha
आचार्य उमास्वामी द्वारा रचित इस ग्रंथ में संसारी और मुक्त जीवों के साथ-साथ उनके औपशमिक, क्षायिक और परिणामिक जैसे विभिन्न भावों का गहन विश्लेषण किया गया है। इसके अतिरिक्त, जीवों के उपयोग लक्षण, पाँच प्रकार की इंद्रियों की संरचना, और विग्रह गति के दौरान होने वाले गमन का सुंदर वर्णन किया गया है।

प्रवचन में औदारिक, वैक्रियक, आहारक, तैजस और कार्मण नामक पाँच शरीरों की विशेषताओं और उनके प्रयोग पर भी प्रकाश डाला गया है। अंत में, जन्म के प्रकार, योनियों के भेदों और आयु के अपवर्तन से जुड़े दार्शनिक सिद्धांतों को सरल रूप में समझाया गया है।

क्या आप जानते हैं कि आपकी आत्मा के पास 53 ऐसे असाधारण भाव हैं जो आपके कर्मों के उदय, उपशम और क्षय के अनुसार बदलते रहते हैं?

जैन दर्शन का यह अध्याय हमें जीवन के सबसे गहरे रहस्यों—आत्मा की पहचान, इंद्रियों की बनावट, मृत्यु के बाद आत्मा की यात्रा (विग्रह गति), और पाँच प्रकार के शरीरों की सूक्ष्म दुनिया में ले जाता है।

आइए, इस अद्भुत यात्रा पर चलें और जानें कि हम वास्तव में कौन हैं!
इस पाठ को पूरा करने के बाद आप सीखेंगे:
• जीव के पाँच असाधारण भावों (Aupashamik, Kshayik आदि) को समझना।
• जीव के लक्षण (उपयोग) और संसारी व मुक्त जीवों के भेदों को पहचानना।
• इंद्रियों के प्रकार (द्रव्य और भाव इंद्रिय) और उनके विषयों को जानना।
• विग्रह गति (आत्मा की यात्रा), जन्म के प्रकार और योनि के भेदों को समझना।
• पाँच शरीरों (औदारिक, वैक्रियक, आहारक, तैजस, कार्मण) और अकाल मरण (आयु अपवर्तन) के नियमों को जानना।
जीव के पांच असाधारण भाव
आचार्य उमास्वामी ने दूसरे अध्याय की शुरुआत जीव के असाधारण भावों से की है। ये वे भाव हैं जो केवल जीव (आत्मा) में ही पाए जाते हैं, अजीव में नहीं। इन्हें मुख्य रूप से पाँच भागों में बाँटा गया है, जिनके कुल 53 भेद होते हैं:

• औपशमिक भाव (2 भेद): यह कर्मों के दबने (उपशम) से होता है। इसके दो भेद हैं—औपशमिक सम्यक्त्व और औपशमिक चारित्र। इसके बिना धर्म की शुरुआत नहीं होती।

• क्षायिक भाव (9 भेद): कर्मों के पूरी तरह नष्ट (क्षय) होने पर यह प्रकट होता है। इसके बिना मोक्ष या परमात्मा अवस्था संभव नहीं है।

• क्षायोपशमिक या मिश्र भाव (18 भेद): जहाँ कुछ कर्म दबे हों और कुछ नष्ट हो चुके हों। संसारी जीवों की वर्तमान मानसिक दशाएँ इसी भाव से चलती हैं।

• औदयिक भाव (21 भेद): कर्मों के उदय से होने वाले भाव, जैसे क्रोध, मान, माया, लोभ और गतियां। इसमें 'लेश्या' (भावों की रंगत) भी शामिल है।
• पारणामिक भाव (3 भेद): यह वह स्वभाव है जो कर्मों के उदय, क्षय या उपशम पर निर्भर नहीं करता। इसके तीन भेद हैं—जीवत्व (जीने का स्वभाव), भव्यत्व (मोक्ष जाने की योग्यता), और अभव्यत्व।


पाँच असाधारण भाव
एक स्लाइड प्रस्तुति जो जीव के पाँचों भावों (औपशमिक, क्षायिक, क्षायोपशमिक, औदयिक, पारणामिक) को उनके भेदों, परिभाषाओं और महत्व के साथ स्पष्ट रूप से समझाती है।

जीव का लक्षण और उसके भेद
आखिर जीव की पहचान क्या है? आचार्य देव कहते हैं—"उपयोगो लक्षणम्" यानी उपयोग ही जीव का लक्षण है। उपयोग का अर्थ है ज्ञान और दर्शन का व्यापार (आत्मा की जानने-देखने की शक्ति)।

उपयोग दो प्रकार का होता है:
• ज्ञानोपयोग (8 भेद): मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मनःपर्ययज्ञान, केवलज्ञान और तीन अज्ञान।
• दर्शनोपयोग (4 भेद): चक्षुदर्शन, अचक्षुदर्शन, अवधिदर्शन और केवलदर्शन।

जीवों का वर्गीकरण: जीवों को मुख्य रूप से दो भागों में बाँटा गया है:
• संसारी जीव: जो जन्म-मरण के चक्र में घूम रहे हैं। ये दो प्रकार के होते हैं—मन सहित (संगी/समनस्क) और मन रहित (असंगी/अमनस्क)।
• मुक्त जीव: जो कर्मों से पूरी तरह मुक्त होकर सिद्ध लोक में विराजमान हैं।

