Friday, September 11, 2026

कषायों को कम करने के व्यावहारिक उपाय

 यहाँ कषायों के प्रकार, उनकी तीव्रता के उदाहरण और नो-कषायों की पूरी जानकारी हिंदी में एक-एक करके समझाई गई है।

1. कषाय की चार तीव्रताएँ (Four Levels of Intensity)

जैन ग्रंथों में चार मुख्य कषायों (क्रोध, मान, माया, लोभ) को उनकी ताकत और समय के आधार पर चार स्तरों में बाँटा गया है:

• अनंतानुबंधी (Anantanubandhi): यह सबसे खतरनाक और तीव्र स्तर है। यह आत्मा के सम्यक्त्व (सच्ची श्रद्धा) को रोकता है और नरक या तिर्यंच (पशु) गति का कारण बनता है। यह कषाय जीवन-भर या कई जन्मों तक आत्मा का पीछा नहीं छोड़ता।

• अप्रत्याख्यानावरण (Apratyakhyanavarana): यह दूसरे स्तर की तीव्रता है। यह कषाय व्यक्ति को जीवन में आंशिक नियम या छोटे व्रत (जैसे अणुव्रत) लेने से रोकता है। यह आत्मा को श्रावक (गृहस्थ धर्म) के मार्ग पर चलने नहीं देता।

• प्रत्याख्यानावरण (Pratyakhyanavarana): यह तीसरे स्तर की तीव्रता है। यह कषाय व्यक्ति को पूर्ण त्याग करने से रोकता है। इसके रहते कोई भी जीव मुनि धर्म या महाव्रत अंगीकार नहीं कर सकता।

• संज्वलन (Sanjvalana): यह सबसे हल्का और सूक्ष्म स्तर है। यह मुनिराजों या उच्च साधकों में भी पाया जाता है। इसके रहते जीव व्रत तो ले लेता है, लेकिन पूर्ण वीतरागता (परम शांति) और यथाख्यात चारित्र प्राप्त नहीं कर पाता। यह कषाय बहुत कम समय के लिए आता है और जल्दी शांत हो जाता है।

2. चार मुख्य कषायों के पारंपरिक उदाहरण (Traditional Analogies)
इन चारों तीव्रताओं को समझाने के लिए जैन दर्शन में बहुत सुंदर उदाहरण दिए गए हैं:

क्रोध (Anger) के चार स्तर:

• पत्थर की लकीर: अनंतानुबंधी क्रोध पत्थर पर खिंची दरार जैसा होता है, जिसे मिटाना लगभग असंभव होता है। यह कई जन्मों तक बैर (दुश्मनी) के रूप में बना रहता है।

• मिट्टी की लकीर: अप्रत्याख्यानावरण क्रोध सूखी और फटी हुई मिट्टी की दरार जैसा है। यह लंबे समय तक रहता है, लेकिन जब शांत रूपी बारिश होती है, तो भर जाता है।

• रेत की लकीर: प्रत्याख्यानावरण क्रोध रेत पर खींची रेखा जैसा होता है। यह कुछ समय के लिए दिखता है, लेकिन हवा के एक झोंके से आसानी से मिट जाता है।

• पानी की लकीर: संज्वलन क्रोध पानी पर खिंची लकीर जैसा होता है। यह जैसे ही बनता है, उसी क्षण तुरंत समाप्त हो जाता है।

मान/अहंकार (Pride) के चार स्तर:

• पत्थर का खंभा: अनंतानुबंधी मान पत्थर के खंभे जैसा कठोर होता है। यह कभी झुकता नहीं, बल्कि सीधा टूट जाता है।

• हड्डी का खंभा: अप्रत्याख्यानावरण मान सूखी हड्डी जैसा कड़ा होता है। इसे झुकाना बहुत मुश्किल है, लेकिन भारी तपन या दबाव में इसे थोड़ा मोड़ा जा सकता है।

• लकड़ी का खंभा: प्रत्याख्यानावरण मान सूखी लकड़ी जैसा होता है। यह सीधा खड़ा रहता है, लेकिन जरूरत पड़ने पर इसे धनुष की तरह झुकाया जा सकता है।

• बेंत या गीली लकड़ी: संज्वलन मान बेंत (cane) की तरह होता है। हवा चलने पर यह तुरंत झुक जाता है और हवा रुकते ही वापस अपनी सामान्य स्थिति में आ जाता है।

माया/कपट (Deceit) के चार स्तर:

• बांस की जड़: अनंतानुबंधी मायाचार बांस के पेड़ की जड़ की तरह उलझा हुआ, टेढ़ा-मेढ़ा और जमीन के अंदर छिपा होता है। ऐसा छल-कपट जीवन भर नहीं छूटता।

• मेंढे (भेड़) का सींग: अप्रत्याख्यानावरण मायाचार मेंढे के सींग की तरह घुमावदार होता है। यह टेढ़ा तो होता है, लेकिन जमीन के ऊपर साफ दिखाई देता है।

• सांप की चाल: प्रत्याख्यानावरण मायाचार सांप की टेढ़ी-मेढ़ी चाल जैसा होता है। सांप चलते समय टेढ़ा होता है, लेकिन बिल में घुसते ही सीधा हो जाता है।

• लकड़ी का छिलका: संज्वलन मायाचार लकड़ी को छीलने पर निकलने वाले पतले छिलके जैसा होता है, जो सिर्फ ऊपर से थोड़ा सा मुड़ा होता है और जरा से दबाव से सीधा हो जाता है।

लोभ (Greed) के चार स्तर:

• पक्का रंग (कृमिज रंग): अनंतानुबंधी लोभ कपड़े पर चढ़े ऐसे पक्के रंग जैसा है जो धोने से भी कभी नहीं छूटता। यह लोभ आत्मा को पूरी तरह जकड़ लेता है।

