Wednesday, September 23, 2026

बैंक हड़ताल की मुख्य मांगें और पृष्ठभूमि



सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (PSBs) के यूनियनों के संगठन यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस (UFBU) ने अपनी मांगों को लेकर 28, 29 और 30 सितंबर 2026 को तीन दिवसीय देशव्यापी बैंक हड़ताल की घोषणा की है। चूंकि 26 सितंबर को चौथा शनिवार (बैंक अवकाश) और 27 सितंबर को रविवार है, इसलिए इस हड़ताल के कारण देश भर में बैंकिंग सेवाएं लगातार 5 दिनों तक ठप रहने की आशंका बन गई है।

यह हड़ताल ऐसे समय में बुलाई गई है जब बैंकों में छमाही क्लोजिंग (Half-Yearly Closing) का बेहद महत्वपूर्ण वित्तीय कार्य होना है। इस संवेदनशील स्थिति, सरकार के सुलह के प्रयासों और आम जनता के हितों को ध्यान में रखते हुए तैयार की गई विस्तृत रिपोर्ट व अपील नीचे दी गई है:

📌 हड़ताल की मुख्य मांगें और पृष्ठभूमि (Key Demands & Background)

यूनियनों ने इस हड़ताल के लिए मुख्य रूप से निम्नलिखित मांगें सामने रखी हैं:
  1. 5-डे बैंकिंग (5-Day Work Week): सभी शनिवारों को पूर्ण अवकाश घोषित किया जाए। यूनियनों का दावा है कि मार्च 2024 के द्विपक्षीय समझौते में इस पर सहमति बनी थी, लेकिन इसे केंद्र सरकार की अंतिम मंजूरी नहीं मिली है।
  2. अन्य मांगें: इसके साथ ही पेंशन सुधार, महंगाई भत्ता (DA) फॉर्मूले में बदलाव और नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) से पुरानी पेंशन योजना (OPS) में जाने का विकल्प देने जैसी मांगें शामिल हैं।
सरकार ने यूनियनों की एक और बड़ी मांग—परफॉर्मेंस लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) योजना में एकतरफा बदलावों को वापस लेने की मांग—को स्वीकार करते हुए PLI योजना को तत्काल प्रभाव से स्थगित (Abeyance) कर दिया था। इसके बावजूद, यूनियनें केवल 5-डे बैंकिंग की जिद पर अड़ी हुई हैं।

📊 सरकार के प्रयास, वार्ता और गतिरोध (Negotiations & Stalemate)

केंद्र सरकार और वित्त मंत्रालय के वित्तीय सेवाएं विभाग (DFS) ने आम जनता को होने वाली भारी असुविधा को रोकने के लिए अत्यधिक लचीला रुख अपनाया:
  • सकारात्मक पहल: सरकार ने यूनियनों की बड़ी मांग (PLI विवाद) को सुलझाकर बातचीत का रास्ता साफ किया।
  • सुलह बैठकें (Conciliation Meetings): मुख्य श्रम आयुक्त और भारतीय बैंक संघ (IBA) के साथ 22 सितंबर 2026 को भी उच्च स्तरीय सुलह बैठक की गई। सरकार ने भरोसा दिलाया कि 5-डे बैंकिंग की मांग विचाराधीन है और इसका समाधान बातचीत से निकाला जा सकता है।
  • गतिरोध (Stalemate): सरकार के इस सहयोगात्मक दृष्टिकोण के बावजूद, वामपंथी विचारधारा से प्रभावित ट्रेड यूनियन नेताओं ने बेहद अड़ियल रुख (Rigid Approach) अपनाया। उन्होंने ठोस लिखित आदेश और तत्काल समय-सीमा की मांग करते हुए वार्ता को विफल कर दिया और हड़ताल पर आगे बढ़ने का फैसला किया।
  • काउंटर-रणनीति: आम जनता को राहत देने के लिए सरकार ने एक असाधारण कदम उठाते हुए 27 सितंबर (रविवार) को देश के सभी सार्वजनिक और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों को पूरी तरह खुला रखने और सामान्य रूप से कार्य करने का आदेश जारी किया है।

