॥ ॐ श्री जिनेन्द्राय नमः ॥
सादर जय जिनेन्द्र
समस्त आदरणीय जैन समाज एवं दानवीर महानुभावों के चरणों में एक विनम्र विचार व अपील
पृष्ठभूमि एवं वर्तमान परिप्रेक्ष्य:
जैन समाज अनादि काल से अपनी करुणा, अहिंसा, त्याग और परोपकार की भावना के लिए संपूर्ण विश्व में वंदनीय रहा है। देश के विकास में सर्वाधिक कर (Tax) देने से लेकर असहायों की सेवा तक—समाज का योगदान सदैव अग्रणीय रहा है।
हमारी यह अटूट आस्था और समर्पण हमारे भव्य जिनालयों में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। श्री सम्मेद शिखर जी सहित देश के विभिन्न तीर्थों और शहरों में समाज ने सैकड़ों-हजारों करोड़ रुपये का दान देकर भव्य मंदिरों और तीर्थ क्षेत्रों का निर्माण कराया है। जिनालयों की स्थापना अवश्य ही हमारी भावी पीढ़ी में धर्म, सुसंस्कार और आत्म-कल्याण की भावना जाग्रत करने के लिए अत्यंत आवश्यक और सराहनीय है।
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समय की मांग: 'देव-सेवा' के साथ 'नर-सेवा' और 'जीव-दया' का विस्तार
आज समय की मांग है कि हम अपने दान और सेवा के प्रवाह को थोड़ा और व्यापक रूप दें। जहां कई मंदिरों में आवश्यकता से अधिक प्रतिमाएं और विशाल संरचनाएं स्थापित हो रही हैं, वहीं समाज और राष्ट्र के समक्ष कुछ ऐसे मानवीय पहलू भी हैं जिन पर हमारा ध्यान जाना अत्यंत आवश्यक है:
'हैप्पी होम' (वृद्धाश्रम): हमारे अनेक वरिष्ठ नागरिक और बुजुर्ग, जो जीवन के अंतिम पड़ाव में हैं और एकाकी या असहाय जीवन जीने को मजबूर हैं, उन्हें एक सम्मानजनक, सुरक्षित और आध्यात्मिक वातावरण मिल सके।
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'मदर्स होम' (अनाथालय): वे मासूम बच्चे जो किसी कारणवश अनाथ या निराश्रित हैं, उन्हें मातृ-स्नेह, उत्तम शिक्षा और जैन धर्म के अहिंसक संस्कार मिल सकें ताकि उनका जीवन सुरक्षित और संस्कारी बन सके।
रुग्ण-सेवा: असहाय और गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों के लिए आधुनिक चिकित्सा और औषध-दान की व्यवस्था।
विनम्र अपील:
परस्परोपग्रहो जीवानाम्" — जीवों का एक-दूसरे पर उपकार ही धर्म का मूल है।
हम समस्त दानवीरों, ट्रस्टियों एवं समाज के प्रबुद्ध जनों से करबद्ध निवेदन करते हैं कि वे अपनी संपत्ति और दान का एक निश्चित अंश इन असहाय बुजुर्गों, अनाथ बच्चों और जरूरतमंद मरीजों के कल्याणार्थ समर्पित करने का संकल्प लें।
भव्य मंदिरों के निर्माण के साथ-साथ यदि हम इन निराश्रित जीवों के जीवन में उजाला ला सकें, तो यह तीर्थंकर भगवान की देशना और करुणा का सच्चा साक्षात्कार होगा।
— एक विचारशील एवं धर्मप्रेमी श्रावक
जैन दर्शन के सिद्धांतों को आधुनिक समस्याओं के
समाधान और सामाजिक सुरक्षा के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
अहिंसा, अपरिग्रह और अनेकांतवाद जैसे मूलभूत मूल्यों को तनाव मुक्त जीवन और वैश्विक शांति के लिए एक अनमोल साधन है।
