Monday, May 18, 2026

दर्दमुक्त जीवन 2

 दर्दमुक्त जीवन - 11

घुटनों का विशेष दर्द


पिछली कड़ी में हमने पैरों के विभिन्न भागों के विशेष दर्द का प्राकृतिक उपचार बताया था। इस कड़ी में हम घुटनों के विशेष दर्द की चर्चा करेंगे और उसका उपचार बतायेंगे।


घुटने हमारे शरीर के वे स्तंभ हैं जो पूरे शरीर का भार वहन करते हैं। उनमें दर्द होने के कई कारण हो सकते हैं, जो निम्न प्रकार हैं- 

-- गठिया (अर्थराइटिस)

-- बढ़ती उम्र

-- घंटों खड़े होकर रसोई या ऑफिस में कार्य करना

-- सीढ़ियों के बजाय लिफ्ट का उपयोग करना

-- पैदल बिल्कुल न चलकर वाहनों में चलना

-- धरती के बजाय कुर्सियों पर बैठना 

-- शरीर में कैल्शियम या विटामिन-डी की कमी होना


यदि घुटनों का दर्द शरीर में कैल्शियम या विटामिन-डी की कमी के कारण है, तो उनको दूर करने के उपाय करने चाहिए, जिसके बारे में पिछली कड़ियों में विस्तार से बताया जा चुका है। यदि दर्द गठिया के कारण है, तो पहले गठिया का उपचार करना चाहिए और घुटनों की गर्म सिकाई करनी चाहिए, जिसके बारे में आगे बताया गया है। 


इनके अलावा अन्य सभी कारणों से होने वाले घुटनों के दर्द का उपचार केवल पैरों के सूक्ष्म व्यायामों, वज्रासन तथा घुटनों के सरल व्यायामों द्वारा किया जा सकता है। घुटनों को स्वस्थ रखने का मूल मंत्र है- पिंडलियों और जंघाओं को मजबूत करना। इसके लिए पैरों के सूक्ष्म व्यायाम तथा वज्रासन प्रतिदिन करते रहने चाहिए। 


पैरों के सूक्ष्म व्यायाम कड़ी 9 में बताये जा चुके हैं तथा वज्रासन करने की विधि पिछली कड़ी में बतायी जा चुकी है। यहाँ घुटनों के सरल व्यायाम बताये जा रहे हैं, जिनको वज्रासन तथा पैरों के सूक्ष्म व्यायामों से पहले कर लेना चाहिए। इन व्यायामों का वीडियो भी साथ में दिया गया है।


*घुटनों के व्यायाम-*


(1) दोनों पैरों को मिलाकर खड़े हो जाइए और थोड़ा झुककर हाथों को घुटनों पर रख लीजिए। अब दोनों घुटनों को आगे की ओर झुकाइए, फिर पैर को सीधा कर लीजिए। ऐसा 10-10 बार कीजिए। 

(2) हाथों को घुटनों पर रखकर दोनों घुटनों को एक साथ घड़ी की सुई की दिशा में 10 बार गोल-गोल घुमाइए। इसी प्रकार विपरीत दिशा में 10 बार घुमाइए। 

(3) पैरों में 10-12 इंच का अन्तर दीजिए। हाथों को उसी प्रकार घुटनों पर रखकर दोनों घुटनों को गोलाई में 10 बार एक दिशा में और 10 बार दूसरी दिशा में घुमाइए। 

(4) पैरों में अन्तर रखते हुए हाथों को उसी प्रकार घुटनों पर रखकर दोनों घुटनों को गोलाई में 10 बार पहले बाहर से भीतर की ओर, फिर 10 बार भीतर से बाहर की ओरं घुमाइए। 


*चेतावनी-* घुटनों का व्यायाम करते समय यह ध्यान रखें कि हाथों से घुटनों पर बिल्कुल भी जोर नहीं पड़ना चाहिए। घुटनों के व्यायाम बहुत कम मात्रा में ही करने चाहिए। 