⚠️ आलोचकों का दृष्टिकोण: देश को आर्थिक नुकसान की साजिश

आर्थिक विश्लेषकों और आलोचकों का मानना है कि छमाही क्लोजिंग (30 सितंबर) के ठीक पहले हड़ताल का दिन चुनना एक सोची-समझी रणनीति या साजिश का हिस्सा प्रतीत होता है, जिसका उद्देश्य केंद्र सरकार पर अनुचित दबाव बनाना और वित्तीय प्रणाली को बाधित करना है।
जब देश का बैंकिंग ढांचा लगातार 5 दिनों के गतिरोध से गुजरेगा, तो चेक क्लियरिंग, लोन मंजूरी, व्यावसायिक लेनदेन और सरकारी कामकाज पूरी तरह रुक जाएंगे। इससे न केवल आर्थिक तरलता प्रभावित होगी, बल्कि त्योहारी सीजन से ठीक पहले आम आदमी, छोटे व्यापारियों और किसानों को भारी मानसिक व आर्थिक प्रताड़ना झेलनी पड़ेगी।

📢 बैंक कर्मचारियों से एक विनम्र अपील (An Appeal to Bank Staff)

प्रिय बैंक कर्मचारी साथियों,
आप देश की आर्थिक प्रगति के सच्चे संवाहक हैं। आपकी कड़ी मेहनत से ही भारत की बैंकिंग प्रणाली आज वैश्विक स्तर पर मजबूत हुई है। आपकी मांगों (जैसे 5-डे बैंकिंग) के प्रति सरकार पूरी तरह संवेदनशील है और इसी सकारात्मक सोच के तहत आपकी एक प्रमुख मांग (PLI स्थगन) को पहले ही पूरा किया जा चुका है।
परंतु, कुछ वामपंथी और राजनीतिक झुकाव रखने वाले यूनियन नेताओं के अड़ियल रुख के कारण आज पूरी बैंकिंग बिरादरी की छवि दांव पर लग गई है।
  • जनता के आक्रोश से बचें: जब गैर-बैंकिंग या महज प्रशासनिक समय-सीमा के मुद्दों पर छमाही क्लोजिंग के समय 5 दिनों का लॉक-आउट जैसी स्थिति बनेगी, तो सबसे ज्यादा नुकसान उस आम आदमी (Common Man) का होगा जो अपनी गाढ़ी कमाई, पेंशन या आपातकालीन लेनदेन के लिए आप पर निर्भर है।
  • विश्वसनीयता को बचाएं: यदि जनता को यह संदेश जाता है कि बैंक कर्मचारी केवल अपने अवकाश के लिए देश के विकास कार्यों को बाधित कर रहे हैं या सरकार को परेशान करने के राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा बन रहे हैं, तो समाज में आपके प्रति सम्मान नाराजगी और घृणा में बदल सकता है।
  • सजग रहें, राजनीति से दूर रहें: अपनी यूनियनों की एकजुटता का उपयोग किसी राजनीतिक साजिश या देश की अर्थव्यवस्था को अस्थिर करने के प्रयास में न होने दें।
अतः सभी जिम्मेदार बैंक स्टाफ और अधिकारियों से अपील है कि वे इस हड़ताल के आह्वान पर पुनर्विचार करें, अपने ग्राहकों के व्यापक हितों को प्राथमिकता दें और बातचीत के माध्यम से समाधान निकलने तक देश के आर्थिक विकास में अपना योगदान जारी रखें।

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The intersection of trade unionism and politics in India's banking sector has a long history, with public sector bank (PSB) unions frequently participating in wider socio-political movements.

Over the last two to three decades, bank unions have often joined nationwide generic strikes called by Central Trade Unions (CTUs), expanding their scope beyond traditional, sector-specific grievances like wage hikes or a five-day workweek.

General Nationwide Strikes vs. Bank-Specific Grievances

A clear distinction exists between bank-specific strikes (which focus strictly on industry demands like the 11th/12th Bipartite Wage Settlements, 5-day week implementation, or pension updates) and general nationwide strikes (Bharat Bandhs).

