दर्द का कारण और निवारण
शरीर के किसी भी अंग का दर्द पीड़ित को बहुत कष्ट देता है और पीड़ित उस दर्द से शीघ्र से शीघ्र छुटकारा पाने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहता है। उसकी इस प्रवृत्ति का बहुत से दुष्ट लोग बहुत दुरुपयोग करते हैं और पीड़ित का बहुत-सा धन इसी बहाने ऐंठ लेते हैं। दर्द अपने आप में कोई रोग नहीं है, बल्कि किसी रोग का लक्षण होता है।
कई बार पीड़ित व्यक्ति स्वयं किसी दर्दनाशक दवा का सेवन कर लेता है, जिससे उसे प्रायः तत्काल आराम मिल भी जाता है। इसका कारण यह है कि दर्दनाशक दवाएँ प्रायः एक प्रकार का नशा होती हैं, जो पीड़ित के मस्तिष्क को इस प्रकार प्रभावित कर देती हैं कि उसे दर्द का अनुभव नहीं होता या कम होता है।
बहुत सी दर्शनाशक दवाएँ प्रायः दर्द की सूचना मस्तिष्क को देनेवाले नाड़ीतंत्र को निष्क्रिय या निर्बल कर देती हैं, जिससे मस्तिष्क को उस दर्द की सूचना नहीं मिल पाती। किसी ऑपरेशन के समय रोगी को बेहोश करने वाली दवायें और स्थानीय निश्चेतना (लोकल एनेस्थीसिया) देनेवाली दवायें भी इसी सिद्धान्त पर कार्य करती हैं।
दर्दनाशक दवा चाहे किसी भी प्रकार की हो, यह तो निश्चित है कि वे दर्द को दूर नहीं करतीं, बल्कि उसका अनुभव पीड़ित को कम हो या बिल्कुल न हो, यही कार्य करती हैं। कुछ समय बाद जब उस दवा का प्रभाव कम हो जाता है, तो पीड़ित को दर्द फिर अनुभव होने लगता है, क्योंकि दर्द का मूल कारण तो दूर होता ही नहीं। पीड़ित प्रायः फिर वह दवा लेता है और कुछ अधिक मात्रा में लेता है। अन्ततः ऐसी स्थिति आ जाती है कि वे दर्दनाशक दवायें भी निष्प्रभावी हो जाती हैं अर्थात् उनसे दर्द का अनुभव भी बन्द नहीं होता। उलटे उन दवाओं के जो हानिकारक पार्श्वप्रभाव (साइडइफैक्ट) होते हैं, रोगी उनसे भी पीड़ित हो जाता है।
इसलिए यह बात स्पष्ट रूप से समझ लीजिए कि दर्द की कोई दवा नहीं होती और जब तक दर्द के मूल कारण को दूर न किया जाये, तब तक वह दर्द किसी भी तरह समाप्त नहीं हो सकता। किसी भी दर्द को समाप्त करने के लिए उसके मूल कारण को समाप्त करना अनिवार्य है। इसलिए पहले यह देखना चाहिए कि वह दर्द किस कारण से हो रहा है और उस कारण को दूर करने का प्रयास करना चाहिए।
किसी प्रकार के दर्द से पीड़ित लोग उसको दूर करने के लिए प्रायः डॉक्टरों, फिजियोथेरापिस्टों, हाड़-वैद्यों या मालिशकर्ताओं के पास जाते हैं, जो पीड़ित के अज्ञान का लाभ उठाकर उनको खूब लूटते हैं। ऐसे लोगों की फीस प्रतिदिन सैकड़ों रुपयों के लेकर हजारों रुपयों तक होती है और ऐसी चिकित्सा प्रायः महीनों तक चलती है, जिससे रोगी आर्थिक रूप से बर्बाद हो जाता है। यदि पीड़ित को दर्द का मूल कारण दूर करने के उपायों का ज्ञान हो, तो वह इन अनावश्यक खर्चों या लूट से बचा रह सकता है।
दर्द अनेक प्रकार के होते हैं, जैसे सिरदर्द, पेटदर्द, दाँत दर्द, हाथ-पैरों के दर्द, घुटनों के दर्द आदि। हर प्रकार के दर्द का अपना अलग कारण होता है, इसलिए उसका उपचार भी अलग होता है। अलग-अलग प्रकार के दर्द का एक ही उपचार नहीं हो सकता। कई शारीरिक दर्द किसी रोग के कारण होते हैं, जैसे गुर्दों का दर्द प्रायः उनमें बनी पथरी के कारण होता है। ऐसी स्थिति में उस रोग की ही चिकित्सा करनी चाहिए। रोग ठीक हो जाने पर उसके कारण उत्पन्न हुआ दर्द भी चला जाता है।
दर्द प्रायः दो प्रकार के होते हैं- नया और पुराना। नया दर्द प्रायः अचानक कहीं चोट लग जाने या थकान हो जाने या गलत खान-पान के कारण होता है, जबकि पुराने दर्द प्रायः पुराने रोगों या नसों और माँसपेशियों में आयी विकृतियों के कारण होते हैं, जो गलत जीवनशैली के परिणाम होते हैं। नये दर्दों को घरेलू और प्राकृतिक उपायों से शीघ्र दूर किया जा सकता है, जबकि पुराने दर्दों को दूर करने के लिए अधिक समय, परिश्रम और धैर्य की आवश्यकता होती है।
इस लेखमाला में हम विभिन्न प्रकार के शारीरिक दर्दों की चर्चा करेंगे और उनको दूर करने के सरल और घरेलू उपाय बतायेंगे, ताकि आप कोई दर्द होेने पर सरलता से उसे दूर कर सकें। ये सभी उपाय मेरे द्वारा स्वयं पर तथा अन्य लोगों पर आजमाये हुए हैं, इसलिए आप इनके प्रभावी होने पर विश्वास कर सकते हैं। फिर भी यदि किसी कारणवश इन उपायों से कोई दर्द पर्याप्त समय तक प्रयास करने पर भी दूर नहीं होता, तो आपको निस्संकोच विशेषज्ञों की शरण में जाना चाहिए। ऐसी स्थिति में दर्द सहन करते रहना उचित नहीं है।
*दर्दमुक्त जीवन
*सिरदर्द और माइग्रेन*
सबसे पहले हम चर्चा कर रहे हैं- सिरदर्द की, जो सबसे अधिक होनेवाली शिकायत है। सिरदर्द बहुत अधिक परेशान करने वाला दर्द होता है। आयुर्वेद के अनुसार सिरदर्द के 175 कारण हो सकते हैं, जैसे पेट की खराबी, अम्लपित्त, तनाव, थकान, कोई पुराना रोग आदि। सिरदर्द अपने आप में कोई रोग नहीं है, बल्कि किसी अन्य रोग का लक्षण या प्रमाण होता है। इसलिए सिरदर्द को दूर करने के लिए उसके मूल कारण की पहचान करना और उस कारण को समाप्त करना आवश्यक है। इसके बिना किसी भी दवा से सिरदर्द नहीं जा सकता।
सिरदर्द प्रायः दो प्रकार का होता है- अचानक हो जानेवाला और निरन्तर बना रहनेवाला। अचानक हो जानेवाला सिरदर्द प्रायः अधिक शारीरिक या मानसिक थकान के कारण होता है। मेरे एक मित्र एकाउंटेंट थे। शाम को 8 बजे कार्यालय से लौटने पर उनको बहुत सिरदर्द होता था, जो दो घंटे सोने के बाद ही सही होता था। ऐसे सिरदर्द से बचने के लिए हमें अपनी शक्ति से अधिक मानसिक या/और शारीरिक कार्य करने से बचना चाहिए तथा बीच-बीच में पर्याप्त विश्राम करना चाहिए।
ऐसे सिरदर्द के स्थानीय उपचार के रूप में माथे पर पर्याप्त ठंडे पानी में भिगोया कपड़ा या रूमाल लगभग 5 से 10 मिनट तक रखना चाहिए और शवासन में विश्राम करना चाहिए।
पुराने और निरन्तर बने रहनेवाले सिरदर्द का सबसे बड़ा और प्रमुख कारण है- पाचन शक्ति की गड़बड़ी। सिरदर्द प्रायः कब्ज अधिक पुराना पड़ जाने पर होता है और इस बात का परिचायक है कि आँतों में मल खतरनाक स्थिति तक सड़कर एकत्र हो चुका है, जिसे यदि तत्काल निकाला नहीं गया, तो वह अनेक रोगों का कारण बन सकता है, यहाँ तक कि जीवन को भी खतरा हो सकता है। इसलिए ऐसे सिरदर्द का इलाज कब्ज के इलाज के साथ प्रारम्भ करना चाहिए।
