इतिहास की सीख: कैसे अति-वामपंथी राजनीति ने भारतीय उद्योगों का भविष्य धुंधला किया (1961-1990)
यह लेख 1961 से 1990 के उस दौर का विश्लेषण करता है जब उदारीकरण (Liberalization) से ठीक पहले भारत में 'लाइसेंस राज' और उग्र मज़दूर राजनीति का बोलबाला था:
खोए हुए तीन दशक: जब 'हड़ताल' विकास पर भारी पड़ गई
1991 के आर्थिक सुधारों से पहले, भारत ने तीन ऐसे दशक देखे जहाँ उद्योगों को फलने-फूलने का अवसर मिलने के बजाय एक खास किस्म की राजनीतिक सोच के तहत दबाया गया। मज़दूरों के हित के नाम पर शुरू हुई राजनीति धीरे-धीरे उद्योगों को तबाह करने वाले हथियार में बदल गई।
1. काम से कतराने की संस्कृति (The Anti-Work Culture)
1960 से 1980 के दशकों में वामपंथी विचारधारा से प्रेरित नेताओं ने मज़दूरों के मन में यह बात बैठा दी कि"अधिकार" सर्वोपरि हैं और "कर्तव्य" गौण।
कार्यालयों में देर से आना, जल्दी चले जाना, और प्रबंधकों (Managers) के आदेशों की अवहेलना करना एक फैशन बन गया था।
चूंकि मज़दूर संघों का राजनीतिक संरक्षण इतना मज़बूत था कि अकर्मण्य कर्मचारियों को भी नौकरी से निकालना असंभव था, इसलिए कार्यकुशलता (Productivity) पूरी तरह समाप्त हो गई।
1. मुंबई और बंगाल का औद्योगिक पतन
इस उग्र हड़ताली संस्कृति का सबसे बड़ा उदाहरण 1982 की मुंबई टेक्सटाइल मिल हड़ताल थी। एक अड़ियल नेतृत्व के कारण महीनों तक मिलें बंद रहीं। नतीजा यह हुआ कि मिलें हमेशा के लिए बंद हो गईं और ढाई लाख सेअधिक मज़दूर रातों-रात सड़क पर आ गए।
यही कहानी पश्चिम बंगाल में दोहराई गई, जहाँ 'घेराव' और हिंसक प्रदर्शनों से तंग आकर देश के बड़े औद्योगिक घरानों ने वहां से निवेश वापस ले लिया। जो राज्य 1960 में देश का औद्योगिक केंद्र था, वह विकास की दौड़ में पिछड़ गया।
1. राष्ट्र निर्माण करने वालों के प्रति नफ़रत
आज जिस तरह कुछ राजनीतिक ताकतें चुनिंदा उद्योगपतियों को निशाना बनाती हैं, उसकी नींव इसी दौर में रखी गई थी। देश के लिए संपत्ति और रोज़गार बनाने वाले उद्यमियों को "शोषक" और "विलेन" के रूप में पेश कियागया। मज़दूरों को यह नहीं समझाया गया कि जब तक पूँजीपति लाभ नहीं कमाएगा, तब तक वह मज़दूरों को वेतन कहाँ से देगा? इस 'नफ़रत की राजनीति' ने देश के आर्थिक विकास की गति को धीमा कर दिया।
1. आधुनिकता और कंप्यूटर का विरोध
जब देश में कंप्यूटर और शुरुआती ऑटोमेशन का दौर आया, तो बैंकों और सरकारी दफ्तरों में वामपंथी यूनियनों ने यह कहकर चक्का जाम कर दिया कि "मशीनें इंसानों का रोज़गार छीन लेंगी।" इस तकनीकी विरोध ने भारत को दुनिया के मुकाबले कई साल पीछे धकेल दिया।
निष्कर्ष
