भारतवर्षीय दिगंबर जैन तीर्थ क्षेत्र कमेटी द्वारा आयोजित आचार्य श्री १०८ शांतिसागर जी महाराज शताब्दी वर्ष (शताब्दी महोत्सव) के प्रमुख कार्यक्रमों और आयोजन स्थलों का संपूर्ण विवरण:
१. प्रमुख आयोजन केंद्र एवं पावन स्थल
यह शताब्दी महोत्सव देश के उन सभी प्रमुख सिद्ध क्षेत्रों, अतिशय क्षेत्रों और दीक्षा-स्थलों पर आयोजित किया जा रहा है, जिनका संबंध आचार्य श्री के जीवन और तपोभूमि से रहा है:
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राज्य / क्षेत्र |
प्रमुख केंद्र / तीर्थ |
ऐतिहासिक8u महत्व एवं संबंध |
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झारखंड |
श्री सम्मेद शिखरजी (मधुबन) एवं गिरिडीह |
ऐतिहासिक वंदना, आचार्य पद की घोषणा तथा पद प्राप्ति के बाद प्रथम चातुर्मास (१९२६) का केंद्र। |
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महाराष्ट्र |
कुंथलगिरी सिद्ध क्षेत्र (धाराशिव / उस्मानाबाद) |
आचार्य श्री के ऐतिहासिक सल्लेखना / समाधि मरण (१९५५) की पावन भूमि। |
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कर्नाटक |
भोज / शेडबाल / बेलगाम (बेलगावी) |
आचार्य श्री की जन्मभूमि, गृहस्थ जीवन एवं दीक्षा भूमि। |
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महाराष्ट्र |
गजपंथा / नासिक क्षेत्र |
वह ऐतिहासिक स्थल जहाँ आचार्य श्री को 'चारित्र चक्रवर्ती' पद से विभूषित किया गया था (१९५१)। |
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राजस्थान एवं गुजरात |
ब्यावर, सागवाड़ा, छाणी एवं ईडर |
ऐतिहासिक संयुक्त चातुर्मास, मुनि दीक्षा स्थली तथा कुरीति निवारण आंदोलनों के केंद्र। |
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दिल्ली-एनसीआर / उप्र |
नई दिल्ली एवं हस्तिनापुर |
तीर्थ क्षेत्र कमेटी का प्रशासनिक केंद्र, राष्ट्रीय संगोष्ठियों एवं ग्रंथ प्रकाशन का मुख्य केंद्र। |
२. प्रमुख कार्यक्रमों का विस्तृत विवरण
क. राष्ट्रीय विद्वत संगोष्ठी एवं शोध कार्य
- राष्ट्रीय विचार गोष्ठियाँ: प्रमुख शहरों में २०वीं सदी में दिगंबर मुनि परंपरा के पुनरुद्धार, अहिंसा और अनेकांत दर्शन पर विद्वानों के शोध-सत्र।
- शांतिसागर स्मृति ग्रंथावली का विमोचन: आचार्य श्री के जीवन पर आधारित प्रामाणिक 'चरित्र कोश', ऐतिहासिक दुर्लभ दस्तावेजों और उनके द्वारा संरक्षित ग्रंथों का पुनर्प्रकाशन।
- विद्वत सम्मान समारोह: जैन धर्म, पुरातत्व और पांडुलिपि संरक्षण में योगदान देने वाले वरिष्ठ विद्वानों और शोधकर्ताओं का राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान।
ख. धार्मिक एवं सांस्कृतिक अनुष्ठान
- शांतिसागर महामंडल विधान: देश भर के सैकड़ों जिनालयों में सामूहिक शांतिसागर विधान एवं विशेष पूजन का आयोजन।
- शताब्दी शोभायात्रा व पदयात्रा: आचार्य श्री के प्रमुख विहार मार्गों को रेखांकित करती हुई भव्य रथयात्राएं, जिसमें उनके जीवन प्रसंगों पर आधारित झांकियां प्रदर्शित की जाएंगी।
- पंचकल्याणक एवं गजरथ महोत्सव: शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में चयनित तीर्थ क्षेत्रों पर भव्य प्रतिष्ठा महोत्सव।
ग. तीर्थ संरक्षण एवं विकास अभियान
- 'स्वच्छ तीर्थ – पवित्र तीर्थ' अभियान: तीर्थ क्षेत्र कमेटी के अधीन आने वाले सभी सिद्ध एवं अतिशय क्षेत्रों में विशेष स्वच्छता, पर्यावरण सुरक्षा और पौधारोपण अभियान।
- ऐतिहासिक स्मारकों व छतरियों का जीर्णोद्धार: सम्मेद शिखरजी, कुंथलगिरी और राजस्थान स्थित आचार्य श्री की चरण-पादुकाओं, निषिद्धिकाओं (छतरियों) और समाधि स्थलों का संरक्षण व नवीनीकरण।
- यात्री सुविधाओं का विस्तार: तीर्थयात्रियों के लिए धर्मशालाओं, त्यागी भवनों और रियायती भोजनालयों का आधुनिकीकरण।
घ. ऐतिहासिक एवं डिजिटल प्रदर्शनी
- दुर्लभ चित्र व दस्तावेज प्रदर्शनी: ब्रिटिश काल के अदालती रिकॉर्ड, पारसनाथ हिल से जुड़े ऐतिहासिक दस्तावेज और आचार्य श्री की दुर्लभ पदयात्राओं के चित्रों की सचल (Mobile) प्रदर्शनी।