कब्ज के स्थायी उपचार के लिए प्रतिदिन प्रातः उठते ही गुनगुने जल में आधा नीबू निचोड़कर और एक चम्मच शहद मिलाकर पीना चाहिए और 5 मिनट बाद शौच जाना चाहिए। फिर शौच के बाद कम से कम 5 मिनट का ठंडा कटिस्नान लेना चाहिए या पेड़ू पर फ्रिज में जमायी हुई बर्फ लगानी चाहिए। इसके बाद पौंछकर टहलने निकल जाना चाहिए और सम्भव हो तो कुछ अन्य व्यायाम तथा प्राणायाम करने चाहिए। ऐसा प्रतिदिन करने से मात्र एक सप्ताह में ही सिरदर्द से मुक्ति मिल सकती है। इसके साथ ही यदि प्रारम्भ में ही दो-तीन दिन का उपवास या रसाहार कर लिया जाये, तो सिरदर्द से पूरी तरह मुक्ति मिलना सरल हो जाता है।
यदि सिरदर्द का कारण पेट की खराबी के अलावा कोई अन्य रोग है, तो उस रोग का प्राकृतिक अथवा आयुर्वेदिक उपचार करना चाहिए। इसके लिए विशेषज्ञ चिकित्सकों से सम्पर्क करना चाहिए।
यदि सिरदर्द अम्लपित्त (एसिडिटी) के कारण होता है, तो उसे दूर करने के लिए ऊपर बताये गये उपायों को करने के साथ-साथ सभी प्रकार की गर्म वस्तुओं जैसे चाय, कॉफी, दूध आदि से बचना चाहिए। यहाँ तक कि सब्जी भी ठंडी करके खानी चाहिए। इसके साथ ही मिर्च-मसालों से दूर रहना चाहिए और सदा शीतल जल पीना चाहिए। इससे अम्लपित्त एक माह में ही बहुत सीमा तक दूर हो जाता है और उसके साथ ही सिरदर्द भी चला जाता है।
*आधाशीशी का दर्द (माइग्रेन)*
आधाशीशी, जिसे माइग्रेन या अधकपारी भी कहते हैं, में सिर के एक हिस्से (दाएं या बाएं) में तीव्र, धड़कन वाला दर्द होता है। यह दर्द आमतौर पर कुछ घंटों से लेकर कई दिनों तक बना रह सकता है। इस दर्द का कारण पीड़ित के नाड़ीतंत्र की कमजोरी होती है। इसे दूर करने के लिए अपनी जीवनशैली में उचित बदलाव करना चाहिए, ताकि नाड़ीतंत्र को पर्याप्त विश्राम मिले।
माइग्रेन से मुक्ति पाने में ऊपर सामान्य सिरदर्द के लिए बताये गये उपचार के अलावा निम्न उपाय बहुत सहायक हो सकते हैं-
1. पर्याप्त जल पीना।
2. मिर्च मसालों से रहित शुद्ध सात्विक भोजन निर्धारित समय पर करना।
3. नाड़ीतंत्र की शान्ति के लिए शवासन में पर्याप्त विश्राम करना।
4. अनुलोम-विलोम प्राणायाम तथा भ्रामरी क्रियायें प्रतिदिन प्रातः और सायंकाल अवश्य करना।
5. कम से कम प्रतिदिन प्रातः और सायं 500 बार तालियाँ बजाना।
ये उपाय निरन्तर एक-दो माह करने पर ही सफलता प्राप्त होती है। गम्भीर स्थिति में किसी अनुभवी प्राकृतिक चिकित्सक की सलाह लेनी चाहिए। घ्यान रखें कि जिन कार्यों से माइग्रेन का दर्द बढ़ जाता है, उन कार्यों को करने से बचना चाहिए, जैसे तेज रोशनी में या तेज शोर के बीच रहना, दो भोजनों के बीच अधिक समय तक भूखा रहना आदि। बहुत से लोगों को भ्रम होता है कि सुबह सूर्योदय के समय गर्म जलेबी खाने से माइग्रेन ठीक होता है। यह मात्र अंधविश्वास है, ऐसी बातों से बचना चाहिए।
यदि सिरदर्द के साथ और कोई विशेष लक्षण है, जैसे आँखों से धुँधला दिखाई देना, अनियमित नींद आदि, तो तत्काल विशेषज्ञ चिकित्सकों से सलाह लेनी चाहिए। इसमें किसी भी तरह की असावधानी हानिकारक हो सकती है।
अगली कड़ी में हम पीठ के दर्द की
*दर्दमुक्त जीवन -
*पीठ का दर्द*
पिछली कड़ी में हमने सिरदर्द और माइग्रेन का प्राकृतिक उपचार बताया था। इस कड़ी में हम पीठ के दर्द की चर्चा करेंगे और उसका उपचार बतायेंगे। कमर का दर्द पीठ के दर्द से अलग होता है, क्योंकि जहाँ पीठ का दर्द पूरी पीठ पर होता है, वहीं कमर का दर्द केवल पीठ के सबसे निचले भाग में होता है। उसका उपचार भी कुछ अलग है। इसलिए हम उसकी चर्चा अलग से करेंगे।
पीठ का दर्द प्रायः रीढ़ की हड्डियों में किसी विकार के कारण होता है। हम जानते हैं कि हमारी रीढ़ हमारे शरीर का आधार है अर्थात् इसी पर हमारा सारा शरीर टिका होता है। यह रीढ़ अनेक छोटी-छोटी हड़िडयों या मनकों से बनी होती है, जो आपस में मिलकर एक नली (पाइप) का निर्माण करती हैं, जिसमें होकर हमारी सभी नाड़ियाँ जाती हैं। यदि किसी कारणवश रीढ़ कक इन मनकों के बीच का तालमेल बिगड़ जाता है अर्थात् यदि उनके बीच का रिक्तस्थान सामान्य से कम या अधिक होता है अथवा उनमें जकड़न आ जाती है, तो हमारी पीठ में दर्द होने लगता है। यह दर्द रीढ़ के ऊपरी, मध्य या निचले भागों में कहीं भी हो सकता है।
ऐसा प्रायः गलत प्रकार से उठने-बैठने और रीढ़ पर अनुचित दबाव डालने के कारण होता है। यह किसी चोट से भी हो सकता है। इसलिए इस दर्द से बचने के लिए हमें सदा अपनी रीढ़ को सीधा रखना चाहिए अर्थात् टेढ़े होकर कभी नहीं बैठना या सोना चाहिए और चलते समय भी रीढ़ को सीधा रखना चाहिए। इससे रीढ़ लचीली बनी रहती है। विशेष रूप से कुर्सी पर बैठकर कार्य करनेवालों को इस बात का ध्यान रखने की विशेष आवश्यकता होती है कि बैठते समय उनकी पीठ हमेशा सीधी रहे। इसके लिए कुर्सी के पीछे तकिया लगाना सहायक हो सकता है। इसके अलावा बीच-बीच में उठकर टहलना भी लाभदायक होता है।
अन्य चिकित्सा पद्धतियों में रीढ़ के दर्द का कोई उपचार नहीं है। वे अधिक से अधिक आपको पट्टा बाँधने और बिस्तर पर पड़े रहने की सलाह दे सकते हैं। कोई दवा इसमें कार्य नहीं करती। परन्तु प्राकृतिक चिकित्सा और योग चिकित्सा में रीढ़ के दर्द को दूर करना बहुत ही सरल है। हम योग के मर्कटासन पर आधारित रीढ़ के क्वीन और किंग एक्सरसाइज करके बहुत सरलता से इस दर्द से मुक्ति पा सकते हैं। ये व्यायाम करने की विधियाँ नीचे दी जा रही हैं और साथ में वीडियो भी दिया जा रहा है।
*क्वीन एक्सरसाइज-*
(1) चित लेट जाइये। हाथों को कंधों की सीध में दोनों ओर फैला लीजिए। पैरों को सिकोड़़कर घुटने ऊपर उठाकर मिला लीजिए। पैर जाँघ से सटे रहेंगे।
(2) अब दोनों घुटनों को एक साथ बायीं ओर ले जाकर जमीन पर रखिए और सिर को दायीं ओर घुमाकर ठोड़ी को कंधे से लगाइए।
(3) कुछ सेकण्ड इस स्थिति में रुककर घुटनों को घुमाते हुए दायीं ओर जमीन से लगाइए और सिर को घुमाते हुए ठोड़ी को बायें कंधे से लगाइए।
(4) इस तरह बारी-बारी से दोनों तरफ 10-10 बार कीजिए।
*किंग एक्सरसाइज-*
(1) क्वीन एक्सरसाइल की तरह ही लेट़कर घुटने ऊपर उठा लीजिए और पैरों में एक-डेढ़ फीट का अन्तर दीजिए।
(2) अब दोनों पैरों को एक साथ बायीं ओर ले जाकर जमीन से लगाइए और सिर को दायीं ओर घुमाकर ठोड़ी को कंधे से लगाइए। इस स्थिति में दायें पैर का घुटना बायें पैर की एड़ी को छूते रहना चाहिए।
(3) कुछ सेकण्ड इस स्थिति में रुककर घुटनों को उठाकर घुमाते हुए दायीं ओर जमीन से लगाइए और सिर को घुमाते हुए ठोड़ी को बायें कंधे से लगाइए। इस स्थिति में बायें पैर का घुटना दायें पैर की एड़ी को छूते रहना चाहिए।
(4) इस प्रकार बारी-बारी से दोनों तरफ 10-10 बार कीजिए।
