डॉ. संजीव गोधा द्वारा प्रस्तुत यह पाठ जैन धर्म के उत्तम मार्दव धर्म की गहन व्याख्या करता है। लेखक के अनुसार, धर्म बाहरी क्रियाओं या दिखावे में नहीं, बल्कि आत्मा की कोमल और सरल अवस्था में निहित है। वे स्पष्ट करते हैं कि ज्ञान, धन और शरीर जैसे पर-संयोगों पर आधारित अभिमान आत्मिक विकास में सबसे बड़ी बाधा है। सच्चा मार्दव धर्म तब प्रकट होता है जब मनुष्य अहंकार का त्याग कर स्वयं को और अन्य सभी जीवों को परमात्मा के समान अनुभव करने लगता है। यह पाठ हमें सिखाता है कि बाहरी प्रशंसा या निंदा से अप्रभावित रहकर अपने शाश्वत स्वभाव को पहचानना ही मुक्ति का वास्तविक मार्ग है।
इस वीडियो "Uttam Mardav - उत्तम मार्दव धर्म" में वक्ता (डॉ. संजीव गोधा) ने उत्तम मार्दव धर्म और मान (घमंड) के त्याग को समझाने के लिए कई महत्वपूर्ण धार्मिक ग्रंथों, काव्यों और पूजन की पंक्तियों का उपयोग किया है।
यहाँ उन सभी प्रमुख पंक्तियों और श्लोकों की सटीक, पंक्ति-दर-पंक्ति (line-by-line) व्याख्या प्रस्तुत है:
1. "दश लक्षण धरम पै चढ़िके, शिवमहल में पग धरै" (कवि द्यानत राय जी की पूजन की पंक्ति)
- पंक्ति-दर-पंक्ति व्याख्या:
- "दश लक्षण धरम पै चढ़िके": दशलक्षण धर्म रूपी जो दस सीढ़ियाँ हैं, उन पर पैर रखकर या एक-एक करके आगे बढ़कर।
- "शिवमहल में पग धरै": मोक्ष रूपी महल (शिवमहल) में कदम रखा जा सकता है।
- गहन अर्थ और वक्ता का विश्लेषण: वक्ता समझाते हैं कि यदि हमें मुक्ति (मोक्ष) के महल तक पहुँचना है, तो हमें इन दस सीढ़ियों रूपी धर्मों की साधना करनी होगी। यह दशलक्षण धर्म कोई बाहरी क्रियाकांड नहीं है, बल्कि यह हमारे अभिप्राय और मान्यता को बदलने का नाम है।
2. "मान करन को कौन ठिकाना" (कवि द्यानत राय जी)
- पंक्ति-दर-पंक्ति व्याख्या:
- "मान करन को कौन ठिकाना": इस जीव के मान (अहंकार या घमंड) करने का भला क्या ठोस आधार या ठिकाना हो सकता है? अर्थात इसका कोई वास्तविक आधार नहीं है।
- गहन अर्थ और वक्ता का विश्लेषण: वक्ता कहते हैं कि हमारा घमंड इतना अस्थिर और कमज़ोर है कि वह किसी भी छोटी-सी बात पर जाग उठता है। यदि कोई हमारी हंसी, हमारे कपड़े, चश्मे, जूते, दांत या वाणी की ज़रा सी प्रशंसा कर दे, तो हमारा अहंकार जाग जाता है। यह अहंकार पूरी तरह से पर-पदार्थों और क्षणिक संयोगों पर टिका है, जो आज हैं और कल नहीं रहेंगे।
3. आठ मदों का मूल श्लोक (समंतभद्र स्वामी - रत्नकरण्ड श्रावकाचार)
"ज्ञानं पूजा कुलं जाति बलं ऋद्धि तपो वपुः। अष्टावेतानि मान्यानि मद्यं प्राहुर्मनीषिणः॥"
- पंक्ति-दर-पंक्ति व्याख्या:
- "ज्ञानं" (ज्ञान मद): अपने शास्त्र ज्ञान या बुद्धि का घमंड करना।
- "पूजा" (पूजा मद): संसार में अपनी प्रतिष्ठा, सत्कार या आदर-सम्मान का अहंकार करना।
- "कुलं" (कुल मद): पिता के पक्ष के उच्च घराने का घमंड करना।
- "जाति" (जाति मद): माता के पक्ष के उच्च वंश का अहंकार करना।
- "बलं" (बल मद): अपनी शारीरिक ताकत या शक्ति का घमंड करना।
- "ऋद्धि" (ऋद्धि मद): अपनी वैभव, संपत्ति या अलौकिक शक्तियों का अहंकार करना।
- "तपो" (तप मद): अपने द्वारा किए जा रहे उपवास, व्रत या तपस्या का घमंड करना।
- "वपुः" (वपु/शरीर मद): अपने सुंदर रूप या शरीर की सुंदरता का अहंकार करना।
- "अष्टावेतानि मान्यानि मद्यं प्राहुर्मनीषिणः": ये आठ आधार हैं जिनके कारण जीव मद (अहंकार) से अंधा हो जाता है, और बुद्धिमान पुरुषों (मनीषियों) ने इन्हें 'मद' (नशा) कहा है।
