1. गिरनार विवाद कब और किस मुद्दे पर शुरू हुआ?
- मुद्दा: विवाद का मुख्य केंद्र गिरनार पर्वत की 5वीं टोंक (शिखर) पर स्थित प्राचीन पदचिह्न (चरण) हैं।
- शुरुआत और कारण: सदियों तक दोनों संप्रदायों के श्रद्धालु यहाँ शांतिपूर्ण ढंग से दर्शन करते रहे, लेकिन1970–1980 के दशक में अधिकार जताने की होड़ शुरू हुई।
- अक्तूबर 2004 में विवाद भड़का: 2004 में 5वीं टोंक पर कथित तौर पर नए निर्माण, ग्रिल और प्रतिमास्थापना को लेकर विवाद हिंसक झड़पों में बदल गया।
2. दोनों पक्षों के दावे क्या हैं?
- जैन पक्ष (दिगंबर एवं श्वेतांबर):
- 22वें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ ने इसी पर्वत पर तपस्या की और 5वीं टोंक से मोक्ष प्राप्त किया।
- पर्वत पर मौजूद चरण चिह्न भगवान नेमिनाथ के हैं।
- मुगल और ब्रिटिश काल के दस्तावेजों का हवाला देकर इसे प्राचीन जैन तीर्थ घोषित करने और पूजा केप्राथमिक अधिकार की मांग की जाती है।
- हिंदू पक्ष (विशेषकर नाथ संप्रदाय):
- यह स्थान भगवान दत्तात्रेय और गुरु गोरखनाथ की प्राचीन तपोभूमि है।
- इन पदचिह्नों को 'दत्तात्रेय पादुका' मानकर नाथ संप्रदाय सदियों से पूजा करता आ रहा है।
- उनका दावा है कि राज्य गजट में यह क्षेत्र 'दत्तात्रेय शिखर' के रूप में दर्ज रहा है।
3. अदालती मामले: किस अदालत में, कब से और क्या स्थिति है?
- किस अदालत में लंबित: यह मुख्य कानूनी विवाद गुजरात उच्च न्यायालय (Gujarat High Court) मेंविचाराधीन है।
- 2005 का यथास्थिति (Status Quo) आदेश: 2005 में Indian Kanoon पर दर्ज Bandilalji Digamber Jain Karkhana बनाम State of Gujarat केस में हाईकोर्ट ने 5वीं टोंक पर किसी भी नएस्थायी निर्माण पर रोक लगा दी और दोनों पक्षों को शांतिपूर्ण दर्शन करने देने का निर्देश दिया।
- 2013 एवं 2024 की नई याचिकाएं:
- 2013 में जैन ट्रस्टों ने अवैध निर्माण और पूजा में बाधा डालने को लेकर अवमानना याचिकाएं दायरकीं।
- 2024 में जैन संगठनों (जैन धर्म संरक्षण महासंघ आदि) ने उच्च न्यायालय में नई याचिका दायर कर5वीं टोंक पर पूजा के प्राथमिक अधिकार (First Right to Worship) की मांग की।
- वर्तमान कानूनी स्थिति: मामला गुजरात हाईकोर्ट में विचाराधीन है। अदालत का मुख्य रुख कानून-व्यवस्थाबनाए रखने और बिना नई संरचना बनाए दोनों पक्षों के दर्शन अधिकार सुरक्षित करने पर है।
4. आजादी के बाद से केंद्र और राज्य सरकारों की भूमिका
- कांग्रेस सरकारें (1960–1990 का दशक): विवाद को स्थानीय कानून-व्यवस्था और राजस्व रिकॉर्ड केदायरे में सीमित रखा गया।
- भाजपा शासनकाल (2000 के बाद):
- 2004–2005: गुजरात सरकार ने 5वीं टोंक को राज्य पुरातत्व अधिनियम के तहत संरक्षित क्षेत्रअधिसूचित किया ताकि अनधिकृत निर्माण रुके।
- अक्टूबर 2020: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गिरनार रोपवे परियोजना का लोकार्पण किया, जिससेबुजुर्गों व तीर्थयात्रियों का शिखरों तक पहुंचना सुलभ हुआ।
- प्रशासनिक रुख: राज्य सरकार सीधे तौर पर किसी एक पक्ष के धार्मिक स्वामित्व का फैसला करने केबजाय इसे धरोहर संरक्षण और शांति प्रबंधन के मॉडल से नियंत्रित करती है।
5. क्या जैन तीर्थयात्रियों को ऊपर जाने और पूजा की अनुमति है?