• कीचड़ या ग्रीस का दाग: अप्रत्याख्यानावरण लोभ गाड़ी के ग्रीस या तेल के काले दाग जैसा होता है। इसे साफ करने के लिए बहुत भारी मेहनत और साबुन की जरूरत पड़ती है।

• शरीर का मैल: प्रत्याख्यानावरण लोभ शरीर या साधारण कपड़े पर लगे मैल जैसा होता है। यह गंदा तो दिखता है, लेकिन सिर्फ पानी से धोने पर तुरंत साफ हो जाता है।

• हल्दी का रंग: संज्वलन लोभ हल्दी के पीले रंग जैसा होता है। यह धूप या हवा लगने मात्र से ही बहुत तेजी से उड़ जाता है और फीका पड़ जाता है।

3. नौ नो-कषाय (9 Quasi-Passions)

ये स्वतंत्र रूप से कर्म नहीं बांधते, बल्कि ऊपर बताए गए मुख्य कषायों को भड़काने का काम करते हैं:

• हास्य (Hasya): किसी का मजाक उड़ाना, बिना बात के जोर से हंसना या चंचलता दिखाना, जो आत्म-लीनता को भंग करे।

• रति (Rati): संसार की अनित्य या भौतिक वस्तुओं और इंद्रिय सुखों में बहुत ज्यादा लगाव या प्रेम होना।

• अरति (Arati): धर्म-कर्म, सामायिक या आत्म-साधना के कार्यों में मन न लगना, उदासीनता या ऊब महसूस होना।

• शोक (Shoka): किसी प्रिय वस्तु, धन या व्यक्ति के बिछड़ जाने पर गहरा दुःख, विलाप या रोना-धोना करना।

• भय (Bhaya): मृत्यु, बदनामी, बीमारी या अनहोनी जैसी चीजों का डर मन में बिठाकर रखना।

• जुगुप्सा (Jugupsa): किसी वस्तु, अशुद्ध चीज या व्यक्ति को देखकर मन में घृणा, नफरत या ग्लानि का भाव लाना।

• पुरुषवेद (Purusha-veda): पुरुषों के मन में स्त्रियों के प्रति होने वाली काम-वासना या आकर्षण।

• स्त्रीवेद (Stri-veda): स्त्रियों के मन में पुरुषों के प्रति होने वाली काम-वासना या आकर्षण।

• नपुंसकवेद (Napunsaka-veda): स्त्री और पुरुष दोनों के प्रति, या दोनों में से किसी के प्रति भी तीव्र काम-वासना का विकृत भाव होना।

इस प्रकार, 16 मुख्य कषाय और इन 9 नो-कषायों को मिलाकर जैन धर्म में कुल 25 कषाय (चारित्र मोहनीय कर्म) कहे जाते हैं।

यहाँ जैन दर्शन के अनुसार गुणस्थान (Spiritual Stages) के क्रम में कषायों के नष्ट होने की प्रक्रिया को एक-एक करके समझाया गया है।

जैसे-जैसे आत्मा आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ती है, ये कषाय एक निश्चित व्यवस्था के तहत कमजोर होते हैं और अंत में पूरी तरह समाप्त हो जाते हैं।

गुणस्थान के अनुसार कषायों के घटने का क्रम

• अनंतानुबंधी कषाय का नाश (चौथा गुणस्थान): जब कोई जीव पहली बार सम्यग्दर्शन (सच्ची श्रद्धा) प्राप्त करता है, तब सबसे पहले अनंतानुबंधी क्रोध, मान, माया और लोभ का उपशम (दबना) या क्षय (नाश) होता है। इसके हटते ही जीव चौथे गुणस्थान (अविरत सम्यग्दृष्टि) में आ जाता है।

• अप्रत्याख्यानावरण कषाय का नाश (पाँचवाँ गुणस्थान): 
जब सम्यग्दृष्टि जीव अपने जीवन में आंशिक त्याग अपनाता है और श्रावक के 12 व्रत (अणुव्रत) अंगीकार करता है, तब अप्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया और लोभ का नाश होता है। जीव देशविरत नाम के पाँचवें गुणस्थान में पहुँच जाता है।

• प्रत्याख्यानावरण कषाय का नाश (छठा और सातवाँ गुणस्थान):
 जब जीव संसार से पूरी तरह विरक्त होकर मुनि दीक्षा लेता है और महाव्रतों का पालन करता है, तब प्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया और लोभ पूरी तरह समाप्त हो जाते हैं। मुनिराज छठे (प्रमत्तसंयत) और सातवें (अप्रमत्तसंयत) गुणस्थान में झूलते रहते हैं।

• नो-कषायों का मंद होना (आठवाँ और नौवाँ गुणस्थान): जब मुनिराज आत्म-ध्यान की गहराई में उतरते हैं (जिसे क्षपक श्रेणी कहा जाता है), तब आठवें और नौवें गुणस्थान में हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा और तीनों वेदों (पुरुष, स्त्री, नपुंसक वेद) का पूरी तरह नाश हो जाता है।

• संज्वलन क्रोध, मान और माया का नाश (दसवाँ गुणस्थान): दसवें गुणस्थान (सूक्ष्मसांपराय) के अंत तक पहुँचते-पहुँचते मुनिराज के भीतर से संज्वलन क्रोध, संज्वलन मान और संज्वलन माया भी पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं। अब आत्मा में केवल अत्यंत सूक्ष्म लोभ बचता है।

• संज्वलन लोभ का पूर्ण नाश (बारहवाँ गुणस्थान): जैसे ही जीव दसवें गुणस्थान से आगे बढ़ता है, वह संज्वलन लोभ का भी पूरी तरह समूल नाश कर देता है। लोभ के नष्ट होते ही जीव सीधे बारहवें गुणस्थान (क्षीणमोह) में पहुँच जाता है, जहाँ मोहनीय कर्म का नामोनिशान नहीं रहता।