बढ़ती उम्र या गठिया वात के कारण घुटनों के दर्द से पीड़ित व्यक्तियों को ऊपर बताये गये सभी व्यायामों के अलावा घुटनों की गर्म सिकाई करने की भी आवश्यकता होती है। यह सिकाई दिन में कम से कम एक बार रात्रि को सोने से पहले करनी चाहिए और फिर पैरों को कम्बल से ढककर सो जाना चाहिए। घुटनों की गर्म सिकाई की विधि नीचे बतायी गयी है। 


*घुटनों की गर्म सिकाई*


(1) इतना बड़ा भगौना लीजिए, जिसमें दोनों पैर एक साथ रखे जा सकें। 

(2) उसमें सुहाता गर्म पानी इतना भर लीजिएं कि पैर घुटनों से कुछ नीचे तक डूब जायें। 

(3) किसी स्टूल पर बैठकर दोनों पैर भगौने के गर्म पानी में डाल लें।

(4) अब किसी मग से गर्म पानी भगौने से लेते हुए दोनों घुटनों पर धार बनाकर डालें। इससे घुटनों तक दोनों पैरों की सिकाई हो जाएगी। 

(5) यदि पानी ठंडा हो जाये तो उसमें आवश्यक मात्रा में गर्म पानी मिला लें। 

(6) 15-20 मिनट सिकाई करने के बाद उठ जायें और पोंछकर पैरों को कम्बल से ढक लें।


इस सिकाई के बाद पैरों को आराम देना आवश्यक है। इसलिए सोने से पहले इस क्रिया को करना सबसे अच्छा है। यदि दर्द एक ही पैर के घुटने में हो, तो केवल उसी पैर की सिकाई करनी चाहिए। 


*सहायक घरेलू उपाय*


-- रात भर भीगा हुआ मेथी दाना सुबह चबाकर खाएँ और रात को सोते समय हल्दी वाला फीका दूध पिएँ। यह सूजन और वात दोष को दूर करता है।

-- गुनगुने तिल या सरसों के तेल से जंघाओं और पिंडलियों की मालिश करें। ध्यान रहे, मालिश हमेशा घुटने की ओर (नीचे से ऊपर और ऊपर से नीचे) मांसपेशियों पर करें।

-- हड्डियों की मजबूती के लिए प्रतिदिन 10-15 मिनट सुहाती धूप का सेवन करना अनिवार्य है।


*सावधानियाँ*


घुटनों के दर्द से बचने के लिए अपनी दिनचर्या में निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए-

-- यदि एक या दो मंजिल ही चढ़ना या उतरना हो, तो लिफ्ट के बजाय सीढ़ियों का उपयोग करें।

-- खड़े होते समय शरीर का वजन दोनों पैरों पर समान रखें।

-- यदि आपका कार्य खड़े रहने का है, तो हर घंटे-आध घंटे पर बैठकर अपने पैरों को विश्राम दें।

-- यदि थोड़ी दूर ही जाना हो और आपके पास समय हो, तो वाहनों के बजाय पैदल चलें। 


अगली कड़ी में हम पेट के दर्द की चर्चा करेंगे। 



पेट का दर्द


पिछली कड़ी में हमने घुटनों के विशेष दर्द का प्राकृतिक उपचार बताया था। इस कड़ी में हम पेट के दर्द की चर्चा करेंगे और उसका उपचार बतायेंगे।


आयुर्वेद में पेट को शरीर का ‘पावर हाउस’ यानी बिजली घर माना गया है। यदि आपका पेट ठीक है, तो आप ऊर्जावान हैं, और यदि इसमें गड़बड़ है, तो यह रोगों का घर बन जाता है। आयुर्वेद कहता है- ”सर्वेषाम् रोगाणामपि निदानं कुपितं मलाः“ अर्थात् सभी रोगों की जड़ आंतों में रुका हुआ मल या गन्दगी है। जब यह गंदगी सड़ने लगती है, तो शरीर में आँव बनता है, जो पेट दर्द और मरोड़ का कारण होता है। यह समस्या वास्तव में कमजोर पाचन शक्ति और मलनिष्कासन प्रणाली के कारण होती है। इसलिए पाचन तंत्र को सुदृढ़ करना ही पेट के दर्द का स्थायी उपचार है।