When major bank employee federations—such as the All India Bank Employees Association (AIBEA) or the Bank Employees Federation of India (BEFI)—participate in broader general strikes, they often align with parent central trade unions like the Centre of Indian Trade Unions (CITU) or the All India Trade Union Congress (AITUC). These actions are frequently organised to protest overarching central government economic policies, labour laws, or legislative bills.
Key Instances of Politically Motivated or Policy-Driven Strikes

The following timeline details major multi-sector and general strikes over the past decades where banking unions participated alongside political and agricultural agitations, shifting the focus away from internal banking demands:

1. The 2026 Joint General Strike and Agri-Protests
In February 2026, ten central trade unions, in conjunction with various farmer organisations, called for a massive nationwide protest and Bharat Bandh.
YouTube
• Primary Focus: The core agitation was aimed at opposing the proposed India-US trade deal, new central labour codes, and broader agricultural market opening rules.
• Banking Involvement: While bank unions like the United Forum of Bank Unions (UFBU) simultaneously pursued standard issues like a 5-day workweek, major segments of the bank workforce struck work primarily to express solidarity with the broader farmer-labour coalition against the central government's macroeconomic and trade policies.

2. The 2020–2022 General Strikes (Kisan Bill and Labour Codes)
Following the introduction of the three controversial farm laws in 2020 (later repealed in late 2021), central trade unions staged multiple national strikes.
Wikipedia

• The Actions: Nationwide strikes took place in November 2020 and March 2022.

• Primary Focus: Standing in explicit solidarity with the Farmers' Protests (Kisan Andolan), demanding the absolute repeal of the farm bills, and expressing outright rejection of the government's four new consolidated Labour Codes.
• Banking Involvement: Left-leaning bank unions actively joined these strikes. Critics highlighted that shutting down the national financial grid during these windows did not relate to immediate bank employee benefits, but served instead as an ideological stand against the ruling NDA government's policy direction.

3. The 2019–2020 Anti-CAA and Economic Policy Strikes
In January 2020, a massive all-India strike was executed by central trade unions.
• Primary Focus: The strike was highly charged with political overtones, aligning tightly with the ongoing nationwide opposition-led agitations against the Citizenship Amendment Act (CAA) and the National Register of Citizens (NRC). It also targeted public sector disinvestment.
• Banking Involvement: Banking services across the country were severely disrupted as employees joined the mass casual leave and strike calls. Observers noted that the participation of public sector workers leaned heavily into a broader political stand against the central government's legislative updates.

4. The 2015 and 2016 Mega General Strikes
During the early years of the Modi-led NDA administration, massive general strikes were organized across India, notably in September 2015 and September 2016.
• Primary Focus: These demonstrations opposed the government's unilateral changes to labour laws, foreign direct investment (FDI) caps in sensitive sectors, and aggressive public asset monetization.
• Banking Involvement: Banking unions formed the logistical backbone of these strikes. Even though routine charter demands (like standard updates to allowances) were appended to the strike notices, the primary driver was a collective pushback against the newly established economic roadmap of the NDA government.


• The Critics' View: Critics and ruling party representatives frequently argue that bank employee unions—historically influenced by left-wing ideologies—occasionally use their collective bargaining power to create leverage against the ruling government on non-banking, external political disputes. They argue that using the financial sector to support opposition-led party narratives creates unnecessary public inconvenience and hurts economic productivity.


सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (PSBs) में ट्रेड यूनियनों द्वारा की जाने वाली राष्ट्रव्यापी हड़तालों और उनके राजनीतिक व गैर-बैंकिंग मुद्दों से जुड़ाव को लेकर भारत में लंबे समय से बहस चल रही है।