• पूर्ण वीतरागता की प्राप्ति (तेरहवाँ गुणस्थान): मोहनीय कर्म (सभी 25 कषायों) के पूरी तरह नष्ट होने के अंतर्मुहूर्त (लगभग 48 मिनट) बाद, जीव को केवलज्ञान (परम ज्ञान) प्रकट हो जाता है। वह तेरहवें गुणस्थान (सयोगकेवली) में आकर अरिहंत भगवान बन जाते हैं, जो पूरी तरह कषाय-रहित और वीतरागी होते हैं।

कषायों को कम करने के व्यावहारिक उपाय (Daily Practices)

एक आम श्रावक (गृहस्थ) अपने दैनिक जीवन में इन उपायों के द्वारा कषायों की तीव्रता को कम करता है:

• सामायिक (Meditation): प्रतिदिन कम से कम 48 मिनट के लिए संसार की सभी चिंताओं को छोड़कर समता भाव में बैठना। इससे तीव्र कषायें तुरंत शांत होकर संज्वलन जैसी मंद हो जाती हैं।

• प्रतिक्रमण (Repentance): दिन भर में या रात में अज्ञानवश किए गए कषायों और गलतियों को याद करके उनके लिए पश्चाताप करना और भविष्य में न दोहराने का संकल्प लेना।

• भावनाओं का चिंतन (12 Bhavanas): अनित्यता, अशरण, और एकत्व जैसी 12 भावनाओं का बार-बार चिंतन करने से धन, परिवार और शरीर के प्रति होने वाला लोभ और मोह अपने आप कम होने लगता है।

• क्षमावाणी (Forgiveness): साल में कम से कम एक बार (पर्युषण पर्व के अंत में) सभी जीवों से अपने ज्ञात-अज्ञात कषायों (क्रोध, अहंकार) के लिए मन, वचन और काय से क्षमा मांगना और सबको क्षमा करना।

Think Before You Try the Viral 80s/90s AI Photo Trend!



Think Before You Try the Viral 80s/90s AI Photo Trend! 


We all love fun photo trends, but before uploading your portraits to random AI filter apps, be aware of the digital risks:


Your Face is Biometric Data: Many free third-party apps include hidden clauses in their terms allowing them to store your photos and train AI models on your facial features.


Deepfake & Impersonation Risks: Once clear facial images are stored on unverified servers or leaked, they can be misused by scammers for identity theft, morphing, or face-swapping scams.


Rogue Apps: Cybercriminals often launch look-alike filter apps simply to gain access to your phone's full media library and contacts.


Safety Rules:

1. Avoid downloading unknown third-party apps or giving unnecessary permissions (like contacts or location).

2. Never upload pictures containing ID cards, family members, or sensitive background details.

3. If using major AI tools, check privacy settings and turn off "data sharing for model training."

Enjoy technology, but protect your digital identity first! 


सावधान! वायरल 80s/90s AI फोटो ट्रेंड अपनाने से पहले यह जरूर पढ़ें 


सोशल मीडिया पर 1980-90 के दशक वाली विंटेज फोटो बनाने का ट्रेंड बहुत तेजी से चल रहा है। दिखने में यह मजेदार लगता है, लेकिन किसी भी अनजान ऐप पर अपनी असली फोटो अपलोड करने से पहले इन साइबर खतरों को समझें:


चेहरा केवल फोटो नहीं, बायोमेट्रिक डेटा है: जब आप किसी थर्ड-पार्टी या फ्री ऐप पर अपनी साफ फोटो डालते हैं, तो आप अपना फेशियल डेटा उन्हें दे रहे होते हैं। कई ऐप्स की पॉलिसी में साफ लिखा होता है कि वे इस डेटा का उपयोग अपने AI मॉडल को ट्रेन करने के लिए कर सकते हैं।


डीपफेक और फर्जीवाड़े का खतरा: यदि आपका फेशियल डेटा किसी असुरक्षित सर्वर पर स्टोर होता है या लीक होता है, तो जालसाज इसका इस्तेमाल मॉर्फिंग (गलत तस्वीरें बनाने), डीपफेक वीडियो या आपकी पहचान चुराकर किसी धोखाधड़ी में कर सकते हैं।


फर्जी ऐप्स का जाल: ऐसे ट्रेंड्स के दौरान कई संदिग्ध ऐप्स प्ले स्टोर या बाहरी लिंक पर आ जाती हैं, जिनका मुख्य मकसद आपके फोन की गैलरी, कॉन्टैक्ट्स और निजी डेटा तक पहुंच बनाना होता है।


सुरक्षित रहने के उपाय:

1. किसी भी अनजान या गैर-भरोसेमंद ऐप को फोन में इंस्टॉल न करें और गैर-जरूरी परमिशन (जैसे गैलरी, कॉन्टैक्ट्स) न दें।

2. ऐसी फोटो कभी अपलोड न करें जिसमें बैकग्राउंड में कोई पहचान पत्र (ID), गाड़ी का नंबर या निजी दस्तावेज दिख रहे हों।

3. ट्रेंड का आनंद लें, लेकिन अपनी डिजिटल पहचान और प्राइवेसी को जोखिम में न डालें।


जागरूक रहें और अपनों को भी सतर्क करें! 