- गहन अर्थ और वक्ता का विश्लेषण: वक्ता बताते हैं कि ये आठों चीजें 'स्वाश्रित' (स्वयं पर निर्भर) नहीं हैं, बल्कि 'पराश्रित' (बाहरी संयोगों पर निर्भर) हैं। परिस्थितियों के बदलते ही ये मद चूर-चूर हो जाते हैं:
- ज्ञान मद केवल अधकचरा ज्ञान रखने वाले अज्ञानियों को होता है, क्योंकि पूर्ण ज्ञानी अरहंत और सिद्धों में कोई अहंकार नहीं होता। एक मामूली दिमागी चोट लगने पर सारा ज्ञान क्षण भर में नष्ट हो सकता है।
- धन और बल का कोई भरोसा नहीं है; एक करोड़पति को रोडपति बनने में और एक बलवान व्यक्ति को बीमारी के कारण बिस्तर पकड़ने में देर नहीं लगती।
- रूप का घमंड समय के साथ ढल जाता है, जैसे बड़ी-बड़ी अभिनेत्रियों का रूप बुढ़ापे में पूरी तरह बदल जाता है।
4. "करि बिनय बहु गुन बड़े जन की, ज्ञान का पावै घड़ा"
- पंक्ति-दर-पंक्ति व्याख्या:
- "करि बिनय बहु गुन बड़े जन की": जो लोग ज्ञान, शील, और संयम में हमसे श्रेष्ठ या गुणी हैं, उनके प्रति अत्यंत विनम्र भाव (विनय) रखना चाहिए।
- "ज्ञान का पावै घड़ा": ऐसी विनम्रता रखने से ही जीव ज्ञान रूपी घड़े (ज्ञान की पूर्णता) को प्राप्त कर सकता है।
- गहन अर्थ और वक्ता का विश्लेषण: वक्ता समझाते हैं कि जीवन में सहज कोमलता और विनम्रता होना आवश्यक है। विनय के बिना धर्म आत्मा में प्रवेश नहीं कर सकता। जो लोग घमंड में अकड़े रहते हैं, वे उस सूखे पेड़ की तरह होते हैं जो आंधी-तूफान में उखड़ जाता है, जबकि विनम्रता से झुकने वाले पौधे बच जाते हैं।
5. "जड़ पर झुकता चेतन... यह चेतन की मारदवै खंडित"
- पंक्ति-दर-पंक्ति व्याख्या:
- "जड़ पर झुकता चेतन": जब चेतन आत्मा स्वयं के शुद्ध स्वरूप को भूलकर जड़ वस्तुओं (जैसे शरीर, धन, वैभव और संयोगों) के सामने अपनी महत्ता स्वीकार करती है या उनके अधीन होती है।
- "यह चेतन की मारदवै..." (खंडित हो रही है): तब आत्मा का जो स्वाभाविक 'मार्दव' (कोमल और सहज स्वभाव) है, वह खंडित हो जाता है।
- गहन अर्थ और वक्ता का विश्लेषण: वक्ता के अनुसार, मान (घमंड) आत्मा की विकारी पर्याय है और मार्दव आत्मा की निर्मल पर्याय है। जब हम संयोगों को देखकर स्वयं को बड़ा या छोटा मानते हैं, तो हम अपनी आत्मा के सहज मार्दव स्वभाव की विराधना करते हैं।
6. "निज आत्मा ज्ञान बिना सुख लेश न पायो"
- पंक्ति-दर-पंक्ति व्याख्या:
- "निज आत्मा ज्ञान बिना": अपनी आत्मा के सच्चे ज्ञान और स्व-अनुभव के बिना।
- "सुख लेश न पायो": इस जीव ने संसार में भटकते हुए रंच मात्र (लेश मात्र) भी सच्चा और स्थायी सुख प्राप्त नहीं किया।
- गहन अर्थ और वक्ता का विश्लेषण: वक्ता समझाते हैं कि हमने भूतकाल में ग्यारह अंग और नौ पूर्व तक का ज्ञान कई बार रट लिया, अनंत बार मुनि पद भी धारण किया और तप भी किए, परंतु जब तक अपनी शुद्ध आत्मा का अनुभव नहीं किया, तब तक सच्चा सुख और मोक्ष मार्ग प्राप्त नहीं हुआ। इसलिए केवल ज्ञान बढ़ाना या क्रियाएं करना धर्म नहीं है, बल्कि आत्मज्ञान होना ही सच्चा धर्म है।
7. महत्वपूर्ण व्यावहारिक उदाहरण (वक्ता द्वारा प्रस्तुत):
- दांत और जीभ का विवाद: दांत कठोर (अभिमानी) होते हैं, वे जीवन में देर से आते हैं और बुढ़ापे में जल्दी टूटकर चले जाते हैं। जीभ कोमल (विनम्र) होती है, जो जन्म से मृत्यु तक साथ रहती है। इससे सिद्ध होता है कि कठोरता नष्ट हो जाती है और कोमलता टिकी रहती है।
- मटकी और प्लेट का दृष्टांत: घड़े (मटकी) के ऊपर रखी प्लेट हमेशा घड़े के माथे पर बैठी रहती है, इसलिए वह सदा प्यासी रहती है। परंतु जो गिलास या प्याला नीचे आकर घड़े के सामने झुकता है, वह शीतल जल से भर जाता है। इसी प्रकार जो जीव अहंकार में चूर होकर सदा ऊपर बने रहना चाहते हैं, वे ज्ञान और शांति से खाली रह जाते हैं, और जो गणधर देव की भाँति प्रभु के चरणों में विनम्रता से झुकते हैं, वे ज्ञान से समृद्ध हो जाते हैं।