- हाँ, कानूनी रूप से अनुमति है: जैन श्रद्धालु पूरी तरह से तलहटी से लेकर 5वीं टोंक तक जा सकते हैं औरदर्शन व पूजा-अर्चना कर सकते हैं।
- रोकथाम नहीं, पर तनाव की स्थिति: किसी भी सरकारी आदेश द्वारा जैनियों पर कोई रोक नहीं है। हालांकि, कभी-कभार शिखरों पर दोनों पक्षों के तत्वों के बीच तीखी नोकझोंक होने पर स्थानीय तनाव बनता है।
6. पुलिस गश्त और सुरक्षा व्यवस्था (Police Patrolling System)
- स्थायी पुलिस चौकियां: तलहटी (भवनाथ), अम्बाजी मंदिर और 5वीं टोंक के पास पुलिस चौकियां औरबैरिकेड्स स्थापित हैं।
- सीसीटीवी और नियमित गश्त: संवेदनशील रास्तों पर नियमित पुलिस पेट्रोलिंग होती है और सीसीटीवी कैमरोंसे निगरानी की जाती है।
- त्योहारों पर अतिरिक्त बल: महाशिवरात्रि मेला, गिरनार लीली परिक्रमा और जैन निर्वाण कल्याणक केमौकों पर जूनागढ़ प्रशासन आरएएफ (RAF) और अतिरिक्त पुलिस बल तैनात करता है।
- प्रशासनिक कार्रवाई: अनधिकृत झंडे लगाने या भड़काऊ गतिविधियों पर पुलिस तुरंत एफआईआर दर्ज करकानूनी कार्रवाई करती है।
गुजरात उच्च न्यायालय द्वारा वर्ष 2004–2005 में गिरनार पर्वत (विशेषकर 5वीं टोंक/शिखर) से जुड़े विवाद परदिए गए अंतरिम व मुख्य निर्देशों का उद्देश्य किसी एक पक्ष के धार्मिक स्वामित्व का अंतिम फैसला करने के बजाययथास्थिति (Status Quo), शांति व्यवस्था और ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण को सुनिश्चित करना था।
उच्च न्यायालय के इस आदेश के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
1. नए स्थायी निर्माण पर पूर्ण प्रतिबंध (Strict Status Quo)
- अदालत ने 5वीं टोंक पर स्थित प्राचीन चरण-चिह्नों/पादुका के आसपास किसी भी प्रकार के नए स्थायीनिर्माण, ढांचागत विस्तार, ग्रिल या कंक्रीट चबूतरा बनाने पर रोक लगा दी।
- महंतों और किसी भी धार्मिक ट्रस्ट को यह स्पष्ट निर्देश दिया गया कि वे स्थल के मूल स्वरूप में कोई भौतिकबदलाव न करें।
2. दोनों पक्षों के दर्शन एवं पूजा का अधिकार
- अदालत ने यह सुनिश्चित करने को कहा कि जब तक स्वामित्व का अंतिम निर्णय नहीं होता, तब तक जैनऔर हिंदू (नाथ संप्रदाय) दोनों ही समुदायों के श्रद्धालुओं को शांतिपूर्ण ढंग से दर्शन और पारंपरिक रीति सेपूजा करने की अनुमति रहे।
- किसी भी पक्ष द्वारा दूसरे पक्ष के श्रद्धालुओं को रोकने, दर्शन में बाधा पहुंचाने या डराने-धमकाने पर कानूनीरोक लगाई गई।
3. संयुक्त जांच समिति का गठन (Joint Inspection Committee)
