Wednesday, August 12, 2026

मेरी भावना. अर्थ सहित- जीवन का उद्देश्य

पंडित जुगलकिशोर जी 'मुख्तार' द्वारा रचित प्रसिद्ध जैन प्रार्थना ‘मेरी भावना’ पर आधारित है। इसमें जीवन जीने के उच्च मानवीय मूल्यों, मानसिक शांति और शुद्ध आत्मा के विकास की भावना व्यक्त की गई है।

मेरी भावना सूने

नीचे प्रत्येक छंद (श्लोक) और उसकी पंक्तियों का सरल एवं स्पष्ट हिंदी अर्थ दिया गया है:

छंद 1: सच्चे परमात्मा/आराध्य का स्वरूप


जिसने राग-द्वेष कामादिक, जीते सब जग जान लिया।

सब जीवों को मोक्ष मार्ग का, निस्पृह हो उपदेश दिया ॥

बुद्ध, वीर, जिन, हरि, हर, ब्रह्मा, या उसको स्वाधीन कहो।

भक्ति-भाव से प्रेरित हो यह, चित्त उसी में लीन रहो ॥


अर्थ:

 जिस परमात्मा ने राग, द्वेष, काम, क्रोध आदि सभी आंतरिक विकारों को जीत लिया है और पूरे संसार का संपूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लिया है,

 जिन्होंने बिना किसी स्वार्थ के सभी जीवों को मोक्ष (मुक्ति) का मार्ग दिखाया है,

 चाहे उन्हें बुद्ध कहें, महावीर, जिन, हरि, हर, ब्रह्मा या स्वाधीन (स्वतंत्र आत्मा) कहें—नाम कोई भी हो,

 मेरा मन भक्ति-भाव से भरकर सदा उन्हीं निष्काम परमात्मा के स्वरूप में लीन रहे।

छंद 2: सच्चे गुरु एवं साधु का स्वरूप


विषयों की आशा नहिं जिनके, साम्य-भाव धन रखते हैं।

निज-पर के हित साधन में जो, निश-दिन तत्पर रहते हैं ॥

स्वार्थ त्याग की कठिन तपस्या, बिना खेद जो करते हैं।

ऐसे ज्ञानी साधु जगत के, दुख समूह को हरते हैं ॥


अर्थ:

 जिनके मन में सांसारिक भोग-विलास की कोई इच्छा नहीं है और समता (समभाव) ही जिनका सबसे बड़ा धन है,

 जो दिन-रात अपना और दूसरों का कल्याण करने में लगे रहते हैं,

 जो बिना किसी दुख या शिकायत के स्वार्थ का त्याग करके कठिन तपस्या करते हैं,

 ऐसे ज्ञानी और सच्चे साधु ही संसार के सभी दुखों और कष्टों को दूर करते हैं।

छंद 3: सत्संग और सदाचार की भावना


रहे सदा सत्संग उन्हीं का, ध्यान उन्हीं का नित्य रहे।

उन्हीं जैसी चर्या में यह, चित्त सदा अनुरक्त रहे ॥

नहीं सताऊँ किसी जीव को, झूठ कभी नहिं कहा करूँ।

पर-धन-वनिता पर न लुभाऊँ, संतोषामृत पिया करूँ ॥


अर्थ:

 मुझे सदा ऐसे संतों और ज्ञानी पुरुषों का सत्संग मिले और उन्हीं के गुणों का चिंतन रहे,

 मेरा मन सदा उन्हीं के समान पवित्र आचरण करने में लगा रहे,

 मैं कभी किसी भी जीव को न सताऊँ और कभी झूठ न बोलूँ,

 दूसरों के धन या दूसरों की स्त्री/पति पर मेरी बुरी दृष्टि न पड़े और मैं सदा संतोष रूपी अमृत का पान करता रहूँ।

