Friday, September 25, 2026

क्षमावाणी पर्व के आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश



यह  डॉ. संजीव गोधा के एक प्रवचन का अंश है, जो जैन धर्म के दस लक्षण पर्व के समापन पर मनाए जाने वाले क्षमावाणी पर्व के आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डालता है। 

डॉ संजीव गोधा के प्रवचन को सुने

संजीव जी के अनुसार, क्षमा केवल वाणी तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि यह आत्मा की शुद्धता और क्रोधके परित्याग से उपजी एक आंतरिक अवस्था है। वे स्पष्ट करते हैं कि सच्चा धर्म स्वयं के ज्ञायक स्वभाव कोपहचानने और समस्त जीवों के प्रति  मैत्री भाव रखने में निहित है। 

व्याख्यान में बाहरी औपचारिकताओं के बजाय आत्म-आराधना और अहंकार के विसर्जन के माध्यम से जीवनमें स्थाई सरलता लाने पर बल दिया गया है। अंततः, यह पाठ हमें सिखाता है कि अपनी गलतियों को स्वीकारकरना और दूसरों को हृदय से क्षमा करना ही मोक्ष मार्ग की वास्तविक शुरुआत है।

दशलक्षण पर्व के दौरान सीखे गए 10 धर्मों (उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव आदि) के अभ्यास को जीवन में निरंतरबनाए रखने के लिए मुख्य सिद्धांत निम्नलिखित हैं:


1. दशलक्षण पर्व को अंत नहीं, बल्कि 'प्रैक्टिस (रिहर्सल)' मानना


दशलक्षण पर्व के 10 दिन धर्म की समाप्ति नहीं हैं, बल्कि यह तो जीवन भर धर्म पर चलने की शुरुआत औरअभ्यास (Practice) हैं । 

यदि कोई व्यक्ति 10 दिनों तक संयम, कषायों की मंदता और नियमित स्वाध्याय कर सकता है, तो यह सिद्धकरता है कि उसके भीतर इसे जीवन भर जारी रखने की क्षमता मौजूद है ।

2. एक-एक कदम अंतर में बढ़ाना (Step-by-Step Approach)

एक साथ बहुत बड़े लक्ष्य देखकर घबराने के बजाय स्टेप बाय स्टेप' (एक-एक कदम) आगे बढ़ना चाहिए ।

मुख्य ध्यान बाहरी क्रियाओं या नियमों के प्रदर्शन पर नहीं, बल्कि आंतरिक परिणामों की निर्मलता पर होना चाहिए ("कदम बाहर में नहीं, अंतर में बढ़ाना है")।

3. नियमित स्वाध्याय और तत्वज्ञान का चिंतन

प्रतिदिन स्वाध्याय और तत्वविचार से जुड़े रहना अत्यंत आवश्यक है । 

जब जीवन में क्रोध या प्रतिकूलता का प्रसंग आए, तब भेदविज्ञान और तत्वज्ञान (जैसे क्रमबद्ध पर्याय, पर-द्रव्य कीस्वतंत्रता आदि) का विचार तुरंत कषायों की तीव्रता को शांत कर देता है ।

4. कषायों की समयावधि घटाना

नाराजगी या विवाद को लंबा न खींचें । जैन सिद्धांत के अनुसार कषाय को 6 महीने से अधिक नहीं टिकने देना चाहिए, ताकि वह अनंतानुबंधी (गहरे बैर) का रूप न ले ।

प्रयास यह होना चाहिए कि कषाय पानी की रेखा' (संज्वलन)की तरह मुहूर्त मात्र में ही मिट जाए।

5. ज्ञायक आत्मा का निरंतर आश्रय (आत्मावलंबन)

