1. गिरनार विवाद का इतिहास एवं प्रमुख पहलू
विवाद की पृष्ठभूमि और शुरुआत:
- रियासती और ब्रिटिश काल: प्रारंभ में यह विवाद सेठ आनंदजी कल्याणजी पेढ़ी और जूनागढ़ रियासत(नवाब) के बीच प्रबंधन और तीर्थयात्रियों के कर अधिकारों को लेकर था। 1928 के एक आदेश में जैनसमुदाय के प्रबंधन अधिकारों को मान्यता दी गई थी।
- सांप्रदायिक स्वरूप (1970–1980 का दशक): स्वतंत्रता के बाद मुख्य टकराव 5वीं टोंक के पदचिह्नों कोलेकर शुरू हुआ। नाथ संप्रदाय के साधुओं ने इसे 'भगवान दत्तात्रेय की तपोभूमि' के रूप में स्थापित किया, जबकि जैन समुदाय इसे 22वें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ की मोक्ष स्थली मानता है।
- हिंसक घटनाएं एवं तनाव (2004, 2013 एवं हालिया वर्ष): 2004 में निर्माण को लेकर झड़पें हुईं।जनवरी 2013 में मुनि प्रबलसागर जी पर हमले के बाद तनाव और बढ़ा।
मुख्यमंत्रियों और प्रधानमंत्रियों के समक्ष मामले का उठना:
- इंदिरा गांधी व राजीव गांधी काल: 1970–80 के दशक में जैन प्रतिनिधिमंडलों ने प्राचीन शिलालेखों औरटोंकों के संरक्षण के लिए ज्ञापन सौंपे। केंद्र ने इसे राज्य का विषय बताकर गुजरात गृह विभाग को संदर्भितकिया।
- नरेंद्र मोदी (गुजरात के मुख्यमंत्री काल, 2001–2014): 2004 की घटनाओं और 2013 के हमले के बादजैन समाज के शीर्ष संतों व ट्रस्टियों ने मुख्यमंत्री से मुलाकात कर 5वीं टोंक पर स्थायी पुलिस बल की तैनातीऔर 2005 के गुजरात उच्च न्यायालय के यथास्थिति आदेश को लागू करने की मांग की।
- डॉ. मनमोहन सिंह (यूपीए सरकार): प्राचीन संस्मारक अधिनियम (AMASR Act) के तहत पूरे पर्वत कोकेंद्रीय संरक्षित धरोहर घोषित करने की मांग की गई।
- नरेंद्र मोदी (प्रधानमंत्री काल): अक्टूबर 2020 में गिरनार रोपवे के लोकार्पण के साथ तीर्थयात्रियों की पहुंचसुलभ की गई। वर्तमान में जैन संगठनों द्वारा The Times of India की रिपोर्ट के अनुसार गुजरात हाईकोर्टमें पूजा के प्राथमिक अधिकार की याचिकाएं विचाराधीन हैं।
विवाद के मुख्य कारण व जिम्मेदार तत्व:
- कट्टरपंथी व असामाजिक तत्व: दोनों पक्षों के कुछ स्थानीय तत्व यथास्थिति का उल्लंघन कर अनधिकृतझंडे लगाने, ग्रिल लगाने या मूर्तियां स्थापित करने की कोशिश करते हैं।
- ऐतिहासिक प्रशासनिक अस्पष्टता: आजादी के समय राजस्व और वन अभिलेखों में शिखरों की सीमाओं औरविशिष्ट धार्मिक उपयोग अधिकारों का स्पष्ट सीमांकन न होना।
- सोशल मीडिया पर भ्रामक प्रचार: पुराने वीडियो और भ्रामक संदेशों के जरिए धार्मिक भावनाओं कोभड़काना।
2. गिरनार विवाद के सर्वोत्तम व व्यावहारिक समाधान (Best Possible Solutions)
चूंकि यह विवाद दो गहरी धार्मिक आस्थाओं से जुड़ा है, इसलिए इसका स्थायी समाधान केवल प्रशासनिक शक्तिसे नहीं, बल्कि एक संतुलित संवैधानिक और संस्थागत ढांचे से ही संभव है:
1. संयुक्त तीर्थ विकास एवं प्रबंधन बोर्ड (Statutory Joint Shrine Board)
- मॉडल: श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड या तिरुपति देवस्थानम की तर्ज पर गुजरात सरकार विधानसभाअधिनियम के जरिए 'श्री गिरनार तीर्थ विकास बोर्ड' का गठन करे।
- संरचना: इसमें राज्य सरकार के प्रशासनिक अधिकारी (कलेक्टर/डिविजनल कमिश्नर), जैन समुदाय(श्वेतांबर व दिगंबर) के प्रतिनिधि और नाथ संप्रदाय/हिंदू अखाड़ों के प्रतिनिधि समान रूप से शामिल हों।
- कार्य: पर्वत का रखरखाव, सुरक्षा, स्वच्छता और दर्शन की व्यवस्था यही बोर्ड देखे, जिससे किसी एक गुट काएकाधिकार समाप्त हो।
2. समय-सारिणी एवं पूजा प्रोटोकॉल का निर्धारण (Standard Operating Procedure - SOP)
- 5वीं टोंक पर दर्शन और पूजा के लिए दोनों संप्रदायों के पारंपरिक समय को स्पष्ट रूप से निर्धारित कियाजाए।
- उदाहरण के लिए, सुबह के विशेष घंटे जैन परंपरा (प्रक्षाल, पूजा, निर्वाण लाडू) के लिए और अन्य निर्धारितसमय हिंदू/दत्तात्रेय पूजा-आरती के लिए तय किए जाएं।
- किसी भी पक्ष द्वारा दूसरे पक्ष के पूजा प्रतीकों को ढकने या हटाने पर सख्त कानूनी प्रतिबंध हो।
3. पुरातत्व विभाग (ASI) का पूर्ण तकनीकी नियंत्रण
- 5वीं टोंक और प्राचीन शिलालेखों को राज्य या केंद्रीय पुरातत्व विभाग की सीधी देखरेख में "अछूता स्मारक" (Strict Protected Heritage Zone) घोषित किया जाए।
- 2005 के हाईकोर्ट आदेश के अनुरूप किसी भी नए निर्माण, शेड, ग्रिल या अतिरिक्त मूर्ति स्थापना पर पूर्णप्रतिबंध का डिजिटल व सीसीटीवी सर्विलांस से क्रियान्वयन हो।
4. डिजिटल टोकन एवं प्रवेश नियंत्रण प्रणाली (Regulated Entry System)
- हाईकोर्ट द्वारा पूर्व में सुझाए गए मॉडल के अनुसार, तलहटी से ही डिजिटल पास/बायोमेट्रिक एंट्री सिस्टमलागू किया जाए ताकि पर्वत पर जाने वाले हर व्यक्ति का रिकॉर्ड रहे और असामाजिक तत्वों द्वारा माहौलबिगाड़ने की आशंका खत्म हो सके।
5. दोनों समुदायों के शीर्ष संतों का संवाद मंच (Inter-Faith Saint Council)
- राजनीतिक हस्तक्षेप से दूर, जैन आचार्यों और नाथ संप्रदाय के प्रमुख महामंडलेश्वरों की एक स्थायी समन्वयसमिति बने, जो किसी भी स्थानीय घटना या विवाद पर सीधे संवाद कर शांति बनाए रखने की संयुक्त अपीलजारी करे।
जय जिनेन्द्र
आपका अपना
दानेन्द्र जैन

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