Thursday, October 29, 2026

कांग्रेस पार्टी के कार्यकाल में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की दुर्दशा का कड़वा स



कांग्रेस पार्टी के कार्यकाल में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की दुर्दशा का कड़वा सच: 
छुपाए गए एनपीए, रीस्ट्रक्चरिंग का खेल और वेंटिलेटर पर बैठी बैंकिंग व्यवस्था

आज जब बैंकों के निजीकरण और उनके भविष्य पर राजनीतिक बयानबाजी होती है, तब यह याद करना बेहद जरूरी है कि हमारे सरकारी बैंकों को बर्बादी की कगार पर किसने पहुंचाया था। 

2008 से 2014 के दौर का बैंकिंग इतिहास इस बात का गवाह है कि कैसे राजनीतिक लाभ और चुनावी छवि चमकाने के लिए देश की गाढ़ी कमाई से खड़े हुए बैंकों को बीमार बना दिया गया।

1. 'एवरग्रीनिंग' और रीस्ट्रक्चरिंग का सुनियोजित फरेब उस दौर में अंधाधुंध बांटे गए कॉर्पोरेट लोन जब डूबने लगे, तो अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए बैंकों पर दबाव डालकर बार-बार लोन रीस्ट्रक्चरिंग (Restructuring) का रास्ता अपनाया गया। इसे वित्तीय दुनिया में 'Evergreening' (डूबे कर्ज को नया कर्ज देकर कागजों पर जिंदा रखना) कहा जाता है। नियम ऐसे लचीले बनाए गए कि अरबों रुपये के डूबे हुए कर्ज (NPA) को बैलेंस शीट में 'खराब' न दिखाकर 'Standard Asset' (सामान्य चालू खाता) के रूप में दर्ज किया जाता रहा।

2. कागजी मुनाफा और छिपे हुए घाटे इस चालाकी का मकसद सिर्फ एक था—जनता और निवेशकों से सच छुपाना ताकि यह दिखाया जा सके कि सब कुछ ठीक है। दिसंबर 2013 तक जहां कागजों पर केवल ₹2.10 लाख करोड़ के आसपास एनपीए दिखाए जा रहे थे, वहीं पर्दे के पीछे लगभग ₹4 लाख करोड़ के डूबे हुए कर्ज को 'रीस्ट्रक्चर्ड खातों' के नाम पर दबा दिया गया था। कुल मिलाकर 11% से अधिक का कर्ज सड़ांध मार रहा था, लेकिन इसे बाहर आने नहीं दिया गया।

3. डूबते बैंकों को बचाने के लिए ₹80,000 करोड़ से अधिक का बेलआउट जब डूबे हुए कर्जों की वजह से बैंकों की वास्तविक पूंजी जलकर खाक होने लगी और उन पर डूबने का खतरा मंडराने लगा, तब उनकी अंतरराष्ट्रीय और घरेलू रेटिंग्स को गिरने से बचाने के लिए जनता के टैक्स का पैसा झोंका गया। 2000 से 2014 के बीच ₹81,200 करोड़ से अधिक की पूंजी (Recapitalization) बैंकों में केवल इसलिए डाली गई ताकि वे दिवालिया होने से बच सकें। इस भारी-भरकम राशि का 70% से ज्यादा हिस्सा (लगभग ₹58,600 करोड़) तो अकेले 2010 से 2014 के चार वर्षों में ही झोंक दिया गया।

4. वेंटिलेटर पर लाकर छोड़ा गया सिस्टम इस घिनौने जोड़-तोड़ ने देश के मजबूत बैंकिंग तंत्र को ऐसी गंभीर बीमारी में धकेल दिया कि कई बैंक सालों तक 'वेंटिलेटर' (Prompt Corrective Action - PCA) पर पड़े रहे। जब 2015 में आरबीआई द्वारा एसेट क्वालिटी रिव्यू (AQR) कराया गया और कालीन के नीचे दबाया गया कचरा बाहर निकला, तब जाकर देश को पता चला कि बैंकों का वास्तविक फंसा कर्ज ₹8.95 लाख करोड़ से भी ज्यादा पहुंच चुका था।