Thursday, September 10, 2026

शौच का वास्तविक अर्थ मात्र बाहरी शारीरिक स्वच्छता नहीं, बल्कि आत्मा की आंतरिक पवित्रता



प्रस्तुत स्रोत डॉ. संजीव गोधा द्वारा उत्तम शौच धर्म पर दिया गया एक आध्यात्मिक प्रवचन है, जो जैन पर्व दशलक्षण के अवसर पर केंद्रित है। लेखक के अनुसार, शौच का वास्तविक अर्थ मात्र बाहरी शारीरिक स्वच्छता नहीं, बल्कि आत्मा की आंतरिक पवित्रता और लोभ कषाय का पूर्ण अभाव है। वे स्पष्ट करते हैं कि लोभ केवल धन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन, पांच इंद्रियों के विषयों और नाम-प्रसिद्धि के प्रति गहरी आसक्ति के रूप में भी विद्यमान है। 


इस प्रवचन में लोभ को पाप का बाप' बताते हुए तर्क दिया गया है कि यही समस्त विकृतियों की जड़ है और इसके मिटने पर ही पूर्ण वीतरागता प्रकट होती है। अंततः, यह पाठ व्यक्ति को अपने शाश्वत शुद्ध स्वभाव को पहचानने और बाहरी प्रलोभनों को त्यागकर आत्म-रमण करने की प्रेरणा देता है।


उत्तम शौच धर्म: लोभ त्याग एवं आत्मिक शुद्धि


प्रस्तुत स्रोत डॉ. संजीव गोधा द्वारा उत्तम शौच धर्म पर दिया गया एक आध्यात्मिक प्रवचन है, जो जैन पर्व दशलक्षण के अवसर पर केंद्रित है। लेखक के अनुसार, शौच का वास्तविक अर्थ मात्र बाहरी शारीरिक स्वच्छता नहीं, बल्कि आत्मा की आंतरिक पवित्रता और लोभ कषाय का पूर्ण अभाव है। वे स्पष्ट करते हैं कि लोभ केवल धन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन, पांच इंद्रियों के विषयों और नाम-प्रसिद्धि के प्रति गहरी आसक्ति के रूप में भी विद्यमान है। इस प्रवचन में लोभ को 'पाप का बाप' बताते हुए तर्क दिया गया है कि यही समस्त विकृतियों की जड़ है और इसके मिटने पर ही पूर्ण वीतरागता प्रकट होती है। अंततः, यह पाठ व्यक्ति को अपने शाश्वत शुद्ध स्वभाव को पहचानने और बाहरी प्रलोभनों को त्यागकर आत्म-रमण करने की प्रेरणा देता है।


उत्तम शौच धर्म में आंतरिक और बाहरी पवित्रता का क्या अर्थ है?


उत्तम शौच धर्म के अंतर्गत पवित्रता को दो स्तरों—बाहरी (शारीरिक) पवित्रता और आंतरिक पवित्रता—पर स्पष्ट किया गया है


1. बाहरी (शारीरिक) पवित्रता (External Purity)

अर्थ: बाहरी पवित्रता केवल शरीर को जल, मिट्टी आदि से नहाने-धोने, वस्त्रों की शुद्धि और बाहरी वातावरण को साफ़-सुथरा रखने तक सीमित होती है


सीमा: जिनवाणी के अनुसार, केवल देह को नहाने-धोने या बाहरी वस्तुओं को साफ़ करने से आत्मा में वास्तविक पवित्रता प्रकट नहीं होती


2. आंतरिक पवित्रता (Internal Purity)

अर्थ: वास्तविक उत्तम शौच धर्म आंतरिक पवित्रता से संबंधित है, जिसका अर्थ मन, भावों, विचारों, श्रद्धा, ज्ञान और चारित्र की निर्मलता है


लोभ का अभाव: जब कषायों की दृष्टि से देखा जाता है, तो लोभ कषाय का अभाव ही उत्तम शौच धर्म है


धन, विषय-भोग, नाम, रूप और जीवन का लोभ आत्मा को भीतर से मलिन और अशुद्ध बनाता है

लोभ के समाप्त होने पर ही आत्मा में पूर्ण पवित्रता आती है


आंतरिक पवित्रता के दो रूप


पर्याय में प्रकट होने वाली पवित्रता (वीतराग धर्म): कषायों और लोभ के नाश से आत्मा की वर्तमान अवस्था (पर्याय) में वीतरागता और निर्मलता का प्रकट होना


द्रव्य/स्वभाव की पवित्रता (वस्तु स्वभाव धर्म): आत्मा का मूल चैतन्य स्वभाव त्रिकाल (सदा) से स्वयं शुद्ध और परम पवित्र है, जिसे कर्मों या मिलावट ने कभी छुआ ही नहीं है


सच्ची आंतरिक पवित्रता अपने इस निष्कलंक और परम पवित्र आत्म-स्वभाव को स्वीकार करने तथा उसका अवलंबन लेने से प्रकट होती है


उत्तम शौच धर्म: लालच की जड़ें और मन की असली शुद्धता


1. प्रस्तावना: क्या बाहरी स्वच्छता ही पर्याप्त है?


आज के दौर में हम स्वच्छता को लेकर 'हाइजीन फ्रीक' हो चुके हैं। हम दिन में दो बार नहाते हैं, महंगे साबुन और सैनिटाइजर का उपयोग करते हैं और कीटाणुओं से बचने के लिए करोड़ों खर्च करते हैं। लेकिन क्या कभी हमने उस सूक्ष्म गंदगी के बारे में सोचा है जो हमारे भीतर गहरी पैठी हुई है? जैन दर्शन के अनुसार, 'उत्तम शौच' धर्म का अर्थ केवल शरीर को जल से धोना नहीं है। असली शुचिता का अर्थ है—लोभ का अभाव। यह लेख इसी जिज्ञासा से शुरू होता है कि क्या हम बाहर की सफाई में इतने व्यस्त हैं कि भीतर जमा 'लोभ' की वह काई हमें दिखाई ही नहीं दे रही, जो हमारी आत्मा को निरंतर मलिन कर रही है?