विख्यात वक्ता श्री अश्विनी उपाध्याय ने जैन समाज की घटती जनसंख्या पर चिंता व्यक्त करते हुए अनाथ बच्चों को अपनाने और एकजुट रहने का आह्वान करता है ताकि राष्ट्र सुरक्षित रहे।
जैन धर्म न केवल व्यक्तिगत शांति का मार्ग है, बल्कि यह आतंकवाद और अपराध जैसी वैश्विक चुनौतियों का भी प्रभावी उत्तर है।
कुल मिलाकर, जैन जीवन शैली को अपनाने और इसके माध्यम से मानवता के कल्याण एवं राष्ट्रीय अखंडता को मजबूत करने पर बल देते हैं।
जैन धर्म की दार्शनिक महानता और वर्तमान में जैन समाज के सामने मौजूद जनसांख्यिकीय (demographic) और सामाजिक चुनौतियों को दो मुख्य भागों में समझा जा सकता है:
1. जैन दर्शन: शांति और खुशहाली का मार्ग
तनाव और अवसाद का समाधान:
आज की दुनिया में तनाव और ब्लड प्रेशर की समस्या बहुत आम हो गई है, जिसका स्थायी समाधान जैन धर्म के'ट्रिपल ए'(AAA) सिद्धांत अहिंसा, अपरिग्रह और अनेकांतवाद में छिपा है ।
दुखों का मूल कारण 'भूख':
जैन दर्शन के अनुसार, हर दुख की जड़ पैसे, सत्ता और जिस्म की 'भूख' (लालसा) है, जो कभी खत्म नहीं होती । इसका समाधान एंबिशन छोड़ना नहीं है, बल्कि भगवद गीता की तरह बिना फल की इच्छा के केवल अपने कर्म पर ध्यान केंद्रित करना है।
अपरिग्रह (Nonpossession): जरूरत से ज्यादा चीजों का संचय न करके उन्हें दान कर देना चाहिए ।
इसी सिद्धांत पर चलते हुए, भारत में दिए जाने वाले कुल दान का 62 प्रतिशत अकेले जैन समाज देता है और देश की 16,000 में से 12,000 गौशालाएं जैनों द्वारा संचालित की जाती हैं ।
अनेकांतवाद (Non-absolutism):
"मैं सही, बाकी सब गलत" की जिद छोड़कर दूसरे के नजरिए को स्वीकार करना अनेकांतवाद है । यह शांति का एक 'एब्सोल्यूट फॉर्मूला' है, जिससे रूस-यूक्रेन या इजरायल हमास जैसे युद्धों को भी खत्म किया जा सकता है ।
अहिंसा (Nonviolence):जैन धर्म में अहिंसा को न्यूटन के तीसरे नियम (एक्शन का रिएक्शन) की तरह वैज्ञानिक माना गया है; यदि हम किसी के साथ शारीरिक या मानसिक हिंसा नहीं करेंगे, तो हमारे साथ भी बुरा नहीं होगा ।
2. जैन समाज के लिए खतरे की घंटी और उसके समाधान
गिरती जनसंख्या: दिल्ली जैसे शहरों में जैन समाज की प्रजनन दर (TFR) घटकर 1.5 रह गई है, जिसका अर्थ है कि समुदाय की संख्या बहुत तेजी से घट रही है (जो घटकर 1 करोड़ या उससे भी कम रह गई है) । वक्ता ने आग्रह किया है कि परिवारों को अपने बच्चों की संख्या बढ़ानी चाहिए ।
मंदिरों में अनाथालय: देश भर में पाए जाने वाले हजारों अनाथ बच्चों को सही राह दिखाने के लिए प्रत्येक जैन मंदिर में एक अनाथालय बनाया जाना चाहिए ।
अनाथ बच्चों को जैन संस्कार मिलने से समाज की संख्या भी बढ़ेगी और देश में आतंकवाद, अलगाववाद व अपराधों में भारी कमी आएगी ।
पारिवारिक विवादों का समाधान:
छोटी छोटी बातों पर होने वाले तलाक और परिवारों के टूटने को रोकने के लिए अदालतों के बजाय जैन मंदिरों को मध्यस्थता केंद्र (ArbitrationCenter) बनाया जाना चाहिए, जहाँ पारिवारिक विवादों को सुलझाया जा सके ।