1961 से 1990 का इतिहास इस बात का गवाह है कि जब मज़दूर राजनीति "काम करो और हक़ मांगो" के बजाय "काम मत करो और केवल मांगो" पर उतर आती है, तो उद्योग दम तोड़ देते हैं। 1991 में भारत को मज़बूरी में अपनी अर्थव्यवस्था को खोलना पड़ा क्योंकि पुरानी समाजवादी व्यवस्था पूरी तरह दिवालिया हो चुकी थी।21वीं सदी के मज़दूरों और युवाओं को इस कड़वे इतिहास से सीख लेनी होगी।
यहाँ ऐतिहासिक संदर्भ को जोड़ते हुए,स्पष्ट किया गया है कि कैसे वामपंथी नीतियों और उग्र यूनियनों के दबाव में हज़ारों छोटे-बड़े उद्योगों को ताला लगाना पड़ा था:
नीतिगत पंगुता से वैश्विक नेतृत्व तक:
भारतीय अर्थव्यवस्था का ऐतिहासिक परिवर्तन
1. 1991 के बाद का दौर: सुधारों की राह में वामपंथी रोड़े
1991 में आर्थिक उदारीकरण (Liberalization) की शुरुआत तो हुई, लेकिन सुधारों की यह रफ्तार हमेशा राजनीतिक बंधनों में जकड़ी रही। विशेषकर 2004 से 2008 (UPA-1) के दौरान, जब केंद्र सरकार बाहरी तौर पर वामपंथी दलों के समर्थन पर टिकी थी, देश ने भारी नीतिगत पंगुता (Policy Paralysis) का सामना किया:
निजीकरण पर रोक: घाटे में चल रहे सार्वजनिक उपक्रमों (PSUs) के रणनीतिक विनिवेश को वामपंथियों ने पूरी तरह ब्लॉक कर दिया। टैक्सपेयर्स का पैसा उन सरकारी कंपनियों को जिंदा रखने में डूबता रहा जो बाज़ार में प्रतिस्पर्धा खो चुकी थीं।
FDI सुधारों में देरी:
बीमा, रक्षा, और खुदरा व्यापार जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाने के फैसलों को वामपंथियों ने सिरे से खारिज कर दिया, जिससे देश में आने वाली वैश्विक पूँजी करीब एक दशक तकरुकी रही।
2. वामपंथी दबाव में उद्योगों का सामूहिक पतन (हज़ारों फैक्ट्रियों पर ताला)
वामपंथी विचारधारा और उग्र मज़दूर संघों (Trade Unions) के दबाव का सबसे आत्मघाती असर देश के औद्योगिक ढांचे पर पड़ा। आंकड़ों और औद्योगिक इतिहास के अनुसार:
अकेले पश्चिम बंगाल में तबाही: 1970 और 1980 के दशक से शुरू हुआ 'घेराव' और हड़ताल का यह सिलसिला 1991 के बाद भी जारी रहा। आधिकारिक और आर्थिक सर्वेक्षणों के अनुसार, वामपंथी नीतियों, बार-बार के बंद और मज़दूर विवादों के कारण **पश्चिम बंगाल में लगभग 50,000 से अधिक छोटे, मध्यम और बड़े उद्योग (MSMEs & Large Scales) या तो पूरी तरह बंद हो गए या उन्होंने राज्य से अपना कारोबार समेट लिया।
महान ब्रांड्स का अंत: डनलोप (Dunlop), बंगाल लैंप, सुलेखा इंक, मेटल बॉक्स, जेसप (Jessop), औरकेसोराम कॉटन मिल्स जैसे देश के प्रतिष्ठित और नामचीन औद्योगिक घराने इसी अड़ियल नीति की भेंट चढ़ गए।
मुंबई टेक्सटाइल और सिंगुर का घाव: 1982 की मुंबई टेक्सटाइल मिल हड़ताल के कारण 60 से अधिक बड़ी कपड़ा मिलें हमेशा के लिए बंद हो गईं, जिससे ढाई लाख मज़दूर रातों-रात बेरोज़गार हुए। वहीं 2008 में, टाटानैनो (Singur) जैसी आधुनिक परियोजना को ₹1,400 करोड़ का निवेश करने के बाद भी उग्र विरोध के कारणरातों-रात बंगाल छोड़ना पड़ा। इस हठधर्मिता ने लाखों युवाओं से सम्मानजनक रोज़गार छीन लिया।
