Sunday, September 6, 2026

उत्तम शौच धर्म

 यह वीडियो डॉ. संजीव गोधा द्वारा दसलक्षण महापर्व के चौथे दिन "उत्तम शौच धर्म" पर दिया गया प्रवचन है (YouTube Video Link)।

प्रवचन के मुख्य सार को एक आम व्यक्ति की समझ के अनुसार क्रमवार (one by one) नीचे समझाया गया है:


1. 'शौच' शब्द का अर्थ और परिभाषा

 शुचिता यानी पवित्रता: 'शौच' शब्द 'शुचि' से बना है, जिसका अर्थ है पवित्रता (निर्मलता या शुचिता)।


 लोभ कषाय का अभाव:  जैसे क्रोध के अभाव में क्षमा, मान के अभाव में मार्दव और मायाचार के अभाव में आर्जव धर्म होता है, वैसे ही लोभ (लालच या तृष्णा) के अभाव का नाम 'उत्तम शौच धर्म' है ।


2. पवित्रता के दो रूप: बाह्य और आंतरिक

 शारीरिक (बाहरी) पवित्रता: जल, साबुन आदि से शरीर को धोना या कपड़े साफ करना केवल बाहरी शुद्धि है। यह शरीर को स्वच्छ रख सकती है, आत्मा को नहीं।


 आंतरिक पवित्रता: असली शौच धर्म मन और आत्मा की शुद्धि है। जब तक मन में लोभ, लालच, तृष्णा और वासना रूपी मैल भरी है, तब तक बाहर से कितनी भी सफाई कर लें, जीव पवित्र नहीं हो सकता।


3. आंतरिक पवित्रता के दो स्तर: स्वभाव और पर्याय

 द्रव्य स्वभाव की पवित्रता (वस्तु स्वभाव धर्म): आत्मा अपने मूल स्वभाव से सदा शुद्ध, निर्विकार और पवित्र ही है। उसमें कोई मैल नहीं लगती।


 पर्याय की पवित्रता (वीतराग धर्म): जब जीव अपने उस शुद्ध स्वभाव को पहचानता है और राग-द्वेष व लोभ से मुक्त होता है, तो उसके वर्तमान विचारों और आचरण (पर्याय) में भी निर्मलता आ जाती है। इसे ही वीतराग धर्म या उत्तम शौच धर्म कहते हैं ।


4. लोभ: सभी पापों का मूल

 लोभ क्या है? पर-वस्तुओं (धन, संपत्ति, वैभव, मान-सम्मान) को अपना मानना और उन्हें पाने की अंतहीन चाह रखना ही लोभ है।


 असंतोष का कारण: लोभ कभी पूरा नहीं होता; जितना अधिक मिलता है, उतनी ही पाने की भूख और बढ़ती है, जिससे मन कभी शांत नहीं रह पाता। जब लोभ छूटता है, तभी जीवन में संतोष और आंतरिक शांति आती है।


5. जीवन में कैसे अपनाएं? (आम आदमी के लिए सीख)

1. उपयोग को सही दिशा में लगाएँ: भौतिक वस्तुओं के पीछे भागकर अपना कीमती समय और चेतना व्यर्थ न करें। अपने उपयोग को जिनवाणी और आत्म-कल्याण में लगाएँ।


2. संतुष्टि का भाव लाएँ: जो प्राप्त है, उसमें संतोष रखें। दूसरों की समृद्धि देखकर ईर्ष्या या और अधिक पाने का लालच न करें।


3. मान्यता और सोच बदलें: बाहरी चीजें न हमारे साथ आई थीं, न साथ जाएँगी। आत्मा ही वास्तविक धन है—इस बात को स्वीकार कर अपने अंदर के लोभ को धीरे-धीरे घटाना ही सच्चा शौच धर्म है।

Saturday, September 5, 2026

उत्तम आर्जव धर्म

यह वीडियो डॉ. संजीव गोधा द्वारा दसलक्षण महापर्व के तीसरे दिन "उत्तम आर्जव धर्म" पर दिया गया प्रवचन है (YouTube Video Link)।


प्रवचन के मुख्य सार को एक आम व्यक्ति की समझ के लिए नीचे सरल भाषा में क्रमवार समझाया गया है:


1. उत्तम आर्जव धर्म का क्या अर्थ है?

