Thursday, October 29, 2026

बुढ़ापा 60 की उम्र से नहीं

 


डॉ. प्रसून चटर्जी भारत के एक प्रमुख जेरियाट्रिशियन (वृद्ध-रोग विशेषज्ञ), दीर्घायु चिकित्सा (longevity medicine) विशेषज्ञ और शिक्षाविद हैं। उन्हें बुजुर्गों के स्वास्थ्य प्रबंधन, डिमेंशिया की देखभाल और स्वस्थ बुढ़ापे (healthy aging) के क्षेत्र में 20 वर्षों से अधिक का क्लिनिकल और शोध अनुभव है।

मुख्य विवरण और योग्यताएं

• विशेषज्ञता: जेरियाट्रिक मेडिसिन (वृद्ध-रोग चिकित्सा), दीर्घायु विज्ञान (longevity science), याददाश्त संबंधी विकार/डिमेंशिया, और व्यापक जेरियाट्रिक मूल्यांकन (CGA)
Listen podcast with Dr Prasoon Chaterjee

इस पॉडकास्ट में जाने-माने जिरियाटिशियन डॉक्टर प्रसून चटर्जी ने लंबी और स्वस्थ उम्र जीने के तरीकों पर विस्तार से चर्चा की है।

 उन्होंने बताया कि एजिंग यानी बुढ़ापा सिर्फ उम्र बढ़ने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह काफी हद तक हमारे लाइफस्टाइल और जींस पर निर्भर करती है। 

डॉक्टर साहब ने हेल्थ स्पैन यानी बीमारी-मुक्त जीवन को बेहतर बनाने के लिए संतुलित खान-पान, फर्मेंटेड फूड, और नियमित शारीरिक गतिविधियों को बहुत महत्वपूर्ण बताया है।

 इसके अलावा, उन्होंने गट हेल्थ यानी पाचन तंत्र की सेहत और तनाव के बीच के गहरे संबंध को समझाते हुए कहा कि मानसिक शांति और पर्याप्त नींद के बिना लंबी उम्र पाना मुश्किल है। अंत में, उन्होंने बुजुर्गों की देखभाल के लिए '7 एम' (याददाश्त, मूड, मांसपेशियां, दवाइयां, गट माइक्रोबायोम, प्रेरणा और गतिशीलता) का जिक्र करते हुए आज से ही स्वस्थ आदतें अपनाने की सलाह दी है।


क्या आपका पेट (Gut) आपको समय से पहले बूढ़ा बना रहा है? डॉ. प्रसून चटर्जी से जानें 100 साल स्वस्थ जीने के 6 सबसे हैरान करने वाले रहस्य

1. प्रस्तावना: एजिंग और लोंजिविटी की नई परिभाषा

क्या 60, 70 या 80 की उम्र के बाद भी एक्टिव, इंडिपेंडेंट और मेंटली फिट रहना मुमकिन है? क्या एजिंग सचमुच 60 की उम्र में पहुंचने के बाद ही शुरू होती है, या फिर इसकी तैयारी बहुत पहले से होने लगती है? अक्सर हम बुढ़ापे को सिर्फ शारीरिक कमजोरी, बार-बार गिरने, याददाश्त की कमी और ढलती उम्र के एक स्वाभाविक चरण के रूप में देखते हैं। लेकिन आधुनिक जिरियाट्रिक मेडिसिन (Geriatric Medicine) और दीर्घायु विज्ञान के अनुसार, एजिंग केवल बुढ़ापे की अवस्था का नाम नहीं है, बल्कि यह मां के गर्भ से शुरू होकर जीवनभर चलने वाली एक निरंतर जैविक प्रक्रिया है।

भारत के जाने-माने जिरियाटिशियन (Geriatrician) और 'हेल्थ एंड वेल बीइंग इन लेट लाइफ' पुस्तक के लेखक डॉ. प्रसून चटर्जी का मानना है कि बुढ़ापे में बीमारियों के साथ जीने के बजाय, हमें 'स्मार्ट एजिंग' का मार्ग चुनना चाहिए। डॉ. चटर्जी वर्षों से बुजुर्गों के स्वास्थ्य, फंक्शनल मेडिसिन और लोंजिविटी (दीर्घायु) पर शोध कर रहे हैं।