2. सबसे बड़ा खुलासा: लोभ 'पापों का बाप' है


आचार्यों ने लोभ को साधारण बुराई नहीं, बल्कि 'पापों का बाप' (जनक) कहा है। यह एक ऐसा विकार है जो बाकी सभी विकारों को पी जाता है। आपने अक्सर देखा होगा कि एक अहंकारी दुकानदार, जो किसी की छोटी सी बात नहीं सुनता, एक 'बड़े ग्राहक' के सामने अपना सारा गुस्सा पी जाता है। वह अपमान सह लेता है, मुस्कुराता रहता है। यहाँ उसका क्रोध और मान गायब नहीं हुए, बल्कि उसके 'मुनाफे के लोभ' ने उन्हें निगल लिया है।


हिंसा, झूठ, चोरी और कुशील—इन सबके पीछे की प्रेरणा लोभ ही है। जैन दर्शन में लोभ की शक्ति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसे 'लोभांत' कहा गया है। आध्यात्मिक विकास की सीढ़ी (गुणस्थान) पर जब क्रोध, मान और माया जैसे विकार विदा हो जाते हैं, तब भी 10वें गुणस्थान तक 'सूक्ष्म लोभ' टिका रहता है। जब तक यह आखिरी दुश्मन नहीं मरता, तब तक पूर्ण पवित्रता प्रकट नहीं होती।


"लोभ सभी पापों की उत्पत्ति का मूल कारण है। यह इतना शक्तिशाली है कि व्यक्ति इसके लिए अपने स्वाभिमान की बलि दे देता है। जब तक आत्मा में लोभ विद्यमान है, तब तक बाहरी क्रियाएं केवल दिखावा हैं, वास्तविक धर्म नहीं।"


3. नोटों का भ्रम: असली आकर्षण कागज का नहीं, भोग का है


हमें लगता है कि हम पैसों से प्यार करते हैं, लेकिन यह एक गहरा मनोवैज्ञानिक भ्रम है। इसे एक प्रयोग से समझें: यदि आपको $100 का एक नया, कड़क नोट दिया जाए और दूसरी तरफ भारत का वह पुराना 1000 रुपये का नोट दिया जाए जिसे सरकार ने बंद (Demonetized) कर दिया है, तो आप किसे चुनेंगे? निश्चित रूप से $100 के नोट को। जबकि पुराना नोट शायद दिखने में अधिक सुंदर हो।


सच्चाई यह है कि हमें उस कागज के टुकड़े के रंग, स्पर्श या गंध से कोई प्रेम नहीं है। हमारा लोभ उस 'क्रय शक्ति' (Purchasing Power) से है जिससे हम इंद्रिय-विषयों की सामग्री खरीद सकते हैं। एक गाय के सामने नोटों की गड्डी रख दें, तो वह उसे पैरों से कुचलकर घास की ओर बढ़ जाएगी, क्योंकि उसकी दृष्टि में उन नोटों की कीमत घास के बराबर भी नहीं है।


एक पुरानी कहावत है—"जिस जमीन के नीचे धन गड़ा होता है, वहां घास भी पैदा नहीं होती।" ठीक वैसे ही, जिसके हृदय में धन का लोभ गड़ा हो, वहां धर्म का अंकुर कभी नहीं फूट सकता।


4. 'बच्चों के लिए'—एक महान आत्म-धोखा और 'खानदानी गुंडागर्दी'


हम अक्सर अपनी अंतहीन तृष्णा पर यह नकाब चढ़ा देते हैं कि "मैं यह सब अपने लिए नहीं, बच्चों के लिए कर रहा हूँ।" यह तर्क सरासर झूठ और थोथी दलील है। इसे मैं 'खानदानी गुंडागर्दी' कहता हूँ—पिता बच्चों को कूटते हैं, बच्चे आगे चलकर अपने बच्चों को कूटते हैं और यह सिलसिला 'संस्कार' के नाम पर चलता रहता है।


जरा सोचिए, यदि विज्ञान कोई ऐसी 'टाइम मशीन' बना दे जिससे मरने के बाद व्यक्ति अपनी संपत्ति अगले जन्म में साथ ले जा सके, तो क्या वह अपने बच्चों के लिए एक फूटी कौड़ी भी छोड़ता? बिल्कुल नहीं! वह सब कुछ झोले में भरकर साथ ले जाता। चूंकि ले जाने की कोई तकनीक नहीं है, इसलिए मजबूरी में उसे बच्चों का नाम देना पड़ता है। वास्तविकता यह है कि हम बच्चों के बहाने अपनी ही अधूरी इच्छाओं और 'ममत्व' (Attachment) को पालते हैं।


5. सूक्ष्म लोभ: प्रसिद्ध और सूचना का 'FOMO'


लोभ केवल तिजोरी तक सीमित नहीं है, इसके रूप बहुत सूक्ष्म और घातक हैं:


* नाम और प्रसिद्धि का लोभ: क्या आपने तीर्थ क्षेत्रों पर दानदाताओं की लंबी सूची देखी है? वहां लोग इसलिए दान नहीं देते कि किसी का भला हो, बल्कि इसलिए देते हैं ताकि बोर्ड पर उनका नाम चमकता रहे। चक्रवर्ती सम्राट भरत जब अपनी विजय का नाम लिखने पर्वत पर गए, तो उन्हें वहां जगह ही नहीं मिली—पर्वत पहले से ही अन्य चक्रवर्तियों के नामों से भरा था। उन्हें अपना नाम लिखने के लिए किसी और का नाम मिटाना पड़ा। यह नाम का लोभ कितना व्यर्थ है!

* जीवन का लोभ (जीने की चाह): 10-10 ऑपरेशन कराकर शरीर के अंग बदलवाने की जिद और मौत का खौफ भी एक लोभ है। "मैं मर न जाऊं" की यह घबराहट आत्मा के अमर स्वभाव को भूलने का नतीजा है।

* ज्ञान और सूचना का लोभ (FOMO): आज के डिजिटल युग में 'सबसे पहले मुझे पता चले' की बेचैनी एक मानसिक बीमारी बन चुकी है। सब कुछ जान लेने का यह लोभ व्यक्ति को सहज नहीं रहने देता। यहाँ तक कि 'धर्म जानने' का लोभ भी यदि वीतरागता की ओर न ले जाए, तो वह केवल सूचनाओं का बोझ है।