संसारी जीवों को आगे त्रस (दो, तीन, चार और पाँच इंद्रिय वाले जीव) और स्थावर (एक इंद्रिय वाले जीव जैसे पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और वनस्पति) के रूप में भी विभाजित किया जाता है।


जीव और उपयोग वर्गीकरण
जीव के लक्षणों (ज्ञानोपयोग और दर्शनोपयोग) तथा जीवों के भेदों (संसारी, मुक्त, त्रस, स्थावर) को प्रदर्शित करने वाला एक विस्तृत माइंड मैप।


इंद्रियाँ और उनके विषय
जैन शास्त्र के अनुसार इंद्रियाँ कुल पाँच हैं—स्पर्श, रस, गंध, वर्ण (चक्षु) और शब्द (श्रोत्र)। लेकिन क्या आप जानते हैं कि प्रत्येक इंद्रिय दो-दो प्रकार की होती है?

• द्रव्य इंद्रिय (शारीरिक संरचना): इसके दो भाग हैं—'निवृत्ति' (पुद्गल परमाणुओं की रचना) और 'उपकरण' (इंद्रिय के बाहरी सहायक अंग जैसे आँख की पलकें)।

• भाव इंद्रिय (आंतरिक शक्ति): इसके भी दो भाग हैं—'लब्धि' (कर्मों के क्षयोपशम से प्राप्त जानने की आंतरिक योग्यता) और 'उपयोग' (वर्तमान में उस योग्यता का उपयोग करना)।

इंद्रियों के विषय:
• स्पर्शन: ठंडा, गर्म, रूखा, चिकना आदि छूना।
• रसन: खट्टा, मीठा आदि स्वाद।
• घ्राण: सुगंध और दुर्गंध।
• चक्षु: काला, पीला, हरा आदि रंग।
• श्रोत्र: विभिन्न प्रकार की आवाजें या शब्द।
रोचक तथ्य: मन को अनिंद्रिय (नो-इंद्रिय) कहा जाता है और इसका विषय 'श्रुतज्ञान' के दायरे में आने वाली सभी वस्तुएँ हैं।


इंद्रियाँ और उनके कार्य
द्रव्य इंद्रिय, भाव इंद्रिय, पाँच इंद्रियों के विषय और मन के कार्यों को याद रखने के लिए उपयोगी फ्लैशकार्ड्स का सेट।

विग्रह गति: आत्मा की गुप्त यात्रा और जन्म
जब एक जीव का मरण होता है, तो वह नए शरीर को धारण करने के लिए यात्रा करता है। इस यात्रा के काल को 'विग्रह गति' कहा जाता है।
• कार्मण काययोग: विग्रह गति के दौरान जीव के पास केवल कार्मण शरीर और तैजस शरीर होते हैं। वह कार्मण काययोग के सहारे गमन करता है।
• मोड़ वाली यात्रा: आत्मा हमेशा आकाश के प्रदेशों की सीधी रेखाओं (श्रेणी) के अनुसार चलती है। यह शतरंज के हाथी की चाल की तरह सीधा गमन करती है और केवल 90 डिग्री पर ही मुड़ती है।
• अनाहारक काल: इस यात्रा के दौरान जीव 1, 2 या अधिकतम 3 समय तक बिना भोजन (आहार) के रह सकता है। चौथे समय में वह अपने नए जन्म स्थान पर निश्चित रूप से पहुँच जाता है।

जन्म के तीन प्रकार:
• समूर्छन जन्म: जो माता-पिता के बिना सीधे वातावरण से पैदा होते हैं (जैसे छोटे कीड़े-मकोड़े, मच्छर)। ये हमेशा नपुंसक होते हैं।
• गर्भ जन्म: माता के पेट से जन्म लेना। इसके तीन भेद हैं—जरायुज (जेर के साथ जन्म, जैसे मनुष्य, गाय), अंडज (अंडे से, जैसे पक्षी) और पोत (जन्म लेते ही दौड़ने वाले जीव, जैसे शेर का बच्चा)।
• उपपाद जन्म: देवों और नारकियों का जन्म। इनका जन्म बिना गर्भ के सीधे शय्या या बिलों में अचानक होता है।

विग्रह गति और जन्म प्रक्रिया
आत्मा के गमन (विग्रह गति), अनाहारक अवस्था, और जन्म के तीन प्रकारों (समूर्छन, गर्भ, उपपाद) को दर्शाता हुआ एक सुंदर इन्फोग्राफिक।

पाँच शरीर और आयु का नियम
जैन दर्शन के अनुसार संसार में पाँच प्रकार के शरीर होते हैं। ये शरीर क्रमशः सूक्ष्म से सूक्ष्मतर होते जाते हैं, लेकिन इनके भीतर परमाणुओं की संख्या बढ़ती जाती है:

• औदारिक शरीर: हमारा वर्तमान हाड़-मांस का शरीर (मनुष्यों और तिर्यंचों का)।
• वैक्रियक शरीर: देवों और नारकियों का शरीर, जो रूप बदल सकता है और छोटा-बड़ा हो सकता है।
• आहारक शरीर: छठे गुणस्थानवर्ती मुनिराजों के मस्तक से निकलने वाला एक हाथ प्रमाण का शुभ पुतला, जो शंका समाधान के लिए केवली भगवान के पास जाता है।
• तैजस शरीर: जो शरीर में कांति, तेज और पाचन क्रिया को संभालता है।
• कार्मण शरीर: कर्मों का ढांचा जो आत्मा के साथ अनादि काल से जुड़ा है।
ध्यान दें: तैजस और कार्मण शरीर हमेशा हमारे साथ रहते हैं (यहाँ तक कि विग्रह गति में भी) और ये किसी भी दीवार या पहाड़ से रुकते नहीं हैं (अप्रतिघात)।

अकाल मरण (आयु का अपवर्तन) कहाँ नहीं होता?
कुछ विशेष जीवों की आयु कभी भी अकाल में समाप्त नहीं हो सकती (यानी उनका एक्सीडेंट या अकाल मरण नहीं हो सकता):
• देव और नारकी।
• चरम शरीरी (जो उसी भव से मोक्ष जाने वाले हैं) यदि वे उत्तम देह वाले (तीर्थंकर, चक्रवर्ती आदि) भी हों।
• भोगभूमि के जीव जिनकी आयु असंख्यात वर्ष की होती है।

Summary
मुख्य निष्कर्ष (Key Takeaways):
• जीव के पांच भाव: औपशमिक, क्षायिक, क्षायोपशमिक, औदयिक और पारणामिक भाव जीव की विभिन्न आत्मिक और कर्मिक अवस्थाओं को दर्शाते हैं।
• उपयोग ही लक्षण है: जानने और देखने की शक्ति (ज्ञान और दर्शन) ही जीव का असली गुण है।
• इंद्रियाँ और उनके विषय: स्पर्श, रस, गंध, वर्ण और शब्द पाँच इंद्रियों के विषय हैं। इंद्रियाँ द्रव्य और भाव रूप में काम करती हैं।
• विग्रह गति: आत्मा मृत्यु के बाद बिल्कुल सीधी रेखाओं में नए शरीर की ओर गमन करती है, जिसमें अधिकतम 3 समय तक अनाहारक अवस्था हो सकती है।
• पाँच शरीर: जीवों के औदारिक, वैक्रियक, आहारक, तैजस और कार्मण रूपी पाँच शरीर होते हैं, जो सूक्ष्मता के क्रम में बढ़ते हैं।
• आयु अपवर्तन: देव, नारकी, भोगभूमि के जीव और तीर्थंकर जैसी उत्तम देह वाले चरम शरीरी जीवों का कभी अकाल मरण नहीं होता।

Monday, September 28, 2026

परिस्थिति नहीं, परिणाम संभालो

 


परिणाम संभालो: भावों का खेल और फल

29 Sept 2026

डॉ. संजीव गोधा का यह प्रवचन इस मूलभूत सिद्धांत पर केंद्रित है कि मनुष्य का भाग्य उसकी बाहरी परिस्थितियों से नहीं, बल्कि उसके आंतरिक परिणामों (भावों) से निर्धारित होता है।

लेखक स्पष्ट करते हैं कि बाहरी स्थितियाँ हमारे नियंत्रण में नहीं हैं, परंतु अपनी मनःस्थिति और अभिप्राय को सुधारना पूरी तरह हमारे वश में है। विभिन्न पौराणिक उदाहरणों और कहानियों के माध्यम से यह समझाया गया है कि एक जैसी क्रिया करने वाले दो व्यक्तियों के परिणाम अलग होने पर उन्हें मिलने वाला फल भी भिन्न होता है। वे जोर देते हैं कि धर्म केवल बाहरी क्रियाओं या दिखावे में नहीं, बल्कि आत्मा की विशुद्धि और तत्वज्ञान के अभ्यास में निहित है।

अंततः, यह संदेश दिया गया है कि व्यक्ति को दुनिया बदलने का व्यर्थ प्रयास छोड़कर अपने विचारों और नजरिए को बदलने पर ध्यान देना चाहिए। अपने अभिप्राय की धारा को सुधारकर ही कर्मों के बंधन से मुक्ति और वास्तविक आत्मिक शांति प्राप्त की जा सकती है।
Listen Dr Sanjeev Godhha

परिस्थिति नहीं, परिणाम संभालो: जीवन और कर्म चक्र को बदलने वाले 5 अचूक आध्यात्मिक विचार

1. प्रस्तावना

हम अपना अधिकांश जीवन और ऊर्जा बाहरी परिस्थितियों को अपने अनुकूल ढालने में नष्ट कर देते हैं। हमारी पूरी चेष्टा इसी बात पर लगी रहती है कि मौसम कैसा है, वातावरण शांत है या कोलाहलपूर्ण, माइक या साउंड सिस्टम सही काम कर रहा है या नहीं, भोजन का स्वाद मनमुताबिक है या नहीं, और घर-परिवार या समाज का व्यवहार हमारे हिसाब से चल रहा है या नहीं। परंतु कड़वी सच्चाई यह है कि इन बाह्य संयोगों और परिस्थितियों (द्रव्यकर्म और नोकर्म) पर हमारा कोई वास्तविक वश नहीं चलता। इसके ठीक विपरीत, जिस अंतरंग मनोस्थिति और अपने भावों (परिणामों) को हम सहजता से संभाल सकते हैं, उस ओर हमारी दृष्टि तक नहीं जाती।