🌸 उत्तम मार्दव धर्म का संदेश: मान (घमंड) का त्याग करके, सभी जीवों को अपने ही समान भगवान या परमात्मा के रूप में देखना और स्वयं के शुद्ध आत्मा के आश्रय से अत्यंत सहज और कोमल परिणाम रखना ही उत्तम मार्दव धर्म है।
आचार्य समंतभद्र स्वामी ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ रत्नकरण्ड श्रावकाचार में मान (अहंकार) के आठ मुख्य आधारों की चर्चा की है। मूल श्लोक इस प्रकार है:
"ज्ञानं पूजा कुलं जाति बलं ऋद्धि तपो वपुः। अष्टावेतानि मान्यानि मद्यं प्राहुर्मनीषिणः॥"
इस श्लोक के अनुसार, बुद्धिमान पुरुषों ने जीवन में घमंड या मद पैदा करने वाले आठ मुख्य कारणों (मदों) को 'मद्य' (नशे) की तरह बताया है, क्योंकि जिस प्रकार नशा इंसान की सोचने-समझने की शक्ति हर लेता है, वैसे ही ये आठ मद भी जीव को अंधा बना देते हैं।
वक्ता के अनुसार, इन आठ मदों का गहन व्यावहारिक और आध्यात्मिक विश्लेषण इस प्रकार है:
1. ज्ञान मद (Pride of Knowledge)
- क्या है? अपनी बुद्धिमत्ता, शास्त्र-ज्ञान, डिग्री या स्मरण शक्ति का अहंकार करना।
- गहन विश्लेषण: वक्ता बहुत अनूठी बात कहते हैं कि ज्ञान मद वास्तव में ज्ञानियों को नहीं, बल्कि अज्ञानियों को होता है। जो पूर्ण ज्ञानी (जैसे अरहंत और सिद्ध भगवान) हैं, उनमें रंच मात्र भी अहंकार नहीं होता; यह मद केवल उन्हें होता है जिन्हें आधा-अधूरा या अधकचरा ज्ञान होता है।
- अस्थिरता: इस क्षयोपशम ज्ञान का कोई भरोसा नहीं है। सड़क पर चलते हुए सिर पर एक मामूली सी चोट लगने से सारा ज्ञान, याददाश्त, शास्त्रों के संदर्भ, पद और प्रतिष्ठा क्षण भर में गायब हो जाते हैं।
2. पूजा मद (Pride of Prestige/Honor)
- क्या है? समाज में अपनी मान-प्रतिष्ठा, सत्कार, आदर-सम्मान या ऊंचे पद का घमंड करना।
- गहन विश्लेषण: जब लोग हमारी प्रशंसा करते हैं, हमारे आगे-पीछे घूमते हैं या हमारा सम्मान करते हैं, तो हमारा अहंकार जाग जाता है। लेकिन यह सम्मान दूसरों की बदलती सोच पर निर्भर है, जो आज है और कल नहीं रहेगा।
3. कुल मद (Pride of Paternal Lineage)
- क्या है? पिता के पक्ष के उच्च घराने, खानदान या समृद्ध पारिवारिक इतिहास का अहंकार करना।
- गहन विश्लेषण: जीव अपने पूर्वजों के नाम और ऊँचे कुल पर घमंड करता है, जबकि यह केवल पूर्व कर्मों के उदय से मिला एक बाहरी संयोग मात्र है, जिसका आत्मा के वास्तविक स्वभाव से कोई संबंध नहीं है।
4. जाति मद (Pride of Maternal Lineage)
- क्या है? माता के पक्ष के उच्च वंश, जाति या ननिहाल पक्ष के गौरव का घमंड करना।
- गहन विश्लेषण: कुल की तरह ही जाति भी बाहरी संयोग है। जीव स्वयं को दूसरों से सामाजिक रूप से श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए इसका अहंकार करता है।
5. बल मद (Pride of Physical Strength)
- क्या है? अपनी शारीरिक शक्ति, ताकत, जवानी या निरोगी शरीर का अहंकार करना।
- गहन विश्लेषण: शारीरिक बल पल भर में समाप्त हो सकता है। वक्ता उदाहरण देते हैं कि यदि एक बलवान से बलवान व्यक्ति को भी रात में सामान्य दस्त (पेट खराब) हो जाएं, तो वह सुबह तक खटिया पकड़ लेता है और उसका सारा बल हवा हो जाता है।
6. ऋद्धि मद (Pride of Wealth/Prosperity)
- क्या है? अपनी धन-संपत्ति, वैभव, ऐश्वर्य या अलौकिक शक्तियों (ऋद्धियों) का घमंड करना।
