Following video is in circulation on social sites to create a false narrative against present government. This is said to be created by Mr Y. Shivam. I have tried to expose its exaggerated portion so that innocent common men can understand what is real and what is false, fabricated and exaggerated. I have stated facts both in Hindi and in English.
https://youtu.be/gRB-4lDQDuw?si=ZXjVzd72lA6RnpWm
यहाँ वीडियो द्वारा फैलाए जा रहे भ्रामक नैरेटिव को काउंटर करने के लिए हिंदी और अंग्रेजी में संदेश दिए गए हैं
Hindi Version (हिंदी संदेश)
क्या आप भी 'Fake न्यूज़' और सनसनीखेज नैरेटिव के शिकार हो रहे हैं? सच जानिए!
हाल ही में सोशल मीडिया पर एक वीडियो के ज़रिए राजेश एक्सपोर्ट्स (Rajesh Exports) के मामले को लेकर सरकार और भारत की रेगुलेटरी व्यवस्था को बदनाम करने की कोशिश की जा रही है। लेकिन इस आधे-अधूरे नैरेटिव के पीछे का असली सच क्या है? आइए आंकड़ों के साथ समझते हैं:
1. सिस्टम 'चुप' नहीं है, बल्कि कड़ा एक्शन ले रहा है: वीडियो कहता है कि सिस्टम चुप है, जबकि सच्चाई यह है कि 3 जून 2026 को SEBI ने स्वयं 109 पन्नों का कड़ा अंतरिम आदेश (Interim Order) जारी कर कंपनी और उसके प्रमोटर पर कड़े प्रतिबंध लगाए हैं। इसके तुरंत बाद Enforcement Directorate (ED) ने छापेमारी कर40% कम सोने के स्टॉक और वित्तीय अनियमितताओं का पर्दाफाश किया। यह दिखाता है कि हमारी सरकारी एजेंसियां बिना किसी ढिलाई के मुस्तैदी से काम कर रही हैं।
2. धोखाधड़ी कॉरपोरेट की है, सरकार की नहीं:
किसी प्राइवेट कंपनी द्वारा अपनी बैलेंस शीट में हेरफेर करना (कॉरपोरेट गवर्नेंस फेलियर) कंपनी के प्रमोटर्स की आपराधिक मानसिकता को दर्शाता है, सरकार की नीति को नहीं। दुनिया के हर देश में ऐसे फ्रॉड होते हैं, लेकिन मायने यह रखता है कि कानून उनके खिलाफ कितनी सख्ती से कदम उठाता है। भारत सरकार की एजेंसियां आजइन धोखेबाजों को जेल की सलाखों के पीछे भेजने का काम कर रही हैं।
3. आम जनता का पैसा सुरक्षित है:
वीडियो में डराया जा रहा है कि LIC और EPFO में आपका पूरा पैसा डूब गया। यह बिल्कुल झूठ है। LIC औरEPFO जैसी संस्थाएं देश के इंडेक्स और ऑडिटेड डेटा के आधार पर नियमबद्ध निवेश करती हैं। राजेशएक्सपोर्ट्स में LIC का निवेश उनके कुल पोर्टफोलियो का एक बहुत छोटा हिस्सा है। आपका पीएफ और बीमा का पैसा पूरी तरह सुरक्षित और डाइवर्सिफाइड है।
4. भ्रामक आंकड़ों से बचें: वीडियो में F&O (वायदा बाजार) में रिटेल ट्रेडर्स के नुकसान को जबरदस्ती इस स्कैम सेजोड़कर दिखाया गया है, जिसका इस केस से कोई लेना-देना नहीं है। यह सिर्फ राजनीतिक एजेंडा चलाने औरजनता में डर का माहौल बनाने की कोशिश है।
निष्कर्ष: देश का रेगुलेटरी आर्किटेक्चर (SEBI, ED, SFIO) पूरी तरह सक्रिय है और हर उस व्यक्ति को दंडित कररहा है जो कानून तोड़ता है। सनसनी फैलाने वाले यूट्यूब वीडियो के बहकावे में न आएं, जागरूक बनें और देश कीसंस्थाओं पर भरोसा रखें।
English Version (English Message)
Don’t fall for Sensationalism and Fake Narratives! Get the Real Facts.