जैन दर्शन के महान आध्यात्मिक चिंतक एवं मनीषी पंडित टोडरमल जी ने मानव मन की इसी मूलभूत भूल पर कड़ा प्रहार किया है। वे स्पष्ट करते हैं कि अधिकांश लोग केवल बाह्य धार्मिक क्रियाओं, अनुष्ठानों और वेशभूषा को सुधारने में उलझे रहते हैं, जबकि कर्मों के फल का संबंध क्रिया से नहीं, बल्कि आत्मा में प्रतिक्षण उठने वाले आंतरिक भावों से होता है। इसी गूढ़ रहस्य का उद्घाटन करते हुए वे लिखते हैं:

"क्रिया पर तो दृष्टि है और परिणाम सुधारने बिगड़ने का विचार नहीं है।" — पंडित टोडरमल जी (मोक्ष मार्ग प्रकाशक, पृष्ठ 238)

2. समान क्रिया, लेकिन भिन्न फल: कर्म का संबंध परिस्थिति से नहीं, भावों से है

दो व्यक्तियों की बाह्य शारीरिक क्रियाएँ देखने में शत-प्रतिशत एक समान हो सकती हैं, किंतु उनके आंतरिक परिणामों (भाव-विशुद्धि या संक्लेश) में पाताल-आकाश का अंतर हो सकता है। कर्म-सिद्धांत कभी भी बाहरी क्रिया को देखकर फल का निर्धारण नहीं करता, बल्कि कर्ता के गुप्त अभिप्राय और अंतरंग परिणामों के आधार पर भाग्य की पटकथा लिखता है।

  • सिंह और जंगली सूअर का दृष्टांत: एक जंगल में क्रूर सिंह और जंगली सूअर के बीच भीषण युद्ध हुआ और अंततः दोनों मारे गए। यदि कोई बाहरी व्यक्ति या वीडियो कैमरा उस दृश्य को देखता, तो दोनों की मृत्यु एक ही युद्ध-क्रिया के कारण समान दिखाई देती। परंतु जब अवधिज्ञानी मुनिराज से दोनों की अंतद्गति के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने रहस्य खोला कि उनमें से एक जीव नर्क गया और दूसरा स्वर्ग। सिंह मुनिराज पर आक्रमण करने के क्रूर हिंसक भावों (शिकार की नीयत) से लड़ रहा था, इसलिए उसने नर्क का घोर दुख प्राप्त किया; जबकि सूअर के मन में दिगंबर मुनिराज की रक्षा करने का पावन रक्षक भाव था, जिसके विशुद्ध परिणामस्वरूप उसने स्वर्ग का देव पद प्राप्त किया।
  • मंदिर में अष्टांग नमस्कार का उदाहरण: दो सुंदर सूट-बूट पहने संपन्न व्यक्ति जिन-मंदिर में प्रभु दर्शन हेतु आए। दोनों ने भगवान के समक्ष अष्टांग नमस्कार करने से पूर्व अपने रेशमी रुमाल से फर्श को पोंछा। बाहर से देखने वाले किसी भी दर्शक के लिए दोनों की क्रियाएँ बिल्कुल अभिन्न थीं। किंतु, एक व्यक्ति ने फर्श इसलिए पोंछा ताकि ज़मीन पर मौजूद सूक्ष्म चींटियाँ या जीव दबकर हिंसा का शिकार न हो जाएँ (जीव-दया का परिणाम), जबकि दूसरे व्यक्ति ने केवल इसलिए फर्श साफ किया ताकि उसकी महँगी पैंट पर धूल या दाग न लग जाए।

संक्षिप्त विश्लेषण: बाहरी आँखें या कैमरे केवल स्थूल शरीर की क्रिया देख सकते हैं, किंतु कर्म का अति-सूक्ष्म नियम आपके अंतरंग अभिप्राय को मापता है। क्रिया से अधिक महत्त्वपूर्ण वह भाव है, जिसके साथ वह क्रिया संपन्न की जा रही है।

3. परिणाम स्थिर नहीं रहते, वे प्रतिक्षण बदलते हैं: राजा श्रेणिक का दृष्टांत

हमारे मन के परिणाम और विचार इतने चंचल हैं कि वे एक ही समय में स्थिर नहीं रहते। सूक्ष्म परिणामों का यह प्रतिक्षण परिवर्तन क्षणभर में जीव को नर्क से स्वर्ग और स्वर्ग से मोक्ष की ओर ले जा सकता है। भगवान महावीर स्वामी के समवशरण में घटित राजा श्रेणिक का प्रसंग इसका ज्वलंत प्रमाण है।

मार्ग में एक मुनिराज को ध्यानस्थ देखकर राजा श्रेणिक समवशरण पहुँचे और भगवान महावीर से पूछा कि यदि इस क्षण इन मुनिराज का मरण हो जाए, तो वे किस गति में जाएँगे?

