मध्य प्रदेश (ग्वालियर) और पश्चिम बंगाल (कोलकाता) के मुआवजा (compensation) में इतना बड़ा अंतर होने के मुख्य रूप से चार कारण हैं।
भारत में कानून के मुताबिक, सार्वजनिक व्यवस्था (public order) और आपदा प्रबंधन (disaster management) पूरी तरह से राज्यों के अधीन आते हैं। इसलिए पूरे देश में किसी हादसे के लिए कोई एक तय राशि या फिक्स्ड मुआवजा नहीं है। हर राज्य सरकार अपने हिसाब से यह राशि तय करती है।
इस अंतर को आप इन 4 आसान बिंदुओं से समझ सकते हैं:
1. राज्यों की वित्तीय क्षमता (Financial Capability)
हर राज्य सरकार को मुआवजे का पैसा अपने बजट और 'राज्य आपदा मोचन निधि' (SDRF) से देना होता है। पश्चिम बंगाल की अर्थव्यवस्था और बजट का आकार मध्य प्रदेश की तुलना में काफी बड़ा है। किसी भी राज्य की आर्थिक स्थिति यह तय करती है कि वह पीड़ितों को अधिकतम कितनी मदद दे सकता है।
2. मुख्यमंत्री का विवेकाधिकार और राजनीतिक दबाव (State Discretion)
चूंकि मुआवाजे को लेकर कोई केंद्रीय कानून नहीं है, इसलिए यह पूरी तरह वहां के मुख्यमंत्री के फैसले पर निर्भर करता है। कोलकाता जैसी बड़ी मेट्रो सिटी (महानगर) में जब कोई बड़ा हादसा होता है, तो वहां राष्ट्रीय मीडिया और जनता का भारी दबाव होता है। ऐसे में सरकारें जनता के गुस्से को शांत करने और जवाबदेही दिखाने के लिए बड़ी राहत राशि और सरकारी नौकरी का ऐलान करती हैं।
3. हादसे की जगह और उसका स्वरूप (Nature of the Incident)
• कोलकाता का हादसा: यह शहर के बीचों-बीच एक बहुत बड़े, मशहूर और सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त दुर्गा पूजा पंडाल में हुआ। इस तरह के आयोजनों की सुरक्षा व्यवस्था में कहीं न कहीं प्रशासन की निगरानी जुड़ी होती है, इसलिए सरकार पर नैतिक जिम्मेदारी ज्यादा होती है।
• ग्वालियर का हादसा: यह एक ग्रामीण इलाके के मंदिर के पास हुआ रोड एक्सीडेंट (सड़क हादसा) था, जहाँ एक ट्रक के ब्रेक फेल हो गए थे। मध्य प्रदेश सरकार के आपदा मैनुअल (disaster manual) के नियमों के मुताबिक सड़क हादसों में मौत होने पर अधिकतम ₹4 लाख का ही प्रावधान है, इसलिए वहां नियमों के तहत यह राशि दी गई।
4. नौकरी देने की नीति (Employment Policy)
पश्चिम बंगाल सरकार की यह पुरानी नीति रही है कि वह बड़े हादसों के शिकार परिवारों को संभालने के लिए 'ग्रुप-डी' (चतुर्थ श्रेणी) की सरकारी नौकरी देती है। इसके विपरीत, मध्य प्रदेश सरकार के नियमों में सड़क हादसों में जान गंवाने वालों के परिजनों को सीधे सरकारी नौकरी देने का कोई प्रावधान नहीं है। वहां केवल सेना, पुलिस या ड्यूटी पर शहीद होने वाले कर्मचारियों के परिवारों को ही अनुकंपा नियुक्ति (नौकरी) दी जाती है।
यही कारण है कि एक ही समय के आस-पास हुए दो अलग-अलग हादसों में पीड़ितों को मिलने वाली सरकारी मदद में इतना बड़ा अंतर दिखाई दिया।
मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल की मुआवजा नीतियों (Compensation Rules) में यह अंतर नियमों, बजट और कानूनी प्राथमिकताओं के कारण है। दोनों राज्यों के आपदा प्रबंधन नियमों और सरकारी नौकरी देने की नीतियों में काफी बुनियादी अंतर हैं:
1. मध्य प्रदेश की मुआवजा नीति (Madhya Pradesh Rules)
• फिक्स्ड रेवेन्यू बुक सर्कुलर (RBC 6-4): मध्य प्रदेश सरकार किसी भी आपदा या हादसे में वित्तीय राहत देने के लिए अपने राजस्व पुस्तक परिपत्र (Revenue Book Circular) के कड़े नियमों का पालन करती है. इसके तहत किसी भी सड़क दुर्घटना या सामान्य सार्वजनिक हादसे में जान गंवाने वालों के परिजनों को मिलने वाली राशि ₹4 लाख पर फिक्स (कैप) की गई है. अधिकारियों के पास इस सीमा से अधिक तुरंत नकद देने का विवेकाधिकार नहीं होता।
• अनुकाम्पा नियुक्ति (Compassionate Appointment) के कड़े नियम: मध्य प्रदेश में हादसे के शिकार आम नागरिकों को सरकारी नौकरी देने का कोई नियम नहीं है। वहां 'अनुकंपा नियुक्ति' की नीति केवल उन सरकारी कर्मचारियों के परिवारों पर लागू होती है, जिनकी सेवाकाल (duty) के दौरान मृत्यु हो जाती है। आम नागरिकों के लिए ऐसी कोई योजना नहीं है.