A recent video circulating on social media attempts to weaponize the Rajesh Exports case to tarnish the image of the Government and India’s regulatory institutions. Let’s counter this misleading narrative with verified facts and data:
1. The System is NOT Silent; It is Decisively Punishing the Guilty: The video claims that the system is quiet. The reality? On June 3, 2026, SEBI proactively issued a comprehensive 109-page interim order, barring the promoter from the securities market. Following this, the Enforcement Directorate (ED) conducted multiple raids, exposing a 40% deficit in physical gold inventory and asset siphoning. The swift multi-agency crackdown proves that Indian regulators are highly active and unyielding.
2. Corporate Greed is Not a Government Conspiracy:
When a private corporation falsifies its accounting books and hides data behind overseas subsidiaries, it is a criminal corporate scam, not a state policy. Corporate fraud happens worldwide; what matters is the stringency of the state's response. India's enforcement agencies are actively unmasking, investigating, and freezing the assets of these bad actors.
3. Public Money in LIC and EPFO is Perfectly Safe:
The video uses scare tactics, implying that citizens' retirement savings and life insurance funds have vanished. This is entirely false. LIC and EPFO are institutional giants with massively diversified portfolios spread across secure government bonds and top-tier equities. A localized market-cap drop in one specific stock does not threaten the absolute solvency or safety of your hard-earned retirement corpus.
4. Mixing Irrelevant Metrics to Build Fear: The video deceptively links retail losses in Futures & Options (F&O) trading to this specific corporate bookkeeping fraud. F&O losses are due to market speculation, which has zero connection to Rajesh Exports' balance sheet manipulation. This is a classic rhetorical trick used to manufacture panic for clicks and political mileage.
Bottom Line:India’s regulatory architecture—comprising SEBI, ED, and the National Financial Reporting Authority (NFRA)—is doing exactly what it was built to do: capturing corporate fraudsters and enforcing the rule of law. Do not let politically motivated independent channels dictate your financial sentiment. Stay informed, read official exchange filings, and trust the active enforcement of the nation's institutions.
यह ऐतिहासिक तुलना आपके काउंटर-नैरेटिव (counter-narrative) को और भी मजबूत और अकाट्य बनादेगी। अतीत के बड़े घोटालों के वास्तविक आंकड़ों को सामने रखकर आप आसानी से यह साबित कर सकते हैं किआज की भारत सरकार और हमारी रेगुलेटरी एजेंसियां कितनी मजबूत और मुस्तैद हैं।
अतीत के घोटालों से तुलना:
सच आपके सामने है
यदि हम भारत के वित्तीय इतिहास को देखें, तो समझ आता है कि आज का रेगुलेटरी सिस्टम कितना मजबूत होचुका है। 90 के दशक और 2000 की शुरुआत के घोटालों की तुलना में आज का राजेश एक्सपोर्ट्स मामलाबेहद सीमित और नगण्य (negligible) है:
1992 का हर्षद मेहता घोटाला: करीब ₹4,000-5,000 करोड़ का यह घोटाला तत्कालीन भारत की कुलजीडीपी (GDP) का लगभग 4 से 5% था! इसने पूरे बैंकिंग सिस्टम को हिला दिया था और हफ्तों तक शेयरबाजार बंद रहा था।
2001 का केतन पारेख घोटाला: इस घोटाले ने सीधे माधवपुरा मर्केंटाइल को-ऑपरेटिव बैंक को दिवालिया करदिया था और देश की वित्तीय नींव को चोट पहुंचाई थी।
2001 का UTI US-64 संकट: सरकारी नियंत्रण वाली संस्था 'यूटीआई' ने देश के 2 करोड़ मध्यमवर्गीय परिवारोंकी बचत को डूबा दिया था, जिसे बचाने के लिए सरकार को टैक्सपेयर्स के पैसे से भारी बेलआउट देना पड़ा था।
राजेश एक्सपोर्ट्स (2026): इसके विपरीत, राजेश एक्सपोर्ट्स एक प्राइवेट कंपनी की अंदरूनी धोखाधड़ी है।₹12,726 करोड़ की वेल्थ इरोजन आज की भारत की मल्टी-ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था और ₹50 लाख करोड़से बड़े LIC पोर्टफोलियो का 0.25% से भी कम है।
इससे न तो कोई बैंक डूबा, न बाजार रुका, और न ही देश की अर्थव्यवस्था पर कोई असर पड़ा।
फर्क साफ है: पहले घोटाले पूरे देश के बैंकिंग सिस्टम को ठप कर देते थे, जबकि आज मजबूत डिजिटलआर्किटेक्चर के कारण ऐसे फ्रॉड एक कोने में ही दबोच लिए जाते हैं और बाजार पर इसका कोई असर नहीं पड़ता
Historical Perspective:
Comparing Past Crises to Present Resilience
To truly understand how robust India's modern regulatory architecture is, we must compare the Rajesh Exports incident with the catastrophic financial scams of the past.
