Tuesday, July 7, 2026

बैंकों का राष्ट्रीयकरण - भारत द्वारा सोना गिरवी रखना

 बैंकों के राष्ट्रीयकरण और सरकार का नियंत्रण बढ़ने के नतीजों के कारण भारत की छवि खराब हुई और आयात का बिल चुकाने के लिए भारी मात्रा में सोना भेजना पड़ा। भारत जैसे देश के लिए वे बुरे दिन भुलाए नहीं जा सकते। ऐसे लोगों के बारे में हमें क्या सोचना चाहिए?

Consequences of bank nationalisation and increasing government control India lost its image and had to despatch tons of Gold to meet our Import Bill. Those black days for a country like India cannot be forgotten. How should we consider such dignitaries.


आर्थिक सुधार रिपोर्ट: 1969 से 1991 (HINDI)


यह रिपोर्ट 1969 में शुरू किए गए समाजवादी राज्य-नियंत्रित मॉडल से लेकर 1991 के संकट के बाद अपनाएगए बाजार-संचालित उदारीकरण तक भारतीय अर्थव्यवस्था के ऐतिहासिक सफर को रेखांकित करती है।


1. बैंकों का राष्ट्रीयकरण क्यों किया गया (1969)

19 जुलाई 1969 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने एक राष्ट्रपति अध्यादेश के माध्यम से 14 प्रमुख वाणिज्यिक बैंकोंका राष्ट्रीयकरण कर दिया। इस बड़े संरचनात्मक बदलाव के पीछे मुख्य कारण निम्नलिखित थे:


 व्यापारिक एकाधिकार को तोड़ना

1969 से पहलेनिजी बैंकों पर बड़े औद्योगिक घरानों (जैसे टाटाबिड़ला और थापरका कड़ा नियंत्रण था। येसमूह जनता की जमा पूंजी (डिपॉजिटको लगभग पूरी तरह से अपनी ही बड़ी परियोजनाओं में लगा देते थेजिससेछोटे उद्यमियों को ऋण नहीं मिल पाता था।


 हरित क्रांति का वित्तपोषण:

निजी बैंकिंग ने कृषि क्षेत्र की पूरी तरह से उपेक्षा की थीक्योंकि वे खेती को अत्यधिक जोखिम भरा औरव्यावसायिक रूप से अव्यवहारिक मानते थे। देश में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सरकार को किसानोंतक उच्च उपज वाले बीजउर्वरक और ट्रैक्टर पहुंचाने के लिए मजबूत संस्थागत ऋण चैनलों की सख्त जरूरतथी।


 राजनीतिक वर्चस्व और वैचारिक विभाजन:

कांग्रेस पार्टी के भीतर पुराने  रूढ़िवादी नेताओं (जिन्हें "सिंडिकेटकहा जाता थाके साथ कड़े सत्ता संघर्ष मेंफंसी इंदिरा गांधी ने राष्ट्रीयकरण को एक लोकलुभावन राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। चंद्रशेखरऔर "यंग तुर्कजैसे कट्टर समाजवादी नेताओं के समर्थन सेउन्होंने खुद को जनता के साथ जोड़ा ताकि अपनीगरीब-हितैषी छवि (*गरीबी हटाओ*) को मजबूत किया जा सके। इसी टकराव के कारण तत्कालीन वित्त मंत्रीमोरारजी देसाई को उनके पद से हटा दिया गया और उन्होंने इस्तीफा दे दिया।


2. इसके सामाजिक-आर्थिक परिणाम

 सकारात्मक पक्ष (सामाजिक कल्याण): राष्ट्रीयकरण के परिणामस्वरूप ग्रामीण और बैंकिंग सुविधाओं से वंचितक्षेत्रों में बैंक शाखाओं का अभूतपूर्व और व्यापक विस्तार हुआ। वित्तीय पहुंच का विकेंद्रीकरण हुआजिसनेग्रामीण साहूकारों के पूर्ण एकाधिकार को सफलतापूर्वक तोड़ा और हरित क्रांति को गति देने के लिए आवश्यकऋण प्रदान किया।