इन व्यायामों को रोगी व्यक्ति भी अपने बिस्तर पर लेटे-लेटे कर सकता है और पर्याप्त लाभ उठा सकता है। यदि प्रारम्भ में आप इनको अच्छी तरह न कर सकें, तो भी चिन्ता की कोई बात नहीं। जिस तरह कर पाते हैं उसी तरह कीजिए और धीरे-धीरे इनकी पूर्णता तक पहुँचिये।
इन दोनों व्यायामों से रीढ़ बहुत लचीली हो जाती है, जिससे सभी रोगों से मुक्ति पाने में भारी सहायता मिलती है। पीठ का दर्द चाहे कितना भी पुराना हो, इन व्यायामों से दूर हो जाता है। यहाँ तक कि स्लिप डिस्क की समस्या भी इनसे हल हो जाती है। साधारण थकान के कारण शरीरं में जो दर्द होता है, वह भी इन व्यायामों से दूर हो जाता है और थकान गायब हो जाती है।
कभी-कभी थकान आने का कारण शरीर में पानी की कमी भी होती है। इसलिए हमें प्रतिदिन पर्याप्त मात्रा में और नियमित समय अन्तराल पर साधारण शीतल जल पीते रहना चाहिए। यह बहुत महत्वपूर्ण है।
पीठ के दर्द में सरसों के तेल से रीढ़ की नीचे से ऊपर और ऊपर से नीचे की ओर मालिश करने पर भी बहुत लाभ मिलता है। ऐसी मालिश किसी हितैषी व्यक्ति से ही करानी चाहिए। यदि शरीर में विटामिन डी की कमी हो, तो तेल मालिश के बाद सुहाती धूप में बैठना बहुत लाभदायक होता है।
अगली कड़ी में हम कमर के दर्द की चर्चा करेंगे।
*दर्दमुक्त जीवन - 4*
*कमर और कूल्हों का दर्द*
पिछली कड़ी में हमने पीठ के दर्द का प्राकृतिक उपचार बताया था। इस कड़ी में हम कमर और कूल्हों के दर्द की चर्चा करेंगे और उसका उपचार बतायेंगे।
कमर का दर्द प्रायः कमर पर अधिक जोर पड़ जाने, कोई झटका लग जाने, फिसलकर गिर जाने या गलत तरह से बैठने या लेटने के कारण होता है। बहुत देर तक बिस्तर पर पड़े रहना और व्यायाम न करना भी इसका कारण हो सकता है। कमर का दर्द पीठ के दर्द से भिन्न है। यह पीठ के सबसे निचले भाग में जहाँ हमारी रीढ़ कूल्हे की हड़्िडयों से जुड़ती है, वहाँ होता है, पर इसका प्रभाव कमर के दायें-बायें भी हो सकता है।
कमर के दर्द से पीड़ित व्यक्ति का उठना-बैठना तथा सीढ़ियाँ चढ़ना भी कठिन हो जाता है। इसलिए कमर में कोई पीड़ा हो जाने पर प्राथमिकता देकर उसका उपचार करना चाहिए। यह उपचार किसी दवा से नहीं हो सकता, बल्कि सही व्यायाम सही मात्रा में सही विधि से करने पर ही हो सकता है। यहाँ हम कमर के व्यायाम बता रहे हैं, जिनको प्रातःकाल और सायंकाल खाली पेट करने से कमर के दर्द से कुछ ही दिनो में मुक्ति पायी जा सकती है।
*कमर के व्यायाम*
(1) सीधे खड़े हो जाइए और पैरों को मिला लीजिए। दोनों हाथों को सीधे ऊपर उठाकर केवल अंगूठों को फँसा लीजिए। अब धीरे-धीरे कमर से बायीं ओर अधिक से अधिक झुकिये। इस स्थिति में कुछ सेकण्ड रुककर धीरे-धीरे पूर्व स्थिति में आ जाइए। अब इसी प्रकार कमर से दायीं ओर झुकिए। यह क्रिया 10-10 बार कीजिए। इस क्रिया को ‘चन्द्रासन’ कहते हैं।
(2) पैरों में एक-सवा फीट का अन्तर देकर सीधे खड़े हो जाइए और हाथों को कंधों की सीध में तान लीजिए। अब पैरों को जमाए रखकर बायीं ओर अधिक से अधिक घूमिये, इतना कि आपको पीठ से पीछे का सारा दृश्य दिखाई देने लगे। इस स्थिति में कुछ सेकण्ड रुकिए और फिर घूमते हुए पूर्व
स्थिति में आ जाइए। अब इसी तरह दायीं ओर घूमिए। यह क्रिया दोनों ओर बारी-बारी से 10-10 बार कीजिए। इस क्रिया को ‘कटिचक्रासन’ कहते हैं। इसमें रीढ़ पूरे 360 अंश घूम जाती है।
(3) पैरों में तीन-चार फीट का अन्तर देकर सीधे खड़े हो जाइए और सीधे हाथ को ऊपर की ओर तान लीजिए। हथेली सिर की ओर रहेगी। अब धीरे-धीरे दायें हाथ को बायीं ओर झुकाते हुए जमीन के समानान्तर लाइए और बायें हाथ को नीचे सरकाते हुए पैर के पंजे तक लाइए। इस स्थिति में 10-15 सेकंड रुकिए। इसे ‘त्रिकोणासन’ कहते हैं। फिर धीरे-धीरे पूर्व स्थिति में आ जाइए। ऐसा ही दूसरे हाथ को ऊपर करके दायीं ओर झुकते हुए कीजिए।
(4) दोनों हाथों से कमर बाँधकर सीधे खड़े हो जाइए और पैरों को मिला लीजिए। अब धीरे-धीरे कमर से सामने की ओर झुकिये और 90 अंश का कोण बनाइये। इस स्थिति में कुछ सेकण्ड रुककर धीरे-धीरे पूर्व स्थिति में आ जाइए। अब इसी प्रकार कमर से पीछे की ओर झुकिए। यह क्रिया 10-10 बार कीजिए।
(5) दोनों हाथों से कमर बाँधकर सीधे खड़े हो जाइए और पैरों को मिला लीजिए। अब सिर और पैरों को स्थिर रखते हुए केवल कमर को गोलाई में घुमाइए। पहले घड़ी की सुई की दिशा में 10 बार, फिर उसकी विपरीत दिशा में 10 बार घुमाइए।
(6) पैरों में तीन-चार फीट का अन्तर देकर सीधे खड़े हो जाइए और हाथों को कंधों की सीध में तान लीजिए। अब पैरों को जमाए रखकर आगे की ओर झुककर दायें हाथ से बायें पैर के पंजे को छूइए। इस समय बायां हाथ आसमान की ओर उठा रहेगा। इस स्थिति में एक क्षण रुककर दायीं ओर घूमते हुए बायें हाथ से दायें पैर के पंजे को छूइए। इस समय दायां हाथ आसमान की ओर उठा रहेगा। यह क्रिया दोनों ओर बारी-बारी से 10-10 बार कीजिए।
इन सभी व्यायामों का वीडियो यहाँ दिया जा रहा है। ध्यान रखें कि इन व्यायामों को प्रारम्भ करने पर दो-तीन दिन दर्द बढता हुआ लग सकता है, क्योंकि जब शरीर की जकड़न खुलती है, तो दर्द अनुभव होता है। परन्तु आप इसकी चिन्ता न करें और व्यायाम जारी रखें। कुछ ही दिनों में कमर का दर्द दूर हो जायेगा। इन व्यायामों के बाद रीढ़ के व्यायाम करना भी हितकर रहता है, जो पिछली कड़ी में बताये जा चुके हैं।
वरिष्ठ नागरिकों के लिए विशेष रूप से सलाह दी जाती है कि वे कमर के व्यायामों को करते समय अपनी शारीरिक स्थिति पर ध्यान दें। वे उतना ही करें जितना वे सरलता से कर सकें और यदि इनमें से कोई व्यायाम बिल्कुल न कर पायें, तो उसको छोड़कर शेष व्यायाम ही करें। जबर्दस्ती करने की कोई आवश्यकता नहीं है।
*कूल्हों का दर्द*
कई बार दर्द कमर में न होकर कूल्हों में होता है। यह कूल्हों का माँस बढ़ने या कोई नस दब जाने या सूजन आ जाने के कारण हो सकता है। यदि सूजन हो तो दर्द के स्थान पर बर्फ की सिकाई करनी चाहिए। इसके लिए बर्फ के टुकड़े को किसी पतले कपड़े में लपेटकर उसे दर्दवाले स्थान पर और आस-पास लगायें। साथ ही तितली व्यायाम भी एक-दो मिनट अवश्य करना चाहिए। इस व्यायाम से कूल्हों का दर्द ही ठीक नहीं होता, बल्कि कूल्हों और नितम्बों की चर्बी भी घटती है। इसकी विधि और वीडियो यहाँ दिये जा रहे हैं।
*तितली व्यायाम*