- गहन विश्लेषण: परिस्थितियां बदलते ही धन और वैभव धूल में मिल जाते हैं। करोड़पति व्यक्ति के 'करोड़' में से केवल 'क' हटने की देर होती है और वह तुरंत 'रोडपति' बन जाता है। यहाँ तक कि तीन खंड के अधिपति श्री कृष्ण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती जैसे महाप्रतापी सम्राटों को भी अंत समय में पानी तक नसीब नहीं हुआ।
7. तप मद (Pride of Penance/Austerity)
- क्या है? अपने द्वारा किए जा रहे उपवास, व्रत, साधना या कठिन धार्मिक तपस्या का अहंकार करना।
- गहन विश्लेषण: कई बार जीव बाह्य तपस्या तो करता है, लेकिन उसके बदले में वह यह चाहता है कि लोग उसे बड़ा तपस्वी मानें। यह 'तप मद' तप के वास्तविक उद्देश्य (आत्मा की सहज कोमलता) को ही नष्ट कर देता है।
8. वपु मद (Pride of Beauty/Body)
- क्या है? अपने सुंदर शरीर, आकर्षक चेहरे या शारीरिक सौंदर्य का घमंड करना।
- गहन विश्लेषण: यह रूप और यौवन समय के साथ ढल जाता है। वक्ता कहते हैं कि यदि आप बड़ी-बड़ी सुंदर अभिनेत्रियों की युवावस्था की तस्वीरें और उनके बुढ़ापे के रूप को देखें, तो समझ आएगा कि शरीर का सौंदर्य कितना क्षणभंगुर है। खुद की 20 साल की उम्र की शक्ल और 80 साल की शक्ल में जो अंतर आता है, वह इस मद को चूर-चूर करने के लिए काफी है।
इन आठ मदों का मूल सिद्धांत और समाधान
- ये सभी 'पर-आश्रित' (External) हैं: वक्ता स्पष्ट करते हैं कि ये आठों चीजें 'स्वाश्रित' (स्वयं पर निर्भर) नहीं हैं बल्कि बाहरी संयोगों पर निर्भर हैं। चूँकि संयोग कभी स्थायी नहीं रहते, इसलिए इनके आश्रय से किया गया कोई भी अहंकार निश्चित रूप से एक न एक दिन टूटता ही है।
- छोटे-बड़े की भावना ही मान का आधार है: मान हमेशा ऊँच-नीच, छोटे-बड़े के मूल्यांकन से पैदा होता है। जब हम किसी से ऊपर चढ़ते हैं, तो नीचे वाले छोटे दिखने लगते हैं; लेकिन हम भूल जाते हैं कि नीचे वाले को हम भी उतने ही छोटे दिखाई दे रहे हैं।
- परमात्म स्वरूप की पहचान: उत्तम मार्दव धर्म तब प्रकट होता है जब हम इन बाहरी पैमानों को छोड़कर "सर्व जीव छे सिद्ध सम" (सभी जीव सिद्धों के समान शुद्ध आत्मा हैं) के सिद्धांत को स्वीकार करते हैं। जब हम स्वयं को और दूसरों को शरीर या संयोग के चश्मे से न देखकर शुद्ध आत्मा के रूप में देखते हैं, तब मान का समूल नाश हो जाता है और परम सहजता प्रकट होती है।
वक्ता ने प्रवचन में इन आठ मदों में से 'ऋद्धि मद' (धन-वैभव का घमंड) और 'ज्ञान मद' (बुद्धि या शास्त्र-ज्ञान का घमंड) को बहुत ही सुंदर कहानियों और जीवन के कड़वे सत्यों के माध्यम से समझाया है। आइए इन्हें गहराई से समझते हैं:
1. ऋद्धि मद (धन और वैभव का घमंड)
वक्ता बताते हैं कि जीव अपनी धन-संपत्ति और साम्राज्य पर बहुत घमंड करता है, लेकिन वह यह भूल जाता है कि इस बाहरी वैभव की वास्तविक कीमत कितनी मामूली है। इसे समझाने के लिए उन्होंने दो बहुत ही प्रभावशाली प्रसंग साझा किए हैं:
क) राजा और चतुर मंत्री की कहानी:
एक राजा था जिसे अपने धन, वैभव और बुद्धिमत्ता का बहुत घमंड था। वह समझता था कि उसके जैसा प्रतापी और समृद्ध कोई दूसरा नहीं है। राजा के बुद्धिमान मंत्री को लगा कि राजा का यह अहंकार तोड़ना जरूरी है।
एक दिन मंत्री ने राजा से एक काल्पनिक प्रश्न पूछा:
- मंत्री: "महाराज, कल्पना कीजिए कि हम दोनों जंगल में शिकार खेलते हुए रास्ता भटक जाएं। सुबह से शाम हो जाए, भयंकर प्यास लगे, कंठ सूखने लगे और चलना भी दूभर हो जाए। ऐसे में यदि कोई व्यक्ति आपके सामने एक लोटा पानी लेकर आए और कहे कि वह पानी तो देगा, लेकिन बदले में आधा राज्य लेगा; तो क्या आप उसे आधा राज्य देंगे?"