 ऋजुता यानी सरलता: 'आर्जव' शब्द 'ऋजु' से बना है, जिसका अर्थ है सरलता, निष्कपटता और सीधापन।


 मायाचार का अभाव: जैसे क्रोध के अभाव में क्षमा और मान (घमंड) के अभाव में मार्दव प्रकट होता है, वैसे ही मायाचार (छल-कपट, धोखेबाजी) के अभाव में उत्तम आर्जव धर्म प्रकट होता है।


2. मायाचार (छल-कपट) का फल: तिर्यंच गति

 गथियों की मुख्य कषायें: मनुष्यों में प्रायः मान (अहंकार), नारकियों में क्रोध, देवों में लोभ और तिर्यंचों (पशु-पक्षियों आदि) में मायाचार की मुख्यता होती है।


 तिर्यंच और निगोद का दुख: आचार्य उमास्वामी के अनुसार, माया तैर्यग्योनस्य—छल-कपट और मायाचारी करने का फल तिर्यंच गति है। तिर्यंच अवस्था में निगोद भी शामिल है, जहाँ नर्क से भी अनंत गुना अधिक कष्ट है । इसलिए जो जीव ऐसे घोर दुखों से बचना चाहते हैं, उन्हें मन के छल-कपट को त्यागना चाहिए।


3. छल-कपट (मायाचार) का वास्तविक स्वरूप

 मन, वचन और काय की विरूपता: 

 मन में कुछ और सोचना,

 वाणी (वचन) से कुछ और बोलना,

 और शरीर (क्रिया/आचरण) से कुछ और दिखाना।


 जब इन तीनों में दोहरापन (दिखावा या पाखंड) होता है, तो उसे मायाचार कहते हैं। आर्जव धर्म का अर्थ है—जैसा भीतर है, वैसा ही बाहर होना।


4. सच्चे आर्जव धर्म की पहचान

 केवल बाहरी बोलने तक सीमित नहीं: केवल मीठा बोलना या सीधे-सादे ढंग से व्यवहार कर लेना ही पूर्ण आर्जव नहीं है।


 आत्मा के स्वरूप को वैसा ही स्वीकारना: आत्मा का जो वास्तविक शुद्ध, शांत और सरल स्वभाव है, उसे वैसा ही जानना, मानना और आचरण में अपनाना ही सच्चा आर्जव धर्म है। स्वभाव की विपरीतता ही मायाचार है और स्वभाव की सहजता ही आर्जव है।


5. आम आदमी इसे अपने जीवन में कैसे उतारे?

1. दिखावा और पाखंड छोड़ें: जो आप वास्तव में नहीं हैं, वैसा दिखने का ढोंग न करें। अपने मन, बात और काम में ईमानदारी रखें।

2. तत्वज्ञान का अभ्यास करें: वस्तु के वास्तविक स्वरूप को समझें कि किसी को धोखा देकर या छल करके हम केवल अपने कर्म ही भारी करते हैं।

3. सहज और सरल बनें: जटिलताओं और कूटनीतियों से बचकर बच्चों जैसी स्वाभाविक सरलता और पवित्रता अपने विचारों व जीवन में अपनाएँ।


"दसलक्षण महापर्व के अगले धर्मों के बारे में जानने के लिए:"

"चौथे धर्म 'उत्तम शौच धर्म' का प्रवचन समझें" 

"दसलक्षण महापर्व के चौथे दिन 'उत्तम शौच धर्म' के प्रवचन का सरल हिंदी में सार समझाइए।"

"चार कषाय (क्रोध, मान, माया, लोभ) का जैन दर्शन में स्वरूप समझें" 

"जैन धर्म में चार कषाय—क्रोध, मान, माया और लोभ क्या हैं और ये जीव को कैसे बांधती हैं?