आलोचकों और सरकार के प्रतिनिधियों का अक्सर यह आरोप रहा है कि यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस (UFBU), ऑल इंडिया बैंक एम्प्लॉईज एसोसिएशन (AIBEA) और बैंक एम्प्लॉईज फेडरेशन ऑफ इंडिया (BEFI) जैसी वामपंथी विचारधारा से प्रभावित बैंक यूनियनें बैंक कर्मचारियों की एकजुटता का उपयोग राजनीतिक विरोध प्रदर्शनों, जैसे कि किसान आंदोलन, नागरिकता संशोधन कानून (CAA) विरोधी प्रदर्शनों और अन्य गैर-बैंकिंग मुद्दों के समर्थन में करती हैं।

नीचे पिछले कुछ दशकों में गैर-बैंकिंग और राजनीतिक मुद्दों पर हुई प्रमुख बैंक हड़तालों का कालानुक्रमिक (Chronological) विवरण और इस विषय से जुड़ा एक विस्तृत विश्लेषण दिया गया है:

पृष्ठभूमि: बैंक हड़तालें और राजनीतिक एजेंडा (Background)

भारतीय बैंकिंग इतिहास में द्विपक्षीय वेतन समझौतों (Bipartite Wage Settlements), 5-डे बैंकिंग (5-Day Week) और पेंशन अपडेशन जैसे बैंक-विशिष्ट मुद्दों पर हड़ताल होना एक सामान्य प्रक्रिया रही है। हालांकि, ट्रेड यूनियन आंदोलन की प्रकृति ऐसी है कि केंद्रीय ट्रेड यूनियनों (जैसे CITU, AITUC) से संबद्ध बैंक यूनियनें अक्सर सरकार की आर्थिक नीतियों, श्रम संहिताओं (Labour Codes) और अन्य विधायी विधेयकों का विरोध करने के लिए 'भारत बंद' या सामान्य हड़तालों में शामिल होती रही हैं।

आलोचकों के अनुसार, इससे बैंकिंग सेवाओं पर बुरा असर पड़ता है और आम जनता को असुविधा होती है, जबकि यूनियनों का तर्क है कि वे व्यापक कामकाजी वर्ग के हितों की रक्षा के लिए ऐसा करते हैं।

गैर-बैंकिंग मुद्दों पर हुई हड़तालों का वर्षवार विवरण (Examples of Non-Bank Issue Strikes)
विभिन्न मीडिया रिपोर्टों और सरकारी बयानों के अनुसार, पिछले दो-तीन दशकों में गैर-बैंकिंग और नीति-आधारित मुद्दों पर हुई प्रमुख हड़तालें इस प्रकार हैं:

• वर्ष 2015 और 2016 (श्रम सुधार और विनिवेश विरोध): केंद्र में एनडीए सरकार के आने के बाद, सितंबर 2015 और सितंबर 2016 में देशव्यापी हड़तालें बुलाई गईं। बैंकों के यूनियनों ने इनमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। इन हड़तालों का मुख्य उद्देश्य सरकार की श्रम नीतियों, सार्वजनिक उपक्रमों के विनिवेश (Disinvestment) और विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) के नियमों में बदलाव का विरोध करना था।
• सांख्यिकी/प्रभाव: इन हड़तालों के कारण देश के अधिकांश सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में कामकाज पूरी तरह ठप रहा और चेक क्लियरिंग से लेकर नकदी लेनदेन तक अरबों रुपये का वित्तीय नुकसान दर्ज किया गया।

• वर्ष 2020 (CAA-NRC विरोध और आर्थिक नीतियां): जनवरी 2020 में केंद्रीय ट्रेड यूनियनों द्वारा बुलाई गई देशव्यापी हड़ताल में बैंक यूनियनों ने भी भाग लिया।
• मुद्दा: बैंकिंग मांगों के साथ-साथ इस हड़ताल में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) का राजनीतिक विरोध भी शामिल था।
• सांख्यिकी/प्रभाव: देश भर में लगभग 2.5 लाख से अधिक बैंक कर्मचारी इस विरोध प्रदर्शन में शामिल हुए, जिससे सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की शाखाओं में सेवाएं प्रभावित हुईं।