इंदौर के प्रसिद्ध सेठ हुकुमचंद जी का उदाहरण प्रेरणादायी है। जब वे 'आठवीं मील की फैक्ट्री' डालने की तैयारी में डूबे थे, तब उनकी पत्नी ने सिर्फ एक वाक्य कहा—"सेठ जी, नरक लोभ का साथी है।" बस, उस एक वाक्य ने सेठ जी के लोभ के साम्राज्य को हिला दिया और उन्होंने अपना विचार त्याग दिया।


6. असली पवित्रता का मार्ग: स्वभाव का अवलंबन


उत्तम शौच का वास्तविक अर्थ कोई नई शुद्धता 'पैदा' करना नहीं है, बल्कि आत्मा की पहले से मौजूद शुद्धता को 'स्वीकार' करना है।


हमारा चैतन्य स्वभाव 24 कैरेट गोल्ड की तरह है। सोने में मिट्टी मिली हो, तब भी सोना स्वभाव से शुद्ध ही रहता है। हमें बस उस मिट्टी (विकृत दृष्टि) को हटाना है। शुचिता कोई 'लक्ष्य' नहीं है जिसे हासिल करना है, बल्कि यह एक 'दृष्टि' है। जब हम यह स्वीकार कर लेते हैं कि "मैं स्वभाव से ही परम पवित्र परमात्मा हूँ और पर-वस्तुएं मुझे छू भी नहीं सकतीं", तब लोभ स्वतः ही गलने लगता है। शौच का अर्थ है—वीतरागता की वह अवस्था जहाँ बाहर की कोई भी चमक आपको विचलित न कर सके।


7. निष्कर्ष: एक विचारोत्तेजक अंत


उत्तम शौच धर्म हमें जीवन के सबसे बड़े कचरे—'लोभ'—से मुक्ति का संदेश देता है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि संग्रह में नहीं, बल्कि विसर्जन में सुख है।


आज स्वयं से एक ईमानदार प्रश्न पूछें: "क्या मैं बाहर के शरीर को चमकाने के लिए इतना समय दे रहा हूँ कि भीतर जमा सदियों पुरानी लोभ की काई मुझे दिखाई ही नहीं दे रही?"


वास्तविक शुचिता साबुन या गंगाजल से नहीं, बल्कि संतोष और अपने शुद्ध स्वभाव की स्वीकृति से शुरू होती है। जिस दिन 'मैं ही परिपूर्ण हूँ' का बोध जाग जाएगा, उस दिन सारा जगत सुंदर और पवित्र नजर आने लगेगा। भीतर की शुचिता ही जीवन का वास्तविक श्रृंगार है।

भगवान को क्या अधिक प्रिय होगा



भगवान को क्या अधिक प्रिय होगा: 


मंदिर की दीवारों को सोने से मढ़ना, या उस बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी लेना जिसका भविष्य चंद रुपयों के अभाव में दम तोड़ रहा है?


सच्चा धर्म कभी भी दिखावे, आडंबर या सार्वजनिक बोलियों में एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ में नहीं रहा।


हमारी परंपरा में 'ज्ञान दान' और 'जीव दया' को दान के सर्वोच्च रूपों में गिना गया है। परमात्मा केवल संगमरमर की मूरतों में नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति के भीतर बसते हैं जिसे सहारे की ज़रूरत है।


हमारा धन पत्थरों पर नहीं, भविष्य पर क्यों लगना चाहिए?


क्षणभर की वाहवाही बनाम पीढ़ियों का उत्थान: बोली लगाकर खरीदा गया मान-सम्मान कुछ पलों का होताहै। लेकिन किसी जरूरतमंद बच्चे की पढ़ाई का जिम्मा उठाने से एक पूरा परिवार गरीबी से बाहर निकलजाता है, और वह बच्चा आगे चलकर दस और लोगों का सहारा बनता है।


आगे बढ़ाने का संकल्प (Pay-it-Forward): जब आप किसी को ब्याज-मुक्त शिक्षा ऋण या छोटा व्यवसाय शुरू करने में मदद देते हैं, तो वह केवल लेने वाला नहीं रहता। कल वह खुद एक सक्षम दाता, मार्गदर्शक और रोजगार देने वाला बनकर समाज को लौटाता है।


समय की मांग: आज जब अन्य सजग समाज अस्पताल, स्टार्टअप फंड, यूपीएससी और प्रतियोगी परीक्षाओं के केंद्र बना रहे हैं, तब हमारा अपनी ही पूंजी को केवल पत्थरों और साज-सज्जा पर सीमित कर देना हमारे युवाओं को पीछे छोड़ रहा है।


'अपरिग्रह' का सच्चा पालन: धर्म के नाम पर करोड़ों रुपये का दिखावा करना भक्ति नहीं, बल्कि अहंकार की तृप्ति है। अपरिग्रह का सच्चा अर्थ यही है कि जो धन आवश्यकता से अधिक है, उसे समाज के दुख और अभाव मिटाने में लगाया जाए।


ईश्वर ने आपको जो संपन्नता दी है, उसे केवल तिजोरियों या दीवारों तक सीमित मत रखिए। अपने दान का रुख शिक्षा निधि, चिकित्सा सहायता और युवा सशक्तिकरण की ओर मोड़िए।


रंपरा का सबसे बड़ा सम्मान सोने का सिंहासन नहीं, बल्कि एक सक्षम और स्वावलंबी पीढ़ी है। अपने पुण्य का हिसाब इस बात से मत लगाइए कि आपने कितना सोना चढ़ाया, बल्कि इससे लगाइए कि आपने कितनों का जीवन संवारा।


What honors the Divine more: 


Plating a temple ceiling in gold, or funding the education of a bright child whose future is dying for a few thousand rupees?


True Dharma has never been about ceremonial ostentation, public bidding, or competing for social prestige inside sacred walls. 


Jain philosophy holds Gyan Daan (the gift of knowledge) and Jeeva Daya (compassion for living beings) as the supreme forms of devotion. 


God does not reside in marble or silver; the Divine lives in the upliftment of the vulnerable.


