Introduction of Sonia Gandhi and Rahul Gandhi in politics and their failure in election
Some suggestions are given below which can help them in improvng performances of congress party
1. संक्षिप्त परिचय (Brief Introduction)
सोनिया गांधी: 1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद उन्होंने कई वर्षों तक सक्रिय राजनीति से दूरी बनाएरखी। 1997 में कोलकाता प्लेनरी में पार्टी की प्राथमिक सदस्यता ली और 1998 में सीताराम केसरी केस्थान पर कांग्रेस अध्यक्ष बनीं। 1999 में पहली बार अमेठी (उत्तर प्रदेश) और बेल्लारी (कर्नाटक) सेलोकसभा चुनाव लड़ा और सांसद बनीं। 1998 से 2017 और फिर 2019 से 2022 तक वे कांग्रेस की सबसेलंबे समय तक रहने वाली अध्यक्ष रहीं।
राहुल गांधी: 2004 में सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया और पारिवारिक सीट अमेठी से लोकसभा चुनावजीतकर संसद पहुंचे। 2007 में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) के महासचिव बने और युवा कांग्रेस(IYC) व एनएसयूआई (NSUI) का प्रभार संभाला। 2013 में वे पार्टी के उपाध्यक्ष बने और दिसंबर 2017 सेजुलाई 2019 (लोकसभा चुनाव में हार के बाद इस्तीफे तक) पार्टी अध्यक्ष रहे। 2024 में वे लोकसभा मेंआधिकारिक नेता प्रतिपक्ष (LoP) बने।
2. केंद्र एवं राज्यों में चुनावी हार और प्रदर्शन में गिरावट
1998 से 2024 के बीच कांग्रेस ने 2004 और 2009 के आम चुनावों में सरकार बनाई, लेकिन 2014 के बादपार्टी का प्रदर्शन राष्ट्रीय स्तर पर ऐतिहासिक रूप से कमजोर हुआ और कई राज्यों में पार्टी सत्ता से बाहर होतीचली गई।
क. लोकसभा आम चुनावों का प्रदर्शन
1999: सोनिया गांधी के नेतृत्व में पार्टी 114 सीटों पर सिमट गई, जो उस समय तक का उसका न्यूनतमआंकड़ा था।
2014: राहुल गांधी के चुनाव अभियान का प्रमुख चेहरा होने के दौरान पार्टी 44 सीटों और 19.3% वोटशेयर पर आ गई। पार्टी संसद में 10% का न्यूनतम कोटा भी हासिल नहीं कर सकी, जिससे उसे नेताप्रतिपक्ष का पद नहीं मिला।
2019: राहुल गांधी के पूर्ण अध्यक्षीय कार्यकाल में पार्टी केवल 52 सीटें जीत सकी। राहुल गांधी स्वयंअमेठी से स्मृति ईरानी से चुनाव हार गए (हालाँकि वे वायनाड से जीते)। हार की जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंनेअध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया।
2024: 'इंडिया' (INDIA) गठबंधन के तहत चुनाव लड़ते हुए पार्टी 99 सीटों पर पहुँची, जिससे 10 वर्षोंबाद उसे लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष का आधिकारिक दर्जा वापस मिला, हालाँकि वह अपने दम पर बहुमत केआंकड़े से काफी दूर रही।
ख. प्रमुख राज्यों में सत्ता से बाहर होना और सीटें घटना
आंध्र प्रदेश: 2004 (185 सीटें) और 2009 (156 सीटें) में कांग्रेस की रीढ़ रहे इस राज्य में 2014 के राज्यविभाजन (तेलंगाना निर्माण) के बाद पार्टी 2014, 2019 और 2024 के विधानसभा चुनावों में एक भी सीट(0 सीट) नहीं जीत सकी।
