Saturday, July 4, 2026

व्यवस्थित भेदभाव और वैधानिक अधिकारों के हनन के संबंध में।

ज्ञापन (MEMORANDUM)
दिनांक: 6 जून, 2026

सेवा में,

 1. सचिव (The Secretary), वित्तीय सेवा विभाग (DFS), वित्त मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली।

 2. अध्यक्ष / प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CMD & CEO), सभी सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक (PSB)।

 3. अध्यक्ष (The Chairman), इंडियन बैंक्स एसोसिएशन (IBA), मुंबई।

विषय: सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के सेवानिवृत्त कर्मचारियों (Retirees) के साथ पेंशन अपडेशन, ग्रेच्युटी, डीए (महंगाई भत्ता) न्यूट्रलाइजेशन और मेडिकल इंश्योरेंस सब्सिडी के मामले में हो रहे संस्थागत अन्याय, व्यवस्थित भेदभाव और वैधानिक अधिकारों के हनन के संबंध में।

आदरणीय महोदय / महोदया,

हम यह ज्ञापन सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (PSBs) के वरिष्ठ नागरिक सेवानिवृत्त कर्मचारियों (Retirees) के साथ हो रहे संस्थागत अन्याय, दोहरे मानदंडों और प्रशासनिक उदासीनता के पूरे इतिहास को आधिकारिक रिकॉर्ड पर लाने के लिए लिख रहे हैं। यह वही कार्यबल है जिसने आधुनिक भारत के बैंकिंग ढांचे की नींव रखी और सरकार की हर वित्तीय समावेशन योजना (जैसे जनधन योजना आदि) को दिन-रात एक करके सफल बनाया। लेकिन आज, इन्हीं बुजुर्गों को बैंक प्रबंधन और 'आईबीए' (IBA) द्वारा एक वित्तीय बोझ समझा जा रहा है और उनके साथ अत्यंत सम्मानहीन व्यवहार किया जा रहा है।

एक तरफ जहां कार्यरत कर्मचारियों के हितों को पूरी तरह सुरक्षित रखा जाता है, वहीं दूसरी तरफ सेवानिवृत्त कर्मचारियों के अधिकारों को दबाने के लिए तकनीकी कमियों, मनमानी तारीखों (Cut-off dates) और कानूनी पेचीदगियों का सहारा लिया जाता है। हम सेवानिवृत्त समाज के साथ हो रहे इस चौतरफा अन्याय को नीचे विस्तार से प्रस्तुत कर रहे हैं:

 1. पूर्ण पेंशन अपडेशन (नियम 56) का उल्लंघन और 'एक्स-ग्रेशिया' का धोखा
बैंक पेंशन रेगुलेशन के **नियम 56 (Regulation 56)** में स्पष्ट रूप से प्रावधान है कि जब भी नया वेतन समझौता (Wage Revision) होगा, तब केंद्र सरकार और रिजर्व बैंक (RBI) की तर्ज पर सेवानिवृत्त बैंक कर्मचारियों की पेंशन को भी अपडेट (संशोधित) किया जाएगा।

 अन्याय: आरबीआई (RBI) के कर्मचारियों की पेंशन हर वेतन संशोधन के साथ नियमित रूप से अपडेट की जाती है, लेकिन सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक कर्मियों की पेंशन को दशकों से एक ही जगह फ्रीज (रोक) कर रखा गया है।

 *'एक्स-ग्रेशिया' का भटकाव: 12वें द्विपक्षीय समझौते (12th Bipartite Settlement) में मूल पेंशन अपडेशन को लागू करने के बजाय एक "मासिक अनुग्रह राशि" (Monthly Ex-Gratia) शुरू कर दी गई। यह अंतरिम राहत तो दे सकती है, लेकिन यह एक सोची-समझी चाल है। इससे आपकी मूल पेंशन (Basic Pension) में कोई बदलाव नहीं होता, न ही इसमें डीए (DA) का मर्जर होता है। यह पुराने सेवानिवृत्त कर्मचारियों की घटती क्रय शक्ति (Purchasing Power) के घाव पर सिर्फ एक अस्थायी पट्टी है, कोई स्थायी समाधान नहीं।