• वर्ष 2020-2022 (किसान आंदोलन और श्रम संहिताएं): नवंबर 2020 और मार्च 2022 में आयोजित राष्ट्रीय हड़तालों में वामपंथी विचारधारा समर्थित बैंक यूनियनों ने हिस्सा लिया।
• मुद्दा: यह हड़ताल प्रमुख रूप से केंद्र सरकार के तीन कृषि कानूनों (Kisan Bill) के विरोध में चल रहे किसान आंदोलनों के समर्थन में और नई चार श्रम संहिताओं (Labour Codes) को वापस लेने की मांग को लेकर की गई थी।
• सांख्यिकी/प्रभाव: मार्च 2022 की दो दिवसीय हड़ताल में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के लाखों कर्मचारियों की भागीदारी के कारण देश भर में बैंकिंग सेवाएं आंशिक या पूर्ण रूप से बाधित रहीं।

• वर्ष 2026 (व्यापार समझौते और कृषि-विरोध): फरवरी 2026 में संयुक्त केंद्रीय ट्रेड यूनियनों और किसान संगठनों द्वारा बुलाए गए भारत बंद में कुछ प्रमुख बैंक यूनियनों ने भी एकजुटता दिखाई। इसका मुख्य उद्देश्य प्रस्तावित अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौतों और कृषि बाजार नीतियों का विरोध करना था।
बैंक कर्मचारियों की विश्वसनीयता और आम जनता के दृष्टिकोण पर विश्लेषण

आर्थिक विश्लेषकों, बैंकिंग उपभोक्ताओं और सरकार के थिंक-टैंकों द्वारा अक्सर बैंक कर्मचारियों और उनकी यूनियनों के समक्ष कुछ महत्वपूर्ण चिंताएं उठाई जाती हैं, जिन्हें ध्यान में रखना देश के विकास और सार्वजनिक तंत्र के लिए आवश्यक है:

• देश के विकास कार्यों में बाधा: बैंक देश की आर्थिक रीढ़ होते हैं। बैंकिंग सेवाओं के ठप होने से केंद्र और राज्य सरकारों के विकास कार्य, बुनियादी ढांचा (Infrastructure) परियोजनाएं और डिजिटल लेनदेन प्रभावित होते हैं। विकास कार्यों में इस प्रकार की रुकावट से देश की आर्थिक प्रगति धीमी होती है।

• आम जनता की असुविधा और नाराजगी: बैंक हड़ताल का सीधा असर दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों, छोटे व्यापारियों, वरिष्ठ नागरिकों (पेंशनभोगियों) और आम उपभोक्ताओं पर पड़ता है। जब गैर-बैंकिंग या शुद्ध रूप से राजनीतिक मुद्दों पर बैंक बंद होते हैं, तो आम जनता को भारी मानसिक और वित्तीय परेशानी का सामना करना पड़ता है, जिससे समाज में बैंक कर्मचारियों के प्रति असंतोष और नाराजगी (Hate/Anger) बढ़ने का खतरा रहता है।

• विश्वसनीयता दांव पर: बैंक कर्मचारियों को समाज में एक उच्च शिक्षित और जिम्मेदार नागरिक माना जाता है। यदि उनकी यूनियनों का उपयोग राजनीतिक दलों के एजेंडे को आगे बढ़ाने या सरकारों को प्रभावित करने के लिए किया जाता है, तो बैंक स्टाफ की तटस्थता और विश्वसनीयता (Credibility) पर सवाल उठने लगते हैं।

निष्कर्ष: बैंक यूनियनों और कर्मचारियों के लिए यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि वे अपनी जायज मांगों (जैसे वेतन वृद्धि, पेंशन सुधार और कार्य परिस्थितियों में सुधार) के लिए लोकतांत्रिक तरीकों का उपयोग करें, परंतु राजनीतिक रूप से प्रेरित और गैर-बैंकिंग मुद्दों वाली हड़तालों से दूरी बनाए रखें। बैंक कर्मचारियों को सतर्क रहना चाहिए ताकि उनकी एकता का उपयोग किसी राजनीतिक एजेंडे के लिए न हो सके, और वे देश के आर्थिक विकास तथा आम जनता के भरोसे को बनाए रखने में अपना योगदान देते रहें।

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