उत्तर प्रदेश: 2012 के विधानसभा चुनाव में राहुल गांधी के व्यापक प्रचार के बावजूद 28 सीटें मिलीं। 2017 में सपा के साथ गठबंधन करने पर पार्टी 7 सीटों पर आ गई, और 2022 में प्रियंका गांधी के नेतृत्व में केवल2 सीटें (2.33% वोट) मिलीं।
महाराष्ट्र: 1999 से 2014 तक लगातार 15 साल सत्ता में रहने के बाद कांग्रेस 2014 में हार गई और तब सेराज्य की राजनीति में तीसरे-चौथे नंबर की ताकत बनकर रह गई।
पूर्वोत्तर भारत: असम (2016), मणिपुर (2017), मेघालय और त्रिपुरा जैसे राज्यों में लंबे समय तक शासनकरने वाली कांग्रेस को भाजपा और क्षेत्रीय दलों के हाथों लगातार हार का सामना करना पड़ा।
सीधे मुकाबले वाले राज्य: मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और गुजरात जैसे राज्यों में जहाँ भाजपा से सीधा मुकाबला रहा, कांग्रेस 2018 में मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ जीतने के बावजूद 2023 के चुनावों में इन तीनों राज्यों में सत्ता गँवा बैठी। गुजरात में 2022 में पार्टी रिकॉर्ड न्यूनतम 17 सीटों पर सिमट गई।
3. क्षेत्रीय दलों पर निर्भरता और जनाधार का क्षरण
सोनिया गांधी और राहुल गांधी के दौर में गठबंधन की राजनीति को प्राथमिकता दी गई। 2004 में UPA का गठनकेंद्र में सत्ता पाने के लिए सफल रहा, लेकिन दीर्घकालिक रूप से राज्यों में कांग्रेस के संगठन को इससे भारी नुकसान पहुँचा:
जूनियर पार्टनर की भूमिका स्वीकारना:
उत्तर प्रदेश (सपा के साथ), बिहार (राजद के साथ), तमिलनाडु(द्रमुक के साथ) और पश्चिम बंगाल (तृणमूल/लेफ्ट के साथ) जैसे बड़े राज्यों में कांग्रेस ने क्षेत्रीय दलों केसामने कम सीटों पर लड़ना स्वीकार किया।
वोट बैंक का स्थायी स्थानांतरण:
इन गठबंधनों के कारण कांग्रेस का पारंपरिक कैडर और सामाजिक आधार(विशेष रूप से दलित, मुस्लिम और मध्यवर्ती जातियां) पूरी तरह क्षेत्रीय दलों के पाले में चला गया।
स्ट्राइक रेट में गिरावट:
कई गठबंधनों में सहयोगियों ने आरोप लगाया कि कांग्रेस अधिक सीटें लड़ती हैलेकिन उसका स्ट्राइक रेट कम रहता है (जैसे 2020 के बिहार चुनाव में 70 में से केवल 19 सीटें जीतना), जिससे गठबंधन सरकार बनाने से चूक जाता है।
4. रणनीतिक एवं राजनीतिक आलोचनाएं
राजनीतिक विश्लेषकों, आलोचकों और विरोधी दलों द्वारा राहुल गांधी के राजनीतिक दृष्टिकोण और रणनीतियोंपर निम्नलिखित प्रमुख सवाल उठाए जाते रहे हैं:
व्यक्ति-केंद्रित नकारात्मक अभियान: 2019 के आम चुनाव में "चौकीदार चोर है" और राफेल सौदे कोलेकर नरेंद्र मोदी पर तीखे व्यक्तिगत हमले किए गए। आलोचकों का मानना है कि इस अभियान ने मोदी कीजन-स्वीकार्यता को नुकसान पहुँचाने के बजाय खुद कांग्रेस पर उलटा असर डाला, क्योंकि पार्टी इसकेसमानांतर एक सशक्त वैकल्पिक दृष्टि (Positive Alternative) पेश करने में विफल रही।
सांस्कृतिक और वैचारिक अस्पष्टता: एक तरफ 2017-18 के दौरान 'जनेऊधारी हिंदू' और मंदिर यात्राओंके जरिए 'सॉफ्ट हिंदुत्व' का प्रयास दिखा, तो दूसरी तरफ सावरकर और पारंपरिक सांस्कृतिक प्रतीकों परकड़े बयानों से बहुसंख्यक हिंदू मतदाताओं के एक बड़े वर्ग में नाराजगी देखी गई। विरोधियों ने इसे वैचारिकअवसरवाद और एकतरफा तुष्टिकरण करार दिया।
