न त्वहं कामये राज्यं न स्वर्गं नापुनर्भवम्।
कामये दुःखतप्तानां प्रणिनामार्तिनाशनम्॥
(English version will follow)
पालिसी स्टेटमेंट
हमारी नीति के अनुसार, हम किसी के साथ झगड़ा नहीं करते और न ही तुष्टीकरण की बात करते हैं। हम वही करते हैं, जो देश और समाज के साथ-साथ बैंकिंग और बैंककर्मियों के लिए ठीक हो। हम अपनें प्रयास में वस्तुनिष्ठ और उद्देश्यपूर्ण बनें रहना चाहते हैं। जब हम 2015 में काम शुरू किए, पेंशनर्स घोर निराशा- हताशा में थे। उन्हें भरोसा था कि उन्हें भी रोटी का एक टुकड़ा जरूर मिलेगा, लेकिन उनके पैर की जमीन ही खींच ली गई। 25.5.2015 के ज्वाइंट नोट मेंं उनका अपनी बैंकों के साथ कोई अनुबंधीय रिश्ता है, इसे इनकार कर दिया गया। इस सदमें से बैंक पेंशनर टूट गया। हमनें सोचा, हमें उन्हें पुनर्जीवित करनें के लिए कुछ करना चाहिए। हम कोई यूनियन या संगठन नहीं हैं। हम तो कुछ लोग है जो बैंककर्मियों को क्रियाशील कर रहे हैं ताकि वे निराशा में भी जीनें की कला सीख सकें, अपनी निराशा भगा सकें और अपना आत्मबल बढ़ा कर आनंद से जी सकें। फोरम सेवारत और सेवामुक्त परेशान बैंककर्मियों की नि:स्वार्थ सेवा कर रहा है।यही इसका मूल उद्देश्य है।
ट्रेड यूनियनें:
हमारा स्पस्ट मत है, ट्रेड यूनियनें परिवर्तन की तंत्र हैं और संगठित उद्योग और व्यापार की अभिन्न अंग हैं। ये कर्मचारियों के हितों की रक्षा और संवर्धन की ताकत हैं। इन्हें ताकतवर, जिन्दा, क्रियाशील और परिणाम देनेवाली बनें रहना चाहिए।
बैंक ट्रैड यूनियनें:
पिछले 20 वर्षों में, बैंकिंग में ट्रेड यूनियनों को लेकर अविश्वास का एक भद्दा दृश्य उभरा है और आज यह चरम पर है। जिम्मेदार लोगों ने जानबूझकर इसकी अनदेखी की है। आज यदि जनसंग्रह-रिफरेंडम- कराया जाये तो 90% से ज्यादा बैंककर्मीं अपने नेताओं का पूर्णरूप से बहिष्कार करेंगे।
हम पिछले 5 वर्षों से संचार व्यवस्था से जुड़े है, लेकिन हमें देश के कोने -कोनें से बहुत ही बुरी टिप्पणियां नेताओं को लेकर मिलती रहीं हैं। हमें उम्मीद थी कि नेताओं के कृपापात्र चमचे कुछ चूं-चड़ाम करेंगे, लेकिन वे भी चुप रहे।
हमारे अभिमत:
हमारी निगाहें, उन लोगों पर रहती हैं जो व्यवस्था के शीर्ष पर होते हैं, क्योंकि हमारे विषयों का उन्हीं से रिस्ता है। कुछ नेता अपनें आस-पास भी नहीं देखते। स्वयंसिद्ध और सही होने के मुगालते में रहते हैं. राजा गलती नहीं करता के सिद्धांत को मानते हैं।
बैंककर्मियों को बेवकूफ बनाने में उन्हें कोई संकोच नहीं होता, हलांंकि आज उनका मुखौटा उतर चुका है। कुछ दिन पहले कह रहे थे कि वे केवल सेवारत बैंककर्मियों और अधिकारियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। पेंशनरों से उनका कोई लेना-देना नहीं है। आजकल उनकी आवाज बदली है। अब वे तुष्टीकरण करते भिन्न आचरण कर रहे हैं। कुछ दिन पहले तक वे सरकारी बयानों पर गहरी चुप्पी साधे रहे और अब ऐसा कर कह रहे हैं जैसे कि सरकार की योजना उन्हें बता दी गई है और वे उसी के अनुरूप आगे बढ़ रहे हैं। वे दावा करते हैं कि पारिवारिक पेंशन उनकी उपलब्धि है, जब कि अंधे ने भी सुना था कि यह श्री रजनीश कुमार, पूर्व आई.बी.ए. चेयरमैन की 22.7.2020 को एम.ओ.यू. साइन होनें के बाद उनकी घोषणा थी। अब ये सब पेंशन अपडेटिंग का दावा करने के लिए अपनी योजना बना रहे हैं।
