Saturday, August 15, 2026

बारह भावना अर्थ सहित

राजा राणा छत्रपतिहाथिन के असवार।

मरना सबको एक दिनअपनी-अपनी बार॥


दल बल देवी देवतामात-पिता परिवार।

मरती बिरियाँ जीव कोकोऊ  राखन हार॥


दाम बिना निर्धन दुखीतृष्णा वशधनवान।

कहूँ  सुख संसार मेंसब जग देख्यो छान॥


आप अकेला अवतरेमरैअकेला होय।

यो कबहूँ इस जीव कोसाथी सगा  कोय॥


जहाँ देह अपनी नहीं,तहाँ  अपना कोय।

घर सम्पत्ति पर प्रगट येपर हैं परिजन लोय॥


दिपै चाम-चादरमढ़ीहाड़ पींजरा देह।

भीतर या सम जगत मेंऔर नहीं घिन गेह॥


मोह नींदके जोरजगवासी घूमें सदा।

कर्म चोर चहुँ ओरसरवस लूटैं सुध नहीं॥


सत्गुरु देय जगायमोह नींद जब उपशमैं।

तब कछु बनहिं उपायकर्म चोर आवत रुकैं॥


ज्ञान-दीप तप-तेल भरघर शोधै भ्रम छोर।

या विधि बिन निकसैं नहींपैठे पूरबचोर॥


पंच महाव्रत संचरणसमिति पंच परकार।

प्रबल पंच इन्द्रिय विजयधारनिर्जरा सार॥


चौदह राजु उतंग नभलोक पुरुष संठान।

तामें जीव अनादितैं,भरमत हैं बिन ज्ञान॥


धन कन कंचन राजसुख,सबहि सुलभकर जान।

दुर्लभ है संसार मेंएक जथारथ ज्ञान॥


जाँचे सुर-तरु देय सुखचिन्तत चिन्ता रैन।

बिन जाँचे बिन चिन्तयेधर्म सकल सुख दैन॥



यहाँ हर दोहा और उसके बाद हिंदी अर्थ अलग-अलग करके दिया है:


दोहा 1: राजा राणा छत्रपतिहाथिन के असवार। मरना सबको एक दिनअपनी-अपनी बार॥


अर्थ: चाहे कोई राजा होछत्रपति होहाथी पर सवार होने वाला बड़ा आदमी हो — मौत सबको एक दिन आनी हीहैबस अपनी-अपनी बारी पर।


दोहा 2: दल बल देवी देवतामात-पिता परिवार। मरती बिरियाँ जीव कोकोऊ  राखन हार॥


अर्थ: सेना-ताकतदेवी-देवतामाँ-बापपूरा परिवार — मरते वक्त इनमें से कोई भी जीव को बचा नहीं पाता।


दोहा 3: दाम बिना निर्धन दुखीतृष्णा वशधनवान। कहूँ  सुख संसार मेंसब जग देख्यो छान॥


अर्थ: पैसे के बिना गरीब आदमी दुखी रहता हैऔर अमीर आदमी और पाने की लालच में जलता रहता है। कविकहता है — मैंने पूरी दुनिया छानकर देख लीकहीं सच्चा सुख नहीं मिला।


दोहा 4: आप अकेला अवतरेमरैअकेला होय। यो कबहूँ इस जीव कोसाथी सगा  कोय॥


अर्थ: इंसान अकेला जन्म लेता है और अकेला ही मरता है। इस जीव का इस दुनिया में सच में कोई साथी-सगानहीं होता।


दोहा 5: जहाँ देह अपनी नहीं,तहाँ  अपना कोय। घर सम्पत्ति पर प्रगट येपर हैं परिजन लोय॥


अर्थ: जहाँ खुद का शरीर भी अपना नहीं (वो भी एक दिन छूट जाएगा), वहाँ घर-सम्पत्ति और रिश्तेदार तो और भीपराए ही हैं — बस दिखावे के अपने लगते हैं।


दोहा 6: दिपै चाम-चादरमढ़ीहाड़ पींजरा देह। भीतर या सम जगत मेंऔर नहीं घिन गेह॥


अर्थ: शरीर तो बस चमड़ी की चादर से ढका हुआ हड्डियों का पिंजरा है। दुनिया में इससे ज्यादा घिनौना कोई “घर” नहीं है।


दोहा 7: मोह नींदके जोरजगवासी घूमें सदा। कर्म चोर चहुँ ओरसरवस लूटैं सुध नहीं॥


अर्थ: मोह-माया की गहरी नींद में दुनिया के लोग हमेशा भटकते रहते हैं। इधर कर्म रूपी चोर चारों तरफ से घेरकरउनकी सारी अच्छाई लूट रहे हैंपर उन्हें होश तक नहीं।


दोहा 8: सत्गुरु देय जगायमोह नींद जब उपशमैं। तब कछु बनहिं उपायकर्म चोर आवत रुकैं॥


अर्थ: जब सच्चा गुरु जगाता है और मोह की नींद कम होती हैतभी कोई उपाय सूझ पाता है और कर्मों के चोरलूटने से रुकते हैं।


दोहा 9: ज्ञान-दीप तप-तेल भरघर शोधै भ्रम छोर। या विधि बिन निकसैं नहींपैठे पूरबचोर॥


अर्थ: ज्ञान का दीपक जलाओतप का तेल भरोमन के भ्रम को साफ करो — तभी अंदर छिपा पुराना चोर (बुरेकर्म-संस्कारपकड़ में आएगानहीं तो कभी नहीं।


दोहा 10: पंच महाव्रत संचरणसमिति पंच परकार। प्रबल पंच इन्द्रिय विजयधारनिर्जरा सार॥


अर्थ: पाँच बड़े व्रतों का पालनपाँच तरह की सावधानियाँऔर पाँचों इन्द्रियों पर काबू — यही कर्मों को झाड़ने काअसली सार है।


दोहा 11: चौदह राजु उतंग नभलोक पुरुष संठान। तामें जीव अनादितैं,भरमत हैं बिन ज्ञान॥


अर्थ: यह विशाल ब्रह्मांड (14 राजु ऊँचाहैइसमें जीव शुरू से ही बिना सच्चे ज्ञान के भटक रहा है।


दोहा 12: धन कन कंचन राजसुख,सबहि सुलभकर जान। दुर्लभ है संसार मेंएक जथारथ ज्ञान॥

अर्थ: धन-दौलतअनाजसोनाराजसी सुख — ये सब आसानी से मिल जाते हैं। पर सच्चा ज्ञान पाना सबसेमुश्किल है।


दोहा 13: जाँचे सुर-तरु देय सुखचिन्तत चिन्ता रैन। बिन जाँचे बिन चिन्तयेधर्म सकल सुख दैन॥

अर्थ: कल्पवृक्ष तभी सुख देता है जब उससे माँगोऔर माँगने में भी दिन-रात चिंता लगी रहती है। पर धर्म बिनामाँगेबिना सोचे भी हर तरह का सुख अपने आप देता है।

No comments:

Post a Comment