उत्तम मार्दव धर्म

यह वीडियो डॉ. संजीव गोधा द्वारा दसलक्षण महापर्व के दूसरे दिन "उत्तम मार्दव धर्म" पर दिया गया प्रवचन है (YouTube Video Link)।

इस प्रवचन के मुख्य बिंदुओं की सरल हिंदी में व्याख्या नीचे दी गई है:


1. दसलक्षण महापर्व का उद्देश्य

 परमात्मा बनाने वाली यूनिवर्सिटी: जैसे मेडिकल कॉलेज में पढ़ने वाला डॉक्टर और इंजीनियरिंग कॉलेज वाला इंजीनियर बनता है, वैसे ही दसलक्षण महापर्व वह आध्यात्मिक संस्थान है जहाँ आत्मा की साधना कर जीव परमात्मा बन सकता है।


 मोक्ष महल की सीढ़ियाँ: 10 धर्म रूपी सीढ़ियों पर चढ़कर ही मोक्ष रूपी महल की प्राप्ति होती है।


2. धर्म का वास्तविक स्वरूप

 बाहरी क्रिया बनाम अंदरूनी बदलाव: केवल पूजा-पाठ, व्रत, उपवास या तीर्थयात्रा कर लेना ही धर्म नहीं है।


 अभिप्राय बदलना: धर्म केवल बाहरी क्रियाकांड या क्षणिक भावुकता का नाम नहीं है, बल्कि अपनी सोच, दृष्टि और अंतर्मन की मान्यता (अभिप्राय) को बदलने का नाम है।


3. 'उत्तम मार्दव धर्म' क्या है?

 अहंकार (मान कषाय) का अभाव: 'मृदु' शब्द से मार्दव बना है, जिसका अर्थ है कोमलता, सरलता और विनम्रता। अपने भीतर के घमंड (मान कषाय) को नष्ट करना ही मार्दव धर्म है।


 छोटे-बड़े की भावना ही अहंकार है: जब हम किसी को अपने से छोटा या बड़ा देखने लगते हैं, वहीं से अहंकार और हीनभावना जन्म लेती है।


4. अहंकार को दूर करने का सुंदर उदाहरण

 ऊंचाई का दृष्टिकोण: जब कोई व्यक्ति पहाड़ या ऊंचे टावर पर खड़ा होकर नीचे देखता है, तो उसे नीचे के लोग और गाड़ियाँ बहुत छोटी दिखाई देती हैं। लेकिन वह यह भूल जाता है कि नीचे खड़ा व्यक्ति जब उसे देखेगा, तो वह भी उसे उतना ही छोटा दिखाई देगा।


 'मान' के आगे 'स' लगाओ (समान): यदि 'मान' (घमंड) को खत्म करना है, तो सबको 'समान' देखना शुरू कर दो। जब हम सभी आत्माओं को एक समान देखेंगे, तो घमंड अपने आप समाप्त हो जाएगा।


5. जीवन में कैसे अपनाएं?

 सब जीवों को सिद्ध समान देखना: जैन दर्शन का सिद्धांत है—"सर्व जीव छे सिद्ध सम", यानी प्रत्येक आत्मा में परमात्मा बनने की पूरी शक्ति है।


 संयोगों का घमंड न करें: धन-दौलत, रूप-रंग, पद, ज्ञान या कुल जैसी बाहरी चीजें अस्थायी हैं। इन बाहरी संयोगों पर घमंड करने के बजाय अपनी आत्मा के मूल स्वभाव की सरलता और विनम्रता को जीवन में प्रकट करना ही सच्चा उत्तम मार्दव धर्म है।

उत्तम क्षमा धर्म

 


यह वीडियो डॉ. संजीव गोधा द्वारा दसलक्षण महापर्व के पहले दिन "उत्तम क्षमा धर्म" पर दिया गया प्रवचन है (YouTube Video Link)।

प्रवचन के मुख्य बिंदुओं को एक आम व्यक्ति की समझ के अनुसार नीचे क्रमवार (one by one) समझाया गया है:

1. जैन पर्वों का असली स्वरूप

 आम त्योहार बनाम जैन पर्व:  दुनिया भर के सामान्य पर्वों में खाना-पीना, नए वस्त्र पहनना, पार्टियां करना और बाहरी मौज-मस्ती शामिल होती है।


 त्याग और साधना का पर्व: इसके विपरीत, जैन धर्म के दसलक्षण पर्व भोग के नहीं बल्कि वैराग्य, त्याग और आत्म-साधना के पर्व हैं। इसमें खाने-पीने का त्याग कर आत्मा के स्वभाव को जानने और समझने का प्रयास किया जाता है।


2. पर्व मनाने का सही तरीका

 केवल सोशल मीडिया तक सीमित न रहें: आज लोग केवल व्हाट्सएप, फेसबुक पर 'शुभकामनाएं' भेजकर या फोन पर बात करके औपचारिकता पूरी कर लेते हैं।


 जीवन में उतारना जरूरी: पर्व केवल मैसेज भेजने का नाम नहीं है, बल्कि धर्म के वास्तविक भाव को समझकर अपने आचरण में उतारने का नाम है।


3. वर्ष में दसलक्षण पर्व का आगमन

 साल में तीन बार: दसलक्षण पर्व वर्ष में तीन बार (चैत्र, माघ और भाद्रपद मास में) आते हैं । भाद्रपद (भादों) का पर्व सबसे प्रमुखता से और व्यापक रूप से मनाया जाता है।


4. 'उत्तम क्षमा' का सरल अर्थ

 क्रोध का त्याग: उत्तम क्षमा का पहला कदम अपने भीतर के क्रोध (गुस्से) को खत्म करना है।

 सच्ची क्षमा क्या है? केवल बाहर से 'क्षमा' कह देना या मजबूरी में चुप रह जाना क्षमा नहीं है। जब मन के भीतर किसी के प्रति कोई द्वेष, वैर या बदले की भावना न रहे और आत्मा में पूर्ण शांति हो, वही सच्ची उत्तम क्षमा है।


5. आम आदमी इसे अपने जीवन में कैसे उतारे?

1. प्रतिक्रिया (Reaction) से बचें: यदि कोई आपको अपशब्द कहे या आपके प्रतिकूल कार्य करे, तो तुरंत क्रोधित न होकर धैर्य रखें।


2. वैर-भाव न पालें: पुरानी कड़वी बातों और गलतियों को दिल से मिटाकर दूसरों को मन से क्षमा करें।


3. आत्म-निरीक्षण करें: दूसरों की कमियों पर ध्यान देने के बजाय अपने अंदर झांकें और अपने आत्म-स्वभाव में शांत रहने का अभ्यास करें।


चार कषाय का अभाव 

क्रोध           उत्तम क्षमा

मान            उत्तम मार्जाव 

माया।         उत्तम आर्जव 

लोभ           उत्तम शौच


पंच पाप का अभाव


हिंसा          उत्तम संयम

झूठ            उत्तम सत्य

चोरी          उत्तम त्याग

कुशील      उत्तम ब्रह्मचर्य

परिग्रह       उत्तम अकिंचन

                   उत्तम ताप

कर्म का सिद्धांत: अपनी तकदीर के निर्माता आप स्वयं हैं!

 


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1. आत्म-स्मृति और ध्यान (Soul Consciousness)

सत्र की शुरुआत ध्यान (Meditation) के अभ्यास से होती है, जिसमें स्वयं को देह से अलग एक "चमकता हुआ सितारा" और एक अजर-अमर आत्मा के रूप में अनुभव करने का निर्देश दिया गया है ।

बीके शिवानी बताती हैं कि आत्मा का मूल स्वरूप "संपूर्ण पवित्रता" (Complete Purity) है—जहाँ न कोई पुरानी बीती बातें हैं, न किसी के प्रति मैल और न ही खुद से कोई शिकायत ।

2. जीवन की योजनाएँ और भाग्य की वास्तविकता (Destiny vs Plans)