- सांस्कृतिक नाटक व वृत्तचित्र: आचार्य श्री के वैराग्य से लेकर समाधि मरण तक की गाथा को दर्शाती लघु-फिल्में और नाट्य मंचन।
ङ. समाज सुधार एवं जन-कल्याणकारी कार्य
- व्यसन मुक्ति अभियान: युवाओं और ग्रामीण क्षेत्रों में मद्यपान, मांसाहार, धूम्रपान और जुआ त्याग के लिए राष्ट्रव्यापी संकल्प अभियान।
- अहिंसा एवं शाकाहार प्रचार: शिक्षण संस्थानों में जीवदया, शाकाहार और पर्यावरण संरक्षण पर जागरूकता शिविर।
- पाठशाला एवं स्वाध्याय प्रोत्साहन: ग्रामीण जैन पाठशालाओं का सुदृढ़ीकरण और धार्मिक शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्रों को छात्रवृत्ति वितरण।
आचार्य श्री १०८ शांतिसागर जी महाराज शताब्दी महोत्सव के आधिकारिक मोनोग्राम (Logo/Emblem) के प्रमुखघटक और दृश्य संकल्पना (Visual Design Concept):
आधिकारिक शताब्दी मोनोग्राम के प्रमुख तत्व (Design Elements)
- केंद्रीय आकृति (Central Motif):
- '१००' का अंक: शताब्दी वर्ष को दर्शाने के लिए सुनहरे (Golden) या केसरिया रंग में १०० का अंक, जिसमें मध्य वृत्त में ध्यान मुद्रा में लीन आचार्य श्री का सौम्य रेखाचित्र (Silhouette) या प्रशम मुद्राअंकित होती है।
- मयूर पिच्छी एवं कमंडल: दिगंबर मुनिचर्या के अनिवार्य उपकरण—मयूर पिच्छी (संयम व अहिंसा काप्रतीक) और कमंडल (पवित्रता का प्रतीक) को कलात्मक रूप से संयोजित किया जाता है।
- शुभ प्रतीक एवं आधार (Sacred Emblems):
- अहिंसा हस्त एवं धर्मचक्र: हाथ की अभय मुद्रा, जिसके मध्य में २४ तीलियों वाला धर्मचक्र और'अहिंसा' शब्द अंकित होता है।
- चरण पादुकाएं: आचार्य श्री के चरण-चिह्न, जो उनके अखंड भारत में हजारों किलोमीटर के पाद-विहार(पदयात्रा) का स्मरण कराते हैं।
- आस-पास का प्रारूप (Outer Ring / Banner):
- शिखरजी व कुंथलगिरी की रूपरेखा: पृष्ठभूमि में श्री सम्मेद शिखरजी के पर्वत शिखरों अथवाकुंथलगिरी समाधि स्थल की सूक्ष्म रेखाएं।
- संस्था का नाम: बाहरी वृत्ताकार पट्टी पर 'भारतवर्षीय दिगंबर जैन तीर्थ क्षेत्र कमेटी' अंकित रहता है।
मोनोग्राम पर अंकित प्रमुख ध्येय-वाक्य (Motto / Slogans)
मोनोग्राम के ऊपरी अथवा निचले भाग में निम्नलिखित में से एक मानक वाक्य अंकित होता है:
"चारित्र चक्रवर्ती / प्रशममूर्ति आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज शताब्दी वर्ष (१९२६–२०२६ / जन्म-दीक्षा शताब्दी)" "परस्परोपग्रहो जीवानाम्" अथवा "अहिंसा परमो धर्मः"
रंग योजना (Color Palette)
- केसरिया/स्वर्ण (Saffron/Gold): तप, त्याग, वैराग्य और शताब्दी के गौरव का प्रतीक।
- श्वेत (White): शांति, पवित्रता और प्रशम भाव का प्रतीक।
- गहरा मैरून/लाल (Maroon/Red): धार्मिक प्रतिष्ठा और संस्थागत गंभीरता का परिचायक।
Centenary Celebrations (Shatabdi Mahotsav) of Acharya Shri 108 Shantisagar Ji Maharaj organized under the aegis of the Bharatvarshiya Digambar Jain Tirth Kshetra Committee (BDJTKC):
I. Major Centers & Locations Across India
The celebrations are hosted across significant sacred sites (Tirth Kshetras), monastic initiation grounds, and major cultural hubs:
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Region / State |
Key Center / Venue |
Significance in Acharya's Journey |
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Jharkhand |
Shri Sammed Shikharji (Madhuban) & Giridih |
Ground of his historic Vandana, conferment of leadership, and the landmark 1926 post-Acharya-pada Chaturmas. |
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Maharashtra |
Kunthalgiri Siddha Kshetra (Dharashiv/Osmanabad) |
Sacred site of his historic 1955 Sallekhana / Samadhi Maran. |
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Karnataka |