- राजा (समझदारी दिखाते हुए): "हाँ, बिल्कुल दूँगा। जान है तो जहान है, आधा राज्य देकर भी मैं पानी खरीद लूँगा।"
- मंत्री: "बहुत अच्छा महाराज! अब मान लीजिए कि वह पानी पीते ही आपके पेट में भयानक दर्द होने लगे और यदि वह पानी बाहर न निकाला जाए तो आपके प्राण निकल जाएं। उसी समय कोई वैद्य आए और कहे कि वह आपके पेट का पानी निकाल देगा, लेकिन बदले में बचा हुआ आधा राज्य भी लेगा; तो क्या आप उसे वह राज्य देंगे?"
- राजा: "हाँ, प्राण बचाने के लिए मैं बचा हुआ आधा राज्य भी दे दूँगा।"
कहानी की सीख: तब मंत्री ने राजा से कहा कि महाराज, जिस साम्राज्य और अथाह संपत्ति का आप इतना घमंड करते हैं, उसकी कुल कीमत क्या है? उस पूरे साम्राज्य की कीमत केवल एक लोटा पानी पीने और उस पानी को बाहर निकालने के बराबर ही तो है! जो वैभव एक लोटे पानी के सामने टिक नहीं पाता, उस पर अहंकार करना कितनी बड़ी मूर्खता है।
ख) तीन खंड के अधिपति श्री कृष्ण का प्रसंग:
वक्ता ने भगवान श्री कृष्ण का उदाहरण देते हुए ऋद्धि मद की क्षणभंगुरता को समझाया।
- श्री कृष्ण 'तीन खंड के अधिपति' थे। तीन खंड का वैभव इतना विशाल होता है कि उसके एक छोटे से हिस्से में हमारी पूरी आज की दुनिया समा जाती है।
- लेकिन जब उनका अंत समय आया, तो परिस्थिति ऐसी बदली कि जंगल में प्यास से तड़पते हुए उन्हें एक गिलास पानी तक नसीब नहीं हुआ। उनके सगे भाई बलदेव पानी लेने गए थे, लेकिन उनके आने से पहले ही एक शिकारी का तीर लगने से कृष्ण ने "पानी-पानी" करते हुए दम तोड़ दिया।
- इसी प्रकार ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती भी पूरी दुनिया पर राज करते-करते अंततः महल में ही मृत्यु को प्राप्त हुए और क्षण भर में नरक चले गए। यह दर्शाता है कि भौतिक संपदा अंत समय में रंच मात्र भी शरण नहीं दे सकती।
2. ज्ञान मद (शास्त्र-ज्ञान का घमंड)
वक्ता के अनुसार, ज्ञान का मद सबसे सूक्ष्म और खतरनाक होता है, क्योंकि जीव को लगता है कि वह धर्म के मार्ग पर बढ़ रहा है, जबकि वह वास्तव में अहंकार की खाई में गिर रहा होता है।
- "अधजल गगरी छलकत जाए": वक्ता कहते हैं कि पूर्ण ज्ञानियों (जैसे अरहंत भगवान) को कभी ज्ञान का मद नहीं होता। यह मद केवल उन अज्ञानियों को होता है जिन्हें थोड़ा-बहुत अधकचरा या ऊपरी ज्ञान हो जाता है। ऐसे लोग अक्सर घमंड करते हैं कि— "मुझे कितने शास्त्रों के संदर्भ याद हैं, मैं कितने सालों से प्रवचन दे रहा हूँ या मुझे कितनी नॉलेज है"।
- ज्ञान की अत्यंत कमजोरी: जिस बुद्धि पर हम इतना इतराते हैं, उसकी सच्चाई यह है कि सड़क पर चलते हुए सिर पर एक मामूली सी चोट लगने से सारा ज्ञान और याददाश्त एक सेकंड में गायब हो जाती है। व्यक्ति अपना नाम, गाँव, पद-प्रतिष्ठा और शास्त्रों की गाथाएं तक भूल जाता है।
- 11 अंग और 9 पूर्व का ज्ञान भी व्यर्थ: जैन शास्त्रों के अनुसार, इस जीव ने भूतकाल में अनंत बार ग्यारह अंग और नौ पूर्व (अत्यंत सूक्ष्म शास्त्र ज्ञान) रट लिया। इतनी कठिन पढ़ाई और अनंत बार मुनि व्रत धारण करने के बावजूद भी जीव आज संसार में भटक रहा है। क्यों? क्योंकि— "निज आत्मा ज्ञान बिना सुख लेश न पायो"। जब तक अपनी शुद्ध आत्मा का अनुभव नहीं हुआ, तब तक वह सारा शास्त्र-ज्ञान केवल एक रटन मात्र रह गया और उससे मोक्ष मार्ग प्रकट नहीं हुआ।
🌸 मूल संदेश: उत्तम मार्दव धर्म हमें सिखाता है कि चाहे हमारे पास कितना भी ज्ञान हो या कितनी भी संपत्ति हो, वे सब क्षणभंगुर संयोग हैं। जब तक हम अपने भीतर विराजमान अविनाशी 'ज्ञायक भगवान आत्मा' के सच्चे वैभव को नहीं पहचानते और स्वयं को दूसरों से बड़ा या छोटा मानते रहते हैं, तब तक हम अहंकार के नशे में ही जीते रहते हैं।