विदेशी मंचों पर टिप्पणियां और विदेश नीति का रुख: विदेशों में भारतीय लोकतंत्र, न्यायपालिका औरसंस्थाओं की स्थिति पर दिए गए बयानों को भाजपा ने "देश की छवि खराब करने" के रूप में प्रचारितकिया। इसी तरह, भारत-चीन सीमा विवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर सरकार पर किएगए हमलों को राष्ट्रवाद के विमर्श में कांग्रेस के खिलाफ इस्तेमाल किया गया।
संगठनात्मक नेतृत्व और निरंतरता का अभाव: पार्टी के भीतर कई वरिष्ठ और युवा नेताओं (जैसे हिमंत बिस्वासरमा, ज्योतिरादित्य सिंधिया, जितिन प्रसाद, आर.पी.एन. सिंह) के असंतोष को समय रहते न संभाल पानानेतृत्व की विफलता माना गया। आलोचक यह भी रेखांकित करते हैं कि हार के बाद व्यापक संगठनात्मकसर्जरी और जवाबदेही तय करने के बजाय व्यवस्था जस की तस बनी रही।
5. कांग्रेस के पुनरुद्धार के लिए व्यावहारिक सुझाव (Way Forward)
यदि कांग्रेस को भारतीय राजनीति में अपनी राष्ट्रीय प्रासंगिकता और जीत की क्षमता (Winnability) को पुनःस्थापित करना है, तो उसे निम्नलिखित मूलभूत बदलावों की आवश्यकता होगी:
स्पष्ट और सकारात्मक राष्ट्रीय विमर्श (Positive Narrative): राजनीति को केवल "मोदी विरोध" परकेंद्रित करने के बजाय कांग्रेस को 21वीं सदी के भारत के लिए अपना आर्थिक, औद्योगिक और रोजगारमॉडल सामने रखना होगा। जनता को केवल यह बताना पर्याप्त नहीं है कि वर्तमान सरकार क्या गलत कररही है; यह स्पष्ट करना होगा कि कांग्रेस के पास उससे बेहतर क्या योजना है।
जमीनी संगठन और आंतरिक लोकतंत्र की बहाली:
बूथ स्तर से लेकर ब्लॉक और जिला स्तर तक पार्टी काढांचा कई राज्यों में निष्क्रिय है। जब तक बिना चुनाव और बिना प्रदर्शन के पदों पर बैठे नेताओं की जगहजमीन पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी नहीं दी जाएगी, तब तक चुनावी लड़ाई लड़ना कठिनरहेगा।
राज्यों में मजबूत क्षत्रपों (Regional Leadership) को स्वायत्तता:
जहां भी कांग्रेस ने भाजपा को हराया है(जैसे कर्नाटक में सिद्धारमैया-डी.के. शिवकुमार या तेलंगाना में रेवंत रेड्डी), वहां मजबूत स्थानीय चेहरों केकारण जीत मिली। दिल्ली से हाई कमान का नियंत्रण कम करके राज्यों के नेताओं को फैसले लेने औरअपनी रणनीति बनाने की खुली छूट देनी होगी।
सांस्कृतिक संतुलन और सामाजिक सामंजस्य:
किसी एक वर्ग या पहचान पर अत्यधिक केंद्रित राजनीति केबजाय एक संतुलित, समावेशी दृष्टिकोण अपनाना होगा, जिससे बहुसंख्यक समाज में यह संदेश न जाए किउनके सरोकारों की अनदेखी की जा रही है।
सहयोगियों के भरोसे रहने के बजाय अपने आधार को फिर से खड़ा करना:
गठबंधन तात्कालिक आवश्यकताहो सकते हैं, लेकिन उत्तर भारत के बड़े राज्यों (यूपी, बिहार) में बिना संगठन के केवल सहयोगी दलों कीबैसाखी पर चलने से पार्टी कभी अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो सकती। पार्टी को इन राज्यों में शून्य से शुरूकरके अपना स्वतंत्र कैडर तैयार करना होगा।