  1. प्रथम उत्तर (सातवाँ नर्क): सर्वज्ञ देव की दिव्य ध्वनि में उत्तर आया—'सातवाँ नर्क'। श्रेणिक स्तब्ध रह गए। वास्तव में, ध्यानस्थ मुनिराज के कान में मार्ग से गुजरती दो महिलाओं की बातें पड़ गई थीं कि उनके पूर्व राज्य पर पड़ोसी राजा ने आक्रमण कर दिया है। यह सुनते ही मुनिराज के भीतर युद्ध और शत्रु-संहार के तीव्र रौद्रध्यान वाले परिणाम चलने लगे थे।
  2. द्वितीय उत्तर (16वाँ स्वर्ग): कुछ ही मिनटों बाद जब श्रेणिक ने पुन: वही प्रश्न दोहराया, तो उत्तर मिला—'16वाँ स्वर्ग'। केवलज्ञान में कोई त्रुटि नहीं थी; बल्कि उन मुनिराज को तत्काल अपनी भूल का बोध हो चुका था। उन्होंने तीव्र पश्चाताप करते हुए बारह भावनाओं का चिंतन और अथांग वैराग्य भावना भाना प्रारंभ कर दिया, जिससे उनके परिणाम संभल गए।
  3. तृतीय उत्तर (सर्वार्थसिद्धि): तीसरी बार पूछने पर उत्तर आया—'सर्वार्थसिद्धि'। वैराग्य चिंतन करते-करते मुनिराज का उपयोग पूरी तरह अपनी शुद्ध आत्मा (पारिणामिक भाव) में लीन हो गया।

संक्षिप्त विश्लेषण: केवल दिगंबर भेष धारण कर लेने या मंदिर में पद्मासन लगा लेने मात्र से सद्गति की गारंटी नहीं मिलती। प्रतिक्षण अपने भीतर बहती परिणाम-धारा और आत्म-उपयोग के प्रति निरंतर जाग्रत रहना ही सच्चा आध्यात्मिक पुरुषार्थ है।

4. आपके विचार ही चुपचाप भाग्य का निर्माण और विनाश करते हैं: चंदन सेठ की कथा

बिना किसी शारीरिक क्रिया या वाणी के उच्चारण के भी हमारे अत्यंत सूक्ष्म मानसिक परिणाम अदृश्य तरंगों की तरह ब्रह्मांड में फैलते हैं और चुपचाप हमारे भाग्य का निर्माण या विनाश कर देते हैं। इस गहन तथ्य को 'चंदन सेठ' की कथा से समझा जा सकता है:

चंदन की मूल्यवान लकड़ियों का व्यापार करने वाले एक सेठ का व्यापार लंबे समय से मंदा चल रहा था। एक दिन राजा की भव्य सवारी उसके भवन के सामने से गुजरी। बालकनी में खड़ा सेठ राजा की शानो-शौकत देख रहा था, तभी उसके मन में एक कुत्सित और मलिन विचार कौंधा—"यदि यह राजा आज ही मर जाए, तो इसके राजसी दाह-संस्कार के लिए मेरा वर्षों से रुका हुआ पुराना चंदन ऊँचे दामों पर बिक जाएगा।"

अद्भुत बात यह हुई कि सेठ ने मुख से एक शब्द भी नहीं कहा था, किंतु उसकी मानसिक तरंगें राजा के मन तक पहुँच गईं। राजा को अचानक सेठ की ओर देखते ही अकारण तीव्र क्रोध आया और उसने तुरंत मंत्री को आदेश दे दिया—"इस सेठ को कल प्रातः फाँसी पर चढ़ा दिया जाए।"

रात्रि में सेठ को अपनी नीच सोच का भयंकर बोध हुआ। उसने रो-रोकर आत्मकथात्मक पश्चाताप (भाव परिवर्तन) किया—"राजा तो हमारी प्रजा के पिता समान हैं। अपने छोटे से व्यापारिक लाभ के लिए मैंने ऐसा पापी विचार क्यों किया?" इस आत्म-विशुद्धि का परिणाम यह हुआ कि उधर राजमहल में राजा का मन स्वतः परिवर्तित हो गया और उसने प्रातः होते ही फाँसी का हुक्म रद्द कर दिया।

संक्षिप्त विश्लेषण: न तो सेठ ने राजा से कोई संवाद किया था, न राजा ने सेठ से। दोनों के बीच केवल मानसिक तरंगों (परिणामों) का मूक आदान-प्रदान हुआ था। आपके मौन विचार ही बाह्य घटनाओं को आपके जीवन में आकर्षित या दूर करते हैं।

5. दिखावा और अभिमान: क्रिया सुधारने से अधिक अभिप्राय सुधारना आवश्यक है

धार्मिक अनुष्ठान, दान, पूजा या उपवास तब तक आध्यात्मिक रूप से निरर्थक हैं, जब तक उनके पीछे का गहराई में छिपा हुआ अभिप्राय निर्मल न हो। यदि कोई धार्मिक क्रिया मान-प्रतिष्ठा, 'दानवीर' या 'शिरोमणि' की उपाधि पाने की लालसा से की जाती है, तो वह आत्मा का हित करने के स्थान पर भयंकर पाप-बंध का कारण बनती है।

