Monday, July 27, 2026

भव्य प्रवेश की यह ग़लत संस्कृति

मुझे WhatsApp पर एक मैसेज मिला है, जिस पर चर्चा और बहस करने की ज़रूरत है; और अगर ज़रूरत पड़ी, तो हमें अपनी आगे की रणनीति में बदलाव करना होगा।

भव्य प्रवेश की गलत संस्कृति जैन समाज में कहाँ से आई?


भव्यता से आत्मा नहीं जागतीवैराग्य से जागती है। धर्म के नाम पर तमाशा नहींतपस्या होनी चाहिए


आज जैन समाज में एक नई बीमारी पनप रही है — 


भव्य प्रवेश” की संस्कृति। चाहे दीक्षा हो या चातुर्मासहर जगह घोड़ोंहाथियोंबैंड-बाजोंपुष्प वर्षाआतिशबाज़ी और हेलीकॉप्टर से संतों का स्वागत किया जाता है।


 सवाल सीधा और स्पष्ट है। 

क्या यह महावीर भगवान के बताए मार्ग का अनुसरण है?


या फिर हमने धर्म को भी दिखावे और इवेंट मैनेजमेंट बना दिया है


जैन परंपरा की मूल भावना   

जैन धर्म सिखाता है - त्यागवैराग्य मौनआत्मानुशासन।


भगवान महावीर ने राजमहल छोड़कर नंगे पांवचुपचाप वन की ओर प्रस्थान किया। उनका कोई स्वागत नहीं हुआ कोई रथ कोई बाजा। क्योंकि वे भीतर की यात्रा पर निकले थे कि किसी जुलूस में।


 दिखावे की शुरुआत कैसे हुई 

चातुर्मास में संतों का ‘राजसी प्रवेश’ क्यों?


चातुर्मास तप का समय हैलोक दिखावे का नहीं।


आज यह देखने को मिल रहा है कि जब कोई मुनिराज चातुर्मास हेतु नगर में पधारते हैं  तो घोड़े और हाथियों की सवारी, बैंड-बाजों और ढोल-नगाड़ों की ध्वनिहेलीकॉप्टर से फूल बरसाना,सड़कें सजाना,लाखों के गेट और स्टेज बनाना। और उसके बाद सोशल मीडिया पर वीडियो अपलोड करना मानो कोई फिल्मी सितारा  रहा हो। 

दीक्षा या गृह त्याग को सेलिब्रेशन’ क्यों बना दिया गया जहाँ त्याग होना चाहिएवहाँ अब लाखों का खर्चस्पॉन्सरशिप की दौड़,किसके पास कितना बड़ा जुलूस था इसका मुकाबला।

सवाल उठता है — क्या आत्मा की यात्रा भी अब स्पॉन्सर्ड हो गई है

इसके घातक परिणाम। 

धर्म का मर्म लुप्त होता जा रहा है  बच्चों और युवाओं को लगने लगा है कि धर्म एक इवेंट है कि साधना।


 साधुओं पर मोह लदता है ।जो वैरागी दिखावे और सम्मान से प्रवेश करेवो भीतर कैसे निर्विकारी बनेगा?


 समाज का पैसा व्यर्थ हो रहा हैहजारों परिवार भूखे हैंबेटियाँ बिना शादी के घर बैठी हैंलेकिन हजारों-लाखोंसंतों के स्वागत में उड़ाए जा रहे हैं। साधु-संघों में प्रतियोगिता कहाँ कितना बड़ा स्वागत हुआ?


 ये संतों की लोकप्रियता का मापदंड बन गया है। क्या हम भगवान बनने की ओर बढ़ रहे हैंया बॉलिवुड स्टारबनने की ओर


कठोर प्रश्न जो समाज को झकझोरें चातुर्मास में संतों के भव्य स्वागत से किसकी आत्मा जागती है?


 दीक्षा को तमाशा बनाकर हम किस नई पीढ़ी को प्रेरित कर रहे हैं। 

अगर मुनिराज भी दिखावे में चुप रहेंतो समाज को कौन मार्ग दिखाएगा


क्या महावीर की साधना इतनी सस्ती हो गई है कि वह गेट और आति शबाज़ी से मापी जाए

समाधान की ओर सादगी से स्वागत करेंभावनाओं से नहीं। 


आयोजनों से  दीक्षा या चातुर्मास का स्वागत मौन साधनाभक्ति गीतऔर आत्मिक भावों से करें।


 संघ और गुरुजन स्वयं यह निर्णय लें  कि वे केवल सादे प्रवेश स्वीकार करेंगे बिना बैंडबिना ढोलबिनाधन-प्रदर्शन के।


 संयम और त्याग का आदर्श प्रस्तुत करें संत अगर खुद इन भव्यताओं को अस्वीकार करेंतो समाज स्वतः सुधर जाएगा। 


नई पीढ़ी को सिखाए धर्म सिर्फ पगड़ी बांधने और घोड़े पर बैठने का नाम नहीं यह भीतर की क्रांति है। 


निष्कर्ष -: जैन धर्म “भीतर” की शुद्धि की बात करता है, “बाहर” की भव्यता की नहीं।


 भव्य प्रवेश की यह ग़लत संस्कृति आज हमारी आत्मिक उन्नति में बाधा बन रही है।


अगर हम सच में महावीर के अनुयायी हैंतो हमें उनकी तरह ही मौनविनम्र और निर्विकारी बनना होगा। अब निर्णय आपका है —धर्म निभाना हैया धर्म का तमाशा करना है?