2. अनुभवी अधिकारियों के साथ धोखा: 45 दिनों के ग्रेच्युटी नियम को दबाना

बैंक ऑफिसर्स सर्विस रेगुलेशन (OSR Rule 46) के अनुसार, जो अधिकारी बैंक में 30 वर्ष से अधिक की सेवा पूरी करते हैं, वे 30 साल के बाद के हर अतिरिक्त वर्ष के लिए **45 दिनों के वेतन** (Basic + DA) की दर से बढ़ी हुई ग्रेच्युटी पाने के कानूनी हकदार हैं। यह नियम जीवनभर की निष्ठा का सम्मान करने के लिए बनाया गया था।

 *अन्याय: सेवानिवृत्ति के समय बैंक ओएसआर (OSR) और केंद्रीय ग्रेच्युटी अधिनियम (Payment of Gratuity Act) दोनों के तहत गणना करते हैं। यदि एक वरिष्ठ अधिकारी की 45 दिनों वाली वैध गणना सरकारी सीमा (जैसे पुरानी 10 लाख या 20 लाख की कैप) से ऊपर निकल जाती है, तो **बैंक ओएसआर के नियम को जबरन दबा देते हैं और भुगतान को न्यूनतम वैधानिक सीमा पर ही रोक देते हैं।

 नतीजा: बैंक आपके जीवन के सबसे वरिष्ठ 4-5 वर्षों के कठिन श्रम का पैसा डकार जाते हैं। स्थिति यह हो जाती है कि 35-36 साल सेवा करने वाले अधिकारी और 30 साल सेवा करने वाले कर्मचारी की ग्रेच्युटी एक बराबर कर दी जाती है। यानी आपके वफादारी के वो आखिरी साल मुफ्त में ले लिए जाते हैं।

 3. महंगाई भत्ते (DA Neutralization) में देरी: दोहरा रवैया

महंगाई कभी यह देखकर नहीं आती कि आप नौकरी में हैं या रिटायर हो चुके हैं। वरिष्ठ नागरिकों को भी उसी बाजार दर पर दवाइयां और राशन खरीदना पड़ता है जिस पर कार्यरत कर्मचारियों को। फिर भी महंगाई भत्ते की गणना में यह गणितीय अन्याय किया जा रहा है:

 *कार्यरत कर्मचारियों  को हर तीन महीने (Quarterly ) में डीए (DA) संशोधन का लाभ मिलता है।

 *सेवानिवृत्त कर्मचारियों को उसी संशोधन के लिए **छह महीने (Half-Yearly) का इंतजार कराया जाता है।

 अन्याय:वरिष्ठ नागरिकों के महंगाई भत्ते को तीन महीने लेट करने का एकमात्र उद्देश्य बैंकों द्वारा अपने वित्तीय खर्चे को बुजुर्गों की जेब काटकर बचाना है, जिसका कोई तार्किक या नैतिक आधार नहीं है।

 4. मेडिकल इंश्योरेंस (चिकित्सा बीमा) में अकेला छोड़ना
ग्रुप मेडिकल इंश्योरेंस योजना का जो ढांचा तैयार किया गया है, वह बुजुर्गों के प्रति संवेदनशीलता की कमी को दर्शाता है:

 *दोहरा मापदंड: कार्यरत कर्मचारियों का 100% मेडिकल प्रीमियम बैंक खुद भरता है। जबकि बुजुर्गों को, जिन्हें इस उम्र में अस्पताल और इलाज की सबसे ज्यादा जरूरत है, अपनी उसी पुरानी बिना-अपडेटेड पेंशन से भारी-भरकम प्रीमियम चुकाने पर मजबूर किया जाता है।

 *अन्याय: आईबीए (IBA) जानबूझकर कार्यरत कर्मचारियों और रिटायरीज के लिए अलग-अलग इंश्योरेंस टेंडर निकालता है। रिटायरीज को एक अलग "हाई-रिस्क" (ज्यादा बीमार होने वाले) पूल में डालकर बीमा कंपनियों को खुली छूट दे दी जाती है कि वे हर साल प्रीमियम में बेतहाशा बढ़ोतरी करें। यदि आईबीए कार्यरत कर्मचारियों और सेवानिवृत्त कर्मचारियों को **एक ही संयुक्त रिस्क पूल (Clubbed Pool)** में रखकर मोलभाव करे, तो बड़ी संख्या के कारण बीमा कंपनियां प्रीमियम की दरों को बहुत कम करने पर मजबूर हो जाएंगी।

