राजेश एक्सपोर्ट्स (Rajesh Exports) के ₹15.15 लाख करोड़ के वित्तीय हेरफेर के मामले को और इस जैसीफर्मों द्वारा अपनाए जाने वाले मॉडस ऑपेरंडी (Modis Operandi - काम करने का तरीका)को नीचे बिंदुवार(point-wise) आसान हिंदी में समझाया गया है:
1. ₹15.15 लाख करोड़ का मामला क्या है?
बाजार नियामक SEBI (सेबी)की जांच के अनुसार, यह कोई ऐसा घोटाला नहीं है जहां ₹15 लाख करोड़ नकद(Cash) गायब कर दिए गए हों, बल्कि यह राजस्व को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने (Inflated Revenue/Accounting Misrepresentation)** का मामला है।
नकली टर्नओवर (Fake Turnover): कंपनी ने वित्तीय वर्ष 2021 से 2025 के बीच अपने बही-खातों में लगभग₹15.15 लाख करोड़ का ऐसा रेवेन्यू (कमाई) दिखाया, जिसका जमीनी स्तर पर कोई ठोस और प्रामाणिक रिकॉर्डनहीं मिला।
विदेशी कंपनियों का सहारा: सेबी ने पाया कि राजेश एक्सपोर्ट्स की कुल घोषित कमाई का 97% से 99% हिस्सा भारत से नहीं, बल्कि उसकी विदेशी सहायक कंपनियों (Overseas Subsidiaries) जैसे कि स्विट्जरलैंडकी 'Valcambi SA' रिफाइनरी से आता हुआ दिखाया जा रहा था।
बही-खातों में अंतर (Mismatch): जब सेबी ने जांच की, तो पता चला कि स्विट्जरलैंड की कंपनी के खुद केअकेले के ऑडिटेड खातों में कमाई बहुत कम थी, लेकिन जब राजेश एक्सपोर्ट्स ने भारत में ग्रुप के नतीजे घोषितकिए, तो उस आंकड़े को लाख करोड़ रुपयों में बदल दिया। सेबी ने इसे "अभूतपूर्व और चौंकाने वाली" गड़बड़ीमाना है।
2. राजेश एक्सपोर्ट्स और अन्य कंपनियों का मॉडस ऑपेरंडी (काम करने का तरीका)
इस तरह की आर्थिक गड़बड़ियों में शामिल कंपनियां मुख्य रूप से निम्नलिखित तरीकों का इस्तेमाल करती हैं:
क. राउंड ट्रिपिंग और सर्कुलर ट्रेडिंग (Round Tripping & Circular Trading)
पैसा और माल घुमाना: ये कंपनियां कागजों पर ही सोने या ट्रांजैक्शन को एक देश से दूसरे देश की अपनी ही शेल(फर्जी) या सहायक कंपनियों में घुमाती रहती हैं।
उदाहरण: कंपनी A (भारत) ने माल बेचा कंपनी B (दुबई) को, B ने बेचा कंपनी C (स्विट्जरलैंड) को, और C नेवापस घुमाकर भारत भेज दिया। वास्तव में कोई नया सोना या पैसा बाजार में नहीं आता, लेकिन हर बार घूमने परकागजों में टर्नओवर (Turnover) बढ़ता जाता है।
ख. जटिल बहुराष्ट्रीय ढांचा (Complex Subsidiary Structures)
सब-सहायक कंपनियों का जाल: ये कंपनियां विदेशों (जैसे सिंगापुर, दुबई, स्विट्जरलैंड) में लेयर-दर-लेयरसहायक कंपनियां (Step-down Subsidiaries) बनाती हैं।
गोपनीयता का फायदा: जब भारतीय नियामक (जैसे SEBI) इनसे डेटा मांगते हैं, तो ये कंपनियां विदेशी डेटाप्रोटेक्शन कानूनों और प्राइवेसी (गोपनीयता) नियमों का हवाला देकर जानकारी छुपाने की कोशिश करती हैं, ताकि असली वित्तीय लेनदेन को छुपाया जा सके।
ग. व्यापार प्राप्य (Trade Receivables) को जानबूझकर लटकाना
कागजी बिक्री: कंपनियां खातों में यह दिखा देती हैं कि उन्होंने भारी मात्रा में माल बेच दिया है और उसका पैसा(Receivables) आना बाकी है।