मनुष्य अपने और परिवार के लिए जीवन की एक योजना (Script) तैयार करता है ।

 कई बार घटनाएँ हमारी सोच के अनुसार होती हैं, लेकिन कभी-कभी बिल्कुल अप्रत्याशित हो जाती हैं; जैसे किसी पर अत्यधिक विश्वास करने पर भी धोखा मिल जाना या किसी अनजान व्यक्ति का अकारण सहयोगी बन जाना ।

 यह सब पूर्व जन्मों और पिछले कर्मों के अदृश्य कार्मिक खातों (Karmic Accounts) के आधार पर तय होता है।


3. रोल कॉन्शियसनेस बनाम आत्मिक दृष्टि (Role vs Soul Consciousness)

 समाज और कार्यस्थल में हम लोगों से उनके पद (Position), ओहदे, प्रोटोकॉल या रिश्तों के आधार पर व्यवहार करते हैं ।

 जब हम अलग-अलग भूमिकाओं वाले लोगों से मिलते हैं, तो हमारे बात करने का तरीका, शारीरिक मुद्रा (Body Language) और आंतरिक भावनाएँ बदल जाती हैं ।

 केवल पद और पदवी देखकर व्यवहार करने से व्यक्ति के अंदर देह-अभिमान और अहंकार (Ego) बढ़ता है, जिससे वह या तो खुद को दूसरों से श्रेष्ठ समझता है या हीन महसूस करता है।


 जब हम स्वयं को आत्मा समझकर सामने वाले को भी आत्मा के रूप में देखते हैं, तो हर संबंध में सम्मान, समानता और सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है।

4. कार्मिक खातों को सुलझाने की विधि (Power of Blessings)

 यदि सामने वाला व्यक्ति कटु व्यवहार या गुस्सा कर रहा हो, तो हमें बदले में गुस्सा करने के बजाय मौन रहकर मन ही मन उसे शुभ संकल्प (Blessings) देने चाहिए ।

 मन में यह संकल्प दोहराना चाहिए कि: "आप एक शांत स्वरूप आत्मा हैं, परमात्मा की शक्तियाँ आपके साथ हैं और हमारा संबंध सम्मानपूर्ण है" । यह आंतरिक वाइब्रेशन सामने वाले के नकारात्मक व्यवहार को शांत करने में मदद करती है।

5. क्षमा और मुक्ति (Forgiveness and Let Go)


 मन में किसी के प्रति जो कड़वाहट या गांठ बंधी होती है, वह केवल एक सोच (Thought) है और उसे खोलना भी सिर्फ एक सही सोच से ही संभव है ।

 कार्मिक खाते को समाप्त करने के लिए बीके शिवानी यह अभ्यास कराती हैं:

 "बीती सो बीती, पुराना कार्मिक खाता आज यहीं समाप्त होता है" ।

 "मैं आपको क्षमा करता/करती हूँ और आपसे क्षमा मांगता/मांगती हूँ"।

 हमें अपना पूरा ध्यान दूसरों के व्यवहार पर केंद्रित करने के बजाय अपने स्वयं के कर्म, विचार और संकल्पों पर रखना चाहिए ।


कर्म का सिद्धांत: अपनी तकदीर के निर्माता आप स्वयं हैं!

अक्सर हम सोचते हैं कि जीवन में सब कुछ हमारी योजना के अनुसार क्यों नहीं चलता? किसी पर अटूट विश्वास करने पर भी धोखा क्यों मिलता है, और कोई अनजान व्यक्ति बिना वजह मददगार कैसे बन जाता है?

