बी के शिवानी को सुने इसे क्लिक करे
ब्रह्माकुमारी बीके शिवानी जी अपने सत्रों में जिस शांत, सहज, गहरे और प्रेमपूर्ण अंदाज़ में बोलती हैं, उसका एकपूरा भाषण रूप नीचे प्रस्तुत है:
"ओम शांति!
आज एक पल के लिए हम सब रुककर अपने अंदर झांकें। हम सुबह से लेकर रात तक अनगिनत प्लान बनाते हैं, अपने लिए, अपने परिवार के लिए और अपने देश के लिए एक स्क्रिप्ट लिखते हैं—ऐसा होगा, फिर वैसा करेंगे, यहबनेंगे। लेकिन कभी-कभी जैसा हम सोचते हैं, वैसा बिल्कुल नहीं होता। किसी पर बहुत विश्वास करते हैं और वही धोखा दे जाता है, तो किसी से कोई उम्मीद नहीं होती और वो हमारा सबसे बड़ा सहयोगी बन जाता है। यह सब आखिर कैसे होता है?
आज तक हम किससे बातचीत कर रहे थे? रिश्तों से, रोल्स से, पोजीशंस से। कोई पिता है, कोई पति है, कोई पत्नी है, कोई सीनियर है, कोई जूनियर है। लेकिन इन सब रिश्तों और प्रोटोकॉल के बीच, हम यह भूल ही गए किमैं एक आत्मा हूँ और जिससे मैं बात कर रही हूँ, वो भी एक शरीर नहीं, बल्कि एक पवित्र आत्मा है।
जब हम ऑफिस या घर में अलग-अलग चार लोगों से मिलते हैं—मान लीजिए कोई गेट पर है, कोई सीनियर पोजीशन पर है—तो क्या हम चार मिनट में चार बार बदलते हैं? हमारा बात करने का तरीका, हमारा पोश्चर बदलजाता है। क्यों? क्योंकि हम रोल कॉन्शियस होकर जी रहे हैं। और यही रोल का अभिमान धीरे-धीरे अहंकार(Ego) बन जाता है।
ईगो सिर्फ यह नहीं है कि खुद को किसी से श्रेष्ठ समझना; ईगो यह भी है कि खुद को किसी से हीन (Inferior) महसूस करना।
ईगो की सीधी परिभाषा है: अटैचमेंट टू अ रॉन्ग इमेज ऑफ माइसेल्फ।(Ego is attachment to a wrong image of myself) यानी जो मैं नहीं हूँ, उस गलत पहचान सेखुद को जोड़ लेना। मैं बेटा हूँ, मैं पत्नी हूँ, मैं इस ओदे पर हूँ—यह सब मेरा है, लेकिन मैं यह नहीं हूँ। मैं तो एकअजर, अमर, अविनाशी, चमकता हुआ सितारा—एक संपूर्ण पवित्र ऊर्जा हूँ।
आज से हमें अपने जीने का तरीका बदलना है। समाज में औदे और उम्र के हिसाब से रिगार्ड (Regard) बहुत ज़रूरी है—बड़ों के पैर छूना, रिस्पेक्ट देना। लेकिन रिस्पेक्ट (Respect) आत्मा के लिए हमेशा एक जैसी होनी चाहिए। चाहे कोई घर की सफाई करने वाला हो या गाड़ी चलाने वाला, रोल्स ऊंचे-नीचे हो सकते हैं, लेकिन हरएक्टर—हर आत्मा—समान, पवित्र और सुंदर है। जब यह स्मृति रहती है, तो अहंकार अपने आप नीचे आ जाता है और रिश्ते मक्खन जैसे मीठे हो जाने लगते हैं।
याद रखिए, जब हम शरीर छोड़ते हैं, तो क्या हमारे साथ जाता है? शरीर छूट जाता है, परिवार, धन, संपत्ति, पढ़ाई—सब यहीं रह जाता है। साथ क्या जाता है? सिर्फ हमारे संस्कार और हमारे कर्म!