नकारात्मक पक्ष (आर्थिक सुस्ती):

इसका दूसरा पहलू यह रहा कि इसने दमघोंटू "लाइसेंस राजको मजबूती से स्थापित कर दिया। ऋण जोखिमविशेषज्ञों के बजाय नौकरशाह और राजनेता यह तय करने लगे कि किसे कर्ज दिया जाए। इससे "लोन मेलोंकीसंस्कृति शुरू हुई और देश की कीमती पूंजी को अकुशल  लगातार घाटे में चल रहे सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों(PSUs) की ओर मोड़ दिया गया।


आर्थिक स्थिरता (ठहराव):

इस गंभीर संरचनात्मक अकुशलता के कारण उत्पादक और उच्च क्षमता वाले निजी व्यवसायों के लिए पूंजी कीभारी कमी हो गई। इसके परिणामस्वरूप भारत पूरी 1970 और 1980 के दशक के दौरान धीमी **"हिंदू विकासदर"** (औसत मात्र ~3.5% वार्षिकके जाल में फंस कर रह गयाजबकि अन्य एशियाई अर्थव्यवस्थाएं हमसेबहुत आगे निकल गईं।


3. भारत द्वारा सोना गिरवी रखना (1990-1991)

दशकों के अत्यधिक सरकारी खर्चऊंचे राजकोषीय घाटे और राज्य-निर्देशित अकुशलताओं के कारण 1990 केअंत तक एक बड़ा भुगतान संतुलन (BoP) संकट पैदा हो गया। इसी दौरान अचानक छिड़े खाड़ी युद्ध ने कच्चे तेलके आयात की कीमतों को आसमान पर पहुंचा दिया और विदेशों में काम करने वाले भारतीयों द्वारा भेजे जाने वालेधन (remittances) के स्रोत को पूरी तरह सुखा दिया।


तत्काल संकटप्रधानमंत्री चंद्रशेखर की अल्पमत सरकार (नवंबर 1990 - जून 1991) के दौरानभारत का विदेशी मुद्रा भंडार गिरकर लगभग $1.2 बिलियन रह गया थाजो मुश्किल से दो सप्ताह के आवश्यक तेल और खाद्य आयात के लिए ही पर्याप्त था।


 सोने की एयरलिफ्टअंतरराष्ट्रीय स्तर पर डिफॉल्ट (कर्ज  चुका पानाहोने की स्थिति से बचने के लिएजिससे भारत की वैश्विक साख और क्रेडिट रेटिंग पूरी तरह बर्बाद हो जातीचंद्रशेखर सरकार ने एक बेहद दर्दनाक औरअसाधारण कदम उठाया। सरकार ने आपातकालीन $400 मिलियन का ऋण प्राप्त करने के लिए 46.91 टनसोना बैंक ऑफ इंग्लैंड और बैंक ऑफ जापान के पास हवाई जहाज से भेजकर गिरवी रख दिया ताकि देश कोदिवालिया होने से बचाया जा सके।


4. निजीकरण की दिशा और मनमोहन सिंह का बदलाव (1991)

1991 के मध्य में भुगतान संतुलन संकट के मलबे के बीच जब प्रधानमंत्री पी.वीनरसिम्हा राव और वित्त मंत्री डॉमनमोहन सिंह ने कार्यभार संभालातो उन्हें अहसास हुआ कि पुराना आर्थिक मॉडल पूरी तरह विफल हो चुका है।उन्होंने ऐतिहासिक 1991 का केंद्रीय बजट पेश कियाजिसने देश को स्पष्ट नीतिगत बदलावों के माध्यम सेउदारीकरणनिजीकरण और वैश्वीकरण (LPG) की ओर मोड़ दिया:


 लाइसेंस राज का अंत:

उन्होंने रक्षा और खतरनाक रसायनों जैसे कुछ रणनीतिक उद्योगों को छोड़कर बाकी सभी के लिए औद्योगिकलाइसेंसिंग को पूरी तरह समाप्त कर दिया। इससे निजी व्यवसायों को बाजार की मांग के आधार पर विस्तार औरनवाचार करने की आजादी मिली।


lरुपये का अवमूल्यन और टैरिफ में कटौती:

निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता को तुरंत बढ़ावा देने के लिए रिजर्व बैंक ने रुपये का लगभग 20% अवमूल्यन किया।इसके साथ हीविदेशी सामानों को रोकने के लिए लगाए गए अत्यधिक आयात शुल्क (जो 300% के उच्चतमस्तर पर थेको घटाकर 150% कर दिया गया ताकि वैश्विक व्यापार के रास्ते खुल सकें।


 निजीकरण और एफडीआई:

स्वचालित अनुमोदन (automatic approval) मार्गों के माध्यम से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) को 51% तककी अनुमति दी गई। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि बजट में "विनिवेश" (disinvestment) की नीति शुरू कीगईजिसके तहत घाटे में चल रहे सार्वजनिक उपक्रमों (PSUs) में सरकार की अल्पांश हिस्सेदारी को बेचकरउनमें वित्तीय अनुशासन और सार्वजनिक जवाबदेही लाने का प्रयास किया गया।


5. वैचारिक दृष्टिकोण में पूर्ण बदलाव (The Ultimate Paradigm Shift)

1969 से 1991 तक का यह सफर आधुनिक भारतीय शासन व्यवस्था में तीन मुख्य मोर्चों पर एक पूर्ण और स्थायीयू-टर्न (बदलावको दर्शाता है:


 मूल दर्शन में बदलाव:भारत 1969 की राज्य-संचालित समाजवाद की उस विचारधारा से दूर हट गयाजो निजीसंपत्ति और बाजार की ताकतों को गहरे संदेह की नजर से देखती थी। 1991 के नए दृष्टिकोण ने बाजार-संचालितपूंजीवाद को अपनायाजहां निजी उद्यम को देश के विकास का प्राथमिक इंजन माना गया।


 बैंकिंग और पूंजी में बदलावइंदिरा गांधी और चंद्रशेखर के दौर मेंराज्य सामाजिक और राजनीतिक कल्याण केउद्देश्यों को पूरा करने के लिए पूंजी को सीधे नियंत्रित और आवंटित करता था। 1991 के बादयह प्रणालीबाजार-निर्धारित ऋणव्यावसायिक दक्षता और बैंकों की संस्थागत स्वायत्तता की ओर स्थानांतरित हो गई।


वैश्विक दृष्टिकोण में बदलाव:

पुराना मॉडल घरेलू उद्योगों को बाहरी दुनिया से सुरक्षित रखने के लिए कड़े संरक्षणवाद और ऊंची टैरिफ दीवारों परनिर्भर था। नया मॉडल पूरी तरह से वैश्वीकरण की ओर मुड़ गयाजिसने विदेशी पूंजीआधुनिक तकनीक औरअंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के लिए भारत के दरवाजे सक्रिय रूप से खोल दिए।


हालांकि 1969 के राष्ट्रीयकरण मॉडल ने एक संवेदनशील दौर में वित्तीय समावेशन और खाद्य सुरक्षा कोप्राथमिकता देकर अपना तात्कालिक सामाजिक उद्देश्य पूरा किया थालेकिन इसने राज्य के हाथों में बहुतअधिक नियंत्रण केंद्रित कर दिया। 1991 के सुधारों ने इस वास्तविकता को स्वीकार किया कि सरकार अकेलेउत्पादन को कुशलतापूर्वक प्रबंधित नहीं कर सकती। राज्य-निर्देशित एकाधिकार को समाप्त करकेइन सुधारोंने उस उच्च-विकास पथ को जन्म दिया जिसने आधुनिक भारत की नींव रखी।

No comments:

Post a Comment