Why Wealth Must Shift From Stone to Minds

  • Enduring Legacy Over Fleeting Prestige: An auction bid buys an hour of applause. An educated child lifts an entire family out of poverty forever and pays that debt forward to educate ten more.
  • The "Pay-It-Forward" Multiplier: When you sponsor a degree or fund a micro-enterprise, you create a self-sustaining cycle. Beneficiaries do not remain takers—they return as donors, mentors, and employers.
  • Preserving the Community’s Future: While other forward-thinking communities build venture funds, competitive coaching hubs, and world-class healthcare, spending community wealth purely on embellishment leaves our own youth helpless and uncompetitive.
  • Honoring Aparigraha (Non-Possessiveness): Pouring millions into lavish display under the guise of faith is not devotion—it is ego. True detachment means using excess wealth to solve real human suffering.

Let the wealth you have been blessed with become an engine of transformation. Direct your philanthropy toward interest-free education funds, medical relief, and youth empowerment.


The greatest tribute we can offer our faith is not an idle temple adorned in gold, but a generation of capable, confident youth carrying its values into the world. Measure your giving not by how much gold you offer, but by how many lives you elevate.


प्रस्तुत है एक वास्तविक कहानी जो ज्ञान दान के महत्व को साबित करने को काफी है.


पाली जिले का छोटा सा कस्बा था सोजत। वहीं  जैन समाज का 400 साल पुराना आदिनाथ मंदिर था। संगमरमर की कारीगरी, सोने के कलश, चांदी के दरवाजे। हर साल महावीर जयंती पर आरती की बोली 7 लाख तक जाती थी। गांव वाले गर्व से कहते, "हमारे भगवान सबसे अमीर हैं।"


उसी कस्बे में रहता था 22 साल का विपुल जैन पिता पापड़-बड़ी का ठेला लगाते। विपुल ने बी.टेक किया था, GATE में 99 पर्सेंटाइल लाई थी। IIT बॉम्बे में M.Tech का एडमिशन पक्का था। फीस: 1.2 लाख सालाना। स्कॉलरशिप नहीं मिली। 


विपुल के पिता सेठ मोहनलाल जैन के पास गए। मोहनलाल ट्रस्ट के अध्यक्ष थे। हर साल आरती की बोली वही लगाते थे। 

"सेठजी, बस 50 हजार का लोन दे दो। ब्याज समेत लौटा दूंगा। बेटा पढ़-लिखकर नाम करेगा।"


मोहनलाल ने सिर हिलाया, "बेटा, ट्रस्ट का पैसा भगवान का है। वो सिर्फ धर्म के काम में लगता है। मंदिर का जीर्णोद्धार चल रहा है। 15 लाख की नई प्रतिमा आ रही है। समझा कर।"


उसी रात विपुल ने सोजत छोड़ दिया। अहमदाबाद में एक फैक्ट्री में 12 हजार की नौकरी पकड़ ली। IIT का सपना वहीं दम तोड़ गया।


3 साल बाद, 2026 की चैत्र शुक्ल त्रयोदशी


सोजत के मंदिर में महावीर जन्म कल्याणक था। आरती की बोली शुरू हुई। 

"1 लाख", "2 लाख"... मोहनलाल खड़े हुए, "5 लाख एक रुपया।"


तभी पीछे से आवाज आई, "5 लाख 11 हजार।"


सबने पलटकर देखा। कोट-पैंट में विपुल खड़ा था। साथ में 4 लड़के-लड़कियां। मोहनलाल चौंके, "तू?"


विपुल हाथ जोड़कर बोला, "सेठजी, बोली मैं नहीं लगाऊंगा। बस आपसे 2 मिनट मांगता हूं।"


सभा शांत हुई। विपुल ने माइक संभाला:


"3 साल पहले मैं इसी मंदिर में 50 हजार मांगने आया था। नहीं मिले। मैं टूट गया था। फिर अहमदाबाद में मुझे माहेश्वरी समाज के '*एजुकेशन लोन फाउंडेशन' का पता चला।* उन्होंने बिना ब्याज 1.5 लाख दिए। शर्त सिर्फ एक थी - 'पढ़कर 2 और बच्चों को पढ़ाना'।"


"मैंने IIT किया। कैंपस में 28 लाख का पैकेज मिला। आज मैं बेंगलुरु में हूं। मेरे साथ ये चारों बच्चे खड़े हैं। रेखा, इसके पिता हमारे मंदिर में सफाई करते हैं। रमेश, इसकी मां विधवा है, लोगों के घर बर्तन मांजती है। दोनों को मैंने CAT की कोचिंग दिलवाई। आज रेखा IIM अहमदाबाद में है, रमेश IIM कलकत्ता में।"


सभा में सन्नाटा था। विपुल रुका नहीं।


"JAIN परंपरा ने हमें 

'अपरिग्रह' सिखाया - जरूरत से ज्यादा मत जोड़ो। 'अनेकांतवाद' सिखाया - सबका दृष्टिकोण समझो। 


भगवान महावीर ने राजपाट छोड़कर सत्य खोजा, महल नहीं बनवाए। उन्होंने कहा था - '*जीव दया' सबसे बड़ा धर्म है।"


"तो बताइए सेठजी, क्या भगवान 15 लाख की मूर्ति से ज्यादा खुश होंगे या रेखा के IIM जाने से? क्या सोने के कलश पर चढ़ा घी, रमेश की किताबों पर खर्च हुए पैसों से ज्यादा पवित्र है?"


मोहनलाल की आंखें झुकी थीं। विपुल ने जेब से चेक निकाला।


"ये 5 लाख 11 हजार की बोली मैं मंदिर में नहीं लगा रहा। आज हम 5 लोग मिलकर “जैन शिक्षा निधि” शुरू कर रहे हैं। इसमें पहला दान मेरा है। इसका ब्याज नहीं होगा। सिर्फ एक वचन होगा - 'लेने वाला कल 2 और को देगा'।"


"अग्रवाल समाज अस्पताल बनाता है। माहेश्वरी समाज स्टार्टअप फंड देता है। राजपुरोहित समाज UPSC कोचिंग चलाता है। सीरवी समाज लॉजिस्टिक हब बना रहा है। तो हम जैन, जिनका मूल मंत्र ही 'जियो और जीने दो' है, सिर्फ पत्थर पर पैसा क्यों लुटाएं?"