*पेट दर्द के विभिन्न रूप*


आयुर्वेद के अनुसार पेट दर्द मुख्य रूप से तीन दोषों के असंतुलन से होता है-

-- वातज शूल- गैस और कब्ज के कारण सुई चुभने जैसा दर्द।

-- पित्तज शूल- पेट और छाती में जलन के साथ होने वाला दर्द।

-- आमज शूल- बिना पचा हुआ भोजन जब पेट में रुकता है, तो मरोड़ और भारीपन पैदा करता है।

इन तीनों प्रकार के पेट दर्द को विभिन्न घरेलू और प्राकृतिक उपायों द्वारा शान्त किया जा सकता है। कभी-कभी नाभि टल जाने के कारण भी पेट में असहनीय दर्द होता है। कई बार हर्निया और अपेंडिक्स के कारण भी पेट में बहुत दर्द होता है। 


पेट दर्द में सबसे पहले तो कुछ भी खाना बन्द कर देना चाहिए। केवल गुनगुना पानी एक या आधा गिलास पीने को दीजिए। ऐसा कम से कम दो बार करके देखिए। इससे पेट साफ होगा और अधिकांश दर्द इसी से चला जाएगा। यदि इससे आराम न मिले, तो लगभग आधा कप (50 मिलीलीटर) सादा पानी में 2 या 3 मिलीलीटर या आधा चम्मच पोदीन हरा (पोदीना का अर्क) डालकर तत्काल पी जाना चाहिए। इससे अपचन के कारण होने वाले पेट दर्द में तुरन्त आराम मिलता है। आवश्यक होने पर इसे एक बार और लिया जा सकता है।


यदि दर्द गैस के कारण है और पोदीन हरा से भी आराम नहीं मिल रहा है, तो पहले चौथाई गिलास पानी में आधे नींबू का रस निचोड़ लीजिए। नींबू के बीज पूरी तरह निकाल दीजिए। अब उसमें खानेवाला अर्थात् मीठा सोड़ा एक चम्मच डालकर चम्मच से हिलाइए। इससे थोड़े झाग बनेंगे। उसी समय उसे पी जाइए। ऊपर से थोड़ा सादा पानी पी लीजिए। इससे गैस के कारण होने वाला भयंकर पेट दर्द भी तत्काल चला जाता है। पेट दर्द फिर से न हो, इसके लिए खान-पान में सुधार करना चाहिए और हानिकारक चीजों तथा अति भोजन से बचना चाहिए।


नाभि टल जाने के कारण हुए भयकर पेट दर्द का उपचार ऊपर बताये उपायों से नहीं हो पायेगा। इसके लिए हमें कुछ आसन या व्यायाम करके नाभि को उसके सही स्थान पर बैठाना होगा। ऐसा करते ही पेट का दर्द लगभग पूरी तरह गायब हो जाएगा। जिसकी नाभि टल गयी हो, उसे तत्काल किसी चटाई पर पेट के बल लेटकर भुजंगासन या/और धनुरासन करना चाहिए। एक-एक मिनट विश्राम देकर दो-तीन बार इन आसनों को करने से नाभि अपने स्थान पर आ जाती है और दर्द ठीक हो जाता है। यदि इनसे आराम न मिले तो किसी व्यक्ति की सहायता से नीचे बताया गया उपाय करना चाहिए, इससे तत्काल आराम मिल जाता है और दर्द कुछ ही देर में समाप्त हो जाता है।


*नाभि बैठाने का सरल उपाय*


1. पीड़ित को किसी चटाई पर पेट के बल लिटा दीजिए। उसको अपने दोनों हाथ माथे के नीचे इस प्रकार रखने चाहिए कि नाक धरती से न टकराये। सिर को सीधा रखें। 

2. खड़े होकर बायां पैर पीड़ित की पीठ पर रखें। फिर हाथों से एक पैर को पंजे से पकड़कर उठायें और उसे लम्बा रखते हुए पीछे की ओर मोड़ने की कोशिश करें। इसके लिए दो-तीन बार हल्के झटके देने चाहिए।

3. क्रमांक 2 की क्रिया दूसरे पैर से भी करें।

4. यही क्रिया दोनों पैरों को एक साथ उठाकर भी करें। 

5. फिर पीड़ित को चित लेटकर आराम करने को कहें। 


नाभि को अपने सही स्थान पर बैठाने में ये योगासन भी बहुत उपयोगी सिद्ध हुए हैं- नौकासन, सेतुबंध आसन, उत्तानपादासन तथा पवनमुक्तासन। इनको किसी योग्य और अनुभवी योग शिक्षक से सीखा जा सकता है।