यह व्यायाम सभी आसनों या व्यायामों को कर लेने के बाद अन्त में किया जाता है। जैसा कि इसके नाम से स्पष्ट है इसमें घुटनों को तितली के पंखों की तरह हिलाया जाता है। इसके लिए सीधे बैठ जाइए और दोनों पैरों के तलुवों को एक साथ मिलाकर पंजों को दोनों हाथों की उँगलियाँ फँसाकर कसकर पकड़ लीजिए। अब दोनों घुटनों को तितली के पंखों की तरह चलाइए। ऐसा कम से कम आधा मिनट और अधिक से अधिक दो मिनट तक कीजिए। इस व्यायाम को करने से पैरों में खून का दौरा तेज होता है। कूल्हों और नितम्बों की चर्बी घटती है।
एक बात पर ध्यान खींचना आवश्यक है कि हड्डियों और माँसपेशियों में दर्द शरीर में कैल्शियम और विटामिन डी की कमी के कारण भी हो सकता है। इसलिए हमें कैल्शियम के लिए पर्याप्त मात्रा में हरी पत्तेदार सब्जियाँ, श्रीअन्न और फलों (जैसे- पालक, मैथी, रागी, तिल, दूध के उत्पाद, सेब, सन्तरा आदि) का सेवन करना चाहिए तथा विटामिन डी के लिए प्रतिदिन आधा-पौन घंटा प्रातःकाल की सुहाती धूप में बैठना चाहिए।
अगली कड़ी में हम स्पोंडिलाइटिस के दर्द की
*दर्दमुक्त जीवन - 5*
*स्पोंडिलाइटिस का दर्द*
पिछली कड़ी में हमने कमर और कूल्हों के दर्द का प्राकृतिक उपचार बताया था। इस कड़ी में हम स्पोंडिलाइटिस और सर्वाइकल के दर्द की चर्चा करेंगे और उनका उपचार बतायेंगे, जो आजकल एक बहुत सामान्य समस्या है।
स्पोंडिलाइटिस एक विशेष प्रकार का दर्द है जो रीढ़ के ऊपरी भाग और कंधे तथा गर्दन की ह़िड्डयों के जोड़ में होता है। प्रायः इसका कारण होता है पढ़ते समय, कम्प्यूटर पर काम करते समय या मोबाइल चलाते समय अपनी पीठ को बहुत अधिक झुकाना। यह पालथी मारकर बैठते समय पीठ और गर्दन को बहुत अधिक झुकाने और सोते समय बहुत मोटा तकिया लगाने से भी हो सकता है।
स्पोंडिलाइटिस से पीड़ित व्यक्ति को बहुत कष्ट होता है। उसके हाथ-पैरों में भी झुनझुनी या कमजोरी हो सकती है और सिरदर्द भी हो सकता है। जब ऐसी कमजोरी के कारण पीड़ित व्यक्ति को चक्कर भी आते हैं, तो उसे सर्वाइकल स्पोंडिलाइटिस कहते हैं। इसका दवाओं पर आधारित किसी भी पैथी में कोई उपचार नहीं है, केवल सही व्यायाम और उचित जीवनशैली से ही इसको ठीक किया जा सकता है।
स्पोंडिलाइटिस और सर्वाइकल दोनों को ठीक करने का एक रामबाण व्यायाम है- कंधों का दोलन। इसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। मैंने इससे अपना और अनेक अन्य लोगों का स्पोंडिलाइटिस ठीक किया है। इस व्यायाम से पहले कंधों को घुमाने का व्यायाम करना भी अच्छा रहता है। इन व्यायामों की विधि और वीडियो यहाँ दिये जा रहे हैं।
*कंधों के विशेष व्यायाम-*
(1) वज्रासन में बैठ जाइए। दोनों हाथों को कोहनियों से मोड़कर सारी उँगलियों को मिलाकर कंधों पर रख लीजिए। अब हाथों को गोलाई में धीरे-धीरे घुमाइए। ऐसा 10 बार कीजिए।
(2) यही क्रिया हाथों को उल्टा घुमाते हुए 10 बार कीजिए।
(3) वज्रासन में ही हाथों को अंग्रेजी अक्षर टी (ज्) की तरह दायें-बायें तान लीजिए और कोहनियों से मोड़कर उँगलियों को मिलाकर कंधों पर रख लीजिए। कोहनी तक हाथ दायें-बायें उठे और तने रहेंगे। अब सिर को सामने की ओर सीधा रखते हुए केवल धड़ को दायें-बायें पेंडुलम की तरह झुलाइए, जैसा कि संलग्न वीडियो में दिखाया गया है। ऐसा 20 से 25 बार तक कीजिए। इस क्रिया में जल्दबाजी करने या जोर से झटके देने की आवश्यकता नहीं है, आराम से इस प्रकार कीजिए कि कंधे अधिक से अधिक घूम सकें।
कंधों के विशेष व्यायाम वज्रासन में करना सबसे अधिक सुविधाजनक और लाभदायक है। परन्तु यदि आप वज्रासन नहीं लगा पाते, तो सुखासन या सिद्धासन में या केवल स्टूल पर बैठकर भी यह व्यायाम कर सकते हैं। फिर भी वज्रासन लगाने का प्रयास करते रहना चाहिए, क्योंकि इससे हमें अन्य अनेक लाभ प्राप्त होते हैं। निरन्तर प्रयास करना ही सफलता की कुंजी है।
इन तीनों व्यायामों को दिन में 4-5 बार नियमित रूप से करने पर स्पोंडिलाइटिस और सर्वाइकल का कष्ट केवल 5-7 दिन में अवश्य ही समाप्त हो जाता है, चाहे ये कष्ट कितने भी पुराने हों। इन व्यायामों को स्वस्थ व्यक्ति को भी प्रतिदिन कर लेना चाहिए। इसलिए मैंने इनको हाथों के व्यायामों के साथ जोड़ दिया है। इन व्यायामों को ग्रीवा व्यायामों के साथ करना और अधिक लाभदायक है। ग्रीवा व्यायामों की विधि नीचे दी जा रही है, साथ में वीडियो भी दिया गया है।
*ग्रीवा व्यायाम-*
(1) वज्रासन या सुखासन में सीधे बैठकर गर्दन को धीरे-धीरे बायीं ओर जितना हो सके उतना ले जाइए। गर्दन में थोड़ा तनाव आना चाहिए। इस स्थिति में 2-3 सेकेंड रुककर वापस सामने ले आइए। अब गर्दन को दायीं ओर जितना हो सके उतना ले जाइए और फिर वापस लाइए। यही क्रिया 10-10 बार कीजिए। यह क्रिया करते समय कंधे बिल्कुल नहीं घूमने चाहिए।
(2) यही क्रिया ऊपर और नीचे 10-10 बार कीजिए।
(3) यही क्रिया अगल-बगल 10-10 बार कीजिए। इसमें गर्दन घूमेगी नहीं, केवल बायें या दायें झुकेगी। गर्दन को बगल में झुकाते हुए कानों को कंधे से छुआने का प्रयास कीजिए, लेकिन कंधों को ऊपर उठाने से बचिये। अभ्यास के बाद इसमें सफलता मिलेगी। तब तक जितना हो सके उतना ही झुकाइए।
(4) गर्दन को झुकाए रखकर चारों ओर घुमाइए- 8 बार सीधे और 8 बार उल्टे।
(5) अन्त में, आधा मिनट तक गर्दन की चारों ओर हल्के-हल्के मालिश कीजिए।
ग्रीवा व्यायाम खड़े-खड़े भी किये जा सकते हैं, लेकिन बैठकर करना अधिक उचित है, क्योंकि उसमें स्थिरता और एकाग्रता बनी रहती है।
यहाँ यह ध्यान रखें कि यदि सर्वाइकल या स्पोंडिलाइटिस की समस्या बहुत अधिक गम्भीर हो गयी है, तो आपको योग्य चिकित्सक या विशेषज्ञ की सलाह से ही ये व्यायाम करने चाहिए। तीव्र दर्द हो, तो गर्दन को बहुत अधिक झुकाने का प्रयास न करें और जितना सरलता से घुमा या झुका सकें उतना ही करें।
स्पोंडिलाइटिस और सर्वाइकल के पीड़ितों को उन गलतियों से बचना चाहिए जिनसे ये कष्ट होते हैं। कम्प्यूटर पर कार्य करते समय स्क्रीन को आँखों से उतनी दूरी पर ठीक सामने रखना चाहिए कि आँखों पर अधिक जोर न पड़े और पीठ को झुकाना न पड़े। यदि झुकाने की आवश्यकता हो, तो केवल गर्दन को झुकायें, पीठ को बिल्कुल नहीं। इसी प्रकार मोबाइल चलाते समय भी पीठ को सीधा रखें और केवल गर्दन को आवश्यक होने पर थोड़ा झुकायें। सबसे अच्छा है कि मोबाइल को किसी मोबाइल स्टेंड पर रखकर अपना कार्य करें। इससे आप हाथों के दर्द से भी बचेंगे।
स्पोंडिलाइटिस और सर्वाइकल के पीड़ितों को प्रतिदिन पर्याप्त मात्रा मे जल अवश्य पीते रहना चाहिए, क्योंकि शरीर में पानी की कमी (डिहाइड्रेशन) भी जोड़ों में जकड़न का कारण बनती है।
अगली कड़ी में हम हाथों के दर्द की चर्चा करेंगे।