Bhoj / Shedbal / Belgaum (Belagavi) |
Birthplace, early ascetic life, and initiation region. |
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Maharashtra |
Gajpantha / Nasik Kshetra |
Venue of the historic Panch Kalyanaka where he was conferred the title Charitra Chakravarti (1951). |
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Rajasthan & Gujarat |
Beawar, Sagwara, Chhani & Idar |
Centers of historic joint Chaturmas, social reform movements, and Muni Diksha milestones. |
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Delhi-NCR / UP |
New Delhi & Hastinapur |
Headquarters and administrative hub for national conferences, scholar conventions, and central publications. |
II. Key Programs & Event Categories
1. National Conventions & Scholarly Symposiums (Vidwat Sammelans)
- National Academic Seminars: Multi-city panels focusing on the revival of 20th-century Digambara monasticism, Anekantavada, and non-violence (Ahimsa) in the modern era.
- Release of Shantisagar Smriti Granthavali: Critical reprints, authentic biographies (Charitra Kosh), and translated editions of ancient texts preserved through his lineage.
- National Felicitations: Honoring eminent Jain scholars, researchers, and community leaders contributing to scriptural preservation and archeological research.
2. Grand Ritual & Devotional Celebrations (Pujan & Vidhan)
- Shantisagar Mahamandal Vidhan: Mass recitations and community worship assemblies across hundreds of local temples.
- Centenary Padyatra / Shobha Yatras: Commemorative processions retracing key monastic routes with traditional religious banners, chariots, and tableaux depicting his ascetic life.
- Grand Panchakalyanaka & Gajaratha Mahotsavas: Consecration rituals at designated pilgrimage spots to mark the centenary year.
3. Tirth Preservation & Heritage Infrastructure
- Renovation of Heritage Monuments (Nishidhiyas & Chhatris): Restoration of historic meditation platforms, Charan Padukas (footprint shrines), and commemorative memorials across Shikharji, Kunthalgiri, and Rajasthan.
- Swachh Tirth – Pavitra Tirth Campaigns: Intensive cleanliness, afforestation, and ecological protection drives surrounding major Siddha and Atishaya Kshetras under the committee’s management.
- Enhanced Pilgrim Amenities: Upgrades to accommodation (Dharamshalas), research libraries, and subsidized vegetarian food halls (Bhojanshalas) at remote pilgrimage sites.
4. Archival & Cultural Exhibitions
- Mobile & Digital Photo Archives: Traveling exhibitions displaying rare historical photographs, colonial-era archival documents, legal records, and letters related to the protection of Parasnath Hill and other pilgrimage sites.
- Stage & Cultural Enactments: Musical dance dramas (Nritya Natikas) and documentaries produced by youth wings depicting his life from renunciation to Samadhi Maran.
5. Social Reform & Public Welfare Drives
- Vyasan Mukti (De-addiction) Campaigns: Public pledges and awareness camps against alcohol, smoking, and gambling.
- Promotion of Ahimsa & Vegetarianism/Veganism: Broad outreach programs in schools and youth forums against animal cruelty.
- Educational & Pathshala Support: Modernizing rural Jain religious schools (Pathshalas) and providing scholarships to student scholars.