इस लेख में हम डॉ. प्रसून चटर्जी के अनुभवों और वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित 6 सबसे प्रभावशाली और सिद्ध 'स्मार्ट एजिंग' टिप्स साझा करने जा रहे हैं, जो आपको 100 साल की उम्र तक बिना किसी गंभीर बीमारी के एक स्वस्थ, ऊर्जावान और आत्मनिर्भर जीवन जीने का वैज्ञानिक मार्ग दिखाएंगे।

2. बुढ़ापा 60 की उम्र से नहीं, मां के गर्भ से ही शुरू हो जाता है

आमतौर पर माना जाता है कि बुढ़ापा 50 या 60 की उम्र के बाद चेहरे की झुर्रियों और बालों के सफेद होने से दिखाई देने लगता है। हालांकि, जैविक स्तर पर एजिंग की शुरुआत तब से होती है जब बच्चा मां के पेट (गर्भ) में होता है।

हमारे शरीर में लगभग 37 ट्रिलियन कोशिकाएं (Cells) होती हैं। हर कोशिका की एक निश्चित जीवन-अवधि होती है—यह जन्म लेती है, अपना कार्य करती है और समय के साथ इसकी मृत्यु हो जाती है, जिसके बाद नई कोशिकाएं बनती हैं। कोशिकाओं के जन्म और मृत्यु की यह गति मुख्य रूप से हमारी जीवनशैली और मानसिक स्थिति पर निर्भर करती है। डॉ. प्रसून चटर्जी के अनुसार, हमारी उम्र और स्वास्थ्य को निर्धारित करने वाले तीन मुख्य कारक हैं:

  1. नेचर (Nature): यह हमारी आनुवंशिकी (Genetics) है, जो हमें अपने माता-पिता से मिलती है। यह हमारी उम्र और सेहत को लगभग 50% तक प्रभावित करती है।
  2. नर्चर (Nurture): यह हमारी जीवनशैली, पर्यावरण और खान-पान है। बचपन से ही हम खुद को कैसे ढालते हैं—जैसे अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड से बचना और अनुशासित जीवन जीना—वह हमारे 'नर्चर' का हिस्सा है।
  3. चांस (Chance): इसमें जीवन में अचानक होने वाली अनपेक्षित घटनाएं या जेनेटिक बदलाव (Genetic Aberrations) शामिल हैं, जिन पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं होता।

आज के समय में बचपन से ही बच्चों पर अत्यधिक महत्वाकांक्षा (High Ambition) का जो सामाजिक दबाव डाला जाता है, वह शरीर में लगातार जैविक तनाव (Cellular Stress) पैदा करता है। यह बिना प्रबंधित तनाव हमारी कोशिकाओं को समय से पहले बूढ़ा बना देता है।

"जिस तरह एक पुराने क्लासिक वाहन को मजबूत और सुचारू बनाए रखने के लिए समय-समय पर उसकी सर्विसिंग और ट्यूनिंग की जरूरत होती है, उसी तरह हमारे शरीर और ब्रेन रूपी सुपरकंप्यूटर को भी देखभाल और सही फ्यूल की जरूरत होती है।" — डॉ. प्रसून चटर्जी

3. 'लाइफस्पैन' नहीं, 'हेल्थस्पैन' बढ़ाना असली लोंजिविटी है

वैज्ञानिक संदर्भ में 'लाइफस्पैन' (Lifespan) और 'हेल्थस्पैन' (Healthspan) के बीच एक बड़ा अंतर है। लाइफस्पैन का अर्थ है आपके जीवित रहने के कुल वर्ष, जबकि हेल्थस्पैन का अर्थ है बीमारी-मुक्त और गुणवत्तापूर्ण जीवन के वर्ष।

आज के आधुनिक चिकित्सा युग में व्यक्ति 40 की उम्र में हाई ब्लड प्रेशर, 50 में शुगर, 60 में हार्ट अटैक और 80 में डिमेंशिया से जूझते हुए भी आधुनिक चिकित्सा सेवाओं के सहारे 100 वर्ष तक जीवित रह सकता है। लेकिन इसे वास्तविक लोंजिविटी नहीं कहा जा सकता। लोंजिविटी का वास्तविक उद्देश्य अपने 'हेल्थस्पैन' को बढ़ाना है ताकि जीवन का अंतिम दौर भी बिना किसी गंभीर बीमारी के बीते।