आज जो लोग बैंकों के संरक्षक बनने का ढोंग कर रहे हैं, उन्हें देश को यह बताना चाहिए कि किसके राजनीतिक दबाव और किन नीतियों के तहत सरकारी बैंकों को बीमार बनाकर उनके अस्तित्व पर सवालिया निशान लगाया गया था।

सच्चाई को पहचानिए। देश की अर्थव्यवस्था झूठ की बुनियाद पर नहीं, बल्कि पारदर्शिता और कड़े सुधारों से ही मजबूत रह सकती है।

तत्कालीन मनमोहन सिंह (यूपीए) सरकार के कार्यकाल (विशेष रूप से 2011 से 2013 के बीच) में बैंक कर्मचारी यूनियनों द्वारा की गई हड़तालों, उनकी सटीक तारीखों, यूनियनों के नामों और उनकी मांगों का ऐतिहासिक विवरण नीचे दिया गया है।

इसे राजनीतिक विरोध और जन-जागरूकता के लिए पर्चों, पोस्टरों या सोशल मीडिया पर साझा करने के लिए तैयार किया गया है:

तथ्यों और तारीखों के साथ ऐतिहासिक ब्यौरा (2011 - 2013)

नेतृत्वकर्ता संगठन: UFBU (United Forum of Bank Unions) — यह देश के 9 बड़े बैंक कर्मचारी और अधिकारी संगठनों का संयुक्त मोर्चा है, जिसमें AIBEA (All India Bank Employees' Association) और AIBOC (All India Bank Officers' Confederation) सबसे प्रमुख हैं। ये उस समय का पोस्टर है 


बड़ी राष्ट्रव्यापी हड़तालें:
 28 फरवरी 2012: यूपीए सरकार की 'जनविरोधी' बैंकिंग सुधार नीतियों और कॉरपोरेट पर नरमी के खिलाफ UFBU द्वारा बुलाई गई देशव्यापी हड़ताल।

 22 और 23 अगस्त 2012: बैंकिंग कानून संशोधन विधेयक (Banking Laws Amendment Bill) और बैंकों के निजीकरण के प्रयासों के खिलाफ UFBU की ऐतिहासिक 2 दिनों की देशव्यापी हड़ताल।

20 और 21 फरवरी 2013: केंद्रीय यूनियनों और बैंक कर्मचारी संगठनों की संयुक्त हड़ताल (दो दिन), जिसमें कॉरपोरेट लूट, बैंकिंग सुधारों और वेतन संशोधन पर सरकार के अड़ियल रवैये का जमकर विरोध हुआ।

18 दिसंबर 2013: UFBU द्वारा बुलाई गई हड़ताल, जिसमें बड़े लोन डिफॉल्टरों के नाम छुपाने और कॉरपोरेट कर्ज को बट्टे खाते (Write-off) में डालने के खिलाफ आवाज बुलंद की गई।

पर्चे और पोस्टर के उदाहरण जो उस समय चिपकाए गए थे यूनियन द्वारा कांग्रेस पार्टी की सरकार के विरोध में । ये राहुल गांधी के सपोर्ट के खोखलापन  को उजागर करता है। 
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              यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियनों (UFBU)
        (AIBEA, AIBOC, NCBE, AIBOA, BEFI, INBEF, INBOC, NOBW)
  
       कॉरपोरेट लूट के खिलाफ और बैंक बचाने की ऐतिहासिक लड़ाई!
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जब मनमोहन सिंह सरकार देश के बड़े उद्योगपतियों के लाखों करोड़ के  कर्ज को 'रीस्ट्रक्चरिंग', CDR और राइट-ऑफ (Write-off) के नाम पर 
माफ कर रही थी, तब बैंक यूनियनों ने सड़क से संसद तक मोर्चा खोला था।

इन ऐतिहासिक हड़तालों को याद रखें:
• 28 फरवरी 2012 — 'बैंकिंग सुधारों' और कॉरपोरेट रियायतों के खिलाफ राष्ट्रव्यापी हड़ताल!
• 22 & 23 अगस्त 2012 — निजीकरण और कॉरपोरेट परस्ती के विरोध में 48 घंटे की पूर्ण हड़ताल!
• 20 & 21 फरवरी 2013 — जनता के पैसे की लूट के खिलाफ देशव्यापी बंद!
• 18 दिसंबर 2013 — डूबे कर्जों (NPA) और 'एवरग्रीनिंग' के खिलाफ जोरदार हड़ताल!