5. चिकित्सा सब्सिडी में शर्तें थोपना और लागू होने की तारीखों में हेराफेरी
रिटायरी फेडरेशनों के लंबे संघर्ष के बाद जब बैंकों ने मेडिकल प्रीमियम पर थोड़ी सब्सिडी देना स्वीकार भी किया, तो उसे दंडात्मक शर्तों और गलत तारीखों के साथ लागू किया गया:

 अधूरी प्रभावी तारीखें (Effective Dates): जब भी सब्सिडी या कल्याणकारी योजनाओं में कोई सुधार या बढ़ोतरी की मांग मंजूर होती है, तो उसे पिछली तारीख (Retrospective Effect) से लागू करने के बजाय एक आगे की तारीख (Prospective Date) दे दी जाती है। इससे उन बुजुर्गों को कोई राहत नहीं मिलती जो पिछले कई वर्षों से महंगे प्रीमियम का कर्ज झेल रहे हैं।

 पॉलिसी चुनने की आजादी का हनन: यह सब्सिडी केवल तभी मिलती है जब आप आईबीए द्वारा तय की गई उसी अत्यधिक महंगी बीमा कंपनी से पॉलिसी खरीदें। यदि कोई बुजुर्ग स्वतंत्र रूप से किसी दूसरी आईआरडीएआई (IRDAI) मान्यता प्राप्त कंपनी से कम दाम में अच्छी पॉलिसी लेता है, या आर्थिक तंगी के कारण पॉलिसी नहीं ले पाता, तो बैंक उसे मिलने वाली सब्सिडी राशि को पूरी तरह रोक देता है। यह कल्याणकारी सहायता नहीं, बल्कि बुजुर्गों को मजबूर करने का जरिया बन गया है।


हमारी स्पष्ट और तत्काल माँगें:

 1. पूर्ण पेंशन अपडेशन: अंतरिम एक्स-ग्रेशिया के छलावे को बंद कर, नियम 56 के तहत आरबीआई की तर्ज पर मूल पेंशन (Basic Pension) का पूर्ण अपडेशन तुरंत लागू किया जाए।

 2. सेवा नियमों (OSR) का सम्मान: 30 वर्ष से अधिक सेवा वाले अधिकारियों को 45 दिनों की बढ़ी हुई ग्रेच्युटी का भुगतान स्वतंत्र रूप से किया जाए, इसे किसी भी सरकारी न्यूनतम सीमा के नाम पर काटा न जाए।

 3. सामूहिक महंगाई भत्ता (DA) समानता: कार्यरत कर्मचारियों की तरह रिटायरीज के लिए भी डीए (DA) का संशोधन हर तीन महीने (Quarterly) पर समान रूप से किया जाए।

 4. एकमुश्त इंश्योरेंस पूल: आईबीए को निर्देशित किया जाए कि वह सेवारत और सेवानिवृत्त कर्मियों का एक ही संयुक्त टेंडर निकाले ताकि कॉर्पोरेट बारगेनिंग से बुजुर्गों का प्रीमियम हमेशा के लिए कम हो सके।

 5. बिना शर्त मेडिकल सब्सिडी: मेडिकल प्रीमियम की सब्सिडी राशि सीधे पात्र रिटायरी के खाते में कैश वेलफेयर के रूप में दी जाए, चाहे उन्होंने अपनी सुविधानुसार किसी भी मान्यता प्राप्त कंपनी से स्वास्थ्य बीमा लिया हो।

हम वित्त मंत्रालय और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के शीर्ष प्रबंधन से यह आग्रह करते हैं कि "वित्तीय बोझ" और "एक्चुअरियल कॉस्ट" का बहाना बनाकर बुजुर्गों के साथ इस गणितीय क्रूरता को बंद करें। जो बैंकिंग तंत्र अपने ही पूर्वजों और निर्माताओं को इस उम्र में बेसहारा छोड़ दे, उसकी व्यावसायिक नैतिकता पर गहरा सवाल उठता है। हम आपसे इस गंभीर विषय में तुरंत प्रशासनिक हस्तक्षेप करने और बैंक रिटायरीज के संवैधानिक व वैधानिक अधिकारों को बहाल करने की मांग करते हैं।

भवदीय,
Danendra Kumar Jain 

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