3. डॉ. मनमोहन सिंह के अंतिम वर्ष: 'फ्रेजाइल फाइव' (Fragile Five) का कलंक
नीतिगत फैसलों में इसी तरह के राजनीतिक गतिरोध, बड़े पैमाने पर हुए प्रशासनिक घोटालों (Scams) और बेकाबू महंगाई के कारण वर्ष 2013 के आते-आते वैश्विक वित्तीय संस्था मॉर्गन स्टेनली (Morgan Stanley) नेभारत को दुनिया की पांच सबसे कमज़ोर अर्थव्यवस्थाओं—'फ्रेजाइल फाइव' (Fragile Five) में शामिल कर दिया था। उस दौर में देश की आर्थिक स्थिति वैश्विक मंच पर बेहद नाजुक और अविश्वसनीय हो चुकी थी।
4. वर्तमान सरकार: आर्थिक सुधार और गतिवर्धन (Growth Acceleration)
2014 के बाद देश के आर्थिक मॉडल में एक बड़ा बुनियादी बदलाव आया। सरकार ने पूँजीपतियों और उद्यमियोंको "शोषक" मानने के बजाय उन्हें राष्ट्र निर्माण का भागीदार माना। इसके परिणामस्वरूप भारत 'फ्रेजाइलफाइव' से निकलकर आज दुनिया की शीर्ष पांच अर्थव्यवस्थाओं (Top 5 Economies) में गर्व से खड़ा है। यहपरिवर्तन निम्नलिखित सुधारों के कारण संभव हुआ:
ढांचागत सुधार (Structural Reforms): जीएसटी (GST) लागू करके पूरे देश को एक एकीकृत बाज़ार बनाया गया, और 'दिवाला एवं दिवालियापन संहिता' (IBC) लाकर बैंकों के डूबते कर्ज (NPA) की क्रोनिक समस्या कोहल किया गया।
कारोबारी सुगमता (Ease of Doing Business):हज़ारों अनावश्यक अनुपालनों (Compliances) और पुराने पड़ चुके ब्रिटिशकालीन श्रम कानूनों को खत्म करके 4 नए लेबर कोड लाए गए, जो मज़दूरों के अधिकार औरउद्योगों की सुरक्षा में संतुलन बनाते हैं।
कैपेक्स (Capex) और इंफ्रास्ट्रक्चर पर रिकॉर्ड खर्च: एक्सप्रेसवे, रेलवे के आधुनिकीकरण, नए एयरपोर्ट औरडिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर (UPI) के निर्माण में अभूतपूर्व निवेश किया गया, जिसने अर्थव्यवस्था की रीढ़ को मजबूतकिया।
मेक इन इंडिया और PLI स्कीम्स: मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग से लेकर रक्षा उपकरणों तक, भारत को मैन्युफैक्चरिंगहब बनाने के लिए प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) योजना शुरू की गई, जिसने दुनिया के बड़े कॉर्पोरेट हाउसेस(जैसे Apple, Foxconn) को भारत की ओर आकर्षित किया।
निष्कर्ष
इतिहास गवाह है कि जब भी भारत में काम न करने की संस्कृति और पूँजीपतियों के प्रति नफ़रत को राजनीतिक बढ़ावा दिया गया, हज़ारों कारखाने बंद हुए और देश आर्थिक गर्त की ओर गया। इसके विपरीत, जब उद्यमिता(Entrepreneurship) का सम्मान हुआ, तकनीक को अपनाया गया और कड़े फैसले लिए गए, तब देश ने शीर्ष5 अर्थव्यवस्थाओं में जगह बनाई। 21वीं सदी का भारत अब खोखले नारों का नहीं, बल्कि ठोस आर्थिक प्रगति, सहयोग और वैश्विक नेतृत्व का आकांक्षी है।
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