दान में पश्चाताप का मनोवैज्ञानिक दुष्परिणाम

इसे एक व्यावहारिक उदाहरण से समझें: एक धनी व्यक्ति सार्वजनिक मंच से आवेश या मान-पोषण के लिए ₹10,00,000 दान देने की घोषणा कर देता है। किंतु कुछ देर बाद जब वह देखता है कि अन्य लोग ₹5,000, ₹11,000 या ₹21,000 देकर भी उतनी ही ताली बटोर रहे हैं, तो उसके भीतर एक गुप्त विचार आता है—"यदि मैं ₹351 या ₹5,000 भी देता, तब भी मेरा नाम तो दानवीर ही रहता; मैंने व्यर्थ ही इतना बड़ा धन गँवा दिया।" यह सूक्ष्म आंतरिक खेद और पश्चाताप क्षणभर में उसके द्वारा अर्जित समस्त पुण्य का क्षय कर देता है और पुण्य-बंध को पाप-बंध में परिवर्तित कर देता है।

इसी दिखावटी भक्ति और क्रियाकांड पर संत कबीरदास जी ने दोहे के माध्यम से तीखा प्रहार किया है:

"माला तो कर में फिरै, जीभ फिरै मुख माहिं। मनवा तो दहुँ दिसि फिरै, यह तो सुमिरन नाहिं॥" — कबीरदास

इसी सिद्धांत का सर्वोत्कृष्ट और हिला देने वाला प्रमाण जैन शास्त्रों में वर्णित 'तंडुल मत्स्य' का उदाहरण है। वह जीव आकार में केवल एक चावल के दाने जितना सूक्ष्म होता है, जो महामत्स्य के कान या आँख के पास चिपका रहता है। उसने जीवनभर अपने छोटे आकार के कारण स्वयं किसी एक भी जीव का भक्षण नहीं किया (शारीरिक रूप से शून्य हिंसा की क्रिया), किंतु महामत्स्य के मुख से बाहर निकलती मछलियों को देखकर उसके मन में निरंतर यह तीव्र हिंसक भाव चलता रहता था—"यदि मैं बड़ा होता, तो इनमें से एक भी मछली को ज़िंदा न बचने देता।" अपनी इस प्रचंड मानसिक हिंसा (तीव्र संक्लेश परिणाम) के बल पर वह मरणोपरांत सातवें नर्क का नारकी बना।

[क्षणिक विचार (परिणाम)] ---> [दीर्घकालिक धारणा (अभिप्राय)] ---> [तत्वज्ञान/स्वाध्याय] ---> [भाव-विशुद्धि व मुक्ति]

संक्षिप्त विश्लेषण: transient thoughts (परिणाम) को तब तक स्थायी रूप से शुद्ध नहीं किया जा सकता, जब तक व्यक्ति तत्वज्ञान के अभ्यास से अपने गहरे सम्यक् श्रद्धान और अभिप्राय को न बदल ले। उपवास का अर्थ केवल भोजन छोड़ना नहीं, बल्कि भोजन पकाने और खाने के समय को बचाकर आत्मा के चिंतन और स्वाध्याय में लीन होना है।

6. एक क्षण की असावधानी का दीर्घकालिक परिणाम: भाव बिगाड़ने का दुष्परिणाम

किसी भी जीव के प्रति मन में लाया गया रंचमात्र भी नकारात्मक भाव, उपहास या ईर्ष्या अंततः हमारे अपने ही आध्यात्मिक और व्यावहारिक जीवन को विनष्ट करती है।

'कार्तिकेयानुप्रेक्षा' ग्रंथ में वर्णित वसंत तिलका, धनदेव और कमला की कथा इस तथ्य का रोंगटे खड़े कर देने वाला उदाहरण है। अतीत के भव में गुरुकुल से लौट रहे दो विद्वान ब्राह्मण छात्रों ने एक वयोवृद्ध मुनिराज को एक युवा मुनि/आर्यिका की शंका का समाधान करते देखा और केवल क्षणभर के लिए उनका उपहास उड़ाते हुए हँस दिए। उस एक क्षण के हास्य और दुर्भाव का फल यह हुआ कि आगामी भवों में वसंत तिलका (वेश्या बने जन्म लेने वाली माँ), धनदेव (पुत्र) और कमला (पुत्री) के बीच सगे भाई-बहन की शादी और माँ-बेटा-पति-पत्नी जैसे ऐसे 18 विचित्र एवं नारकीय पारिवारिक संबंध बने, जिनकी कल्पना मात्र से रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

इसीलिए आध्यात्मिक विद्वानों का यह अमोघ नियम सदा स्मरण रखने योग्य है:

"भाव किसी के लिए भी बिगाड़ो, भाव तो अपना ही बिगड़ेगा।"

हम अपने बुरे विचारों से दूसरों का अहित कर पाएँगे या नहीं, यह तो उनके अपने कर्मोदय पर निर्भर करता है; किंतु किसी के प्रति बुरा सोचते ही हमारी अपनी आत्मा और भाव-मंडल तत्काल दूषित और पतित हो जाते हैं।