10 लक्षणों का मूल आधार आत्मा की आराधना है । 

स्वयं को तथा जगत के समस्त जीवों को शरीर या शत्रु/देखने के बजाय 'ज्ञायक भगवान आत्मा' के रूप में देखना । जब जीव अपनी निज आत्मा का अवलंबन लेता है, तो क्षमा, मार्दव, आर्जव आदि धर्म जीवन में स्वतः और सहज रूप से प्रकट रहते हैं ।

6. औपचारिक दिखावे से दूर व्यावहारिक जीवन में उतारना

धर्म केवल 10 दिनों के उत्सव या सोशल मीडिया के संदेशों तक सीमित न रहे, बल्कि घर-परिवार, वाणी और दैनिक आचरण में सहज रूप से झलकना चाहिए ।

क्षमावाणी पर्व का आध्यात्मिक महत्व और इसके पीछे निहित मुख्य भावना स्त्रोतों के अनुसार निम्नलिखित है:


1. क्षमावाणी पर्व का आध्यात्मिक महत्व

साधना की वास्तविक शुरुआत (अभ्यास/प्रैक्टिस):

दशलक्षण पर्व के 10 दिनों में किया गया स्वाध्याय, संयम और तप कोई अंतिम पड़ाव नहीं है, बल्कि यह जीवन भर आत्म-धर्म पर चलने का एक अभ्यास (प्रैक्टिस) और वास्तविक शुरुआत है । 

निज आत्मा के अवलंबन से क्षमा का प्रकटीकरण:

उत्तम क्षमा बाहर से थोपा गया कोई आचरण नहीं है; जब जीवअपने  ज्ञायक भगवान आत्मा  का आश्रय लेता है, तो आत्मा में वीतरागी पर्याय के रूप में उत्तम क्षमा स्वतः प्रकट हो जाती है]।

कषायों का शमन और अनंतानुबंधी से बचाव:

जैन दर्शन में क्षमावाणी पर्व वर्ष में तीन बार आता है, ताकि किसी भी जीव के प्रति कषाय या नाराजगी का भाव 6 महीने से अधिक न टिके और अनंतानुबंधी (गहरे बैर) का रूप न ले  साधक का प्रयास कषाय को 'पानी की रेखा' (संज्वलन) के समान क्षणिक बनाने का होना चाहिए ।

निज आत्मा के प्रति अपराध स्वीकृति:

अनादि काल से अपने त्रिकाली ज्ञायक आत्मा को न पहचानना ही सबसे बड़ा अपराध रहा है । 

क्षमावाणी का उच्चतम आध्यात्मिक ध्येय अपने ही निज भगवान आत्मा के सामने अपनी भूल स्वीकार कर उसमेंलीन व समर्पित होना है।

2. क्षमावाणी पर्व के पीछे की मुख्य भावना

सर्व जीवों में 'भगवान आत्मा' देखना: संसार के समस्त जीवों (एकेन्द्रिय जीवों से लेकर पंचेन्द्रिय तक) को अपने समान चेतन्य/ज्ञायक आत्मा देखना तथा किसी भी जीव की विराधन न करने का संकल्प लेना ।

अहंकार का शमन और क्रोध पर विजय: दूसरों से सच्चे मन से क्षमा माँगने से व्यक्ति के मान (अहंकार) का क्षयहोता है और नम्रता आती है, जबकि दूसरों को क्षमा करने से व्यक्ति अपने क्रोध पर विजय पाता है ।


डिजिटल दिखावे से परे वास्तविक निर्मलता:


क्षमावाणी केवल व्हाट्सएप मैसेजेस या सोशल मीडिया पर संदेश भेजने की औपचारिकता नहीं है; यह हृदय की वास्तविक कोमलता, निर्मलता और दैनिक व्यवहार में उतरनी चाहिए ।


स्वरूप में विश्रांति और करुणा: जब आत्मा अपने शुद्ध स्वरूप में विश्राम पाती है, तब व्यक्ति की वाणी औरआचरण में स्वाभाविक रूप से करुणा और शांति छलकती है ।है ।

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