वक्ता (डॉ. संजीव गोधा) ने उत्तम मार्दव धर्म के अंतर्गत कोमलता और विनम्रता के महत्व को समझाने के लिए दांत और जीभ का एक बेहद व्यावहारिक और मनोरंजक प्रसंग साझा किया है:
दांत और जीभ का स्वभाव और उनका अस्तित्व
हमारे मुँह में दो अंग मुख्य रूप से काम करते हैं—दांत और जीभ।
- दांत कठोर (अभिमानी) होते हैं: वे हमारे जन्म के बहुत बाद (जब बच्चा लगभग साल-डेढ़ साल का होता है) आते हैं और बुढ़ापा आते-आते सबसे पहले टूटकर साथ छोड़ देते हैं।
- जीभ कोमल और लचीली (विनम्र) होती है: वह मनुष्य के जन्म से लेकर उसकी मृत्यु तक हमेशा साथ निभाती है।
इससे यह सिद्ध होता है कि जिसमें कठोरता या अकड़ होती है, वह जल्दी नष्ट हो जाता है, और जो कोमल व विनम्र होता है, वह सदा टिका रहता है।
दांत और जीभ का विवाद (संवाद)
एक बार दांतों और जीभ के बीच विवाद छिड़ गया और दोनों आपस में बहस करने लगे:
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दांतों का अहंकार: दांतों को अपनी संख्या (32) और अपनी मजबूती पर बहुत घमंड था। उन्होंने जीभ को धमकाते हुए कहा—
"ऐ जीभ! ज्यादा बकवास मत कर। तू भूल रही है कि तू हम 32 बलवान और कठोर दांतों के बीच में फंसी हुई है। अगर तूने ज्यादा होशियारी दिखाई, तो हम तुझे जोर से काट लेंगे और दबाकर रख देंगे। इसलिए संभलकर रह।"
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जीभ की कोमलता की शक्ति: जीभ ने बिल्कुल सहज रहकर बहुत ही लाजवाब जवाब दिया—
"भैया! अपनी इस कठोरता पर ज्यादा गर्व मत करो। माना कि तुम बत्तीस हो और मैं अकेली फंसी हूँ, लेकिन मुझे कमजोर मत समझना। यदि मैंने बाहर किसी के सामने केवल एक कड़वा या अनुचित शब्द बोल दिया, तो सामने वाला व्यक्ति बाहर से आकर तुम बत्तीस के बत्तीस दांत तोड़कर बाहर कर देगा! और मैं तो मुँह के अंदर जैसी कोमल हूँ, वैसी ही सुरक्षित बैठी रहूँगी।"
इस कहानी का व्यावहारिक और आध्यात्मिक संदेश
- कोमलता में ही जीवन है: वक्ता कहते हैं कि जगत में एक प्रसिद्ध कहावत है— "झुकता वही है जिसमें जान होती है, अकड़ना तो मुर्दों की पहचान होती है।" मुर्दा शरीर अकड़ जाता है, जबकि जीवित शरीर में कोमलता और लचीलापन होता है।
- विनम्रता से ही रक्षा: जैसे आंधी-तूफान आने पर जो बड़े और भारी पेड़ अकड़कर खड़े रहते हैं, वे जड़ से उखड़ जाते हैं; लेकिन जो कोमल पौधे विनम्रता से झुक जाते हैं, वे सुरक्षित बच जाते हैं।
- धर्म का प्रवेश: जीवन में जहाँ विनय और सहज विनम्रता होती है, वहीं धर्म आत्मा के भीतर प्रवेश कर पाता है। यदि हम दांतों की तरह अहंकार की अकड़ में जिएंगे, तो हमारा पतन निश्चित है, लेकिन यदि जीभ की तरह विनम्र और सहज रहेंगे, तो जीवन में सुख और धर्म का अवतरण होगा।
वक्ता (डॉ. संजीव गोधा) ने घड़े और प्लेट के संवाद के माध्यम से विनम्रता और अहंकार के व्यावहारिक अंतर को बहुत ही सुंदर ढंग से समझाया है:
घड़े और प्लेट का संवाद
एक घड़े (मटकी) के ऊपर पानी को ढकने के लिए एक प्लेट (ढक्कन) रखी हुई थी। एक दिन उस प्लेट को घड़े पर बहुत गुस्सा आया और उसने नाराज होकर घड़े से शिकायत की।
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प्लेट की शिकायत: "अरे घड़े भैया! मैं तुमसे बहुत ज्यादा नाराज हूँ। तुम्हारे पास जो भी प्यासा व्यक्ति आता है, तुम उसे अपना शीतल जल पिलाकर तृप्त कर देते हो। लेकिन मैं तो चौबीस घंटे तुम्हारे सिर पर, तुम्हारे साथ ही बैठी रहती हूँ, फिर भी तुमने मुझे आज तक कभी पानी की एक बूंद भी नहीं पिलाई!"
