राजा राणा छत्रपति, हाथिन के असवार।
मरना सबको एक दिन, अपनी-अपनी बार॥
दल बल देवी देवता, मात-पिता परिवार।
मरती बिरियाँ जीव को, कोऊ न राखन हार॥
दाम बिना निर्धन दुखी, तृष्णा वशधनवान।
कहूँ न सुख संसार में, सब जग देख्यो छान॥
आप अकेला अवतरे, मरैअकेला होय।
यो कबहूँ इस जीव को, साथी सगा न कोय॥
जहाँ देह अपनी नहीं,तहाँ न अपना कोय।
घर सम्पत्ति पर प्रगट ये, पर हैं परिजन लोय॥
दिपै चाम-चादरमढ़ी, हाड़ पींजरा देह।
भीतर या सम जगत में, और नहीं घिन गेह॥
मोह नींदके जोर, जगवासी घूमें सदा।
कर्म चोर चहुँ ओर, सरवस लूटैं सुध नहीं॥
सत्गुरु देय जगाय, मोह नींद जब उपशमैं।
तब कछु बनहिं उपाय, कर्म चोर आवत रुकैं॥
ज्ञान-दीप तप-तेल भर, घर शोधै भ्रम छोर।
या विधि बिन निकसैं नहीं, पैठे पूरबचोर॥
पंच महाव्रत संचरण, समिति पंच परकार।
प्रबल पंच इन्द्रिय विजय, धारनिर्जरा सार॥
चौदह राजु उतंग नभ, लोक पुरुष संठान।
तामें जीव अनादितैं,भरमत हैं बिन ज्ञान॥
धन कन कंचन राजसुख,सबहि सुलभकर जान।
दुर्लभ है संसार में, एक जथारथ ज्ञान॥
जाँचे सुर-तरु देय सुख, चिन्तत चिन्ता रैन।
बिन जाँचे बिन चिन्तये, धर्म सकल सुख दैन॥
यहाँ हर दोहा और उसके बाद हिंदी अर्थ अलग-अलग करके दिया है:
दोहा 1: राजा राणा छत्रपति, हाथिन के असवार। मरना सबको एक दिन, अपनी-अपनी बार॥
अर्थ: चाहे कोई राजा हो, छत्रपति हो, हाथी पर सवार होने वाला बड़ा आदमी हो — मौत सबको एक दिन आनी हीहै, बस अपनी-अपनी बारी पर।
दोहा 2: दल बल देवी देवता, मात-पिता परिवार। मरती बिरियाँ जीव को, कोऊ न राखन हार॥
अर्थ: सेना-ताकत, देवी-देवता, माँ-बाप, पूरा परिवार — मरते वक्त इनमें से कोई भी जीव को बचा नहीं पाता।
दोहा 3: दाम बिना निर्धन दुखी, तृष्णा वशधनवान। कहूँ न सुख संसार में, सब जग देख्यो छान॥
अर्थ: पैसे के बिना गरीब आदमी दुखी रहता है, और अमीर आदमी और पाने की लालच में जलता रहता है। कविकहता है — मैंने पूरी दुनिया छानकर देख ली, कहीं सच्चा सुख नहीं मिला।
दोहा 4: आप अकेला अवतरे, मरैअकेला होय। यो कबहूँ इस जीव को, साथी सगा न कोय॥
अर्थ: इंसान अकेला जन्म लेता है और अकेला ही मरता है। इस जीव का इस दुनिया में सच में कोई साथी-सगानहीं होता।
दोहा 5: जहाँ देह अपनी नहीं,तहाँ न अपना कोय। घर सम्पत्ति पर प्रगट ये, पर हैं परिजन लोय॥
अर्थ: जहाँ खुद का शरीर भी अपना नहीं (वो भी एक दिन छूट जाएगा), वहाँ घर-सम्पत्ति और रिश्तेदार तो और भीपराए ही हैं — बस दिखावे के अपने लगते हैं।
दोहा 6: दिपै चाम-चादरमढ़ी, हाड़ पींजरा देह। भीतर या सम जगत में, और नहीं घिन गेह॥
अर्थ: शरीर तो बस चमड़ी की चादर से ढका हुआ हड्डियों का पिंजरा है। दुनिया में इससे ज्यादा घिनौना कोई “घर” नहीं है।
दोहा 7: मोह नींदके जोर, जगवासी घूमें सदा। कर्म चोर चहुँ ओर, सरवस लूटैं सुध नहीं॥
अर्थ: मोह-माया की गहरी नींद में दुनिया के लोग हमेशा भटकते रहते हैं। इधर कर्म रूपी चोर चारों तरफ से घेरकरउनकी सारी अच्छाई लूट रहे हैं, पर उन्हें होश तक नहीं।
दोहा 8: सत्गुरु देय जगाय, मोह नींद जब उपशमैं। तब कछु बनहिं उपाय, कर्म चोर आवत रुकैं॥
अर्थ: जब सच्चा गुरु जगाता है और मोह की नींद कम होती है, तभी कोई उपाय सूझ पाता है और कर्मों के चोरलूटने से रुकते हैं।
दोहा 9: ज्ञान-दीप तप-तेल भर, घर शोधै भ्रम छोर। या विधि बिन निकसैं नहीं, पैठे पूरबचोर॥
अर्थ: ज्ञान का दीपक जलाओ, तप का तेल भरो, मन के भ्रम को साफ करो — तभी अंदर छिपा पुराना चोर (बुरेकर्म-संस्कार) पकड़ में आएगा, नहीं तो कभी नहीं।
दोहा 10: पंच महाव्रत संचरण, समिति पंच परकार। प्रबल पंच इन्द्रिय विजय, धारनिर्जरा सार॥
अर्थ: पाँच बड़े व्रतों का पालन, पाँच तरह की सावधानियाँ, और पाँचों इन्द्रियों पर काबू — यही कर्मों को झाड़ने काअसली सार है।
दोहा 11: चौदह राजु उतंग नभ, लोक पुरुष संठान। तामें जीव अनादितैं,भरमत हैं बिन ज्ञान॥
अर्थ: यह विशाल ब्रह्मांड (14 राजु ऊँचा) है, इसमें जीव शुरू से ही बिना सच्चे ज्ञान के भटक रहा है।
दोहा 12: धन कन कंचन राजसुख,सबहि सुलभकर जान। दुर्लभ है संसार में, एक जथारथ ज्ञान॥
अर्थ: धन-दौलत, अनाज, सोना, राजसी सुख — ये सब आसानी से मिल जाते हैं। पर सच्चा ज्ञान पाना सबसेमुश्किल है।
दोहा 13: जाँचे सुर-तरु देय सुख, चिन्तत चिन्ता रैन। बिन जाँचे बिन चिन्तये, धर्म सकल सुख दैन॥
अर्थ: कल्पवृक्ष तभी सुख देता है जब उससे माँगो, और माँगने में भी दिन-रात चिंता लगी रहती है। पर धर्म बिनामाँगे, बिना सोचे भी हर तरह का सुख अपने आप देता है।
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