2. पश्चिम बंगाल की मुआवजा नीति (West Bengal Rules)
• विशेष विवेकाधीन राहत कोष: पश्चिम बंगाल का आपदा प्रबंधन विभाग सामान्य तय नियमों (जैसे प्राकृतिक आपदा में ₹2 लाख की राशि) के अलावा, मुख्यमंत्री को अपने विशेष विवेकाधीन कोष (Discretionary Fund) से अतिरिक्त बड़ी राशि मंजूर करने की कानूनी शक्ति देता है. जब कोई असामान्य या बड़ी मानवीय लापरवाही का हादसा होता है, तो राज्य कैबिनेट तुरंत विशेष प्रस्ताव पास करके ₹25 लाख जैसी बड़ी राशि जारी कर सकती है।
• पुनर्वास के लिए रोजगार नीति (Group D Placement Scheme): पश्चिम बंगाल सरकार की प्रशासनिक नीतियों में "सामाजिक सुरक्षा और पुनर्वास" को अत्यधिक प्राथमिकता दी जाती है। वहां राज्य सरकार के पास यह विशेष नीतिगत प्रावधान है कि यदि किसी बड़े सार्वजनिक हादसे में किसी परिवार का एकमात्र कमाने वाला सदस्य मारा जाता है, तो परिवार को गरीबी से बचाने के लिए वे Group-D (चतुर्थ श्रेणी) के पदों पर सीधे सीधे नौकरी (जैसे प्यून, लैब अटेंडेंट, सुरक्षा गार्ड) दे सकते हैं। इसके लिए उन्हें सामान्य भर्ती परीक्षाओं से छूट दी जाती है।
संक्षेप में कहें तो, मध्य प्रदेश सरकार केवल वित्तीय सहायता (Fiancial Aid) देने के नियम पर काम करती है, जबकि पश्चिम बंगाल सरकार वित्तीय सहायता के साथ-साथ परिवार के दीर्घकालिक पुनर्वास (Long-term Rehabilitation) की नीति पर काम करती है।
क्या आप यह जानना चाहते हैं कि केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) के राष्ट्रीय आपदा राहत नियमों (NDRF) के तहत देश भर में मुआवजे के क्या मानक तय किए गए हैं?
केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) के राष्ट्रीय आपदा राहत नियमों (NDRF/SDRF guidelines) के तहत देश भर में मुआवजे के कुछ तय मानक निर्धारित किए गए हैं।
गृह मंत्रालय के तहत काम करने वाले राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) और वित्त आयोग (Finance Commission) की सिफारिशों के आधार पर केंद्र सरकार पूरे भारत के लिए राष्ट्रीय आपदा राहत नियम तय करती है:
1. मृत्यु होने पर बुनियादी मुआवजा (₹4 लाख)
• गृह मंत्रालय के आधिकारिक दिशा-निर्देशों के अनुसार, किसी भी अधिसूचित आपदा (Notified Disaster) जैसे बाढ़, चक्रवात, भूकंप आदि में किसी व्यक्ति की मृत्यु होने पर उसके परिजनों को ₹4 लाख प्रति व्यक्ति की अनुग्रह राशि (Ex-gratia payment) दी जाती है।
• इसमें राहत कार्यों में जुटे कर्मचारी या स्वयंसेवक भी शामिल होते हैं, यदि आपदा के दौरान ड्यूटी करते समय उनकी जान जाती है।
• मध्य प्रदेश सरकार ने इसी राष्ट्रीय मानक (₹4 लाख) को आधार बनाकर ग्वालियर हादसे के लिए मुआवजा तय किया था।
2. गंभीर चोट और दिव्यांगता (Disability) पर राहत
नियमों के अनुसार, घायल व्यक्तियों को उनकी दिव्यांगता के प्रतिशत के आधार पर मदद दी जाती है: [1, 2]
• 40% से 60% तक दिव्यांगता होने पर: ₹74,000 प्रति व्यक्ति।
• 60% से अधिक दिव्यांगता होने पर: ₹2.50 लाख प्रति व्यक्ति।
• गंभीर चोट के कारण अस्पताल में भर्ती होने पर (एक सप्ताह से अधिक): करीब ₹16,000 और एक सप्ताह से कम भर्ती रहने पर ₹5,400 तक की तत्कालिक मदद का प्रावधान है।
3. फंड का बंटवारा (Funding Pattern)
इस मुआवजे की राशि का पूरा बोझ अकेले राज्य सरकार पर नहीं होता। गृह मंत्रालय के नियमों के अनुसार:
• सामान्य राज्यों में: इस फंड का 75% हिस्सा केंद्र सरकार देती है और 25% हिस्सा राज्य सरकार अपने खजाने से मिलाती है।
• विशेष श्रेणी के राज्यों में (जैसे पूर्वोत्तर के राज्य और पहाड़ी राज्य): केंद्र सरकार 90% हिस्सा देती है और राज्य सरकार को केवल 10% हिस्सा देना होता है।
फिर राज्यों के मुआवजे में अंतर क्यों होता है?
गृह मंत्रालय के ये नियम केवल न्यूनतम मानक (Minimum Benchmark) तय करते हैं। केंद्र सरकार राज्यों को यह अधिकार देती है कि यदि कोई राज्य अपने नागरिकों को इससे ज्यादा मुआवजा देना चाहता है, तो वह अपने राज्य के बजट (State Treasury) या मुख्यमंत्री राहत कोष (CMRF) से अतिरिक्त पैसा जोड़कर ₹25 लाख या उससे अधिक का ऐलान कर सकता है। पश्चिम बंगाल और कई अन्य राज्य अक्सर इसी विशेष अधिकार का उपयोग करके बड़ा मुआवजा घोषित करते हैं।
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