विवाद की समयरेखा
(Origin of the Dispute)
- प्रारंभिक जड़ें (1880–1890 के दशक): विवाद तब शुरू हुआ जब पालगंज के तत्कालीन राजा ने पहाड़की जमीन और वनों के अधिकारों को लेकर पट्टे जारी करने शुरू किए।
- 1918 का पट्टा एवं 1933 का प्रिवी काउंसिल निर्णय: 1918 में श्वेतांबर समुदाय (सेठ आनंदजीकल्याणजी पेढ़ी) ने पालगंज के राजा से पहाड़ के कुछ अधिकार खरीदे। 1933 में प्रिवी काउंसिल (लंदन) नेस्पष्ट किया कि यद्यपि राजा ज़मींदार थे, पहाड़ पर दोनों संप्रदायों (दिगंबर और श्वेतांबर) को अपनी-अपनीधार्मिक परंपराओं के अनुसार पूजा-वंदना का निर्बाध अधिकार है।
- 1950–1968 (ज़मींदारी उन्मूलन के बाद का कानूनी टकराव): 'बिहार भूमि सुधार अधिनियम 1950' लागू होने पर पूरा पहाड़ राज्य सरकार में निहित हो गया। 1965 में बिहार सरकार और श्वेतांबर ट्रस्ट के बीचप्रबंधन समझौता हुआ, जिसके विरुद्ध दिगंबर समाज ने 1967-68 में गिरिडीह सिविल कोर्ट में मुकदमादायर किया (Title Suit Nos. 10/1967 और 23/1968)।
प्रधानमंत्रियों एवं मुख्यमंत्रियों के समक्ष प्रतिनिधित्व जैन समाज के दोनों संप्रदायों और शीर्ष संतों ने समय-समयपर देश के शीर्ष नेतृत्व के समक्ष इस मुद्दे को उठाया है:
- इंदिरा गांधी एवं राजीव गांधी काल (1970–1980 के दशक): दिगंबर और श्वेतांबर संतों केप्रतिनिधिमंडलों ने पहाड़ पर निर्माण, टोंकों के मूल स्वरूप की सुरक्षा और शांति बनाए रखने के लिएतत्कालीन सरकारों को ज्ञापन दिए। बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्रियों (जैसे के. बी. सहाय, कर्पूरी ठाकुर) केसाथ कई दौर की वार्ताएं हुईं।
- डॉ. मनमोहन सिंह काल (2004–2014): 2004 में झारखंड उच्च न्यायालय के निर्णय के बाद दिगंबरऔर श्वेतांबर दोनों पक्षों के प्रमुख प्रतिनिधियों ने तीर्थ क्षेत्र के संयुक्त प्रबंधन और अल्पसंख्यक धार्मिकअधिकारों की रक्षा के लिए केंद्र सरकार से संपर्क किया।
- नरेंद्र मोदी काल (2022–2023): जब पारसनाथ वन्यजीव अभयारण्य और सम्मेद शिखरजी क्षेत्र कोइको-टूरिज्म (Eco-Tourism) के अंतर्गत अधिसूचित किया गया, तो देशभर में व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए।इसके बाद केंद्रीय पर्यावरण मंत्री और केंद्र सरकार ने सीधे हस्तक्षेप कर पर्यटन गतिविधियों पर रोक लगाईऔर तीर्थ की पवित्रता सुनिश्चित करने के आदेश जारी किए।
विगत सरकारों द्वारा किए गए कदम
- 1965 का बिहार सरकार का समझौता: बिहार सरकार ने एकमुश्त राशि लेकर श्वेतांबर ट्रस्ट के साथप्रबंधन समझौता किया, जिसे 2004 में झारखंड उच्च न्यायालय ने अवैध घोषित कर रद्द कर दिया।
- 2004 में संयुक्त समिति का प्रस्ताव: न्यायालय के निर्देशों के तहत झारखंड सरकार ने दोनों पक्षों (दिगंबर, श्वेतांबर) और प्रशासनिक अधिकारियों को मिलाकर एक साझा निगरानी ढांचा बनाने की पहल की।
- 2023 का केंद्रीय कार्यालय ज्ञापन (Office Memorandum): केंद्र सरकार ने राज्य सरकार को निर्देशदिए कि पर्वत क्षेत्र में मांस, मदिरा, नशीले पदार्थों की बिक्री, लाउडस्पीकर और गैर-धार्मिक गतिविधियों परपूर्ण प्रतिबंध लागू किया जाए तथा निगरानी समिति में जैन समाज के प्रतिनिधियों को शामिल किया जाए।
विवाद को जन्म देने और बढ़ाने वाले प्राथमिक कारण कानूनी और ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार किसी एकपक्ष को पूरी तरह 'दोषी' ठहराने के बजाय निम्नलिखित ऐतिहासिक परिस्थितियां विवाद का मुख्य कारण बनीं:
- औपनिवेशिक काल के जमींदारों का दोहरा रवैया: 19वीं सदी में पालगंज के राजाओं ने आर्थिक लाभ केलिए पहाड़ के विभिन्न हिस्सों के अधिकार कई पक्षों को बेचे और पट्टे दिए, जिससे मालिकाना हक कोलेकर भ्रम पैदा हुआ।
- एकाधिकार (Exclusive Ownership) बनाम समानता का संघर्ष: श्वेतांबर पक्ष द्वारा क्रय-दस्तावेजों केआधार पर एकाधिकार का दावा करना और दिगंबर पक्ष द्वारा इसे अनादि तीर्थ मानते हुए टोंकों के मूलस्वरूप में बदलाव व नियंत्रण का कड़ा विरोध करना विवाद की मुख्य जड़ रहा।
- 1965 में सरकारी प्रशासन की त्रुटि: बिहार सरकार द्वारा दिगंबर समाज को विश्वास में लिए बिनाएकपक्षीय समझौता करना, जिसने 1967 के बाद मुकदमों की नई और लंबी श्रृंखला को जन्म दिया।
सम्मेद शिखरजी विवाद के स्थायी और सौहार्दपूर्ण समाधान के लिए निम्नलिखित व्यावहारिक और नीतिगतसमाधान लागू किए जा सकते हैं:
1. श्री माता वैष्णो देवी / तिरुपति की तर्ज पर 'स्वायत्त तीर्थ श्राइन बोर्ड'
- झारखंड सरकार और केंद्र सरकार एक विशेष अधिनियम (Shri Sammed Shikharji Shrine Act) पारित कर एक स्वायत्त, गैर-लाभकारी श्राइन बोर्ड का गठन करे।
- इस बोर्ड में दिगंबर और श्वेतांबर दोनों संप्रदायों को 50-50 प्रतिशत (समान) प्रतिनिधित्व मिले, जिसकीअध्यक्षता किसी निष्पक्ष जैन न्यायविद या उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश द्वारा की जाए।
2. स्वामित्व (Ownership) की जगह 'संरक्षण और सेवा' (Trusteeship) का सिद्धांत
- पर्वत को किसी एक संस्था या ट्रस्ट की निजी मिल्कियत मानने के बजाय इसे 'समग्र जैन समाज की साझीपावन धरोहर' घोषित किया जाए।
- प्रशासनिक नियंत्रण किसी एक पक्ष के पास होने के बजाय साझा प्रबंधन (Joint Management) केअधीन रहे।
3. यथास्थिति और पूजा-पद्धति की पूर्ण स्वतंत्रता (Protection of Ritual Practices)
- सभी 24 टोंकों और चरण-छत्रियों के मूल और ऐतिहासिक स्वरूप में किसी भी प्रकार के एकतरफा बदलावपर पूर्ण कानूनी रोक लगे।
- दिगंबर और श्वेतांबर दोनों परंपराओं के श्रद्धालुओं को अपनी-अपनी स्थापित धार्मिक मान्यताओं के अनुसारस्वतंत्र और निर्बाध पूजा-वंदना का अधिकार सुनिश्चित हो।
4. सर्वोच्च न्यायालय के तत्वावधान में मध्यस्थता (Court-Monitored Mediation)
- वर्तमान में लंबित अपीलों के निपटारे के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा मध्यस्थता पैनल गठित किया जाए, जिसमेंदोनों परंपराओं के शीर्ष आचार्य/मुनि भगवंतों द्वारा नामित प्रतिनिधि शामिल हों।
- आपसी सहमति से तैयार समाधान को न्यायालय की अंतिम डिक्री (Consent Decree) बनाकर सभीलंबित दीवानी मुकदमों को सदा के लिए समाप्त कर दिया जाए।
5. पर्यावरण और धार्मिक पवित्रता की संयुक्त निगरानी
- पर्वत क्षेत्र में मांस, मदिरा, नशीले पदार्थों की बिक्री, वाणिज्यिक मनोरंजन और गैर-धार्मिक गतिविधियों परकड़े कानूनी प्रतिबंध लागू रहें।
- यात्रा मार्ग पर पर्यावरण-अनुकूल व्यवस्थाओं (कचरा प्रबंधन, सौर ऊर्जा, आपातकालीन चिकित्सा, डोलीविनियमन) का संचालन संयुक्त रूप से किया जाए।
जय जिनेन्द्र
आपका अपना
दानेन्द्र जैन

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