- उच्च न्यायालय ने जूनागढ़ जिला कलेक्ट्रेट और राज्य पुरातत्व विभाग (State Archaeology Department) की एक संयुक्त समिति को स्थल का भौतिक सर्वेक्षण करने और रिपोर्ट प्रस्तुत करने कानिर्देश दिया।
- समिति को यह जांचने का जिम्मा सौंपा गया कि क्या राज्य पुरातत्व अधिनियम के तहत संरक्षित इस स्मारकक्षेत्र में बिना अनुमति कोई अनधिकृत निर्माण किया गया है।
4. कानून-व्यवस्था एवं सुरक्षा व्यवस्था का जिम्मा
- जिला प्रशासन और पुलिस को संवेदनशील शिखरों (जैसे 5वीं टोंक और गोरखनाथ शिखर) परकानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए स्थायी सुरक्षा चौकियां और पुलिस बल तैनात करने का आदेश दियागया।
- पर्वों और मेलों के दौरान श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए विशेष इंतजाम करने के निर्देश दिए गए।
आदेश का प्रभाव और बाद की स्थिति
2005 का यह आदेश इस विवाद में एक आधारभूत निर्णय माना जाता है। हालांकि, बाद के वर्षों (2013 और2024) में जैन ट्रस्टों द्वारा Gujarat High Court की याचिकाओं में आरोप लगाया गया कि 2005 केयथास्थिति आदेश का उल्लंघन कर कुछ निर्माण कार्य किए गए। इसी कारण यह कानूनी प्रक्रिया समय-समयपर अवमानना और नए दिशा-निर्देशों के लिए उच्च न्यायालय में विचाराधीन रही है।
सम्मेद शिखरजी (पारसनाथ पर्वत, गिरिडीह, झारखंड) को लेकर जनवरी 2023 में केंद्र सरकार (पर्यावरण, वनएवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय) द्वारा जारी किया गया आधिकारिक आदेश इस विवाद का एक निर्णायक मोड़था।
1. आदेश की पृष्ठभूमि (Background)
- 2019 की अधिसूचना और राज्य पर्यटन नीति 2022: 2019 में पारसनाथ वन्यजीव अभयारण्य केआसपास 'इको-सेंसिटिव ज़ोन' (ESZ) की अधिसूचना जारी की गई थी और झारखंड सरकार ने 2022 मेंअपनी पर्यटन नीति के तहत इसे इको-टूरिज्म गंतव्य के रूप में विकसित करने की घोषणा की।
- जैन समाज का विरोध: 24 में से 20 जैन तीर्थंकरों की निर्वाण स्थली होने के कारण जैन समाज ने इसेपर्यटन स्थल बनाए जाने का देशव्यापी शांतिपूर्ण विरोध किया। समाज को आशंका थी कि पर्यटन बढ़ने सेपर्वत की धार्मिक पवित्रता भंग होगी, गंदगी फैलेगी और वहाँ मांस-मदिरा का सेवन शुरू हो जाएगा।
2. 5 जनवरी 2023 के केंद्रीय आदेश के मुख्य बिंदु
केन्द्रीय पर्यावरण मंत्रालय के Press Information Bureau (PIB) द्वारा जारी कार्यालय ज्ञापन के तहतनिम्नलिखित प्रमुख निर्णय लिए गए:
- पर्यटन गतिविधियों पर तत्काल रोक (Immediate Stay):
- 2019 की ईएसजेड (ESZ) अधिसूचना की धारा 3 के उन सभी प्रावधानों पर तत्काल रोक लगा दीगई, जो पर्यटन और इको-टूरिज्म को बढ़ावा देते थे।