🕊️ ॥ ॐ श्री पार्श्वनाथाय नमः ॥ 🕊️
॥ जय जिनेन्द्र ॥
🚩 भारतवर्षीय दिगंबर जैन तीर्थ क्षेत्र कमेटी: इतिहास, स्थापना एवं स्वर्णिम योगदान 🚩
🏛️ तीर्थ क्षेत्र कमेटी की स्थापना क्यों हुई?
१९वीं सदी के अंत और २०वीं सदी के प्रारंभ में ब्रिटिश शासनकाल के दौरान जैन समाज के शाश्वत एवं प्राचीनसिद्ध क्षेत्रों (जैसे श्री सम्मेद शिखरजी, गिरनार जी, पावागढ़) पर कई कानूनी संकट, अतिक्रमण और भू-स्वामियों(ज़मींदारों) के विवाद खड़े हो रहे थे।
इन परिस्थितियों में पूरे भारत के दिगंबर जैन तीर्थों की कानूनी सुरक्षा, संरक्षण, जीर्णोद्धार और शुद्ध वातावरणबनाए रखने हेतु एक केंद्रीय अखिल भारतीय संस्था की आवश्यकता महसूस हुई, जिसके फलस्वरूप 'भारतवर्षीय दिगंबर जैन तीर्थ क्षेत्र कमेटी' की स्थापना हुई।
🌟 संस्था के प्रमुख सूत्रधार एवं महापुरुष:
- दानवीर सेठ माणिकचंद हीराचंद जी (मुंबई): जिन्होंने संस्था की नींव रखी और तीर्थ रक्षा के लिए वित्तीय वप्रशासनिक संबल दिया।
- सर सेठ हुकमचंद जी (इंदौर): प्रख्यात उद्योगपति व दानवीर, जिन्होंने प्रिवी काउंसिल (लंदन) तक मुकदमोंऔर तीर्थ विकास में अपना सर्वस्व सहयोग दिया।
- बैरिस्टर चंपतराय जी जैन: अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विधिवेत्ता एवं विद्वान, जिन्होंने अदालतों में जैन धर्म औरतीर्थों के पक्ष को अकाट्य तर्कों से स्थापित किया।
- रायबहादुर धनपत सिंह जी एवं बाबू छोटेलाल जी: जिन्होंने पूर्वी और उत्तरी भारत के तीर्थ प्रबंधन मेंऐतिहासिक योगदान दिया।
⚖️ प्रमुख ऐतिहासिक एवं कानूनी उपलब्धियां:
- श्री सम्मेद शिखरजी (पारसनाथ हिल) की रक्षा: अंग्रेजों के समय पारसनाथ पर्वत की पवित्रता औरअविभाज्य स्वरूप को अक्षुण्ण रखने के लिए लंदन की प्रिवी काउंसिल तक ऐतिहासिक कानूनी विजय प्राप्तकी।
- तीर्थों का राष्ट्रीय दस्तावेजीकरण: देश के कोने-कोने में उपेक्षित पड़े सैकड़ों प्राचीन अतिशय और सिद्ध क्षेत्रोंका सीमांकन व कानूनी संरक्षण किया।
- पवित्रता की रक्षा: तीर्थ क्षेत्रों के आसपास मांसाहार, मद्यपान और अवांछित गतिविधियों पर रोक लगाने हेतुनिरंतर प्रशासनिक संघर्ष।
🏨 कमेटी के प्रमुख वर्तमान कार्य:
- यात्री सुविधाएं: श्री सम्मेद शिखरजी (मधुबन), हस्तिनापुर, चंपापुर, कुंथलगिरी सहित प्रमुख तीर्थों परविशाल धर्मशालाओं, त्यागी भवनों और भोजनालयों का सुचारू संचालन।
- प्राचीन मंदिरों का जीर्णोद्धार: जीर्ण-शीर्ण दिगंबर जिनालयों और चरण-पादुकाओं की सुरक्षा एवंनवीनीकरण।
- धार्मिक साहित्य व शोध: तीर्थ दिग्दर्शिका, ऐतिहासिक पत्रिकाओं और शोध ग्रंथों का नियमित प्रकाशन।
- शताब्दी व ऐतिहासिक महोत्सव: आचार्य श्री १०८ शांतिसागर जी महाराज जैसे युगप्रवर्तक संतों के शताब्दीवर्ष एवं तीर्थ कल्याणक महोत्सवों का राष्ट्रीय स्तर पर संयोजन।
📌 आइए, अपने गौरवशाली इतिहास को जानें और तीर्थ रक्षा में संगठित सहयोग दें।
🙏 यह महत्वपूर्ण जानकारी सभी जैन बंधुओं, परिवारों और ग्रुप्स में अवश्य साझा (Forward) करें। 🙏

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