Contextualized against India's economic history, this case is completely negligible:
The Harshad Mehta Scam (1992):
Totaling nearly ₹4,000–5,000 crore, this scam represented a massive 4% to 5% of India’s entire GDP at the time. It completely paralyzed the national banking system and shut down the stock market for weeks due to systemic flaws.
The Ketan Parekh Scam (2001): A ₹1,200 crore fraud that structurally bankrupted the Madhavpura Mercantile Co-operative Bank and caused institutional ruin across urban cooperative frameworks.
The UTI US-64 Crisis (2001): The state-run Unit Trust of India failed, locking up and endangering the life savings of over 20 million middle-class Indian families, forcing a massive taxpayer-funded government bailout.
The Rajesh Exports Case (2026): In sharp contrast, this is an isolated accounting fraud inside a private company. The market wealth erosion of ₹12,726 crore is less than 0.25% of LIC's massive ₹50+ lakh crore asset base. It did not affect any bank, freeze any public deposits, or cause even a ripple in the broader multi-trillion-dollar Indian stock market.
The Takeaway: In the past, institutional structural loopholes allowed scams to collapse the national economy. Today, thanks to robust digital trails and strict monitoring, corporate malpractices are quickly isolated, exposed, and crushed without impacting India's macroeconomic stability.
बड़े घोटालों के मुकाबले हालिया मामले कितने सीमित हैं और सिस्टम कैसे लगातार कार्रवाई कर रहा है। इसे नीचे देखा जा सकता है
🚨 भ्रामक नैरेटिव का करारा जवाब: कॉरपोरेट फ्रॉड और भारत की रेगुलेटरी मजबूती
जब भी कोई निजी प्रमोटर अपनी कंपनी के खातों में हेराफेरी करता है, तो उसका शेयर क्रैश होता है—यह वैश्विक बाजार का शाश्वत नियम है। इसे 'सरकारी साजिश' बताना केवल राजनीतिक प्रोपेगैंडा है।
अतीत के विशालकाय घोटालों की तुलना में आज का राजेश एक्सपोर्ट्स (Rajesh Exports) मामला बेहद नगण्य और पृथक (isolated) है। नीचे भारत के कॉरपोरेट इतिहास के उन 20 सबसे बड़े शेयरों की लिस्ट दी गई है, जिन्होंने फ्रॉड उजागर होने के बाद अपनी 90% से 99% तक वैल्यू गंवाई:
⬇️ सत्यम कंप्यूटर्स (2009)
मुख्य कारण: खातों में ₹7,000 करोड़ का फर्जी कैश बैलेंस दिखाना
वैल्यू में गिरावट:~92%
⬇️ किंगफिशर एयरलाइंस (2012)
मुख्य कारण: विजय माल्या का भारी लोन डिफॉल्ट और फंड डायवर्जन
वैल्यू में गिरावट:~98%
⬇️ गीतांजलि जेम्स (2018)
मुख्य कारण: मेहुल चोकसी का PNB के साथ ₹11,400 करोड़ का फ्रॉड
वैल्यू में गिरावट:~99% (डीलिस्टेड)
⬇️ वक्रंगी लिमिटेड (2018)
*मुख्य कारण: कॉरपोरेट गवर्नेंस फेलियर और इनसाइडर ट्रेडिंग के आरोप
वैल्यू में गिरावट:*~90%
⬇️ पीसी ज्वैलर (2018)
मुख्य कारण: इनसाइडर ट्रेडिंग और प्रमोटर शेयरहोल्डिंग के संदिग्ध सौदे