छंद 4: अहंकार का त्याग और उपकार भावना


अहंकार का भाव न रक्खूँ, नहीं किसी पर क्रोध करूँ।

देख दूसरों की बढ़ती को, कभी न ईर्ष्या भाव धरूँ ॥

रहे भावना ऐसी मेरी, सरल सत्य व्यवहार करूँ।

बने जहाँ तक इस जीवन में, औरों का उपकार करूँ ॥


अर्थ:

 मेरे मन में कभी घमंड या अहंकार न आए और मैं किसी पर भी क्रोध न करूँ,

 दूसरों की प्रगति और समृद्धि को देखकर मेरे मन में कभी जलन (ईर्ष्या) की भावना न आए,

 मेरी भावना सदा यही रहे कि मैं सभी के साथ सरल और सच्चा व्यवहार करूँ,

 और जब तक इस जीवन में संभव हो, मैं दूसरों का भला और उपकार करता रहूँ।

छंद 5: जीवमात्र से मैत्री और करुणा


मैत्री भाव जगत में मेरा, सब जीवों से नित्य रहे।

दीन-दुखी जीवों पर मेरे, उर से करुणा-स्रोत बहे ॥

दुर्जन-क्रूर-कुमार्ग-रतों पर, क्षोभ नहीं मुझको आवे।

साम्यभाव रक्खूँ मैं उन पर, ऐसी परिणति हो जावे ॥


अर्थ:

 संसार के सभी जीवों के साथ मेरा सदा मित्रता का भाव रहे,

 गरीब, असहाय और दुखी जीवों को देखकर मेरे हृदय से दया और करुणा की धारा बहने लगे,

 जो लोग बुरे, क्रूर या गलत रास्ते पर चल रहे हैं, उन पर भी मुझे गुस्सा या चिढ़ न आए,

 बल्कि मैं उन पर भी समभाव (शांत स्वभाव) रख सकूँ, मेरी मानसिक स्थिति ऐसी बन जाए।

छंद 6: गुणी जनों के प्रति आदर और निर्दोष दृष्


गुणी जनों को देख हृदय में, मेरे प्रेम उमड़ आवे।

बने जहाँ तक उनकी सेवा, करके यह मन सुख पावे ॥

होऊँ नहीं कृतघ्न कभी मैं, द्रोह न मेरे उर आवे।

गुण-ग्रहण का भाव रहे नित, दृष्टि न दोषों पर जावे ॥


अर्थ:

 गुणवान व्यक्तियों को देखकर मेरे हृदय में उनके प्रति प्रेम और आदर उमड़ आए,

 जहाँ तक हो सके, उनकी सेवा करके मेरा मन आनंद महसूस करे,

 मैं कभी किसी का अहसान भूलने वाला (कृतघ्न) न बनूँ और किसी से द्रोह (शत्रुता) न करूँ,

 मेरा स्वभाव सदा दूसरों के गुणों को अपनाने का रहे, मेरी नज़र कभी दूसरों के दोषों पर न जाए।

छंद 7: धर्म और न्याय पर अडिग रहने का संकल्


कोई बुरा कहे या अच्छा, लक्ष्मी आवे या जावे।

लाखों वर्षों तक जीऊँ या, मृत्यु आज ही आ जावे ॥

अथवा कोई कैसा ही भय, या लालच देने आवे।

तो भी न्याय मार्ग से मेरा, कभी न पद डिगने पावे ॥


अर्थ:

 कोई मेरी तारीफ करे या बुराई करे, धन-संपत्ति आए या चली जाए,

 मेरी उम्र लाखों वर्ष की हो या मेरी मृत्यु आज ही क्यों न आ जाए,

 या कोई मुझे कितना भी बड़ा डर दिखाए या कोई बड़ा लालच दे,

 फिर भी न्याय और सत्य के मार्ग से मेरे कदम कभी पीछे न हटें।

छंद 8: सुख-दुख में समता और धैर्


होकर सुख में मग्न न फूले, दुख में कभी न घबरावे।

पर्वत, नदी, श्मशान, भयानक, अटवी से नहिं भय खावे ॥

रहे अडोल अकंप निरंतर, यह मन दृढ़तर बन जावे।

इष्ट वियोग अनिष्ट योग में, सहनशीलता दिखलावे ॥


अर्थ:

 सुख मिलने पर मन अधिक घमंड में न फूले और दुख आने पर कभी न घबराए,

 पर्वत, नदी, श्मशान या भयानक घने जंगल (अटवी) में भी मन निडर रहे,

 मेरा मन हमेशा शांत, अडिग और मजबूत बना रहे,

 प्रिय वस्तु के बिछड़ने और अप्रिय स्थिति के सामने आने पर भी धैर्य एवं सहनशीलता बनी रहे।

छंद 9: विश्व शांति और धर्म की उन्नति


सुखी रहें सब जीव जगत के, कोई कभी न घबरावे।

बैर-पाप-अभिमान छोड़ जग, नित्य नये मंगल गावे ॥

घर-घर चर्चा रहे धर्म की, दुष्कृत दुष्कर हो जावे।

ज्ञान-चरित उन्नत कर अपना, मनुज जन्म फल सब पावे ॥


अर्थ:

 इस संसार के सभी जीव सुखी रहें, किसी को भी कोई भय या घबराहट न हो,

 सब लोग दुश्मनी, पाप और अहंकार छोड़कर रोज खुशी और मंगल के गीत गाएं,

 हर घर में धर्म और नीति की चर्चा हो तथा बुरे काम करना असंभव हो जाए,

 सभी मनुष्य अपने ज्ञान और चरित्र को ऊँचा उठाकर अपने मानव जन्म को सफल बनाएं।

छंद 10: प्राकृतिक संतुलन और लोक-कल्याण


ईति-भीति व्यापै नहिं जग में, वृष्टि समय पर हुआ करे।

धर्मनिष्ठ होकर राजा भी, न्याय प्रजा का किया करे ॥

रोग-मरी-दुर्भिक्ष न फैले, प्रजा शांति से जिया करे।

परम अहिंसा धर्म जगत में, फैल सर्व हित किया करे ॥


अर्थ:

 संसार में प्राकृतिक आपदाओं और भय का प्रकोप न हो, समय पर वर्षा हो,

 देश के शासक और नेता धर्म पर चलते हुए प्रजा के साथ सच्चा न्याय करें,

 कोई महामारी, बीमारी या अकाल न फैले और सभी लोग शांति से जीवन जिएं,

 परम अहिंसा का धर्म पूरे विश्व में फैले और सभी प्राणियों का कल्याण करे।

छंद 11: आपस में प्रेम और देश/राष्ट्र की उन्नति


फैले प्रेम परस्पर जग में, मोह दूर ही रहा करे।

अप्रिय कटुक कठोर शब्द नहिं, कोई मुख से कहा करे ॥

बनकर सब ‘युग-वीर’ हृदय से, देशोन्नति रत रहा करें।

वस्तुस्वरूप विचार खुशी से, सब दुख संकट सहा करें 


अर्थ:

 संसार में सभी के बीच आपस में प्रेम फैले और अज्ञान व मोह दूर रहे,

 कोई भी इंसान अपने मुँह से कड़वे, कठोर या अप्रिय शब्द न बोले,

 सभी लोग सच्चे 'युग-वीर' (साहसी व वीर) बनकर हृदय से देश की उन्नति में लगे रहें,

 और जीवन की वास्तविक सच्चाई को समझते हुए हर संकट और दुख को खुशी-खुशी सहन करें।

निष्कर्ष

‘मेरी भावना’ केवल एक धार्मिक स्तवन नहीं है, बल्कि यह एक सार्वभौमिक (Universal) जीवन-दर्शन है जो हर व्यक्ति को सत्य, अहिंसा, करुणा, आत्म-नियंत्रण और विश्व-बंधुत्व की प्रेरणा देता है

No comments:

Post a Comment