*दर्दमुक्त जीवन - 6*
*हाथों का दर्द*
पिछली कड़ी में हमने स्पोंडिलाइटिस और सर्वाइकल के दर्द का प्राकृतिक उपचार बताया था। इस कड़ी में हम हाथों के दर्द की चर्चा करेंगे और उसका उपचार बतायेंगे।
हम प्रायः अपने सारे कार्य हाथों से करते हैं, इसलिए हाथों का स्वस्थ और क्रियाशील होना अन्यन्त आवश्यक है। कई बार किसी कारण से हाथों में दर्द होने लगता है, जिससे हमारी कार्यक्षमता प्रभावित होती है। हाथों में दर्द प्रायः दो कारणों से होता है- एक, आकस्मिक चोट लग जाने के कारण, और दो, अत्यधिक थकान के कारण। इन दोनों कारणों से होनेवाले दर्द को दूर करने के उपाय अलग-अलग हैं।
यदि हाथ के किसी भाग में चोट लगने के कारण दर्द हो रहा है और बड़ा घाव नहीं है, तो उस भाग को ठंडे पानी में डुबोने या उस भाग पर बर्फ लगाने या फिर उस पर बहुत ठंडे पानी की पट्टी रखने से तत्काल आराम मिलता है। कलाई से थोड़ी ऊपर तक की चोट लगने पर उस हाथ को सरलता से ठंडे पानी में भरे बर्तन में डुबोकर रखा जा सकता है। एक बार में केवल 5 या 10 मिनट तक डुबोकर रखना पर्याप्त होता है। इतने से ही दर्द बहुत कम हो जाता है।
यदि चोट कोहनी या उससे ऊपर के भाग में लगी है, तो प्रभावित स्थान पर बर्फ लगा सकते हैं या बर्फ जैसे ठंडे पानी में भिगोया कपड़ा रख सकते हैं। इससे भी उतना ही आराम मिलता है, जितना पानी में डुबोकर रखने पर मिलता है। आवश्यक होने पर इस प्रक्रिया को एक या दो घंटे बाद दोहराया जा सकता है।
आज के समय में हाथों की थकान का सबसे बड़ा कारण ‘डिजिटल ओवरलोड’ है। लगातार मोबाइल पकड़ने और टच स्क्रीन का अत्यधिक उंगलियों द्वारा उपयोग या गलत तरीके से माउस चलाने से उंगलियों और कलाइयों की नसों पर निरंतर दबाव (Static Loading) पड़ता है, जिससे दर्द स्थायी रूप ले सकता है।
यदि हाथों के किसी भाग में दर्द थकान के कारण हो रहा है, जैसे मोबाइल या माउस चलाने, लैपटॉप पर टाइप करने या कोई कार्य बार-बार करने, अधिक वजन उठाने या खेलने से, तो उसका मुख्य उपचार है- हाथों को आराम देना। पर्याप्त समय तक आराम करने या/और उस भाग की सरसों के तेल से हल्की मालिश करने से दर्द गायब हो जाता है।
यदि हाथों में दर्द लगातार बना ही रहता है, तो उसका कारण नसों की थकान या सूजन हो सकती है। ऐसी स्थिति में आराम के साथ ही हाथों के सरल व्यायाम बहुत लाभकारी होते हैं। ये व्यायाम नीचे बताये गये हैं और इनका वीडियो भी साथ में दिया गया है।
*हाथों के व्यायाम-*
इसमें हाथों के प्रत्येक भाग जैसे उँगलियाँ, कलाई, कोहनी, कंधा आदि के अलग-अलग सरल व्यायाम किये जाते हैं, जिनसे हाथों का पूरा व्यायाम हो जाता है। ये सभी व्यायाम बैठकर करने चाहिए। ये व्यायाम इस प्रकार हैं-
*उँगलियाँ-* दोनों हाथ आगे करके उँगलियों को फैला लीजिए। अब उँगलियों की हड्डियों पर जोर डालते हुए धीरे-धीरे मुट्ठी बन्द कीजिए और झटके से खोलिए। मुट्टी बन्द करते समय एक बार अँगूठा बाहर रहेगा और एक बार भीतर। ऐसा 10-10 बार कीजिए।
*कलाई-* (1) दोनों हाथ आगे करके हथेलियों को फैला लीजिए और उँगलियों को मिला लीजिए। अँगूठा भी उँगलियों से चिपका रहेगा। अब हथेली को खड़ा रखते हुए कलाई से भीतर की ओर मोड़िये। फिर पूर्व स्थिति में आकर बाहर की ओर मोड़िए। ऐसा दोनों ओर 10-10 बार कीजिए। (2) दोनों मुट्ठियाँ बन्द कर लीजिए। अँगूठा भीतर रखिए। कलाई को स्थिर रखकर मुट्ठियों को गोलाई में 10 बार घुमाइए। इसी प्रकार 10 बार उल्टी दिशा में घुमाइए।
*कोहनी-* (1) दोनों हाथ सामने करके हथेलियों को ऊपर की ओर खोलकर फैला लीजिए। उँगलियाँ और अँगूठा चिपके रहेंगे। अब हाथ को सीधा रखकर हल्के झटके से कोहनी पर से मोड़ते हुए उँगलियों से कंधों को छूइए। फिर खोल लीजिए। ऐसा 10-10 बार कीजिए। (2) यही क्रिया हाथों को दायें-बायें फैलाकर 10-10 बार कीजिए। (3) यही क्रिया हाथों को ऊपर खड़ा करके 10-10 बार कीजिए।
*कंधे-* (1) हाथों को कंधों की सीध में दोनों ओर फैला लीजिए। सभी उँगलियों को खोल लीजिए। अब हाथों को पेंडुलम की तरह हिलाइए जैसे मना कर रहे हों। ऐसा 20 बार कीजिए। (2) हाथों की कोहनी से मोड़कर कंधों पर रख लीजिए। अब दोनों हाथों को गोलाई में 10 बार धीरे-धीरे घुमाइए। घुमाते समय झटका मत दीजिए। अब 10 बार विपरीत दिशा में घुमाइए।
*कंधों का दोलन-* वज्रासन में बैठकर हाथों को दायें-बायें तान लीजिए और कोहनियों से मोड़कर उँगलियों को मिलाकर कंधों पर रख लीजिए। कोहनी तक हाथ अंग्रेजी के टी अक्षर की तरह दायें-बायें उठे और तने रहेंगे। अब सिर को सामने की ओर सीधा रखते हुए केवल धड़ को दायें-बायें पेंडुलम की तरह झुलाइए। ऐसा 20 से 25 बार तक कीजिए।
*ये व्यायाम वज्रासन में बैठकर करने से अधिक लाभ मिलता है। यदि इसमें कोई कठिनाई हो, तो सुखासन या सिद्धासन में या किसी स्टूल पर बैठकर भी ये व्यायाम किये जा सकते हैं। लेकिन वज्रासन में बैठने का प्रयास करते रहना चाहिए।*
हाथों के ये व्यायाम देखने-करने में बहुत सरल होने पर भी बहुत प्रभावशाली हैं और हाथों की 99 प्रतिशत समस्याओं का समाधान इनसे किया जा सकता है। यहाँ तक कि गठिया के कारण हाथों में होनेवाला दर्द भी इनसे ठीक हो सकता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को दिन में कम से कम एक बार ये व्यायाम अवश्य कर लेने चाहिए।
अगली कड़ी में हम कोहनी के विशेष दर्द (टेनिस एल्बो) तथा कंधों की जकड़न (फ्रोजन सोल्जर) के दर्द की
*दर्दमुक्त जीवन - 7*
*कोहनी का विशेष दर्द (टेनिस एल्बो)*
पिछली कड़ी में हमने हाथों के दर्द का प्राकृतिक उपचार बताया था। इस कड़ी में हम कोहनी के विशेष दर्द (टेनिस एल्बो) के दर्द की चर्चा करेंगे और उसका उपचार बतायेंगे।
यह कोहनी के बाहरी हिस्से में होने वाला एक दर्दनाक विकार है, जो बार-बार कलाई और बांह मोड़ने से कोहनी के जोड़ में सूजन आने के कारण होता है। यह समस्या प्रायः टेनिस खिलाड़ियों को होती है, क्योंकि वे गेंद पर पूरे जोर से बल्ला मारने में अपनी कोहनी के बल का बहुत अधिक उपयोग करते हैं। क्रिकेट खिलाड़ी सचिन तेंदुलकर को भी यह समस्या हो गयी थी, क्योंकि वे बहुत भारी बल्ले से लम्बे समय तक बल्लेबाजी करते थे। यह रोग न केवल खिलाड़ियों, बल्कि कंप्यूटर उपयोग करने वालों, पेंटरों और भारी सामान उठाने वालों को भी हो सकता है।
टेनिस एल्बो के कारण प्रायः निम्न समस्याएँ होती हैं-
1. कोहनी के बाहरी भाग में सूजन, दर्द और जलन होती है।
2. हाथ की पकड़ कमजोर हो जाती है।