इन्हें अब दिखाई पड़ा है कि केन्द्रीय पेंशन में 1995 से अब तक कितनें सुधार हो चुके हैं, जिनका बैंक पेंशन में समावेश नहीं हुआ है। आश्चर्य होता है, चंद दिन पहले तक नेता पेंशन अपडेटिंग का सवाल सुनते ही आग बबूला हो जाते थे, लागत के नाम पर इसकी संभावना को ही खारिज कर देते थे, जैसे बैंकें इनके बाप की जागीर हों और इन्हें अपनी जेब से कुछ देना हो! अब गिरगिट की तरह रंग बदल लिए हैं। लेकिन, ये इनका मारीची अवतार है।
नेताओं का चरित्र:
हमनें देखा है कि सिरफिरे नेता लोगों को उकसाते हैं, फरमान जारी करते हैं, आपस में लड़ाते हैं, और फूट डालते हैं। यह इनकी आदत है। इसके बिना वे नेता नहीं रह सकते। सोसल मीडिया में उजागर हो रही सच्चाइयों का मुकाबला करनें की इनमें हिम्मत नहीं है। अगर इनके पास सच्चाई है, तो इसे छुपाने की क्या जरूरत है? अगर लोग नानसेंस हैं तो उसका प्रतिवाद करो, खंडन करो। मीडिया सेल बनाओ। बिल में मत जाओ।
हलांकि कि हमारा मत है कि अगर नीतियां, कार्यक्रम और निर्णय यूनियनें कठोर लोकतांत्रिक माध्यमों से तय करतीं हैं, तो हो सकता है किसी को हस्तक्षेप की जरूरत ही न पड़े। लेकिन जब संगठनों का अपहरण कर लिया गया है और उन्हें निजी हित में प्रयोजित कर गुलाम बना लिया गया हो, बैंककर्मियों को हस्तक्षेप करने का जायज कारण बनता है।
व्यक्तिगत स्तर पर किए गये भ्रष्टाचार की मार एक छोटे दायरे में होती है, लेकिन वही भ्रष्टाचार जब कोई किसी संस्था के शीर्ष पर बैठा आदमीं करता है, तो वह उस समुदाय, समाज और देश को बरबाद करता है, जिसका वह प्रतिनिधित्व करता है। भ्रष्टाचार का मतलब जरूरी नहीं कि रूपये पैसे का भ्रष्टाचार ही हो। निर्णय और नीतियों में भी भ्रष्टाचार होता है। बैंकों में ट्रैड यूनियनें एक धंधा का रूप ले चुकी हैं, जहां आमदनी ही आमदनी है, बिना किसी लागत या निवेश के। निश्चित तौर पर, हम यह जरूरी पाते हैं कि हम गलत बातों का भंडाफोड़ करें, शीर्ष पर चाहे कोई भी हो।
झूंठे मंतव्य:
सोसल मीडिया पर 11वें समझौते को लेकर तोतारटंत बयान जारी है, जिसका ज्यादा भाग सोसल मीडिया में सक्रिय लोगों को लक्ष्य में इस्तेमाल हुआ है। स्वाभाविक है, हम इसे पाखंड की पराकाष्ठा के रूप में लें। यह चोरी और सीनाजोरी है। नेताओं की अंतरात्मा उनसे कहती है कि वे भ्रष्ट हैं, गलत हैं और यह सब बैंककर्मियों की नजर में है। इनकी ढीठता को दाद देना होगा।
हमारा साधारण सा विचार है कि अगर समझौते को लेकर अपार समर्थन के संदेश मिल रहे हैं, लोग खुशियां जाहिर कर रहे हैं, जैसा दावा किया जा रहा है, तो नेताओं के बिचलित या चिंचित होने की जरूरत क्या है? ईर्ष्या के बजाय आनंद मनाएंं। हां, यह लंबा 'इंतजार' और 'अनिश्चितता' तो थी, लेकिन काम पर कौन था, इसके लिए जवाबदेह और जिम्मेदार कौन था? अड़चनें और अवरोध क्या थे और उसके लिए जिम्मेदार कौन थे, इसे कभी स्पस्ट क्यों नहीं किया गया? यह तो लुका-छिपी भर था।
'यह एक सर्वोत्तम समझौताहै', यह प्रचलन में एक मजाक भर है, हकीकत नहीं। ऐसा कब से होता आ रहा है! कभी समझौतों को दूसरा मील का पत्थर, कभी लैंडमार्क तो कभी अनोखा, अभूतपूर्व, अद्वितीय वगैरह वगैरह कहा जा चुका है।