  • वैश्विक आंकड़े: दुनिया भर के आंकड़ों के अनुसार, इस समय लगभग 6.5 से 7.5 लाख लोग ऐसे हैं जो 100 वर्ष से अधिक (Centenarians) आयु के हैं और पूरी तरह स्वस्थ हैं। इनमें से लगभग 80,000 से 90,000 लोग केवल भारत में हैं।
  • ब्लू ज़ोन और प्राकृतिक जीवन: दुनिया के 5 'ब्लू ज़ोन्स' (Blue Zones) और हमारे प्राचीन साधु-संतों का जीवन प्रमाण है कि 100 वर्ष तक बिना बीमारी के जीना कोई असंभव चमत्कार नहीं है। जब हम प्रकृति के अनुशासन और नियमों का पालन करते हैं—कम खाते हैं, अधिक पैदल चलते हैं और तनाव से दूर रहते हैं—तो 100 साल तक स्वस्थ जीना अत्यंत सरल हो जाता है।

4. आपके गट (Gut Microbiome) में छिपा है लंबी उम्र का राज: ब्रेन-गट एक्सेस

मानव शरीर की पाचन प्रणाली और कोलन (Colon) में लगभग 100 ट्रिलियन गट माइक्रोबायोम (Gut Microbiome) पाए जाते हैं। यह सूक्ष्मजीवों की एक विशाल और विविध आबादी है, जो हमारी सेहत को कई तरीकों से नियंत्रित करती है:

  • गट माइक्रोबायोम के कार्य: यह आंत की सुरक्षात्मक परत (Gut Barrier) को बनाए रखते हैं, जटिल स्टार्च और हरी सब्जियों के उन हिस्सों को पचाते हैं जिन्हें शरीर सीधे नहीं पचा सकता, और हमारे इम्यून सिस्टम को मजबूत रखते हैं। जब यह बैरियर कमजोर होता है, तो 'लीकी गट' (Leaky Gut) की समस्या होती है, जिससे आंतों की सूजन पूरे शरीर में फैलकर गंभीर बीमारियों का कारण बनती है (जैसा कि गंभीर कोविड मरीजों में देखा गया था)।
  • ब्रेन-गट एक्सेस (Brain-Gut Axis): पाचन तंत्र केवल खाना नहीं पचाता, बल्कि यह मस्तिष्क से सीधा संवाद करता है। शरीर का 90% सेरोटोनिन (Happy Hormone) और मेलाटोनिन (नींद का हार्मोन) गट के निर्देशों और गट बैक्टीरिया द्वारा ही निर्मित होता है।
  • अत्यधिक महत्वाकांक्षा और तनाव का प्रभाव: बचपन या युवावस्था से लिया जाने वाला अत्यधिक मानसिक तनाव हमारे गट माइक्रोबायोम की विविधता को नष्ट कर देता है, जिससे गट बैरियर कमजोर होता है और बुढ़ापा तेजी से आने लगता है।

गट स्वास्थ्य के लिए क्या खाएं और किससे बचें:

  • उत्तम आहार (Good Foods): फर्मेंटेड फूड जैसे दही, छाछ, योगर्ट, फर्मेंटेड राइस (जैसे पारंपरिक पांता भात), उबली हुई सब्जियां, हरी पत्तेदार साग और ताजे फल।
  • हानिकारक आहार (Bad Foods): अत्यधिक चीनी (Sugar), अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड और अत्यधिक मानसिक तनाव।

"100 से अधिक वर्ष जीने वाले स्वस्थ लोगों (Centenarians) के गट में बिफिडोबैक्टीरियम (Bifidobacterium), लैक्टोबैसिलस (Lactobacillus) और एकरमेनसिया (Akkermansia) जैसे हेल्दी बैक्टीरिया की मात्रा सबसे ज्यादा पाई जाती है।" — डॉ. प्रसून चटर्जी

5. 5 से ज्यादा दवाइयां लेना 'कारपेट बॉम्बिंग' है, सटीक इलाज नहीं

वृद्धजनों में एक साथ कई दवाइयों के सेवन (Polypharmacy) की प्रवृत्ति एक गंभीर समस्या बनती जा रही है। जब किसी बुजुर्ग को 5, 10 या 14 अलग-अलग गोलियां दी जाती हैं, तो यह स्वास्थ्य में सुधार करने के बजाय नुकसान पहुंचा सकती हैं।