नीचे दिए दिए गए बिंदु उन प्राथमिक आलोचनाओं और नीतिगत सुधारों को रेखांकित करते हैं, जिन पर राजनीतिकविश्लेषक, चुनावी रणनीतिकार और असंतुष्ट नेता लंबे समय से चर्चा करते रहे हैं। यदि इन बिंदुओं को एकसंगठित और व्यावहारिक सुधार रूपरेखा (Actionable Strategic Framework) में ढाला जाए, तो कांग्रेसपार्टी और राहुल गांधी के लिए निम्नलिखित आवश्यक कदम बनते हैं:
राहुल गांधी और कांग्रेस के लिए व्यावहारिक सुधार के प्रमुख बिंदु
1. प्रतिभाशाली और जनाधार वाले नेताओं का सम्मान व स्वायत्तता
प्रतिभा का पलायन रोकना: पिछले एक दशक में ज्योतिरादित्य सिंधिया, जितिन प्रसाद, आर.पी.एन. सिंह, कैप्टन अमरिंदर सिंह और गुलाम नबी आजाद जैसे प्रमुख नेताओं का पार्टी छोड़ना यह दिखाता है किआंतरिक प्रतिभा प्रबंधन में गंभीर कमी रही है।
दरबारी संस्कृति का खात्मा: शीर्ष नेतृत्व को केवल "जी-हजूर" करने वाले सलाहकारों के दायरे से बाहरनिकलकर उन नेताओं को निर्णय लेने की छूट देनी होगी, जिनका जमीन पर अपना प्रभाव और चुनावी पकड़है।
आंतरिक योग्यता को पुरस्कार: पार्टी पदों, टिकट वितरण और राज्यसभा सीटों का आवंटन व्यक्तिगत निष्ठाके बजाय चुनावी प्रदर्शन, योग्यता और संगठनात्मक परिश्रम के आधार पर होना चाहिए।
2. नकारात्मक और अमर्यादित भाषा पर पूर्ण रोक
अभद्र बयानों से दूरी: ऐसे प्रवक्ताओं और नेताओं पर कठोर अनुशासनात्मक कार्रवाई होनी चाहिए जोप्रधानमंत्री या विरोधी नेताओं के खिलाफ हिंसक, असंसदीय या अपमानजनक भाषा का प्रयोग करते हैं।
उलटा असर (Boomerang Effect) समझना: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर किए गए तीखे व्यक्तिगत हमले(जैसे "चौकीदार चोर है" या "मौत का सौदागर") जनता के बीच सहानुभूति पैदा करते हैं और कांग्रेस कोएक परिपक्व राजनीतिक विकल्प के रूप में प्रस्तुत करने में बाधा बनते हैं।
3. सेना और राष्ट्रीय सुरक्षा पर गैर-राजनीतिक दृष्टिकोण
सैन्य कार्रवाई पर सवाल न उठाना: सर्जिकल स्ट्राइक, एयर स्ट्राइक या सीमा पर भारतीय सेना के पराक्रमपर सबूत मांगना या सार्वजनिक संदेह जताना आम भारतीय जनमानस की राष्ट्रवादी भावनाओं को सीधे तौरपर आहत करता है।
रणनीतिक परिपक्वता: राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति के मुद्दों पर सरकार की कूटनीतिक विफलताओं कीरचनात्मक समीक्षा संसद के भीतर की जा सकती है, लेकिन सेना की पेशेवर विश्वसनीयता और मनोबल परसवाल उठाना चुनावी दृष्टि से पार्टी के लिए आत्मघाती साबित होता है।
4. क्षेत्रीय दलों की बैसाखी छोड़कर स्वतंत्र संगठन का निर्माण
अल्पकालिक लाभ बनाम दीर्घकालिक नुकसान: उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसेराज्यों में क्षेत्रीय दलों (सपा, राजद, तृणमूल, द्रमुक) के साथ कनिष्ठ (junior) सहयोगी बनकर चुनाव लड़नेसे कांग्रेस का अपना स्थानीय संगठन लगभग समाप्त हो गया।