बैंककर्ममियों का एक छोटा सा सवाल है: यह कैसे सर्वोत्तम है? क्या यह केन्द्रीय कर्मियों के वेतन से अच्छा है, जो स्थिति 1970 के दशक में थी? क्या यह 10वें समझौते से ज्यादा है? सर्वोत्तम कैसे है के जवाब में 'वर्तमान परिस्थितियों में' का स्पस्टीकरण पर्याप्त नहीं है। 'वर्तमान परिस्थितियां' क्या थीं पिछले साढ़े तीन वर्षों में कभी बताया नहीं गया क्या? यह सब शब्दों की जालशाजी है, जो बैंककर्मियों को परोसी जा रही है। बैंककर्मियों को राजा-रानी की कहानीं में अब कोई दिलचस्पी नहीं है। बैंककर्मीं उच्च शिक्षित है और भली भांति सूचनाओं से अवगत है। उन्हें बेवकफों का समूह समझना बंद किया जाना चाहिए।
छोटा समूह:
इतिहास तो हमेशा 'छोटे समूह' ने ही रचा है। माचिस की छोटी तीली से निकली चिनगारी ही शोला बनती है। छोटी सी चींटी हाथी के सूंढ़ में घुस जाए, तो हाथी की जान चली जाती है। 'छोटा' कर आंकना, यह कुछ भंड नेताओं का सिरफिरापन है और कुछ नहीं। सोसल मीडिया में लोग यूनियनों की कोई लानत-मलानत नहीं कर रहे हैं, बल्कि उन शातिर तत्वों की लानत-मलानत कर रहे हैं, जिन्होंने यूनियनों का अपहरण कर लिया है। अगर ये शातिर लोग अपनें बिरोधियों का शातिरपन जानते हैं, तो उनका पर्दाफाश करनें में देरी क्यों हो रही है? किसने रोका है? इंतजार क्योंं? इन शातिरों को अगर उनके भ्रष्ट आचरण, निर्णय और निकम्मेंपन के लिए कटघरे में खड़ा किया जाता है, तो यूनियन का घाघरा पहन कर शिखंडी बन जाते हैं। भला इनका निजी दुराचरण संगठन का दुराचरण कैसे हो सकता है? इनका बिरोध, इनकी आलोचना यूनियन का बिरोध या आलोचना कैसे हो सकती है?
शीशे का घर शीशे का ही होता है:
अगर सोसल मीडिया के क्रियाशील लोगों का रिकार्ड शातिराना है, तो आपका कौन सा साधू-संत का है? शीशे का घर शीशे का ही होता है। कोई भी हो, लेकिन जिनका घर शीशे का होता है, वह दूसरों के घर पर पत्थर नहीं मारा करते किसी फिल्म का संवाद है। जवाब में हजारों पत्थर बरसेंगे। अत: ऐसी धमकियां न हमारा रास्ता बदल सकती हैं न रोंक सकतीं हैं और न हमें हमारे उद्देश्यों से भटका सकती हैं।
क्या तुम अज्ञानी हो,
अंजान हो,
गुमराह हो?
सिरफिरे, नेता से दलाल बने लोग, बैंककर्मियों को अज्ञानी कहते हैं। उन्हें अंजान पुकारते हैं और उन्हे गुमराह हुआ कहते हैं। बैंककर्मीं अपने नेताओं के बौद्धिक दीवालियापन को समझ सकते हैं। बैंक नेताओं का युवा और उच्च शिक्षित बैंककर्मियों के प्रति यह नजरिया है। अगर बैंककर्मीं सही सूचना पाते हैं या सही सवाल उठाते हैं तो उन्हें गुमराह या प्रोपेगैंडा से ग्रसित करार दिया जाता है। क्या वाकई हमारे मंतव्य गलत हैं, भ्रमित करते हैं या दंभपूर्ण हैं?
बैंककर्मियों से विनम्र अपील:
सहयोगी भाइयों और बहनों,
आपसे हम निवेदन करते हैं कि आप हमारे काम को लेकर अपनी राय हमें दें। क्या वाकई हम प्रोपेगैंडा करते हैं या किसी तरह से आपको आपकी यूनियनों के खिलाख भड़काते है? सही तथ्यों से आपको अवगत करना क्या गलत है? क्या आपको क्रियाशील करना, मोटिवेट और चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए सुसज्जित करना गलत है? हमरा निवेदन है, हमारी मंशा और मंतव्य की समीक्षा करें और यदि आपको लगता है कि हम गलत हैं और हमारे विचार गलत हैं तो हमें लिखें। हम पुनर्विचार कर सकते हैं और जरूरी हुआ तो हम अपना काम बंद भी कर सकते हैं। हमारा काम आपकी बेहतरी को समर्पित है और यदि यह ठीक नहीं है तो हमारे काम करने का क्या मतलब?
नक्कालों से सावधान रहें, वे नये शिकार की खोज में निकले हैं।
(जे.एन.शुक्ला)
नेशनल कंवेनर
18.11.2020
9559748834
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