जैन परंपराओं का वैश्विक प्रभाव:
सूर्यास्त से पहले भोजन करने की जैन परंपरा को आज पूरी दुनिया ‘इंटरमिटेंट फास्टिंग' (Intermittent Fasting) के नाम से अपना रही है, जिसे प्रमोट करके इसका पेटेंट कराया जाना चाहिए ।
एकजुटता की आवश्यकता:
श्वेतांबर और दिगंबर के आपसी विवादों को खत्म करके समाज को एकजुट होना चाहिए । वक्ता के अनुसार, 1992 के अल्पसंख्यक कानून ने हिंदुओं और जैनों को बांटने का काम किया है, इसलिए समाज को यह समझना होगा कि "एक रहेंगे तो सेफ रहेंगे" और "बटेंगे तो कटेंगे"
मतभेदों को दूर करे और एक साथ आये
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प्रेरक कहानी:
असली घर वही, जहाँ अपनापन हो
शाम ढल चुकी थी। सात वर्षीय आरव अपनी ड्राइंग बुक में एक बड़ा सा घर बना रहा था। माँ रसोई से चाय लेकर आईं और दादाजी के पास बैठकर उनके घुटनों पर धीरे-धीरे तेल की मालिश करने लगीं। दादाजी पिछले कुछ दिनों से बीमार थे और चलने-फिरने में असमर्थ थे।
पिताजी ने दफ्तर से लौटकर आरव की ड्राइंग देखी और मुस्कुराते हुए पूछा, "अरे वाह आरव! कितना सुंदर घर बनाया है। इसमें कौन-कौन रहेगा?"
आरव ने उत्साह से उंगली रखकर बताया, "पापा, यह सबसे बड़ा कमरा दादाजी और दादी के लिए है, ताकि उन्हें धूप और ताज़ी हवा मिले। यह कमरा आपके और माँ के लिए है, और यह छोटा वाला मेरा।" फिर उसने घर के बाहर एक छोटी सी गाड़ी बनाई और कहा, "और यह एम्बुलेंस है, ताकि अगर पड़ोस के किसी बीमार दादा-दादी को अस्पताल जाना हो, तो हम तुरंत उनकी मदद कर सकें।"
पिताजी ने प्यार से पूछा, "बेटा, तुमने इतना सब कैसे सोचा?"
आरव ने सहजता से जवाब दिया, "पापा, जब मैं बीमार होता हूँ तो माँ रात भर जागकर मेरी सेवा करती हैं। आज जब दादाजी अस्वस्थ हैं, तो माँ उनका ख्याल वैसे ही रख रही हैं जैसे मेरा रखती हैं। माँ कहती हैं कि जो इंसान अपने बड़ों का आदर करता है और किसी दुखी-बीमार के आँसू पोंछता है, वही सच्चा इंसान है। मैं ऐसा ही इंसान बनना चाहता हूँ ताकि माँ को मुझ पर गर्व हो।"
यह सुनकर माँ की आँखें नम हो गईं और दादाजी के चेहरे पर एक शांत संतोष की मुस्कान तैर गई। उस शाम उस छोटे से परिवार ने यह सिद्ध कर दिया कि घर सिर्फ ईंट-पत्थर से नहीं, बल्कि बुजुर्गों के सम्मान, माँ के दिए संस्कारों और पीड़ितों की सेवा के संकल्प से स्वर्ग बनता है।
कविता: घर को स्वर्ग बनाएँ
जहाँ बुजुर्गों की आँखों में, सदा सुकून का साया हो।
जिनके अनुभव की छाँव तले, हर आँगन मुस्काया हो॥
माँ की ममता का मान रहे, संतान बने अभिमान सदा।
कर्म करें ऐसे जग में हम, गर्वित हो उसकी जान सदा॥
रोग-शोक से जो घिर जाएँ, उनका हाथ थाम लें हम।
दवा बने अपनापन बनकर, दुख-तकलीफ मिटा दें हम॥
ईंट-गारे का मकान नहीं, यह प्यार का पावन मंदिर है।
जहाँ सेवा, सम्मान, समर्पण हो, ईश्वर बसता उसके अंदर है॥

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