3. हाथ से कार्य करने में कठिनाई होती है।
4. यह दर्द कोहनी से नीचे कलाई तक फैल सकता है।
किसी हाथ में टेनिस एल्बो हो जाने पर उस हाथ को पूर्ण आराम की आवश्यकता होती है। कोहनी की सूजन को कम करने के लिए उस स्थान पर बर्फ से सिकाई करनी चाहिए। यह सिकाई एक बार में 5 से 10 मिनट तक की जा सकती है। पिछली कड़ी में बताये गये हाथों के व्यायाम भी इसमें बहुत हितकर होते हैं। बर्फ से सिकाई दिन में तीन-चार बार और हाथों के व्यायाम दिन में दो बार करना पर्याप्त रहता है। वास्तव में केवल इतना करने से ही कोहनी के दर्द में अधिकांश आराम आ जाता है। इसके अलावा अर्द्ध या एक हाथ का ताड़ासन करने से भी बहुत लाभ होता है। यह करने के लिए दर्द वाले हाथ को सीधा ऊपर उठायें और कान से सटाकर उँगलियाँ सीधी करके हाथ को अधिक से अधिक ऊपर की ओर तानें। एक मिनट तानना पर्याप्त रहेगा।
इन तीनों उपायों के साथ ही कोहनी की शक्ति वढाने के लिए तिर्यक भुजंगासन बहुत उपयोगी पाया गया है। इसकी विधि नीचे दी गयी है और वीडियो भी साथ में दिया गया है।
*तिर्यक भुजंगासन की विधि-*
1. किसी दरी या चटाई पर पेट के बल लेट जाएँ। पैरों को सीधा रखें और एड़ियाँ पास-पास रखें।
2. हथेलियों को फेफड़ों के दाएं-बाएं भूमि पर रखें।
3. अब सिर, गर्दन और छाती को ऊपर उठाएँ। नाभि तक का भाग भूमि पर ही रहेगा। कोहनी हल्की मुड़ी हो अर्थात् हाथ पूरी तरह सीधा न हो। यह भुजंगासन की सामान्य स्थिति है।
4. अब सिर, गर्दन और धड़ को बाईं ओर मोड़ें और दाईं एड़ी को देखने की कोशिश करें।
5. कुछ सेकंड इस स्थिति में रहकर वापस सामान्य स्थिति में आ जायें।
6. अब इसी प्रकार दाईं ओर मुड़ें और बाईं एड़ी की ओर देखें। फिर सामान्य स्थिति में आयें।
7. सिर तथा धड़ को वापस ज़मीन पर ले आएँ।
यह दाएँ-बाएँ मिलाकर 1 चक्र माना जाता है। आप ऐसे 5 से 10 चक्र कर सकते हैं। सभी क्रियायें बिना झटका दिये आराम से करें। यह व्यायाम दिन में दो बार अवश्य करें। यह आसन करते समय आपको सामान्य विधि से साँस लेते रहना चाहिए। वैसे इसे सामान्य स्थिति में साँस भरकर और फिर साँस रोककर भी किया जा सकता है। ऐसा करने पर वापस सामान्य स्थिति में आने पर साँस बाहर निकाल देनी चाहिए। यह ध्यान रखें कि साँस को अपनी शक्ति से अधिक न रोकें, क्योंकि वह हानिकारक हो सकता है। इसलिए सामान्य रूप से साँस लेते हुए करना ही सबसे अच्छा है।
अगली कड़ी में हम कंधे की जकड़न के दर्द (फ्रोजन शोल्डर) की चर्चा करेंगे।
*दर्दमुक्त जीवन - 8*
*कंधों की जकड़न का दर्द (फ्रोजन शोल्डर)*
पिछली कड़ी में हमने कोहनी के विशेष दर्द (टेनिस एल्बो) का प्राकृतिक उपचार बताया था। इस कड़ी में हम कंधों की जकड़न का दर्द (फ्रोजन शोल्डर) की चर्चा करेंगे और उसका उपचार बतायेंगे।
कंधे की जकड़न एक दर्दनाक स्थिति है, जिसमें कंधे के जोड़ के आसपास के ऊतक बहुत कड़े और मोटे हो जाते हैं। इससे कंधे को हिलाने-डुलाने में तेज दर्द होता है और हाथ उठाना भी कठिन हो जाता है, जिसके कारण दैनिक कार्यों जैसे कपड़े पहनना, बालों में कंघी करना आदि में कठिनाई होती है। यह समस्या सामान्यतया 40-60 वर्ष की आयु के लोगों में होती है।
कंधों की जकड़न चोट लगने, व्यायाम न करने, हाथों से बहुत अधिक कार्य करने और वजन उठाने से हो सकती है। मधुमेह तथा थायराइड के रोगियों में इसके होने की संभावना सबसे अधिक होती है। जो गृहिणियाँ अधिक रोटी या पापड़ बेलती हैं, उनको भी यह समस्या हो सकती है।
फ्रोजन शोल्डर के उपचार में सामान्य दर्दों की अपेक्षा अधिक समय लगता है। कंधों के जोड़ों को ढीला करने के लिए कुछ व्यायामों के साथ-साथ दर्दवाले स्थान और उसके आस-पास गर्म-ठंडी सिकाई की जाती है। मेरा अनुभव है कि इस दर्द में गर्म सिंकाई कोई लाभ नहीं करती, केवल गर्म-ठंडी सिकाई ही लाभ करती है। ऐसी सिकाई दिन में दो बार करनी चाहिए- एक बार सुबह और दूसरी बार रात्रि को सोने से पहले। इसकी विधि नीचे दी गयी है।
*गर्म-ठंडी सिकाई*
1. दो मध्यम आकार के भगौने लीजिए। एक भगौने में गर्म पानी भर लें। दूसरे भगौने में उतना ही खूब ठंडा पानी भर लें।
2. एक तौलिया या सूती कपड़ा लेकर दो-तीन तह करके उतना बडा बना लें कि जहाँ की सिकाई करनी है वह स्थान पूरी तरह ढक जाये। उसे ठंडे पानी में भिगोकर हल्का निचोड़ लें और प्रभावित स्थान पर एक मिनट तक रखें।
3. दूसरा तौलिया या सूती कपड़ा लेकर दो-तीन तह करके उतना बडा बना लें कि जहाँ की सिकाई करनी है वह स्थान पूरी तरह ढक जाये। उसे गर्म पानी में भिगोकर हल्का निचोड़ लें और प्रभावित स्थान पर तीन मिनट तक रखें।
4. एक मिनट ठंडी और तीन मिनट गर्म - सिकाई की इस प्रक्रिया को चार बार करें।
5. अन्त में एक मिनट ठंडी सिकाई करें।
6. यदि गर्म पानी ठंडा हो जाये, तो उसमें आवश्यक मात्रा में गर्म पानी मिला लें।
कृपया ध्यान रखें कि सिकाई के बाद उस हाथ को कम से कम आधा घंटे का पूर्ण आराम देना आवश्यक होता है। इसलिए दूसरी बार की सिकाई सोने से ठीक पहले करनी चाहिए और सिकाई के तुरन्त बाद सो जाना चाहिए।
गर्म-ठंडी सिकाई के साथ पिछली कड़ी में बताये गये हाथों के सामान्य व्यायामों के अलावा कंधे के जोड़ को गति देनेवाले कुछ विशेष व्यायाम भी करने चाहिए, जो नीचे बताये गये हैं।
*कंधे की जकड़न दूर करने के लिए विशेष व्यायाम*
1. हाथ को झुलाना - सीधे खड़े होकर एक ओर थोड़ा झुकते हुए हाथ को बगल में 10 बार आगे-पीछे झुलायें। इसी प्रकार थोड़ा सामने झुककर उस हाथ को दायें-बायें 10 बार झुलायें।
2. हाथ को घुमाना- सीधे खड़े होकर एक ओर झुकते हुए हाथ को गोलाई में 10 बार घुमायें। उसी प्रकार उल्टी दिशा में 10 बार घुमायें।
3. हाथ को ऊपर-नीचे ले जाना- दीवार की ओर मुँह करके खड़े होकर उस हाथ को उँगलियों से चलाते हुए अधिक से अधिक ऊपर तक ले जायें। फिर उसी प्रकार नीचे लायें। ऐसा 10 बार करें।
4. हाथ को खींचना- दर्द वाले हाथ को पीछे ले जाकर किसी तौलिये या चुन्नी के एक सिरे को पकड़ लें। अब दूसरे हाथ से उस कपड़े का दूसरा सिरा पकड़कर उसे सिर की ओर इस प्रकार खींचें कि दर्द वाला हाथ ऊपर की ओर खिंच जाये।
5. सिर को दबाना- दोनों हाथों को सिर के पीछे ले जाकर उनकी उँगलियों को आपस में फँसा लें। अब हाथों को आगे लाते हुए सिर को दोनों ओर से दबायें।
ये व्यायाम बिना झटका दिये और बहुत आराम से केवल उसी हाथ में करने चाहिए, जिसमें फ्रोजन शोल्डर की समस्या है। ये व्यायाम हाथों से सामान्य व्यायामों के बाद सुबह-शाम दोनों समय नियमित रूप से करने चाहिए।