7. निष्कर्ष

हमारे जीवन में आने वाली प्रतिकूल या अनुकूल बाह्य परिस्थितियाँ (संयोग) हमारे ही अतीत के कर्मों के फल हैं, जिन्हें व्यर्थ की चिंता या व्याकुलता से बदला नहीं जा सकता। बाहरी दुनिया, व्यवस्थाओं और लोगों के व्यवहार को बदलने में अपनी अमूल्य शक्ति नष्ट करने के बजाय, बुद्धिमत्ता इसी में है कि हम तत्वज्ञान और स्वाध्याय के निरंतर अभ्यास द्वारा अपने अंतरंग अभिप्राय और परिणामों को सँभालें।

परिणामों की विशुद्धि किसी बाहरी दबाव से नहीं, बल्कि अपने अचल, निर्विकार पारिणामिक भाव (निज शुद्धात्मा) के आश्रय से प्रकट होती है। जब हम बाह्य क्रियाओं के दिखावे से ऊपर उठकर अपने अभिप्राय को निर्मल बनाते हैं, तो हमारा वर्तमान और भविष्य स्वतः निष्पाप और कल्याणकारी बन जाता है।

आज जब आपके सामने कोई विपरीत परिस्थिति आए, तो क्या आप बाहर दुनिया को बदलने की कोशिश करेंगे, या अपने भीतर के परिणाम संभालेंगे?

Saturday, September 26, 2026

क्षमा प्रार्थी हूँ Forgive Me







बीते वर्ष में मेरे से जाने अनजाने में 

मेरी वाणी से ,

व्यवहार से या 

भाव से आपको ठेस पहुँची हो 

आपको दुख हुआ हो , 

बीच बीच मैं कुछ संदेश भी भेजता हूँ 

उसमे कुछ ग़लत बाते लिखी हो या उ

से पढ़कर मन दुखी हुआ हो तो 

उन सब बातो के लिए 

मैं तहे दिल से हाथ जोड़ कर क्षमा प्रार्थी हूँ आशा है आप हमे माफ करेंगे । 

और यदि आप खुले दिल से 

मेरी गलतियों को बतायेंगे तो 

आवश्यकता अनुसार मैं अपने विचार और कार्य में सुधार लाने की पूरी कोशिश करूँगा

 

आपका अपना 

दानेन्द्र जैन 

27.09.2026



If, over the past year, 

I have caused you any hurt or distress—

whether through my words, behavior, or attitude—

or if any messages I sent contained anything inappropriate or upsetting,

I sincerely apologize with folded hands.

I hope you will forgive me.

Furthermore, if you openly point out my mistakes, I will make every effort to improve my thoughts and actions accordingly.

Yours truly,

Danendra Jain
27.09.2026
Giridih

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मिच्छा मि दुक्कड़म्" (या मिच्छा मे कुक्कड़म) और "खमत खामणा" जैन धर्म के बहुत ही पवित्र और महत्वपूर्ण वाक्यांश हैं, जिनका वास्तविक अर्थ है "मेरे सभी बुरे कर्म (पाप) मिथ्या (निष्फल) हो जाएं और मैं आपसे क्षमा मांगता हूँ।"
यह जैन समाज में पारंपरिक रूप से पर्युषण पर्व के अंतिम दिन (संवत्सरी) पर एक-दूसरे से क्षमा मांगने और क्षमा करने के लिए उपयोग किया जाता है।
शब्दों का गहरा अर्थ (शाब्दिक विच्छेद):
  • मिच्छा (मिथ्या): व्यर्थ, निष्फल या शून्य हो जाना।
  • मि (मे): मेरे द्वारा।
  • दुक्कड़म् (दुष्कृतम्): बुरे कार्य, गलतियाँ, या पाप। (बोलचाल में लोग इसे 'कुक्कड़म' कह देते हैं, लेकिन सही प्राकृत शब्द 'दुक्कड़म्' है।)
  • खमत खामणा: इसका अर्थ है "क्षमा करना और क्षमा मांगना।"
जब आप किसी से "मिच्छा मि दुक्कड़म्, खमत खामणा" कहते हैं, तो आप यह स्वीकार करते हैं कि जाने-अनजाने में, मन से, वचनों (शब्दों) से या काया (शरीर) से यदि आपने सामने वाले को कोई ठेस पहुंचाई है, तो आप उसके लिए दिल से क्षमा प्रार्थी हैं।

इसके पीछे की मुख्य भावनाएं:
  • अहंकार का त्याग: यह वाक्य बोलने के लिए इंसान को अपने अहंकार (घमंड) को छोड़ना पड़ता है।
  • मन की शुद्धि: बीते वर्ष की सभी कड़वाहटों और दुश्मनी को भुलाकर नए सिरे से रिश्तों की शुरुआत करना।
  • जियो और जीने दो: सभी जीवों के प्रति दया और करुणा का भाव रखना।

विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर का संयुक्त राष्ट्र में भाषण



विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर का संयुक्त राष्ट्र में भाषण (26 सितंबर 2026, UNGA 81वां सत्र)

आतंकवाद और पाकिस्तान पर:


बिना नाम लिए कहा कि "कल एक 'आतंकवाद के आदी देश' ने इस सभा में झूठी बातें कहीं" — यह पाकिस्तान के PM शहबाज शरीफ के भाषण के अगले दिन कहा गया

कहा — "दोस्ती और आतंकवाद साथ-साथ नहीं चल सकते"

भारत आतंकवाद से खुद को बचाने का अधिकार इस्तेमाल करता रहेगा, ऐसा साफ कहा

आतंकवाद को फंडिंग करने वालों को बेनकाब करने और रोकने की मांग की


दुनिया में बदलते हालात पर: कहा कि आजकल पैसा, बाजार, तकनीक और संसाधन — सबको दबाव बनाने के हथियार जैसे इस्तेमाल किया जा रहा है ("हर चीज़ का हथियारीकरण")

कहा दुनिया अब "बहु-ध्रुवीय" (multipolar) बन रही है, यानी सिर्फ कुछ बड़े देश नहीं, बल्कि कई देश मिलकर फैसले लें — इसलिए संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं में सुधार जरूरी है

युद्ध और संघर्षों पर (खाड़ी देश/यूक्रेन/फिलिस्तीन):


खाड़ी क्षेत्र में शांति और संयम बरतने की अपील की; भारतीय नाविकों की मौत पर जहाजों पर हमलों की निंदा की

यूक्रेन युद्ध पर PM मोदी की बात दोहराई — "अब युद्ध खत्म होना चाहिए"


फिलिस्तीन के लिए "दो-राष्ट्र समाधान" का समर्थन किया (यानी इस्राइल और फिलिस्तीन दोनोंअलग-अलग देश के रूप में शांति से रहें)


आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पर:

कहा हर देश को अपनी जरूरत और सोच के हिसाब से अपना खुद का AI सिस्टम बनाने का हक है

साथ ही चेताया कि AI का गलत इस्तेमाल भेदभाव और अविश्वास बढ़ा सकता है


गरीब और विकासशील देशों ("Global South") पर:

कहा इन देशों पर "4F संकट" है — Food (खाना), Fuel (ईंधन), Fertilizer (खाद), Finance (पैसा)

भारत के 78 देशों में 600+ विकास परियोजनाओं और डिजिटल तकनीक से मदद की बात बताई


भाषण गांधीजी की इस बात से खत्म किया: "शांति की ओर कोई रास्ता नहीं है, शांति खुद ही रास्ता है"


एक और भारतीय अधिकारी की भूमिका


हर साल पाकिस्तान के PM के भाषण के बाद, भारत का एक युवा राजनयिक (First Secretary) तुरंत"Right of Reply" (जवाब देने का अधिकार) इस्तेमाल करके करारा जवाब देता है। पिछले साल (2025) यह जिम्मा पेटल गहलोत ने निभाया था और शरीफ के दावों को "नाटकबाजी" बताया था।


Here's a summary of India's key statements at the UN, focused on the most recent one:

EAM Dr. S. Jaishankar's Address — 81st UNGA Session (Sept 26, 2026, New York)

On terrorism / Pakistan:

  • Called terrorism a "persistent threat to peace" and urged the world to hold governments backing cross-border terrorism accountable
  • Without naming Pakistan directly, said "a serial practitioner of terrorism misrepresented facts before this assembly" a day after PM Shehbaz Sharif's address, and that "arguments were invoked to normalise terrorism... that will not stand"
  • Reiterated "friendship and goodwill cannot coexist with terrorism," and said India would exercise its right to self-defence
  • Called for zero tolerance on terrorism, with special focus on exposing and countering terror financing

On global order / "weaponisation of everything":

  • Warned that finance, market access, supply chains, technology, resources and connectivity are increasingly used as tools of pressure, eroding global trust
  • Said the world is moving toward multipolarity and "the post-1945 order is giving way to new realities," strengthening the case for reformed multilateralism

On conflicts (Gulf/Ukraine/West Asia):

  • Called for restraint in the Gulf, protection of civilians, and unimpeded flow of energy and commerce; condemned attacks on commercial shipping that killed Indian seafarers
  • On Ukraine, backed peace efforts, invoking PM Modi's line that "endless war must give way now to an end to war"
  • Backed a two-state solution for Palestine and offered India's help on food/energy security challenges from the West Asia conflict

On Artificial Intelligence:

  • Argued every nation has the right to shape its own AI ecosystem — its own models and deployment strategies — rather than follow a single imposed path, while warning AI misuse could deepen bias and erode mutual respect

On the Global South:

  • Flagged a "4F crisis" — food, fuel, fertilizer and finance security — worsened by a super El Niño and trade restrictions
  • Cited India's 600+ development projects across 78 countries and its digital public infrastructure as its contribution to Global South resilience
  • Closed with Gandhi's line: "There is no way to peace. Peace is the way."

Other Indian voices at UNGA (recurring practice)

Each year, a young First Secretary from India's Permanent Mission exercises India's "Right of Reply" to rebut Pakistan's PM immediately after his speech — in 2025 this was Petal Gahlot, who called Sharif's claims "absurd theatrics" and cited Pakistan's terror record. Past reply-givers include Bhavika Mangalanandan (2024), Mijito Vinito (2020/2022), and Eenam Gambhir (2016).