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घड़े का उत्तर: घड़े ने अत्यंत सहजता से जवाब दिया— "बहन! इसमें मेरी कोई गलती नहीं है। बात यह है कि जो भी प्यासा जीव (जैसे प्याला, गिलास या लोटा) मेरे पास आता है, वह नीचे की ओर जाता है और थोड़ा झुकता है। जो भी मेरे सामने आकर थोड़ा झुकता है, वह शीतल जल से पूरी तरह भर जाता है। लेकिन तुम सदा काल मेरे माथे (शिखर) पर ही सवार बैठी रहती हो, कभी झुकती नहीं हो; इसीलिए तुम हमेशा प्यासी की प्यासी ही रह जाती हो।"
इस कहानी का गहरा आध्यात्मिक संदेश
- माथे पर सवार रहने की प्यास (अहंकार): वक्ता बताते हैं कि जो जीव सदा समाज में, परिवार में या धर्म के क्षेत्र में 'माथे पर सवार' रहना चाहता है—यानी स्वयं को दूसरों से बड़ा और श्रेष्ठ मानकर अहंकार की अकड़ में ऊपर बैठा रहता है—वह जीवन में कभी भी आत्मिक शांति, सच्चा ज्ञान और सहज सुख प्राप्त नहीं कर पाता। अहंकार व्यक्ति को हमेशा अतृप्त और प्यासा रखता है क्योंकि जो माथे पर सवार रहेगा, वह कुछ भी प्राप्त नहीं कर पाएगा।
- झुकने से ही पात्रता आती है (विनम्रता): जैसे घड़े के सामने झुकने वाला प्याला या लोटा पानी से लबालब भर जाता है, वैसे ही जो जीव गुरुओं, जिनवाणी और ज्ञानी पुरुषों के सामने अपनी अकड़ को छोड़कर विनम्रता से झुकता है, वही ज्ञान और धर्म से समृद्ध हो पाता है।
- गणधर देव का आदर्श उदाहरण: वक्ता ने समझाया कि साक्षात चार-चार ज्ञान के धारी (मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मनःपर्ययज्ञान) और द्वादशांग के ज्ञाता गणधर देव भी जब समवसरण में तीर्थंकर परमात्मा के सामने बैठते हैं, तो अत्यंत विनम्रता से दोनों हाथ जोड़कर ऐसे बैठते हैं जैसे उन्हें कुछ आता ही न हो। जब तीर्थंकरों के बाद दूसरे नंबर पर आने वाले इतने महान ज्ञानी भी स्वयं को कुछ नहीं समझते और पूर्ण रूप से निरभिमानी रहते हैं, तो हमारा ज़रा सा शास्त्र-ज्ञान या धन पाकर इतराना कितनी बड़ी भूल है।
वक्ता (डॉ. संजीव गोधा) ने ऋद्धि मद (धन, वैभव और साम्राज्य के अहंकार) की क्षणभंगुरता और उसकी निरर्थकता को स्पष्ट करने के लिए राजा और चतुर मंत्री की इस काल्पनिक कहानी को बहुत ही विस्तार और तार्किक ढंग से प्रस्तुत किया है:
कहानी की पृष्ठभूमि
एक राजा था जिसे अपने राज्य, अथाह धन-संपत्ति, वैभव और अपनी बुद्धिमत्ता का बहुत घमंड था। वह स्वयं को सबसे श्रेष्ठ समझता था। राजा का मंत्री बहुत ही चतुर और दूरदर्शी था। उसे लगा कि राजा का यह अहंकार उसके आत्म-कल्याण में बाधक है और इसे तोड़ना अत्यंत आवश्यक है। इसलिए वह राजा के पास गया और उसने अपनी बुद्धि का उपयोग करते हुए राजा के सामने एक काल्पनिक परिस्थिति रखी।
काल्पनिक परिस्थिति: जंगल में संकट
मंत्री ने राजा से कहा, "महाराज! मान लीजिए कि हम दोनों कभी शिकार खेलने के लिए जंगल में जाएं और किसी जानवर का पीछा करते-करते जंगल में इतनी दूर निकल जाएं कि वापस अपने नगर का रास्ता ही भूल जाएं। रास्ता ढूंढते-ढूंढते सुबह से शाम हो जाए। भयंकर गर्मी हो, प्यास के मारे कंठ पूरी तरह सूख रहा हो, पीने के लिए पानी की दो बूंद भी न मिलें और प्यास की तड़प के कारण आगे चलना भी पूरी तरह दूभर (असंभव) हो जाए।"