फायदा: इससे बाजार को लगता है कि कंपनी का बिजनेस बहुत बड़ा है। राजेश एक्सपोर्ट्स का मामला भी तबखुला जब एक शेयरधारक ने शिकायत की कि कंपनी के हजारों करोड़ रुपये सालों से बाजार में फंसे(Outstanding Receivables) दिखाए जा रहे हैं, लेकिन वो पैसा कभी वापस बैंक खातों में नहीं आया।
घ. बिना दस्तावेजों के फर्जी खरीदारी (Unsupported Transactions)
फर्जी बिल (Fake Invoices): सेबी की जांच में पाया गया कि कई ऐसी कंपनियों (जैसे 'Affluence' और अन्यवेंडर्स) से करोड़ों की खरीदारी दिखाई गई, जिनके न तो कोई डिलीवरी चालान थे, न स्टॉक रजिस्टर में एंट्री थी, और न ही कोई GST रिकॉर्ड था। कई बार तो एंट्री होने से 3 साल पुराने बैक-डेटेड बिल लगा दिए गए।
ङ. स्टॉक मार्केट वैल्यूएशन और लोन का खेल
नकली साख (Market Cap Inflation): जब टर्नओवर कागजों पर लाखों करोड़ का दिखने लगता है, तो शेयरबाजार में कंपनी के शेयर की कीमत (Market Valuation) कृत्रिम रूप से बढ़ जाती है।
बैंकों से बड़ा लोन उठाना: इसी बढ़े हुए वैल्यूएशन, बड़े टर्नओवर और ऊंची शेयर कीमतों को बैंक के पास गिरवीरखकर ये कंपनियां हजारों करोड़ का असली लोन (Cash) उठा लेती हैं। बाद में जब यह कागजी किला ढहता है, तो आम निवेशकों का पैसा डूब जाता है और बैंक लोन डिफ़ॉल्ट (NPA) में बदल जाता है (जैसा कि इस मामले मेंकेनरा बैंक के साथ हुआ)।
च. ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ना (Blame Game)
जब नियामक (Regulators) जांच के लिए आते हैं, तो कंपनी का टॉप मैनेजमेंट और बोर्ड यह कहकर पल्लाझाड़ लेता है कि उन्हें विदेशी ऑपरेशन्स की कोई जानकारी नहीं थी और सारा काम केवल मुख्य प्रमोटर ही देखरहे थे, जिससे कॉर्पोरेट गवर्नेंस की धज्जियां उड़ जाती हैं।
राजेश एक्सपोर्ट्स (Rajesh Exports) और इसके प्रमोटर राजेश मेहता ने भारत के नागरिकों, बैंकों और देश कीअर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुँचाया है। सेबी (SEBI) और बैंकिंग ट्रिब्यूनल (DRT) के हालिया आदेशों औरजांच के आधार पर इस नुकसान को निम्नलिखित भागों में समझा जा सकता है:
1. भारतीय नागरिकों (निवेशकों) को कितना और कैसे नुकसान हुआ?
₹12,726 करोड़ की संपत्ति स्वाहा (Wealth Erosion): सेबी के अंतरिम आदेश के अनुसार, कंपनी केबही-खातों में नकली टर्नओवर दिखाकर शेयर की कीमतों को कृत्रिम रूप से बढ़ाया गया था। जैसे ही जून 2026 में सेबी का यह फर्जीवाड़ा सामने आया, कंपनी के शेयर धड़ाम हो गए और छोटे खुदरा निवेशकों (Retail Investors) की लगभग ₹12,726 करोड़ की संपत्ति डूब गई।
आम जनता के टैक्स और पॉलिसी के पैसे का नुकसान: भारत की सबसे बड़ी सरकारी बीमा कंपनी LIC (लाइफइंश्योरेंस कॉर्पोरेशन) के पास राजेश एक्सपोर्ट्स की 10.8% हिस्सेदारी (Stalk)थी। LIC में भारत के करोड़ों आमनागरिकों की पॉलिसी का पैसा लगा होता है। इस घोटाले के कारण LIC के निवेश की वैल्यू करीब आधी रह गई, जिसका सीधा असर आम जनता के पैसों पर पड़ा।
2. बैंकों से कितना लोन लिया और क्या वह वापस नहीं किया?