यों तो फ्रोजन शोल्डर के पीड़ितों को फिजियोथेरापिस्टों द्वारा अनेक तरह के व्यायाम कराये जाते हैं, परन्तु अनुभव से पता चलता है कि इतने व्यायामों से कोई लाभ नहीं होता, बल्कि हाथों की थकान बढ़ जाती है। इस रोग का कारण हाथों पर अधिक जोर पड़ना ही होता है। इसलिए व्यायाम उतनी ही मात्रा में करने चाहिए जितने से हाथों को गति मिले और थकान बिल्कुल न हो, अन्यथा किसी व्यायाम का कोई लाभ नहीं मिलेगा। मैंने पिछली कड़ी में और यहाँ जो व्यायाम बताये हैं उनको ही प्रतिदिन दो बार कर लेने से हाथों का आवश्यक और पर्याप्त व्यायाम हो जाता है और उनका पूरा लाभ मिलता है।
*सावधानियाँ*
फ्रोजन शोल्डर के पीड़ितों को कुछ सावधानियाँ रखना भी आवश्यक होता है। उनको उस करवट सोने से बचना चाहिए, जिधर के कंधे में दर्द होता है। इसके साथ ही रोटी बेलने और भारी वस्तु उठाने से भी बचना चाहिए। इस दर्द के इलाज में बहुत समय लगता है- लगभग 6 माह से 1 वर्ष तक। इसलिए पूरी तरह ठीक होने तक ये सावधानियाँ रखना अनिवार्य है। पीड़ितों को अपने खून में विटामिन बी12 तथा विटामिन डी की जाँच करा लेनी चाहिए। यदि शरीर में विटामिन बी12 की कमी पायी जाये, तो दलिया, श्रीअन्न और हल्दी मिले दूध का सेवन करना चाहिए, तथा विटामिन डी की कमी होने पर प्रतिदिन कम से कम हाथ-पैरों पर सरसों का तेल लगाकर प्रातःकाल की सुहाती धूप में आधा-पौन घंटा बैठना चाहिए। इनसे रोगमुक्त होने में भारी सहायता मिलती है।
अगली कड़ी में हम पैरों के दर्द की चर्चा करेंगे।
*-- डॉ. विजय कुमार सिंघल*
प्राकृतिक चिकित्सक एवं योगाचार्य
मो. 9919997596
*दर्दमुक्त जीवन - 9*
*पैरों का दर्द*
पिछली कड़ी में हमने कंधों की जकड़न के दर्द (फ्रोजन शोल्डर) का प्राकृतिक उपचार बताया था। इस कड़ी में हम पैरों के दर्द की चर्चा करेंगे और उसका उपचार बतायेंगे।
पैरों का दर्द एक ऐसी समस्या है, जिससे लगभग हर व्यक्ति कभी न कभी पीड़ित होता है। यह दर्द हल्का भी हो सकता है और इतना गंभीर भी कि व्यक्ति का चलना-फिरना भी दूभर हो जाए। पैरों के स्वास्थ्य पर ध्यान देना इसलिए आवश्यक है कि वे हमारे पूरे शरीर का भार वहन करते हैं। सामान्यतया कूल्हे से नीचे जाँघ से लेकर टखने तक के भाग को ‘टाँग’ कहा जाता है और टखने से नीचे के भाग को ‘पैर’ कहा जाता है। परन्तु यहाँ हम इन दोनों को मिलाकर ‘पैर’ ही कहेंगे और पूरे पैर की चर्चा करेंगे। बाद में इसके विभिन्न भागों के विशेष दर्द की अलग से भी चर्चा की जाएगी।
*पैरों में दर्द के कारण*
1. सबसे प्रमुख कारण है- थकान। चलने या दौड़ने, सीढ़ियाँ चढ़ने अथवा पैरों पर जोर डालने वाला कोई भी कार्य अधिक करने से पैरों में थकान आती है, जिससे उनमें दर्द हो सकता है। यह दर्द पूरे पैर में या उसके किसी भाग में हो सकता है।
2. किसी कारणवश पैरों में झटका लगने से मांसपेशियों में खिंचाव (Muscle Strain) हो सकता है, जिससे असहनीय दर्द होता है।
3. कभी-कभी कमर की नस दबने के कारण कूल्हे से लेकर नीचे तक पैर में दर्द हो जाता है, जिसे सायटिका (Sciatic) कहते हैं।
4. कई बार अधिक आराम करने के कारण धमनियों में रुकावट आ जाती है, जिससे पैरों तक पर्याप्त खून नहीं पहुँच पाता, जिससे दर्द और भारीपन अनुभव होता है। इसे ‘पैर का सो जाना’ भी कहते हैं।
5. बहुत टाइट अथवा ऊँची एड़ी (High Heels) वाले जूते या चप्पल पहनने से भी पैरों के पंजों और एड़ियों में दर्द हो सकता है।
6. कुछ रोगों जैसे मोटापा, मधुमेह (डायबिटीज), यूरिक एसिड का बढ़ना और गठिया (अर्थराइटिस) के कारण भी पैरों में दर्द हो सकता है।
7. शरीर में पानी की कमी (डिहाइड्रेशन) या पोषक तत्वों जैसे कैल्शियम, मैग्नीशियम या विटामिन डी की कमी के कारण भी पैरों में ऐंठन होने लगती है।
इनमें से किसी भी कारण से पैरों में दर्द के साथ-साथ सूजन, झुनझुनी, सुन्नपन, नसों में नीलापन, ऐंठन आदि हो सकती है।
*दर्द से राहत पाने के घरेलू उपाय*
पैरों के दर्द को कम करने के लिए सबसे पहले उसके कारण का पता लगाना चाहिए। यदि दर्द क्रमांक 7 के कारण है, तो पर्याप्त मात्रा में पानी पीना चाहिए और पोषक तत्वों की पूर्ति करने वाले खाद्यों को अपने भोजन में सम्मिलित करना चाहिए। यदि दर्द क्रमांक 6 के अनुसार किसी विशेष रोग के कारण है, तो उस रोग का उपचार करना चाहिए। इससे उस रोग के साथ ही पैरों का दर्द भी चला जाएगा। यदि क्रमांक 5 के अनुसार छोटे आकार के या बहुत ऊँची एड़ी के जूते-चप्पल पहनने के कारण पैरों में दर्द हो रहा है, तो उनको हटाकर सही आकार और एड़ी के जूते-चप्पल पहनने चाहिए।
यदि पैरों में दर्द क्रमांक 1 से 4 तक में से किसी कारण से हो रहा है, तो उसका उपचार निम्न प्रकार किया जा सकता है-
1. मालिश- सबसे पहले दर्द वाले स्थान या पूरे पैर की मालिश किसी जानकार व्यक्ति से करायें या स्वयं करें। इसमें सरसों, नारियल या जैतून के तेल का उपयोग किया जा सकता है। अधिकतर दर्द ऐसी मालिश से और फिर पैरों को पर्याप्त विश्राम देने से चला जाता है।
2. पैरों के सूक्ष्म व्यायाम- पैरों के दर्द को दूर करने में पैरों के सूक्ष्म व्यायाम बहुत उपयोगी सिद्ध हुए हैं। इनको सूक्ष्म व्यायाम इसलिए कहा जाता है कि ये बहुत सरल हैं और इनसे थकान बिल्कुल नहीं होती, बल्कि पैरों को आराम मिलता है। ये व्यायाम नीचे बताये गये हैं और साथ में वीडियो भी दिया गया है।
*पैरों के सूक्ष्म व्यायाम*
1. सामने पैर लम्बे करके रीढ़ को सीधा रखकर बैठें। आवश्यक हो तो हाथ बग़ल में रखकर धड़ को सहारा दें।
2. पैरों के पंजों को 10-20 बार हिलायें।
3. दोनों एड़ियों को मिलाकर पास-पास रखें। फिर दोनों पैरों के पंजों को 10-20 बार आपस में टकरायें।
4. पैरों की उँगलियों को मोड़कर बंद करें और खोलें। ऐसा 10-10 बार करें।
5. दोनों पैरों के पंजों को बाहर की ओर तानिए, फिर भीतर की ओर तानिए। यह भी 10-10 बार करें।
6. पैरों के पंजों को एक साथ गोलाई में 10 बार घुमायें। फिर 10 बार उल्टी दिशा में घुमायें।
7. एड़ियों को थोड़ी दूर-दूर रखकर दोनों पैरों के पंजों को बायीं तरफ इतना घुमायें कि ज़मीन से छू जायें। फिर दायीं ओर इसी तरह घुमाकर ज़मीन से छुआयें। ऐसा 10-10 बार करें। यह क्रिया करते समय पैर सीधे रहने चाहिए।
8. दोनों घुटनों को उठायें और गिरायें जिससे पिंडलियां ज़मीन से टकरायें। ऐसा 20 बार करें।