पहला प्रश्न: पानी का एक लोटा और आधा राज्य
मंत्री ने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए राजा से पहला प्रश्न पूछा:
- मंत्री का प्रश्न: "महाराज, ऐसी मरणासन्न स्थिति में यदि कोई व्यक्ति आपके सामने पानी का एक लोटा लेकर आ जाए। लेकिन वह पानी देने के बदले में एक शर्त रखे कि वह आपको पानी तभी पिलाएगा जब आप उसे अपना 'आधा राज्य' लिख कर दे देंगे। तो ऐसी परिस्थिति में क्या आप उसे अपना आधा राज्य देंगे या नहीं?"
- राजा का उत्तर: राजा बहुत समझदार और व्यावहारिक था, उसने तुरंत उत्तर दिया, "हाँ, बिल्कुल दे दूँगा! क्योंकि 'जान है तो जहान है'। जब प्राण ही नहीं बचेंगे तो राज्य का क्या करूँगा? आधा राज्य देकर भी मैं वह पानी का लोटा ले लूँगा।"
- मंत्री ने राजा के इस निर्णय की प्रशंसा की और कहा कि महाराज, आप वास्तव में बहुत बुद्धिमान हैं।
दूसरा प्रश्न: पेट की पीड़ा और बचा हुआ आधा राज्य
इसके बाद मंत्री ने कहानी में एक और मोड़ लाया और राजा से दूसरा प्रश्न पूछा:
- मंत्री का प्रश्न: "महाराज, अब मान लीजिए कि सुबह से प्यासे रहने के कारण आपने वह पानी का एक लोटा तो पी लिया। लेकिन वह पानी पेट में जाते ही आपके पेट में भयंकर और असहनीय दर्द होने लगा। स्थिति ऐसी बन गई कि यदि उस पानी को (पेशाब/यूरिन आदि के रूप में) शरीर से बाहर न निकाला जाए, तो दर्द के कारण आपके प्राण निकल जाएंगे। उसी समय संयोग से वहाँ कोई वैद्य आ जाए और कहे कि वह आपके पेट का पानी निकाल देगा और आपका दर्द ठीक कर देगा, लेकिन बदले में वह आपका 'बचा हुआ आधा राज्य' भी माँगेगा। तो क्या आप उसे वह बचा हुआ आधा राज्य देंगे या नहीं?"
- राजा का उत्तर: राजा ने बिना देर किए उत्तर दिया, "हाँ, मैं अपने प्राण बचाने के लिए वह बचा हुआ आधा राज्य भी तुरंत उस वैद्य को दे दूँगा।"
कहानी की सीख और आध्यात्मिक निष्कर्ष
राजा का यह उत्तर सुनते ही चतुर मंत्री ने हाथ जोड़े और राजा को उनके अहंकार का आइना दिखाते हुए कहा:
"महाराज! जिस विशाल साम्राज्य, धन-संपत्ति और वैभव का आप रात-दिन इतना घमंड करते हैं, उसकी वास्तविक कीमत पर विचार कीजिए! आपके इस पूरे अखंड साम्राज्य की कुल कीमत केवल 'एक लोटा पानी पीने' और 'एक लोटा पानी बाहर निकालने' के बराबर ही तो है!"
वक्ता इस कहानी के माध्यम से समझाते हैं कि जिस भौतिक संपत्ति की औकात एक लोटे पानी के सामने इतनी तुच्छ है, उस पर अनादि काल से यह जीव अहंकार करता आ रहा है। यह बाह्य वैभव और संयोग क्षणभंगुर हैं, जो अंत समय में जीव को रंच मात्र भी शरण नहीं दे सकते। इसलिए, बाहरी धन-दौलत का घमंड छोड़ना और अपनी अविनाशी आत्मा के अनंत चैतन्य वैभव को पहचानना ही सच्चा पुरुषार्थ है।
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