"मैं आरती की बोली का विरोधी नहीं। पर जब मेरे समाज का बच्चा फीस के लिए रोए, और हम लाखों की प्रतिमा मंगवाएं - तो वो धर्म नहीं, दिखावा है। तीर्थंकरों ने हमें त्याग सिखाया था, तिजोरी भरना नहीं।"


सभा में सबसे पहले हाथ चौधरी साब ने उठाया। सीरवी समाज के मुखिया थे। "विपुल बेटा, मेरी तरफ से 2 लाख इस निधि में। मेरा पोता भी तेरे साथ IIT में पढ़ता है।"


फिर माहेश्वरी समाज के व्यापारी बोले, "हमारे कॉमर्स कॉलेज में जैन बच्चों को 50% स्कॉलरशिप।"


मोहनलाल उठे। आंखें नम थीं। 70 साल के जीवन में पहली बार वो मंच पर लड़खड़ाए। 


"विपुल, आज तूने मेरी आंखें खोल दी। 40 साल से मैं बोली लगाता आया। सोचा पुण्य मिल रहा है। पर असली पुण्य तो तेरे चेहरे पर है।"


उन्होंने माइक लिया, "आज से सोजत JAIN ट्रस्ट का 60% पैसा शिक्षा और स्वास्थ्य पर लगेगा। 40% मंदिर रखरखाव पर। और हां, 'जैन लोन फाउंडेशन' आज से ही शुरू। पहला लोन रेखा की छोटी बहन को - MBBS की फीस के लिए।"


पूरी सभा खड़ी होकर ताली बजा रही थी। घंटियों की आवाज के बीच एक नई आरती शुरू हो चुकी थी - आत्मनिर्भरता की आरती।


6 महीने बाद का सोजत


मंदिर वही था। पर अब उसके पीछे 'महावीर कोचिंग सेंटर' चलता था। 80 बच्चे फ्री में पढ़ते थे। 12 बच्चे NEET-JEE निकाल चुके थे। ट्रस्ट ने 3 परिवारों को बिजनेस लोन दिया था। एक पापड़ का कारखाना, एक केमिकल यूनिट, एक डिजिटल मार्केटिंग फर्म।


दीवाली पर मोहनलाल ने घोषणा की: "इस साल आरती की बोली नहीं होगी। बोली लगेगी संकल्पों की। कौन कितने बच्चों को पढ़ाएगा, कितने रोजगार देगा - उसकी बोली लगेगी।"


विपुल दिवाली पर सोजत आया। मंदिर में नई संगमरमर की पट्टिका लगी थी। लिखा था:


_"न स देवेसु बंदामि, जे अन्नं न पहावए।"_  

_- जो दूसरों को आगे न बढ़ाए, मैं उस देव को नहीं पूजता।_


नीचे छोटा लिखा था - _जैन शिक्षा निधि : 1.2 करोड़, लाभार्थी : 47 छात्र_


मोहनलाल ने विपुल को गले लगाया, "बेटा, तूने साबित कर दिया - भगवान मूर्ति में नहीं, मजबूर की मदद में बसते हैं। हमने सालों सोने के सिंहासन पर भगवान बिठाए। तूने भगवान को बच्चों की किताबों में बिठा दिया।"


निष्कर्ष:  जैन दृष्टि से


जैन आगमों में 'दान' को 4 प्रकार का बताया है - आहार दान, औषध दान, ज्ञान दान, अभय दान। ज्ञान दान को सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। भगवान महावीर स्वयं राजा के पुत्र थे। उन्होंने महल, हीरे, सेना सब त्यागकर 'केवलज्ञान' चुना। 


आज जब हम ₹10 लाख की बोली लगाकर क्षणिक अहंकार तुष्ट करते हैं, तब हम महावीर के 'अपरिग्रह' व्रत के उलट चलते हैं। मंदिर बनाना गलत नहीं - पर मंदिर के बाहर खड़ा भूखा, बेरोजगार, अशिक्षित जैन युवा, उस संगमरमर से ज्यादा महत्वपूर्ण है।


JAIN परंपरा 'संघ' को महत्व देती है। संघ यानी साथ चलना। अगर संघ का एक सदस्य पीछे छूट जाए, तो पूरी यात्रा अधूरी है। 'बोली नहीं, बदलाव' का मंत्र यही है - पैसा वहीं लगे जहां से अगला महावीर, अगला आर्य सुधर्मा, अगला वैज्ञानिक, अगला उद्यमी निकले।


धर्म वो नहीं जो दीवारों को सोने से मढ़ दे। धर्म वो है जो इंसान के भविष्य को रोशन कर दे। क्योंकि अंत में तीर्थंकर भी यही पूछेंगे - "मेरे नाम पर कितने दीप जलाए? नहीं। मेरे बताए रास्ते पर कितने जीवन संवारे?" 


_तो फैसला हमें करना है - पत्थर पूजने हैं या भविष्य गढ़ने हैं? आरती की बोली लगानी है या आत्मनिर्भरता की नींव रखनी है? जवाब मंदिर की घंटियों में नहीं, एक बच्चे की किलकारी में मिलेगा।


नोट समाज हित में सकारात्माक सोच के साथ एक बार अवश्य पड़ने का लक्ष्य रखे,आपकी यथा शक्ति सहधर्मी की निस्वार्थ,बिना आडम्बर, सहायता कीजिए!अगर उपरोक्त विचारों से आप सहमत हों तो अपने अन्य group में भी डालने का लक्ष्य रखे.


आपका सहधर्मी भाई