  • सर्जिकल स्ट्राइक बनाम कारपेट बॉम्बिंग: डॉ. चटर्जी के अनुसार, यदि किसी बुजुर्ग को 5 से अधिक दवाइयां दी जा रही हैं, तो इसका अर्थ है कि बीमारी की मूल जड़ का सटीक निदान (Diagnosis) नहीं हो सका है। बिना सही निदान के ढेर सारी दवाइयां देना 'कारपेट बॉम्बिंग' के समान है। इसके विपरीत, सटीक बीमारी को पहचानकर 2 या 3 मुख्य दवाइयां देना 'सर्जिकल स्ट्राइक' कहलाता है।
  • दवाइयों के साइड इफेक्ट्स: अत्यधिक दवाइयों के सेवन से गट माइक्रोबायोम बुरी तरह प्रभावित होते हैं, जिससे बुजुर्गों में चक्कर आना, कब्ज, नींद न आना और शारीरिक संतुलन बिगड़ने जैसी समस्याएं पैदा हो जाती हैं।
  • 3.4 बिलियन धड़कनों का गणित: डॉ. चटर्जी के अनुसार, मानव हृदय को प्रकृति से 100 साल के जीवनकाल में लगभग 3.4 बिलियन (340 करोड़) बार धड़कने की क्षमता मिलती है। अत्यधिक तनाव और बिना सोचे-समझे ली गई दवाइयों के दुष्प्रभावों से हमारी पल्स रेट (हृदय गति) लगातार बढ़ी रहती है। जिस प्रकार हाइबरनेशन में जाने वाले कछुए अपनी हृदय गति धीमी रखकर लंबा जीवन जीते हैं, उसी प्रकार हमें भी बेवजह के तनाव और गोलियों के बोझ से बचकर अपने हृदय की धड़कनों के इस रिजर्व को बचाना चाहिए।

6. बुजुर्गों की सेहत परखने का '7 Ms' फॉर्मूला और सिंपल 'चेयर टेस्ट'

अत्यधिक दवाइयां देने के बजाय, डॉ. प्रसून चटर्जी बुजुर्गों और 65 वर्ष से अधिक उम्र के माता-पिता की समग्र सेहत का सटीक निदान करने के लिए '7 Ms' का एक व्यापक फॉर्मूला अपनाते हैं:

  1. Memory (याददाश्त): क्या वे हाल की घटनाएं भूल रहे हैं या एक ही सवाल बार-बार दोहरा रहे हैं?
  2. Mood (मन/मूड): क्या उनमें उदासी, चिड़चिड़ापन या सामाजिक अलगाव (Isolation) के लक्षण हैं?
  3. Muscle (मांसपेशियां): मांसपेशियों के क्षय (सारकोपेनिया / Sarcopenia और Frailty) की जांच करना।
  4. Medication (दवाइयां): यह सुनिश्चित करना कि दवाइयों की संख्या 5 से कम हो।
  5. Microbiome (गट स्वास्थ्य): स्टूल मेटाजीनोमिक्स (Stool Metagenomics) जैसे आधुनिक परीक्षणों से गट बैक्टीरिया के संतुलन को समझना और आहार तय करना।
  6. Motivation (जिंदगी जीने की इच्छा): जीवन के प्रति उनका उत्साह, उद्देश्य और जीने की इच्छा कितनी है।
  7. Mobility (गतिशीलता): बिना किसी सहायता के स्वतंत्र रूप से चलने-फिरने की क्षमता।

क्विक टेस्ट (The Chair Test): मांसपेशियों की ताकत और मोबिलिटी जांचने का एक बेहद सरल तरीका है 'चेयर टेस्ट'। यदि कोई बुजुर्ग किसी कुर्सी से बिना हाथों का सहारा लिए सीधे खड़े हो सकते हैं, तो उनकी मांसपेशियों की ताकत और मोबिलिटी बेहतर स्थिति में है।

7. 100 साल तक एक्टिव रहने का 'स्मार्ट एजिंग' डेली रूटीन

डॉ. प्रसून चटर्जी ने दीर्घायु और निरोगी जीवन के लिए दैनिक दिनचर्या के 5 सबसे सरल, व्यावहारिक और वैज्ञानिक नियम बताए हैं:

  • 7 घंटे की गहरी नींद: प्रतिदिन 7 घंटे की नींद अनिवार्य है। नींद की कमी (Sleep Debt) आपके जीवन के वर्षों को सीधे कम करती है। यदि आप लगातार 2 घंटे कम सोते हैं (यानी केवल 5 घंटे की नींद लेते हैं), तो आपकी संभावित जीवन-अवधि 100 वर्ष से घटकर 90 वर्ष तक (10 साल कम) हो सकती है।
  • 14 घंटे की इंटरमिटेंट Fasting: शाम 6 बजे तक अपना डिनर समाप्त कर लें और अगली सुबह 8 बजे नाश्ता करें। यह 14 घंटे का प्राकृतिक उपवास शरीर और गट माइक्रोबायोम को पुनर्जीवित करता है।
  • भोजन के बाद 10 मिनट की वॉक: दिन में कम से कम 30 मिनट टहलें। विशेष रूप से हर मील (नाश्ता/खाना) के बाद 10 मिनट की हल्की वॉक करें।
    • मसल का ग्लूकोज रिजर्व नियम: मांसपेशियां केवल चलने-फिरने का अंग नहीं हैं, बल्कि ये शरीर में अतिरिक्त ग्लूकोज को जमा करने का प्राथमिक स्टोरहाउस (Reservoir) भी हैं। खाना खाने के तुरंत बाद 10 मिनट टहलने से रक्त में मौजूद ग्लूकोज पहले इस्तेमाल हो जाता है। इसके बाद मांसपेशियां भोजन से मिलने वाले प्रोटीन का बेहतर अवशोषण और उपयोग कर पाती हैं, जिससे कार्बोहाइड्रेट फैट में बदलने के बजाय मसल बिल्डिंग में काम आता है।
  • प्रोटीन का सही नियम: अपने शरीर के प्रति किलो वजन के हिसाब से 1 ग्राम प्रोटीन प्रतिदिन लें (जैसे 60 किग्रा वजन वाले व्यक्ति को 60 ग्राम प्रोटीन चाहिए)।
    • किडनी मरीजों के लिए विशेष चेतावनी: किडनी की बीमारी से पीड़ित मरीजों को प्रोटीन का सेवन घटाकर 0.6 ग्राम प्रति किग्रा करना होता है, और यह केवल अपने डॉक्टर की देखरेख में ही किया जाना चाहिए।
    • व्यायाम का संयोजन: केवल प्रोटीन खाना काफी नहीं है। मांसपेशियों द्वारा प्रोटीन के उपयोग के लिए हफ्ते में कम से कम 2 दिन प्रतिरोधी व्यायाम (Resistive Exercise/Weight Training) और रोज भोजन के बाद वॉक करना बेहद आवश्यक है।
  • सकारात्मक माइंडसेट: आंतरिक प्रसन्नता (Happiness Within), बिना किसी स्वार्थ के दूसरों की मदद करना, स्पिरिचुअल होना और जीवन में कृतज्ञता (Gratitude) का भाव रखना आपकी कोशिकाओं की उम्र को धीमा कर देता है।

8. निष्कर्ष: आपकी स्मार्ट एजिंग की शुरुआत आज से है

उम्र के बढ़ने (Biological Aging) को पूरी तरह रोक पाना प्रकृति के नियमों के विरुद्ध है, लेकिन हमारी एजिंग की प्रक्रिया कैसी होगी—बीमारियों से भरी या ऊर्जावान और स्वतंत्र—यह काफी हद तक हमारे अपने हाथों में है। 'स्मार्ट एजिंग' का तात्पर्य केवल अधिक वर्षों तक जीना नहीं है, बल्कि जीवन के अंतिम दौर तक मानसिक रूप से सजग, शारीरिक रूप से एक्टिव और दूसरों पर निर्भर हुए बिना जीना है।

यदि आपकी उम्र आज 40 या 50 वर्ष है, तो 60 का होने का इंतजार न करें। अपनी नींद, आहार, एक्सरसाइज और मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देना आज से ही शुरू करें।

एक विचारोत्तेजक सवाल: क्या आप अपने जीवन में केवल साल जोड़ना चाहते हैं, या अपने सालों में स्वस्थ और खुशहाल जीवन जोड़ना चाहते हैं? आज से आप अपने या अपने बुजुर्गों के स्वास्थ्य का कौन सा 'M' सुधारने जा रहे हैं?

No comments:

Post a Comment