सारा दिन लोग हमारे साथ क्या कर रहे हैं, यह मैटर नहीं करता। हम अक्सर उंगली बाहर दूसरों पर रखते हैं कि'उसने मेरा भाग्य बिगाड़ दिया।' अरे, कोई दूसरा आपके भाग्य को नहीं बिगाड़ सकता, सिवाय आपके खुद के! मैंने जो किया, वो मुझ पर रिकॉर्ड हुआ; उन्होंने जो सोचा और किया, वो उन पर रिकॉर्ड हुआ। इसलिए आज से बाहरउंगली रखना बंद करें और पूरी ज़िम्मेदारी अपने हाथ में लें।
दूसरों को देखकर यह न कहें कि 'यह इंसान ऐसा क्यों है? मुझे समझ नहीं आता।' वह गलत नहीं हैं, बल्कि वे अपनी हज़ारों सालों की यात्रा और अलग संस्कारों के लेंस (Lens) से दुनिया को देख रहे हैं। हर एक का लेंस अलग है, इसलिए हर एक को परिस्थिति अलग दिखती है। अब से किसी को गलत कहने के बजाय, उनके लिएमन में कहें: 'I understand you, I accept you' (मैं आपको समझता हूँ, स्वीकार करता हूँ) और उन्हें बदलकर दिखाने के लिए वाइट सर्कल में रखकर दुआएं और शक्तियां भेजें।
और अंत में, हमारा भाग्य हमारे कर्मों से बनता है। कर्म सिर्फ बोल और व्यवहार नहीं हैं—कर्म हमारी इंटेंशन (Intent), सोच और भावनाएं हैं। हम जो ऊर्जा बाहर फेंकते हैं, वही घूमकर परिस्थितियों और लोगों के व्यवहारके रूप में हमारे पास वापस आती है। इसलिए जो चाहिए, वही फेंकिए! अगर जीवन में सुख, शांति और प्यार चाहिए, तो पहले सबको वही दीजिए।
आइए, एक छोटा सा संकल्प करें कि आज से हम देह-अभिमान से निकलकर आत्मा-अभिमानी बनेंगे। अपने हरएक पुराने कार्मिक अकाउंट को क्षमा और प्रेम से फुल स्टॉप लगाएंगे, और अपनी इस सुंदर जीवन यात्रा को पूरी लाइट और पावर के साथ जिएँगे।
ओम शांति।"
दिए गए प्रमुख उदाहरण (Illustrations):
क. कपड़ों और उम्र का उदाहरण (The Costumes & Age of the Soul):
उदाहरण: सत्र के दौरान उन्होंने सामने बैठे एक 11 साल के बच्चे और 40 साल के माता-पिता को खड़ा करके पूछा कि किसकी उम्र क्या है?
स्पष्टीकरण: यह उम्र उस शरीर यानी "कपड़े" की है जो हमने पहना है । आत्मा अजर, अमर और अविनाशी है । यह आत्मा इस शरीर से पहले भी कई अलग-अलग शरीरों (कॉस्च्युम) में रह चुकी है। इसलिए शरीर की उम्र छोटी या बड़ी हो सकती है, लेकिन हर आत्मा अपने आप में समान और पवित्र है ।
ख. दो सीडी और अलग-अलग लेंस का उदाहरण (Two CDs & Colored Lenses):
उदाहरण: पति-पत्नी या परिवार के अन्य सदस्यों के बीच मतभेद क्यों होते हैं? इसे समझाने के लिए उन्होंने बताया कि हर आत्मा अपनी लंबी यात्रा के दौरान हजारों सालों के संस्कारों और अनुभवों की "सीडी" रिकॉर्ड करके लाई है ।
स्पष्टीकरण: हर व्यक्ति दुनिया को अपने "संस्कार रूपी लेंस" (Colored Lens) से देखता है । मान लीजिए कोई व्यक्ति काले रंग का चश्मा पहने है और दूसरा लाल रंग का, तो दोनों को एक ही वस्तु अलग-अलग दिखाई देगी ।
निष्कर्ष: इसमें कोई गलत नहीं है, बस दोनों के संस्कार और दृष्टिकोण अलग-अलग हैं । हमें किसी को "गलत" कहने के बजाय यह समझना चाहिए कि वह अपनी पिछली जर्नी और संस्कारों के वश में है।
ग. कर्मों की बॉल फेंकने का उदाहरण (Throwing and Receiving Balls):
उदाहरण: हमारे कर्म एक "बॉल" की तरह हैं ।
स्पष्टीकरण: हम जो सोचते, बोलते और व्यवहार करते हैं (इंटेंशन, थॉट, वर्ड, बिहेवियर), वह ऊर्जा या कर्म रूपी बॉल हम बाहर फेंकते हैं । वही बॉल घूमकर वापस हमारे पास परिस्थितियों या लोगों के व्यवहार के रूप में लौटती है ।
यदि हमारे जीवन में कोई कठिन परिस्थिति या बुरा व्यवहार आ रहा है, तो इसका मतलब है कि हमने ही अतीत में वैसी बॉल फेंकी थी । हम पुरानी फेंकी हुई बॉल को तो नहीं बदल सकते, लेकिन अब जो नई बॉल फेंक रहे हैं (यानी अपना वर्तमान कर्म और प्रतिक्रिया), उस पर हमारा पूरा नियंत्रण है।
No comments:
Post a Comment