एक-दो चुनाव हारने का जोखिम लेना: पार्टी को क्षेत्रीय दलों के भरोसे रहने के बजाय ज़मीनी स्तर से बूथकार्यकर्ताओं को तैयार करना होगा। चाहे एक-दो विधानसभा चुनावों में भारी पराजय मिले, लेकिन लंबेसमय में पार्टी तभी पुनर्जीवित हो सकती है जब वह अपने पारंपरिक मतों पर स्वतंत्र दावा पेश करे।
5. सांस्कृतिक संतुलन और बहुसंख्यक समाज का सम्मान
आरएसएस/धार्मिक संगठनों पर एकतरफा आक्रमण की समीक्षा: जमीनी स्तर पर सेवा कार्य करने वालेसामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों की लगातार तीखी आलोचना करने से बहुसंख्यक हिंदू समाज का एक बड़ावर्ग खुद को उपेक्षित और आहत महसूस करता है।
वैचारिक स्पष्टता: पार्टी को तुष्टिकरण और बहुसंख्यक विरोध के आरोपों से बाहर निकलकर सच्चे अर्थों मेंसमावेशी राजनीति करनी होगी। धार्मिक आस्थाओं और परंपराओं के प्रति संवेदनशील रहकर ही एकराष्ट्रीय दल जनमानस का विश्वास जीत सकता है।
फर्जी विमर्श और सोशल मीडिया विश्वसनीयता: गैर-प्रमाणित सूचनाओं, भ्रामक क्लिपों या गलत आंकड़ोंपर आधारित अभियानों से अस्थायी प्रचार तो मिल सकता है, लेकिन पकड़े जाने पर पार्टी की समग्रविश्वसनीयता हमेशा के लिए धूमिल हो जाती है।
6. भ्रष्टाचार पर शून्य सहनशीलता (Zero Tolerance)
पारदर्शिता और सख्त कार्रवाई: जिन राज्यों में कांग्रेस की सरकारें रहीं या हैं, वहाँ भ्रष्टाचार के किसी भीआरोप पर तुरंत और निष्पक्ष कार्रवाई दिखनी चाहिए।
विपक्ष में रहते हुए नैतिक श्रेष्ठता: यदि कांग्रेस स्वयं को एक साफ-सुथरा विकल्प प्रस्तुत करना चाहती है, तोउसे दागदार पृष्ठभूमि वाले नेताओं को पार्टी में संरक्षण देने या पद देने से पूरी तरह परहेज करना होगा।
7. विदेशी मंचों पर घरेलू राजनीति न ले जाना
राष्ट्रीय संप्रभुता का संदेश:
विदेशों में जाकर भारतीय लोकतंत्र, चुनावी व्यवस्था या न्यायपालिका कीआलोचना करना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की छवि को प्रभावित करता है और घरेलू मतदाताओं में यह संदेशजाता है कि पार्टी बाहरी ताकतों का समर्थन जुटाने की कोशिश कर रही है।
पड़ोसी देशों के संदर्भ में कड़ा रुख: पाकिस्तान, चीन या बांग्लादेश जैसे संवेदनशील मुद्दों पर पार्टी का रुखकिसी भी प्रकार से ढुलमुल या बचाव की मुद्रा वाला नहीं दिखना चाहिए। राष्ट्रहित से जुड़े मसलों पर हमेशाएकजुट और कठोर राष्ट्रीय दृष्टिकोण दिखना अनिवार्य है।
8. सकारात्मक और भविष्योन्मुखी राजनीति (Positive Roadmap)
केवल 'एंटी-मोदी' होने से काम नहीं चलेगा: मतदाताओं को यह समझाना पर्याप्त नहीं है कि मौजूदा सरकारक्या गलत कर रही है। कांग्रेस को यह स्पष्ट करना होगा कि उसके पास भारत के आर्थिक विकास, रोजगारसृजन, विनिर्माण (Manufacturing) और तकनीक के लिए क्या ठोस रोडमैप है।
सकारात्मक विकल्प का निर्माण: विरोध की राजनीति को छोड़कर जब तक पार्टी एक सकारात्मक, ऊर्जावान और आकांक्षात्मक भारत (Aspirational India) के विज़न को प्रस्तुत नहीं करेगी, तब तक वहनए दौर के मतदाताओं के मन में अपनी जगह नहीं बना पाएगी।