*पेट दर्द की प्राकृतिक चिकित्सा*


हम बता चुके हैं कि कमजोर पाचन और मलनिष्कासन तंत्र के कारण ही पेट की सभी समस्याएँ होती हैं। इन तंत्रों को मजबूत करने का किसी अन्य पैथी में कोई उपाय नहीं है, लेकिन प्राकृतिक चिकित्सा में इसका रामबाण उपाय है, जिसको मैं सैकड़ों बार आजमा चुका हूँ। यह उपाय है- पेड़ू पर 3 से 5 मिनट बर्फ लगाकर या ठंडे पानी की पट्टी 10-15 मिनट रखकर उसे ठंडा करना, फिर 15-20 मिनट टहलना या कोई ऐसा व्यायाम करना जिससे शरीर में गर्मी आ जाये। नाभि से नीचे के पेट के आधे भाग को ‘पेड़ू’ कहा जाता है। 


प्रतिदिन खाली पेट प्रातःकाल और आवश्यक होने पर सायंकाल भी यह क्रिया करने से कमजोर से कमजोर पाचन तंत्र सुदृढ़ हो जाता है और सभी बीमारियाँ भागती दिखाई देती हैं। यह उपाय कितने भी दिन करें, इससे लाभ के सिवा हानि होने की कोई संभावना नहीं है। यह क्रिया आंतों की सूजन और पुरानी कब्ज को दूर करने के लिए वरदान है।


इसके अतिरिक्त कुछ ऐसे आसन और क्रियाएँ भी हैं, जिनसे पाचन शक्ति बहुत प्रबल हो जाती है। उनका संक्षिप्त उल्लेख यहाँ किया जा रहा है। इनको किसी अनुभवी व्यक्ति से सीखकर किया जा सकता है। हर्निया और अपेंडिक्स से पीड़ितों के लिए ये क्रियायें करना वर्जित है।

-- पवनमुक्तासन: यह आसन रुकी हुई दूषित वायु को बाहर निकालकर पेट को हल्का बनाता है।

-- भुजंगासन: यह आसन पाचन शक्ति सुधारता है और पेट की चर्बी कम करता है। 

-- वज्रासन: यह आसन भोजन के बाद 5-10 मिनट किया जाता है। इससे भोजन का पाचन अच्छी तरह होता है।

-- अग्निसार: यह क्रिया जठराग्नि को बढ़ाती है अर्थात् पाचन शक्ति को सुधारती है और मलनिष्कासन में सहायता करती है।

-- लंघन (उपवास): आयुर्वेद में उपवास को ‘परम औषधि’ माना गया है। यदि पेट में दर्द हो, तो भोजन का त्याग करके केवल गुनगुना पानी लें।


अगली कड़ी में हम हर्निया और अपेंडिक्स के दर्द की चर्चा करेंगे। 


*दर्दमुक्त जीवन - 13*


*हर्निया और अपेंडिक्स के दर्द*


पिछली कड़ी में हमने पेट के दर्द का प्राकृतिक उपचार बताया था। इस कड़ी में हम हर्निया और अपेंडिक्स के दर्द की चर्चा करेंगे और उनका उपचार बतायेंगे।


आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा के दृष्टिकोण से इन रोगों का मूल कारण शरीर में दोषों का असंतुलन और मंदाग्नि (कमजोर पाचन) है। 

हर्निया तब होता है जब शरीर का कोई अंग (प्रायः आंत) उसे थामने वाली दीवार या मांसपेशियों की परत में छेद या कमजोरी के कारण बाहर निकलने लगता है। आयुर्वेद इसे ”अंत्र वृद्धि“ कहता है। यह मुख्य रूप से वात दोष के कुपित होने और मांसपेशियों (स्नायु) की कमजोरी से होता है। 