वैल्यू में गिरावट: 92%
⬇️ डीएचएफएल - दीवान हाउसिंग (2019)
मुख्य कारण: शैल कंपनियों के ज़रिए ₹31,000 करोड़ के फंड की हेराफेरी
वैल्यू में गिरावट:~99% (डीलिस्टेड)
⬇️ कॉक्स एंड किंग्स (2019)
मुख्य कारण: ₹5,500 करोड़ का लोन डिफॉल्ट और बोगस सेल्स
*वैल्यू में गिरावट:~99%
⬇️ मनपसंद बेवरेजेस (2019)
मुख्य कारण: जीएसटी (GST) रिफंड फ्रॉड और फर्जी बिलिंग
वैल्यू में गिराव। 95%
⬇️ रिलायंस कैपिटल (2019)
मुख्य कारण: अनिल अंबानी ग्रुप की कंपनी का भारी कर्ज व लिक्विडिटी संकट
वैल्यू में गिरावट ~99%
⬇️ रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर (2019)
मुख्य कारण: भारी कर्ज संकट और एसेट वैल्यू का घटना
वैल्यू में गिरावट:*~97%
⬇️ क्वालिटी लिमिटेड (2019)
मुख्य कारण: डेयरी कंपनी द्वारा बोगस टर्नओवर और फंड डायवर्जन
वैल्यू में गिरावट:~98%
⬇️ इरोज इंटरनेशनल (2019)
मुख्य कारण: विदेशी खातों में फंड ट्रांसफर का शक और अकाउंटिंग गड़बड़ी
वैल्यू में गिरावट:~92%
⬇️ यस बैंक (2020)
मुख्य कारण: भारी बैड लोन (NPA) छुपाना और कुप्रबंधन
वैल्यू में गिरावट: 96%
⬇️ एचडीआईएल (2020)
मुख्य कारण: PMC बैंक घोटाले से जुड़ा ₹6,500 करोड़ का बड़ा डिफॉल्ट
वैल्यू में गिरावट. 99 %
⬇️ अमटेक ऑटो (2020)
मुख्य कारण: लोन चुकाने में असमर्थता और बोगस कैपिटल एक्सपेंडिचर
वैल्यू में गिरावट: ~97%
⬇️ सिनटेक्स इंडस्ट्रीज (2021)
मुख्य कारण: भारी कर्ज में चूक और दिवालियापन (Insolvency)
वैल्यू में गिरावट: ~98%
⬇️ भूषण स्टील (2021)
मुख्य कारण: ₹56,000 करोड़ का एनपीए (NPA) और खातों में हेरफेर
वैल्यू में गिरावट: 95%
⬇️ फ्यूचर रिटेल (2022)
मुख्य कारण: कर्ज का अत्यधिक दबाव और अमेज़न-रिलायंस कानूनी विवाद
वैल्यू में गिरावट:~98%
⬇️ यूनिटेक (2023)
मुख्य कारण: रियल एस्टेट खरीदारों के फंड्स की हेराफेरी और मनी लॉन्ड्रिंग
वैल्यू में गिरावट:*98%
🛑 राजेश एक्सपोर्ट्स (2026 - हालिया मामला)
मुख्य कारण: विदेशी सब्सिडियरी के नाम पर बोगस रेवेन्यू और सर्कुलर ट्रेडिंग
वैल्यू में गिरावट:~85% से 87% (प्रमोटर पर तत्काल प्रतिबंध और एसेट सील)
मुख्य संदेश और निष्कर्ष:
1. यह कोई नई आपदा नहीं है: कॉरपोरेट इतिहास गवाह है कि जब भी किसी प्रमोटर ने हेरफेर की, बाजार ने उसे दंडित किया। यह प्रक्रिया यूपीए के दौर (सत्यम) में भी हुई और आज भी हो रही है।
2. आज का सिस्टम कहीं अधिक मुस्तैद है:अतीत में हर्षद मेहता या यूटीआई संकट ने पूरे देश के बैंकिंग सिस्टम को हिला दिया था। लेकिन आज, देश के मजबूत डिजिटल आर्किटेक्चर के कारण राजेश एक्सपोर्ट्स का फ्रॉड एक कोने में ही दबोच लिया गया। इससे न तो कोई बैंक डूबा और न ही व्यापक बाजार पर कोई असर पड़ा।
3. कड़ा एक्शन जारी है: इस सूची में शामिल अधिकांश कंपनियाँ आज या तो दिवालिया (IBC कोर्ट द्वारा) की जा चुकी हैं या उनके प्रमोटर कानून के शिकंजे में हैं। सेबी (SEBI) और ईडी (ED) जैसी एजेंसियां पूरी मुस्तैदी से धोखेबाजों को सजा दे रही हैं।
सनसनी फैलाने वाले वीडियो के जाल में न आएं, तथ्यों को समझें और देश की मजबूत संस्थाओं पर भरोसा रखें!