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                      हमारी प्रमुख मांगें:
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1. 'विलफुल डिफॉल्ट' को फौजदारी अपराध घोषित करो!
   - जो बड़े पूंजीपति जानबूझकर बैंकों का पैसा दबाकर बैठे हैं, उन्हें जेल भेजो।

2. बड़े डिफॉल्टरों के नाम सार्वजनिक करो!
   - जनता के पैसे की चोरी छुपाने के लिए डिफॉल्टरों की सूची गुप्त रखना बंद करो।

3. 'Evergreening' और 'लोन राइट-ऑफ' का खेल बंद हो!
   - बड़े कॉरपोरेट घरानों को फायदा पहुंचाने के लिए डूबते कर्जों को 'सामान्य कर्ज'
     (Standard Assets) दिखाना बंद करो।

4. आम जनता के पैसे से कॉरपोरेट का घाटा पूरा करना बंद हो!
   - बैंकों के मुनाफे का इस्तेमाल आम जनता और कर्मचारियों के लिए हो, न कि बड़े 
     कारोबारियों के बेलआउट (Bailout) के लिए।

5. कर्मचारियों के वेतन और पेंशन अधिकारों पर हमला बंद करो!
   - बैंकों की पूंजी डूबने का बहाना बनाकर कर्मचारियों की वेतन वृद्धि (Wage Revision )रोकने की दोहरी नीति नहीं चलेगी।

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             बैंकिंग बचाओ - देश बचाओ - आम जनता का पैसा बचाओ!
       UFBU और AIBEA का बुलंद नारा: "कॉरपोरेट की लूट बंद करो!"
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इस जानकारी के माध्यम से आप तत्कालीन सरकार की नीतियों के खिलाफ यूनियनों के कड़े रुख, आंदोलनों की सटीक तारीखों और उनकी असली मांगों को ऐतिहासिक तथ्यों के साथ प्रस्तुत कर सकते हैं।

1991 के आर्थिक संकट से लेकर आज तक सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs) के सफर, उनकी आर्थिक दुर्दशा और हालिया वर्षों में आए बदलावों का तथ्यात्मक विश्लेषण:

1. 1991 का संकट: सोना गिरवी रखने की नौबत और LPG सुधार

1991 में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार गिरकर मात्र 1.2 अरब डॉलर रह गया था, जो केवल दो से तीन हफ्तों के आयात के लिए पर्याप्त था। वित्तीय स्थिति इतनी बदहाल हो चुकी थी कि सरकार को बैंक ऑफ इंग्लैंड और बैंक ऑफ जापान में अपना 47 टन से अधिक सोना गिरवी रखकर तात्कालिक कर्ज लेना पड़ा।

इसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिम्हा राव और वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने LPG मॉडल (Liberalisation, Privatisation, Globalisation) को अपनाया:

लाइसेंस-परमिट राज की समाप्ति: उद्योगों से सरकारी पाबंदियां हटाई गईं।

विनिवेश (Disinvestment): पहली बार सरकारी उपक्रमों (PSUs) और बाद में बैंकों में सरकारी हिस्सेदारी बेचकर पूंजी जुटाने की प्रक्रिया शुरू हुई।

वैश्वीकरण: विदेशी व्यापार और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए भारतीय बाजार को खोला गया, जिसने संरक्षणवादी अर्थव्यवस्था की कमियों को उजागर किया।

2. सरकारी नियंत्रण और PSUs की संरचनात्मक बर्बादी
दशकों तक शत-प्रतिशत सरकारी नियंत्रण में रहने वाले कई उपक्रम अक्षमता, नौकरशाही की दखलअंदाजी और अत्यधिक राजनीतिक हस्तक्षेप के शिकार हो गए:

BSNL और MTNL: 2000 के दशक की शुरुआत में हजारों करोड़ का मुनाफा कमाने वाली BSNL नीतिगत देरी, 3G/4G स्पेक्ट्रम आवंटन में पिछड़ने और निजी कंपनियों (Airtel, Vodafone, Jio) के साथ प्रतिस्पर्धी न बन पाने के कारण गंभीर वित्तीय संकट और भारी घाटे में डूब गई।

Air India: 2007 में एयर इंडिया और इंडियन एयरलाइंस के विलय के बाद कंपनी पर भारी कर्ज लद गया। 111 नए विमानों की खरीद और बढ़ते परिचालन घाटे के कारण यह एयरलाइन रोजाना 20 करोड़ रुपये से अधिक के घाटे पर चलने लगी और पूरी तरह करदाताओं के पैसों पर टिकी रही।

भारतीय रेल: बुनियादी ढांचे के आधुनिकीकरण के बजाय लोकलुभावन घोषणाओं (बिना वित्तीय आधार के नई ट्रेनें और किराए न बढ़ाना) के कारण रेलवे का ऑपरेटिंग रेश्यो (Operating Ratio) 98%–99% के स्तर पर पहुंच गया, जिससे विकास कार्यों के लिए अपने स्तर पर पूंजी जुटाना असंभव हो गया।

शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था: सरकारी स्कूलों, कॉलेजों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHCs) में दशकों तक बुनियादी ढांचे के अभाव, राजनीतिक नियुक्तियों और गुणवत्ता की उपेक्षा के कारण आम जनता निजी संस्थानों और अस्पतालों पर निर्भर होने के लिए मजबूर हुई।

3. 2014 के बाद की नीति: कायाकल्प, प्रोफेशनलिज्म और निर्णायक सुधार

2014 के बाद सरकार ने इन क्षेत्रों के प्रति एक बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाया—जहाँ संभव था वहाँ आधुनिकीकरण और वित्तीय अनुशासन लागू किया गया, और जहाँ सुधार असंभव था वहाँ निर्णायक विनिवेश किया गया:

सरकारी बैंकों की ऐतिहासिक रिकवरी: 'एसेट क्वालिटी रिव्यू' (AQR) के जरिए छुपे हुए एनपीए (NPA) को बाहर लाया गया।

   IBC (इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड) के माध्यम से कर्ज वसूली को तेज किया गया और बैंकों का विलय कर 12 मजबूत बैंक बनाए गए।

 नतीजा यह रहा कि 2015-18 में लाखों करोड़ के घाटे में रहने वाले सरकारी बैंक वित्त वर्ष 2023-24 और उसके बाद ₹1.4 लाख करोड़ से अधिक का रिकॉर्ड मुनाफा दर्ज करने लगे।

Air India का पूर्ण निजीकरण (2022):
    दशकों से करदाताओं के पैसे बहा रही एयर इंडिया को अंततः टाटा समूह को सौंप दिया गया, जिससे सरकार को सालाना हजारों करोड़ के घाटे से मुक्ति मिली।

BSNL के लिए पुनरुद्धार पैकेज:
सरकार ने BSNL को बंद करने के बजाय ₹1.64 लाख करोड़ से अधिक के रिवाइवल पैकेज दिए, 4G/5G स्पेक्ट्रम आवंटित किया और स्वदेशी टेलीकॉम स्टैक पर आधारित नेटवर्क शुरू कराया, जिससे इसका परिचालन घाटा (Operating Loss) धीरे-धीरे कम हुआ।

रेलवे में अभूतपूर्व पूंजीगत व्यय (Capex): अलग से पेश होने वाले राजनीतिक रेल बजट को समाप्त कर मुख्य बजट में मिलाया गया।

   'वंदे भारत', 'अमृत भारत', डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (DFC) और रेलवे स्टेशनों के पुनर्विकास में लाखों करोड़ का पूंजीगत निवेश किया गया ताकि लॉजिस्टिक्स लागत घटे।

डिफेंस और नवरत्न PSUs का प्रदर्शन:
HAL, BEL और अन्य रक्षा उपक्रम—जो कभी केवल असेंबली लाइन माने जाते थे—आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत बड़े निर्यात और रिकॉर्ड लाभ मार्जिन हासिल करने वाली वैश्विक कंपनियां बनकर उभरीं।

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