प्राकृतिक चिकित्सा की दृष्टि से यह रोग पुराने कब्ज, भारी वजन उठाना, लगातार खाँसी या मोटापे के कारण पेट की दीवारों पर अधिक दबाव पड़ने के कारण होता है। कब्ज पुराना और कठोर हो जाने के कारण मल को निकालने में अधिक जोर लगाना पड़ता है, जिससे पेट की माँसपेशियों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।


*हर्निया का प्राकृतिक उपचार*


हर्निया का वास्तविक कारण समझ में आ जाने पर इसका समाधान करना सरल हो जाता है। ऐलोपैथी में इस रोग का शल्य चिकित्सा (सर्जरी) के अलावा कोई समाधान नहीं है, जबकि प्राकृतिक चिकित्सा से यह रोग बहुत सरलता से जा सकता है। इसके लिए हमें केवल अपने कब्ज को जड़ से मिटाना होगा। कब्ज मिट जाने पर पाचन और मलनिष्कासन क्रियायें सरलता से होने लगती हैं, तथा आँतों की सूजन समाप्त हो जाती है, जिससे हर्निया का कष्ट मिट जाता है।


कब्ज को दूर करने के लिए प्राकृतिक चिकित्सा में पेड़ू पर मिट्टी रखकर गुनगुने पानी का एनिमा दिया जाता है। परन्तु इसकी सुविधा सभी लोगों को उपलब्ध नहीं होती, इसलिए इसके विकल्प के रूप में हम पेड़ू पर 5 मिनट बर्फ लगाकर या ठंडे पानी की पट्टी 10 मिनट रखकर टहलने जा सकते हैं। इससे धीरे-धीरे कुछ ही दिनों में पाचन और मलनिष्कासन क्रियाएँ सरलता से होने लगती हैं। 


*पेड़ू पर बर्फ़ लगाने की विधि* 


1. किसी कटोरी में पानी भरकर फ्रीजर में रखकर बर्फ़ जमा लें। 

2. बिस्तर पर सीधे लेट जायें और कमर के नीचे तौलिया बिछा लें, जिससे बिस्तर गीला न हो। 

3. अब किसी पतले रूमाल में कटोरी में जमायी गयी बर्फ़ को लपेटकर उसको पेड़ू (नाभि के नीचे का आधा पेट) पर इस तरह फिरायें कि सारा पेडू खूब ठंडा हो जाये। 

4. पाँच मिनट या निर्धारित समय बाद उठ जायें और पेडू को तौलिया से पोंछकर टहलने निकल जायें।


बर्फ के विकल्प के रूप में, फ्रीजर में रखे हुए आइस पैक को भी पेड़ू पर लगाया जा सकता है। दोनों से लगभग समान लाभ होता है। मुख्य बात है- पेड़ू को ठंडा करना। यही कार्य ठंडे पानी में भिगोयी हुई कपड़े की पट्टी भी कर सकती है, पर उसे थोड़े अधिक समय तक रखना पड़ता है और बीच-बीच में बदलना भी पड़ता है।


इस मुख्य उपचार के साथ ही कुछ व्यायाम और आसन करके भी पाचन क्रिया को सुधारा जा सकता है, परन्तु हर्निया से पीड़ितों को ऐसा कोई आसन नहीं करना चाहिए, जिसका सीधा दबाव पेट पर पड़ता हो। इसलिए उचित यही है कि हर्निया ठीक होने तक योगासनों से बचा जाये। हाँ, वज्रासन कभी भी सरलता से किया जा सकता है। यह बहुत लाभदायक है।


हर्निया के स्थानीय उपचार के रूप में दर्दवाले स्थान और उसके आस-पास बर्फ लगानी चाहिए या बर्फ जैसे ठंडे पानी में भिगोया कपड़ा 20 मिनट तक रखना चाहिए, ताकि सूजन कम हो जाये। सूजन को कम करने में बर्फ या ठंडे पानी का कोई विकल्प नहीं है। भूलकर भी हर्निया में पेट की गर्म सिकाई नहीं करनी चाहिए। ठंडी सिकाई आवश्यकता के अनुसार दिन में तीन-चार बार भी की जा सकती है।


