विक्रम संवत् १९८७ (सन् १९३०) में राजस्थान के ब्यावर (अजमेर) नगर में २०वीं सदी के दो महान दिगंबर जैनाचार्यों—चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री १०८ शांतिसागर जी महाराज (दक्षिण) और प्रशममूर्ति आचार्य श्री १०८ शांतिसागर जी महाराज (छाणी/उत्तर) का ऐतिहासिक संयुक्त चातुर्मास संपन्न हुआ था।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
- भौगोलिक मिलन: उस कालखंड में दक्षिण भारत से उत्तर भारत की ओर पद विहार कर रहे 'दक्षिण परंपरा' केआचार्य श्री और राजस्थान-गुजरात क्षेत्र में प्रभावना कर रहे 'छाणी परंपरा' के आचार्य श्री का ब्यावर मेंआगमन हुआ।
- समान नाम और सम्मान: दोनों ही संतों का नाम 'शांतिसागर' था और दोनों ही दिगंबर मुनि परंपरा के सर्वोच्च शिखर पुरुष थे। समाज में किसी भी प्रकार के संशय या भेदभाव को समाप्त करने के लिए दोनों संघों ने एक ही नगर में वर्षावास (चातुर्मास) करने का निर्णय लिया।
चातुर्मास के प्रमुख आकर्षण एवं घटनाक्रम
- अभूतपूर्व वात्सल्य और सामंजस्य: दोनों आचार्यों के बीच गुरु-तुल्य आदर और साधु-सुलभ वात्सल्य का अनूठा दृश्य देखने को मिला। शास्त्र-चर्चा, सामयिक और प्रतिक्रमण में दोनों संघों की पारस्परिक एकात्मताने पूरे समाज को प्रेरित किया।
- विशाल धर्म प्रभावना: इस संयुक्त चातुर्मास के दौरान पूरे भारतवर्ष (महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान) से लाखों श्रावक-श्राविकाएं, विद्वान और श्रेष्ठी वर्ग ब्यावर पहुंचे।
- शास्त्र स्वाध्याय और तत्वचर्चा: प्रतिदिन प्रात:काल और सायंकाल दोनों आचार्यों के सान्निध्य में तत्त्वार्थ सूत्र, षट्खण्डागम और समयसार जैसे ग्रंथों पर गंभीर प्रवचन और विद्वत-गोष्ठियां आयोजित होती थीं।
- सामाजिक एकता और कुरीति निवारण: दोनों संघों के संयुक्त प्रभाव से समाज में फैली कुरीतियों (जैसे मृत्युभोज, फिजूलखर्ची और आपसी मतभेद) को समाप्त करने के लिए ठोस नियम और प्रस्ताव पारित किएगए।
जैन इतिहास में महत्व
- सांप्रदायिक व क्षेत्रीय सद्भाव: इस घटना ने उत्तर और दक्षिण की जैन परंपराओं के बीच एक मजबूत सेतु कानिर्माण किया।
- मुनि परंपरा का सुदृढ़ीकरण: ब्रिटिश शासनकाल में दिगंबर मुनिचर्या, निर्ग्रंथ दिगंबर पदयात्रा और धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा के लिए यह चातुर्मास एक मील का पत्थर साबित हुआ।
जैन दर्शन में सल्लेखना (संथारा) और समाधि मरण को जीवन की अंतिम साधना माना गया है। यह आत्महत्यानहीं, बल्कि मृत्यु को भय और राग-द्वेष के बिना शांत भाव से स्वीकार करने की एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है।
'सल्लेखना' का अर्थ है—सत् + लेखना अर्थात सम्यक रूप से काय (शरीर) और कषायों (क्रोध, मान, माया, लोभ) को कृश (कमजोर/शांत) करना।
सल्लेखना धारण करने की अनिवार्य स्थितियाँ जैन शास्त्रों (जैसे आचार्य समंतभद्र कृत रत्नकरण्ड श्रावकाचार) के अनुसार सल्लेखना केवल विशेष परिस्थितियों में ही ली जा सकती है:
- उपसर्गे (अपरिहार्य संकट या आपदा आने पर)
- दुर्भिक्षे (अकाल या धर्म साधन की प्रतिकूलता होने पर)