राजेश एक्सपोर्ट्स खुद को हमेशा एक "कर्ज-मुक्त" (Debt-Free) कंपनी बताता रहा है, लेकिन हकीकत मेंइसने सरकारी बैंकों के साथ बहुत बड़ा डिफ़ॉल्ट किया है:
कितना लोन बकाया है: बैंकर्स डेटा (जैसे TransUnion CIBIL और हालिया रिपोर्टों) के अनुसार, राजेशएक्सपोर्ट्स पर कैनरा बैंक (Canara Bank) का कुल बकाया ₹2,458 करोड़ तक पहुँच चुका है।
धोखाधड़ी का तरीका (Letter of Credit Defaults): कंपनी ने बैंकों से सीधे कैश लोन लेने के बजाय लेटर्सऑफ क्रेडिट (LC - क्रेडिट पत्र)का सहारा लिया। बैंक ने विदेश से सोना आयात करने के लिए कंपनी के नाम परगारंटी (LC) जारी की थी। कंपनी ने वह सोना तो मंगा लिया, लेकिन जब 2020 में बैंकों को पैसा चुकाने की बारीआई, तो राजेश एक्सपोर्ट्स मुकर गया। नतीजतन, कैनरा बैंक को अपनी जेब से विदेशी सप्लायर्स को भुगतानकरना पड़ा और बैंक का ₹509 करोड़ से लेकर ₹2,458 करोड़ तक का फंड फंसा रह गया, जिसे अब बैंक'तनावग्रस्त संपत्ति' (Stressed Asset) मानकर बेचने की कोशिश कर रहा है।
फर्जी बिल जमा करना: जब यह मामला डेब्ट रिकवरी ट्रिब्यूनल (DRT) में गया, तो ट्रिब्यूनल ने पाया कि राजेशएक्सपोर्ट्स ने बैंकों के दावों को दबाने के लिए कोर्ट में फर्जी बिल (Fake Bills) पेश किए थे, जिसे कोर्ट नेखारिज कर दिया।
3. क्या इससे भारत देश को कोई नुकसान हुआ है?
हाँ, इस घोटाले ने देश को व्यापक स्तर पर तीन बड़े नुकसान पहुँचाए हैं:
विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) को चोट: भारत अपनी जरूरत का 99% सोना बाहर से आयात करता हैजिसके लिए देश को कीमती अमेरिकी डॉलर (USD) चुकाने पड़ते हैं। राजेश एक्सपोर्ट्स ने 'सर्कुलर ट्रेडिंग' केजरिए सिर्फ कागजों पर ₹15.15 लाख करोड़ का टर्नओवर घुमाया। इस प्रक्रिया में देश के विदेशी मुद्रा भंडार काएक बड़ा हिस्सा बिना किसी वास्तविक आर्थिक मूल्य (Economic Value) के केवल ट्रांजैक्शन और हेरफेर मेंइस्तेमाल होता रहा, जिससे भारतीय रुपये पर दबाव पड़ा।
भारत की कॉरपोरेट साख को नुकसान:
₹15.15 लाख करोड़ का यह वित्तीय हेरफेर भारतीय इतिहास के सबसे बड़े अकाउंटिंग घोटालों में से एक माना जारहा है। इतनी बड़ी भारतीय कंपनी द्वारा वैश्विक स्तर पर (विशेषकर स्विट्जरलैंड की रिफाइनरी के जरिए) किएगए इस फर्जीवाड़े से अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत के बैंकिंग और कॉर्पोरेट गवर्नेंस की छवि को गहरा धक्का लगाहै।
SEBI Investigation विस्तार से बताता है कि कैसे LIC और भारत के आमरिटेल निवेशकों के करोड़ों रुपये इस कंपनी के शेयरों के गिरने के कारण डूब गए हैं।
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