- पवित्र तीर्थ स्थल के रूप में औपचारिक मान्यता:
- केंद्र सरकार ने लिखित रूप में स्वीकार किया कि सम्मेद शिखरजी केवल जैन समुदाय ही नहीं, बल्किपूरे देश के लिए एक अत्यंत पवित्र और पूजनीय धार्मिक स्थल है।
- निषेधात्मक नियमों का कड़ा क्रियान्वयन:
- पर्वत क्षेत्र पर शराब, नशीले पदार्थों और मांसाहार की बिक्री व सेवन पर पूर्ण प्रतिबंध को सख्ती सेलागू करने का निर्देश दिया गया।
- लाउडस्पीकर बजाने, तेज आवाज में संगीत, पालतू जानवरों को ले जाने, अनधिकृत ट्रैकिंग, कैंपिंगऔर धार्मिक धरोहरों/चट्टानों को गंदा करने पर रोक लगाने के सख्त आदेश दिए गए।
- निगरानी समिति (Monitoring Committee) में प्रतिनिधित्व:
- पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत गठित राज्य निगरानी समिति में जैन समुदाय के 2 स्थायी सदस्यों और स्थानीय आदिवासी समुदाय के 1 स्थायी सदस्य को अनिवार्य रूप से शामिल करनेका आदेश दिया गया, ताकि निर्णयों में सभी पक्षों की सहमति रहे।
4. वर्तमान स्थिति और आगे की चुनौतियाँ
इस आदेश के बाद पर्यटन को लेकर उपजा मुख्य विवाद शांत हो गया। हालांकि, जमीनी स्तर पर पारसनाथ पर्वत पर वन विभाग के नियम, स्थानीय आदिवासी परंपराओं (मरांग बुरु) के अधिकार और जैन तीर्थयात्रियों की व्यवस्था के बीच प्रशासनिक समन्वय बनाए रखना जिला प्रशासन (गिरिडीह) के लिए एक सतत कार्य बना हुआहै।
सम्मेद शिखरजी (झारखंड) और गिरनार तीर्थ (गुजरात) दोनों ही जैन धर्म के सबसे पवित्र और सर्वोच्च तीर्थ स्थलमाने जाते हैं। हालांकि, दोनों स्थलों पर विवादों की प्रकृति, विरोधी पक्ष और सरकारी समाधान की स्थिति मेंबुनियादी अंतर हैं।
तुलनात्मक विवरण (मुख्य बिंदु)
1. धार्मिक महत्व (जैन मान्यता)
- श्री सम्मेद शिखरजी: 24 में से 20 तीर्थंकरों की निर्वाण स्थली (भगवान पार्श्वनाथ सहित)।
- श्री गिरनार तीर्थ: 22वें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ की दीक्षा, केवलज्ञान और मोक्ष स्थली।
2. विवाद का मुख्य स्वरूप
- श्री सम्मेद शिखरजी: तीर्थ बनाम पर्यटन / पर्यावरण (Eco-Tourism vs Sanctity): राज्य सरकार कीपर्यटन नीति और स्थानीय आदिवासी अधिकारों से जुड़ा मुद्दा।
- श्री गिरनार तीर्थ: सांप्रदायिक व धार्मिक पहचान (Sectarian / Identity Conflict): विशेषकर 5वींटोंक के पदचिह्नों (चरण) के स्वामित्व का विवाद।
3. दूसरा पक्ष
- श्री सम्मेद शिखरजी: स्थानीय संथाल आदिवासी समाज (मरांग बुरु मान्यता) और राज्य का पर्यटन विभाग।
- श्री गिरनार तीर्थ: हिंदू संप्रदाय, विशेषकर नाथ संप्रदाय (भगवान दत्तात्रेय / गुरु गोरखनाथ की तपोभूमि)।