ब्रह्माकुमारीज़ संस्थान में बीके शिवानी द्वारा समझाए गए "कर्म के सिद्धांत" के गहरे और जीवन बदलने वाले सूत्र:


1. पद और चेहरे नहीं, आत्मा को देखें दिनभर में हम कई लोगों से मिलते हैं—कोई बड़ा अधिकारी है तो कोई गेट पर खड़ा गार्ड। अक्सर हम उनके ओहदे और हैसियत देखकर अपना व्यवहार और ऊर्जा बदल लेते हैं। यही अहंकार और तनाव की शुरुआत है। जब आप यह याद रखते हैं कि "मैं एक पवित्र आत्मा हूँ और सामने वाला भी एक दिव्य आत्मा है," तो हर रिश्ते में डर या दिखावे की जगह सच्चा सम्मान और शांति आ जाती है।


2. जीवन की स्क्रिप्ट और कार्मिक खाता जो कुछ आज हमारे सामने आ रहा है, वह हमारे ही पुराने कर्मों और संकल्पों का परिणाम है। सामने वाले का व्यवहार उसका कार्मिक हिसाब है, लेकिन उस पर हमारी प्रतिक्रिया (Response) हमारा नया कर्म तय करती है। दूसरों के व्यवहार पर आपका नियंत्रण नहीं हो सकता, लेकिन अपने कर्म पर आपका पूरा अधिकार है।


3. मन की गांठें खोलें (क्षमा की शक्ति) किसी के प्रति सालों से मन में दबाया हुआ गुस्सा या शिकायत सिर्फ एक नकारात्मक सोच है। बीती बातों को पकड़कर रखना खुद को सजा देने जैसा है। आज ही अपने मन से कहें:

"बीती सो बीती... पुराना कार्मिक खाता आज यहीं समाप्त। मैं आपको क्षमा करता हूँ, आपसे क्षमा मांगता हूँ। मेरी तरफ से आपके लिए केवल दुआएँ और शुभकामनाएँ हैं।"

4. शब्दों से नहीं, वाइब्रेशन से बात करें जब कोई आप पर गुस्सा करे या कड़वा बोले, तो बदले में बहस करने के बजाय मौन रहकर मन ही मन उसे शुभ संकल्प दीजिए: "आप शांत स्वरूप आत्मा हैं, परमात्मा की शक्तियाँ आपके साथ हैं।" आपकी सकारात्मक ऊर्जा सामने वाले के गुस्से को भी शांत करने का सामर्थ्य रखती है।

आज का संकल्प: परिस्थितियाँ जैसी भी हों, नियंत्रण हमेशा आपके हाथ में है। अपने विचारों को शुद्ध रखिए, हर आत्मा को सम्मान दीजिए और कर्म ऐसा कीजिए जो आपकी आने वाली तकदीर को सुंदर बना दे।

अपने मन को हल्का कीजिए, दुआएँ दीजिए और मुस्कुराकर आगे बढ़िए!

Thursday, September 3, 2026

उपनिषद क्या है? (What is Upanishad?



उपनिषद क्या है? (What is Upanishad?)

​'उपनिषद' शब्द तीन शब्दों के मेल से बना है:
• ​उप = समीप (पास)
• ​नि = निष्ठापूर्वक (श्रद्धा से)
• ​षद् = बैठना

​इसका शाब्दिक अर्थ है — "गुरु के समीप निष्ठापूर्वक बैठकर लिया गया रहस्यमयी ज्ञान।"

​प्राचीन काल में शिष्य जब आश्रम में गुरु के पास बैठकर जीवन, आत्मा और ईश्वर के रहस्य को समझते थे, वही ज्ञान उपनिषदों में दर्ज किया गया। मुख्य रूप से 108 उपनिषद माने जाते हैं, जिनमें से 10 से 13 प्रमुख उपनिषद (जैसे- ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुंडक, मांडूक्य, छान्दोग्य, बृहदारण्यक
 आदि) सबसे महत्वपूर्ण हैं।

​उपनिषद क्या सिखाता है? (What does it teach?)
​उपनिषद पूजा-पाठ या कर्मकांड के बजाय दर्शन (Philosophy) और आत्म-ज्ञान (Self-realization) पर जोर देते हैं। इसकी मुख्य शिक्षाएं निम्नलिखित हैं:

• ​1. ब्रह्म और आत्मा का ज्ञान (Brahman & Atman)
• ​ब्रह्म (Brahman): इस पूरी सृष्टि को चलाने वाली एक सर्वव्यापी, निराकार और परम शक्ति।
• ​आत्मा (Atman): हर जीव के अंदर बसने वाला सच्चा 'मैं' या चेतना।
• ​उपनिषद सिखाता है कि आत्मा और ब्रह्म अलग नहीं, बल्कि एक ही हैं (अहम ब्रह्मास्मि — मैं ही ब्रह्म हूँ)।

• ​2. जीवन का अंतिम लक्ष्य: मोक्ष (Liberation)
• ​सांसारिक दुखों, मोह-माया और जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति पाना ही जीवन का असली उद्देश्य है।

• ​3. कर्म और पुनर्जन्म का नियम (Karma & Reincarnation)
• ​मनुष्य जैसा कर्म करता है, उसे वैसा ही फल भोगना पड़ता है। आत्मा शरीर बदलती है, लेकिन आत्म-ज्ञान मिलते ही वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाती है।

• ​4. सत्य की खोज (Search for Truth)
• ​उपनिषद बाहरी दिखावे को छोड़कर अपने अंदर झांकने और 'मैं कौन हूँ?' इस सवाल का जवाब खोजने की प्रेरणा देते हैं।

​उपनिषद का महावाक्य (Core Essence)
​उपनिषद का मूल संदेश इस प्रसिद्ध प्रार्थना में समाहित है:
"असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मा अमृतं गमय॥"
(हे ईश्वर, मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चल, अंधकार से प्रकाश की ओर ले चल, और मृत्यु से अमरता की ओर ले चल।)

उपनिषदों की समझ को और गहरा बनाने के लिए इनके वर्गीकरण, प्रमुख सिद्धांतों तथा 4 सबसे प्रसिद्ध महावाक्यों का विवरण नीचे दिया गया है।

1. वेदों से संबंध और प्रमुख उपनिषद
प्रत्येक उपनिषद किसी न किसी वेद से जुड़ा हुआ है। कुल 108 उपनिषदों में से आदिशंकराचार्य द्वारा भाष्य लिखे गए 10 मुख्य उपनिषद (दशोपनिषद) सबसे प्रामाणिक माने जाते हैं:

वेदसंबंध उपनिषदऋग्वेदऐतरेय, कौषीतकिसामवेदछान्दोग्य, केनशुक्ल यजुर्वेदईशावास्य, बृहदारण्यककृष्ण यजुर्वेदकठ, तैत्तिरीय, श्वेताश्वतरअथर्ववेदमुंडक, मांडूक्य, प्रश्न

2. चार महावाक्य (Four Great Aphorisms)
उपनिषदों के पूरे दर्शन का सार चार वेदों के इन चार महावाक्यों में समाहित है:
• अहं ब्रह्मास्मि (बृहदारण्यक उपनिषद - यजुर्वेद) — "मैं ही ब्रह्म हूँ।" (स्वयं के भीतर ईश्वर की उपस्थिति का अहसास)।
• तत्त्वमसि (छान्दोग्य उपनिषद - सामवेद) — "वह (ब्रह्म) तुम ही हो।"
• अयमात्मा ब्रह्म (मांडूक्य उपनिषद - अथर्ववेद) — "यह आत्मा ही ब्रह्म है।"
• प्रज्ञानं ब्रह्म (ऐतरेय उपनिषद - ऋग्वेद) — "परम ज्ञान ही ब्रह्म है।"

3. उपनिषद की प्रसिद्ध कथाएं और विचार
• कठोपनिषद (नचिकेता और यमराज संवाद): बालक नचिकेता यमराज से मृत्यु के बाद का रहस्य पूछता है। यमराज उसे सिखाते हैं कि शरीर नश्वर है, लेकिन आत्मा अजर और अमर है।
• सत्यमेव जयते: भारत का राष्ट्रीय आदर्श वाक्य मुंडक उपनिषद से लिया गया है, जिसका अर्थ है— "सत्य की ही जीत होती है।"
• पंचकोश सिद्धांत: तैत्तिरीय उपनिषद में बताया गया है कि मनुष्य का अस्तित्व 5 परतों (अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय कोश) से बना है।