- जरसि (अत्यधिक वृद्धावस्था, जब शरीर साधना में असमर्थ हो जाए)
- रुजायां (असाध्य रोग, जिसका कोई उपचार संभव न हो)
सल्लेखना की चरणबद्ध विधि एवं नियम
- मानसिक एवं सामाजिक शुद्धि:
- क्षमापना: सभी जीवों और परिजनों से क्षमा मांगना तथा सबको अंतर्मन से क्षमा करना ("खामेमि सव्वजीवे...")।
- राग-द्वेष और परिग्रह का त्याग: संपत्ति, परिवार, पद और शरीर के प्रति आसक्ति का पूर्ण त्याग करना।
- शोक और भय का निवारण: मृत्यु के भय, दुख या पश्चाताप को त्यागकर चित्त को शांत रखना।
- आहार का क्रमिक त्याग (काय-कृशता):
- पहले ठोस आहार (अन्न) का त्याग कर तरल पदार्थ (दूध, छाछ, फलों का रस आदि) लेना।
- इसके बाद तरल पदार्थों को छोड़कर केवल गर्म जल (उष्णोदक) ग्रहण करना।
- अंत में जल का भी त्याग कर पूर्ण निराहार (अणसण) व्रत अंगीकार करना।
- आत्म-चिंतन एवं स्वाध्याय (कषाय-कृशता):
- नवकार महामंत्र, भक्तामर स्तोत्र, समाधि भावना और तत्त्वार्थ सूत्र जैसे आध्यात्मिक पाठों का श्रवणऔर मनन करना।
- साधु या गुरु के सान्निध्य में आत्म-निरीक्षण और पश्चाताप (आलोचना/प्रायश्चित्त) करना।
सल्लेखना के ५ प्रमुख अतीचार (दोष/निषिद्ध भाव) सल्लेखना के दौरान निम्नलिखित ५ प्रकार के विचारों को दोषमाना गया है और इनसे बचना अनिवार्य है:
- जीवित शंसा: जीने की इच्छा रखना।
- मरण शंसा: जल्दी मृत्यु की कामना करना (कष्ट से घबराकर)।
- मित्रानुराग: मित्रों, परिजनों या पूर्व संबंधों को याद कर व्याकुल होना।
- सुखानुबंध: पिछले सांसारिक सुखों और भोगों का स्मरण करना।
- निदान: आगामी जन्म में स्वर्ग, वैभव या अच्छे पद की आकांक्षा रखना।
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१९२६ में गिरिडीह में प्रशममूर्ति आचार्य श्री शांतिसागर जी (छाणी) का ऐतिहासिक चातुर्मास
विक्रम संवत् १९८३ (सन् १९२६) में श्री सम्मेद शिखरजी की वंदना के उपरांत गिरिडीह में आचार्य श्री शांतिसागर जी(छाणी) का आचार्य पद प्राप्ति के बाद का प्रथम ऐतिहासिक वर्षावास (चातुर्मास) संपन्न हुआ था। इस चातुर्मासको सफल और प्रभावकारी बनाने में गिरिडीह के प्रमुख जैन श्रावकों, श्रेष्ठी वर्ग और विद्वानों का विशेष योगदान रहा:
प्रमुख आयोजक एवं श्रेष्ठी परिवार
- बाबू किशोरीलाल जी एवं रामचंद्र जी (मेसर्स सेठ हजारीलाल किशोरीलाल):
- गिरिडीह के प्रतिष्ठितव्यापारिक परिवार, जिन्होंने मुनिसंघ के प्रवास, दैनिक चर्या, शास्त्र-सभाओं और बाहर से आने वालेश्रद्धालुओं के ठहरने की संपूर्ण व्यवस्था का मुख्य दायित्व निभाया।
- श्री दिगंबर जैन बीसपंथी कोठी (मधुबन/गिरिडीह प्रबंधन): गिरिडीह रेलवे स्टेशन से शिखरजी आने-जानेवाले यात्रियों और चातुर्मास स्थल के समन्वय व प्रबंध में अग्रणी भूमिका निभाई।
- गिरिडीह दिगंबर जैन समाज: स्थानीय समाज के गणमान्य श्रावकों ने आचार्य संघ से गिरिडीह में वर्षाकाल व्यतीत करने का विनम्र निवेदन कर इस चातुर्मास की स्वीकृति प्राप्त की थी।
शास्त्र स्वाध्याय एवं विद्वत मंडल गिरिडीह चातुर्मास केवल तप-साधना ही नहीं, बल्कि गंभीर तत्व-चर्चा एवं सिद्धांत ग्रंथों के स्वाध्याय का प्रमुख केंद्र बना। इसमें भाग लेने वाले प्रमुख विद्वान:
- पंडित बुधचंद जी (नियमित शास्त्र स्वाध्याय एवं वाचना के सहयोगी)
- पंडित शिवजी राम जी
- पंडित जयदेव जी
- पंडित झम्मनलाल जी
- श्री भगत जी एवं बिहार-गया क्षेत्र से आए अन्य प्रमुख तत्ववेत्ता।
चातुर्मास की प्रमुख उपलब्धियां
- गोम्मटसार, सर्वार्थसिद्धि और राजवार्तिक जैसे उच्च कोटि के ग्रंथों पर प्रतिदिन गहन प्रवचन एवं कक्षाएंआयोजित हुईं।
- समाज में व्याप्त कुरीतियों के त्याग, व्यसन मुक्ति और अहिंसा के प्रचार-प्रसार के कई नियम पारित किएगए।
- उत्तर-पूर्वी भारत में दिगंबर मुनिचर्या के प्रति जनजागरण और श्रद्धा की एक नई लहर उत्पन्न हुई।
श्री दिगंबर जैन तीर्थ निर्देशिका (Sri Digamber Jain Tirth Nirdeshika) भारतभर के दिगंबर जैन तीर्थक्षेत्रों की विस्तृत जानकारी प्रदान करने वाली एक अत्यंत लोकप्रिय गाइडबुक है। हसमुख जैन गांधी द्वारा संपादितइस पुस्तक का मुख्य उद्देश्य जैन समाज, विशेषकर युवा पीढ़ी को अपने गौरवशाली इतिहास और पवित्रतीर्थस्थलों से जोड़ना है।
निर्देशिका की मुख्य विशेषताएं
यह पुस्तक जैन यात्रियों और दर्शनार्थियों के लिए एक संपूर्ण यात्रा गाइड के रूप में कार्य करती है, जिसमेंनिम्नलिखित जानकारियां शामिल होती हैं:
- तीर्थों का विवरण: इसमें भारत के लगभग 238 से अधिक प्रमुख दिगंबर जैन सिद्ध क्षेत्र और अतिशय क्षेत्रशामिल हैं।
- संपर्क सूत्र: सभी प्रमुख जैन मंदिरों और प्रबंधकीय कमेटियों के फोन नंबर एवं सटीक पते।
- आवास और सुविधाएं: तीर्थ क्षेत्रों पर उपलब्ध धर्मशालाओं, भोजनालयों और अन्य सुविधाओं की जानकारी।
- पहुंचने के साधन: निकटतम रेलवे स्टेशन, हवाई अड्डे, बस मार्गों और प्रमुख शहरों से दूरी।
- ऐतिहासिक महत्व: प्रत्येक तीर्थ का धार्मिक इतिहास, वहां से मोक्ष गए तीर्थंकरों/मुनियों का विवरण औरनक्शे।
भारत के कुछ प्रमुख दिगंबर जैन तीर्थ क्षेत्र
निर्देशिका में मुख्य रूप से इन पवित्र स्थलों का विस्तृत वर्णन मिलता है:
- श्री सम्मेद शिखरजी (झारखंड): जैन धर्म का सबसे बड़ा और पवित्र सिद्ध क्षेत्र, जहां से 24 में से 20 तीर्थंकरोंने मोक्ष प्राप्त किया।
- श्रवणबेलगोला (कर्नाटक): भगवान बाहुबली की 57 फीट ऊंची विशाल एकाश्म (एक ही पत्थर से बनी) प्रतिमा के लिए प्रसिद्ध।
- बावनगजा (मध्य प्रदेश): भगवान आदिनाथ की 84 फीट ऊंची ऐतिहासिक प्रतिमा और प्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र।
- पावापुरी (बिहार): भगवान महावीर स्वामी का निर्वाण (मोक्ष) स्थल।
- गिरनार जी (गुजरात): भगवान नेमिनाथ की मोक्ष स्थली।
ऑनलाइन उपलब्धता और डाउनलोड
- आधिकारिक वेबसाइट: आप इसकी आधिकारिक वेबसाइट TirthNirdeshika.com पर जाकर इसपुस्तक के विभिन्न संस्करणों और तीर्थों की ऑनलाइन जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
- ई-बुक / PDF: कुछ अन्य जैन आध्यात्मिक मंचों जैसे Vitragvani पर भी दिगंबर जैन तीर्थ दर्शन सेसंबंधित डिजिटल सामग्रियां उपलब्ध हैं।
- हार्डकॉपी: यह पुस्तक प्रिंटेड रूप में Amazon India जैसी ई-कॉमर्स साइटों पर भी ऑर्डर के लिए उपलब्धहै。

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