पैरों के ये सूक्ष्म व्यायाम अत्यधिक सरल होते हुए भी बहुत प्रभावशाली हैं और इनसे पैरों की 90 प्रतिशत समस्याओं का समाधान हो जाता है। यहाँ तक कि नसों की सूजन और साइटिका का दर्द भी इनसे ठीक हो जाता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को कम से कम दिन में एक बार ये व्यायाम अवश्य करने चाहिए। जो व्यक्ति पैरों के दर्द से पीड़ित हैं, वे सुबह-शाम दोनों बार ये व्यायाम अवश्य करें। प्रत्येक व्यक्ति को इन व्यायामों को अपने दैनिक व्यायाम का भाग बना लेना चाहिए।
इन व्यायामों से पहले 5 मिनट वज्रासन में बैठने से भी बहुत लाभ मिलता है। सबसे अच्छा यह है कि पहले हम वज्रासन में बैठकर हाथों के सामान्य व्यायाम करें। फिर पैर सामने फैलाकर पैरों के सूक्ष्म व्यायाम करें। इससे हमारे हाथों और पैरों का आवश्यक और पर्याप्त व्यायाम हो जाता है।
पैरों का स्वास्थ्य हमारी सक्रिय जीवनशैली की नींव है। इनकी देखभाल में की गई थोड़ी सी सावधानी आपको भविष्य की बड़ी परेशानियों से बचा सकती है।
अगली कड़ी में हम पैरों के विभिन्न भागों के विशेष दर्द की चर्चा करेंगे।
*दर्दमुक्त जीवन - 10*
*पैर के विभिन्न भागों के विशेष दर्द*
पिछली कड़ी में हमने पैरों के सामान्य दर्द का प्राकृतिक उपचार बताया था। इस कड़ी में हम पैरों के विभिन्न भागों के विशेष दर्द की चर्चा करेंगे और उसका उपचार बतायेंगे।
*तलवों और एड़ी का दर्द*
तलवों और एड़ी का दर्द एक बहुत सामान्य समस्या है, जो प्रायः लम्बे समय तक बैठने के बाद उठने पर सबसे अधिक महसूस होती है। ऐसा प्रायः मोटापे, गलत जूते-चप्पल पहनकर चलने, देर तक चलने, सीढ़ियाँ चढ़ने, तलवों में सूजन आने या बिवाई फटने के कारण भी होता है।
सामान्य थकान के कारण होने वाले तलवों या एड़ी के दर्द का उपचार उनकी तेल मालिश करना और पैरों के सूक्ष्म व्यायाम करना है, जिनके बारे में पिछली कड़ी में बताया जा चुका है। यदि तलवों में सूजन हो या बिवाई फटी हो, तो इनके अलावा ठंडे पानी में पैर डालकर बैठने से बहुत आराम मिलता है। इसकी विधि निम्न प्रकार है-
एक ऐसा बर्तन (बाल्टी या भगौना) लें, जिसमें दर्द से प्रभावित पैर सरलता से रखे जा सकें। उस बर्तन में बर्फ जैसा ठंडा पानी इतना भरें कि पैर टखने से एक-दो इंच ऊपर तक डूब जायें। आवश्यक होने पर उसमें बर्फ डाल लें। अब इसमें पैर रखकर कम से कम 10 मिनट बैठें। फिर पैर पोंछकर उनको कम्बल से ढककर 20 मिनट के लिए लेट जायें। यह क्रिया रात को सोने से ठीक पहले करने पर अधिक लाभ मिलता है, क्योंकि पैरों को पूरा आराम मिल जाता है।
डायबिटीज के रोगियों को भी ठंडे पानी में पैर डालकर बैठने से कोई हानि नहीं होती, क्योंकि ठंडा पानी निष्क्रिय नाड़ियों को भी सक्रिय कर देता है, जो लाभदायक है।
कई लोग गुनगुने पानी में सेंधा नमक डालकर 15-20 मिनट तक पैर डुबोकर रखने की सलाह देते हैं। पर मैं इस उपाय से सहमत नहीं हूँ, क्योंकि इससे सूजन और बिवाई दोनों पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।
*टखनों का दर्द*
टखनों का दर्द प्रायः बहुत अधिक सीढ़ियाँ चढ़ने या दौड़ने के कारण होता है। इसके लिए भी एड़ी के दर्द के लिए बताये गये सभी उपाय लाभकारी हैं। यदि दर्द टखनों की हड्डी में है, तो सरसों के तेल या महानारायण तेल की मालिश भी इसमें बहुत लाभ देती है। ऐसी मालिश के बाद हल्की गर्म सिकाई भी दर्द पूरी तरह दूर करने में बहुत सहायक होती है। यदि दर्द किसी चोट के कारण हो, तो सामान्य चोट में ठंडा पानी या बर्फ बहुत लाभदायक है। चोट अधिक होने पर डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए।
*पिंडलियों का दर्द*
पिंडलियों में प्रायः थकान के कारण दर्द होता है। इसका उपचार भी मालिश करना और पैरों के सूक्ष्म व्यायाम करना है। यदि दर्द पिंडली की किसी नस में सूजन या दब जाने के कारण हो रहा है, तो वहाँ बर्फ लगाने या खूब ठंडे पानी की पट्टी से बहुत आराम मिलता है। इसके साथ पैरों के सूक्ष्म व्यायाम करना और वज्रासन में बैठने से भी नसों को अपने सामान्य रूप में आने में भारी सहायता मिलती है।
*जाँघों का दर्द*
जाँघों के सामान्य दर्द का उपचार पिछली कड़ी में बताया जा चुका है। यदि किसी जाँघ में कोई नस चढ़ जाने के कारण दर्द हो रहा हो, तो अन्य उपायों के साथ-साथ निम्न उपाय करना चाहिए-
जिस जाँघ में दर्द हो, उसे किसी मफलर या कपडें से दो लपेट देकर कसकर बाँध लें। अब किसी मेज या पलंग को दोनों हाथों से पकड़कर कम से कम 10 बार बैठक करें। ऐसा करने के बाद जाँघ के बंधन को खोल दें।
सामान्यतया प्रतिदिन सुबह-शाम ऐसा करने से दो-तीन दिन में ही जाँघ की नस अपनी सही जगह बैठ जाती है। लेकिन यदि इससे लाभ न हो रहा हो, तो किसी अनुभवी हाड़वैद्य या मालिश के अच्छे जानकार के पास जाकर नस को सही करा लेना चाहिए।
*वज्रासन*
इस लेखमाला में हमने अनेक जगह वज्रासन में बैठने का उल्लेख किया है। इस आसन को करने की विधि यहाँ दी जा रही है। साथ में चित्र भी दिया गया है।
*वज्रासन करने की विधि-*. एक आसन बिछाएं और इस पर घुटनों के बल बैठ जाइए। पैरों को नितम्बों के नीचे ले जाइये और अंगूठों को मिलाकर एड़ियों को दोनों ओर फैला दीजिए। अब नितम्बों को एड़ियों के बीच में सुविधापूर्वक रख दीजिए। हाथों को सामने घुटनों पर रखिए। सिर और शरीर को सीधा और दृष्टि सामने रखिए। (चित्र देखिए)
नये लोगों को वज्रासन में बैठने में कठिनाई हो सकती है। इसलिए इसके अभ्यास के लिए पहले किसी पलंग या गद्दे पर वज्रासन लगाने की कोशिश करनी चाहिए। प्रारम्भ में 10 सेकंड बैठना भी पर्याप्त है। धीरे-धीरे वज्रासन का समय बढ़ाना चाहिए और बाद में भूमि पर चटाई या आसन बिछाकर बैठना चाहिए। कई लोगों का घुटना पूरी तरह नहीं मुड़ता, ऐसे लोगों को पहले घुटनों के बल आधे खड़े होकर फिर धीरे-धीरे बैठने का अभ्यास करना चाहिए। इससे कुछ ही दिनों में उनका घुटना पूरी तरह मुड़ने लगेगा और वे वज्रासन में सरलता से बैठने लगेंगे।
इस आसन में बैठने से पैर की बहुत सी शिकायतें दूर होती हैं और पैर वज्र की तरह मजबूत हो जाते हैं। पैर की सभी विकृतियों, टेढापन आदि को दूर करने में वज्रासन रामबाण है। प्रतिदिन कम से कम 5 मिनट प्रातः और सायं इस आसन में अवश्य बैठना चाहिए। आप इसमें भोजन करने के तुरन्त बाद भी बैठ सकते हैं। इससे भोजन का पाचन अच्छी तरह होता है।
अगली कड़ी में हम घुटनों के विशेष दर्द की चर्चा करेंगे।
*-- डॉ. विजय कुमार सिंघल*
प्राकृतिक चिकित्सक एवं योगाचार्य
मो. 9919997596
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