4. केंद्र बिंदु / टकराव का स्थल
- श्री सम्मेद शिखरजी: संपूर्ण पारसनाथ पर्वत क्षेत्र और उसकी धार्मिक पवित्रता।
- श्री गिरनार तीर्थ: मुख्य रूप से पर्वत की 5वीं टोंक और ओघड़ शिखर।
5. विवाद का इतिहास
- श्री सम्मेद शिखरजी: 2019 की ईएसजेड (ESZ) अधिसूचना और 2022 की झारखंड पर्यटन नीति के बादबड़ा आंदोलन बना।
- श्री गिरनार तीर्थ: 1970–1980 के दशक से शुरू होकर 2004–2005 और 2013 में कई बार गंभीर रूपले चुका है।
6. कानूनी एवं न्यायिक स्थिति
- श्री सम्मेद शिखरजी: केंद्र के हस्तक्षेप के बाद प्रशासनिक स्तर पर निपटारा; राष्ट्रीय हरित अधिकरण(NGT) और वन नियमों के अधीन।
- श्री गिरनार तीर्थ: मामला गुजरात उच्च न्यायालय में लंबित; 2005 से यथास्थिति (Status Quo) आदेशप्रभावी।
7. सरकारी समाधान की स्थिति
- श्री सम्मेद शिखरजी: सुलझा हुआ (Resolved): केंद्र सरकार ने जनवरी 2023 में पर्यटन पर रोक लगाकर'पवित्र तीर्थ' की मान्यता दी।
- श्री गिरनार तीर्थ: प्रशासनिक नियंत्रण (Managed): पूर्ण न्यायिक समाधान लंबित; केवल सुरक्षा औरकानून-व्यवस्था का प्रबंधन।
मुख्य अंतर और समानताएं
समानताएं:
- दोनों ही पर्वतों को जैन धर्मावलंबी 'सिद्धक्षेत्र' मानते हैं, जहाँ पर्वत के कण-कण को पूजनीय माना जाता है।
- दोनों विवादों में जैन समाज का मुख्य उद्देश्य तीर्थ की आध्यात्मिक पवित्रता (Sanctity) को मांस, मदिराऔर अनियंत्रित व्यावसायिक गतिविधियों से बचाना रहा है।
विशिष्ट भिन्नताएं:
- शिखरजी में कोई दूसरा संप्रदाय पदचिह्नों को अपना नहीं बताता: शिखरजी में विवाद इस बात पर नहीं था कि20 टोंक किसकी हैं, बल्कि इस पर था कि पूरे पहाड़ को "टूरिस्ट पिकनिक स्पॉट" न बनाया जाए।
- गिरनार में सीधे-सीधे पदचिह्नों की पहचान पर विवाद है: गिरनार की 5वीं टोंक पर स्थित पदचिह्नों को जैनसमुदाय 'नेमिनाथ भगवान के चरण' और नाथ संप्रदाय 'दत्तात्रेय पादुका' मानता है, जिससे यह शुद्ध धार्मिकआस्था का सीधा टकराव बन जाता है।
3. आदेश का विश्लेषण एवं प्रभाव
पहलू | प्रभाव और विश्लेषण |
तीर्थ कीपहचान | शिखरजी को केवल एक 'हिल स्टेशन/टूरिस्ट स्पॉट' बनने से बचाया गया और इसके 'पवित्र आध्यात्मिक स्वरूप' को कानूनी सुरक्षा मिली। |
सामुदायिकअधिकार | निर्णय प्रक्रिया में जैन समाज और स्थानीय आदिवासियों दोनों को निगरानी समिति में जगह देकर प्रशासनिकसंतुलन बनाया गया। |
प्रशासनिकस्पष्टता | पर्यटन और पर्यावरण संरक्षण के बीच अंतर स्पष्ट हुआ—ईएसजेड का उद्देश्य पर्यावरण की रक्षा करना है, न किअनियंत्रित वाणिज्यिक पर्यटन को बढ़ावा देना। |