इसके साथ ही निम्नलिखित आयुर्वेदिक उपाय हर्निया के उपचार में सहायक हैं-

1. त्रिफला चूर्ण रात को गुनगुने पानी के साथ लें, ताकि पेट साफ रहे और दबाव न बने।

2. प्रभावित भाग पर हल्के हाथ से अरंडी के तेल की मालिश करने से सूजन कम होती है।

3. अधिक रेशा (फाइबर) युक्त भोजन लें। भोजन को खूब चबाकर खाएं, ताकि आंतों पर जोर न पड़े।


*अपेंडिक्स (आंतों की सूजन)*


बड़ी आंत के अंत में एक छोटी-सी थैली होती है, जिसे अंत्र-पुच्छ या अपेंडिक्स कहते हैं। जब इसमें संक्रमण या रुकावट के कारण सूजन आ जाती है, तो उसमें भयंकर दर्द होता है। ऐसा जठराग्नि के मंद होने और विषाक्त पदार्थों (आँव) के जमा होने से होता है। कम फाइबर वाला और मैदायुक्त भोजन करने और पुराने कब्ज के कारण ऐसा होता है।


अपेंडिक्स का प्राकृतिक उपचार भी वही है, जो हर्निया के लिए बताया गया है अर्थात् पेड़ू पर बर्फ लगाकर या बहुत ठंडे पानी की पट्टी रखकर टहलना। इसमें भी दर्द वाले स्थान की ठंडी सिकाई की जा सकती है, जिससे दर्द में बहुत आराम मिलता है। ऐलोपैथी में इसका एकमात्र समाधान अंत्र-पुच्छ को काट देना होता है, परन्तु इससे तात्कालिक राहत के सिवा कोई लाभ नहीं होता, क्योंकि रोग का मूल कारण तो ठीक होता ही नहीं है। इसलिए भूलकर भी अपेंडिक्स का ऑपरेशन नहीं कराना चाहिए। 


प्राकृतिक चिकित्सा में प्रारम्भ में एक-दो दिन का जल उपवास करने की सलाह दी जाती है। इस अवधि में केवल तरल पदार्थों जैसे नारियल पानी या फलों के जूस पर रहने से आँतों को बहुत आराम मिलता है और कब्ज दूर करने में सहायता मिलती है।


सहायक आयुर्वेदिक उपचार के रूप में अदरक की चाय और लहसुन की एक-दो कली का सेवन खाली पेट किया जा सकता है। पुदीने की पत्तियों की चाय पीने से भी आँतों को शांति मिलती है और दर्द में राहत मिलती है।


अगली कड़ी में हम दाँतों के दर्द की चर्चा करेंगे। 


*दर्दमुक्त जीवन - 14*


*दाँतों का दर्द*


पिछली कड़ी में हमने हर्निया और अपेंडिक्स के दर्द का प्राकृतिक उपचार बताया था। इस कड़ी में हम दाँतों के दर्द की चर्चा करेंगे और उनका उपचार बतायेंगे।


आजकल बच्चों, युवाओं और अधिक आयु के लोगों में भी दाँतों में कीड़ा लगना, मसूड़ों की सूजन, ठंडा-गर्म पानी लगना और लगातार दर्द रहना सामान्य होता जा रहा है। यह हमारी बदलती जीवन शैली, भोजन शैली और दैनिक आदतों का परिणाम भी है। पहले दाँतों की समस्याएँ अपेक्षाकृत कम होती थीं। इसका कारण केवल प्राकृतिक भोजन ही नहीं था, बल्कि भोजन करने की पद्धति, लार (ैंसपअं) की स्वाभाविक क्रिया, भोजन के बाद कुल्ला करने की आदत तथा मुख की प्राकृतिक सफाई भी थी। आधुनिक जीवन शैली में इन आदतों के बदल जाने से दाँतों की समस्याएँ तेजी से बढ़ी हैं। अधिकांश लोग लार को साधारण तरल समझते हैं, परन्तु वास्तव में यह दाँतों और मुख की सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक रक्षक है। यह दाँतों की स्वाभाविक सफाई करती है और कीड़ा लगने से बचाती है।


आज बच्चों और युवाओं में चॉकलेट, टॉफी, केक, बिस्कुट और मीठे स्नैक्स का सेवन बहुत बढ़ गया है। ये दाँतों से चिपक जाते हैं, लंबे समय तक दाँतों के बीच फँसे रहते हैं, मुख के जीवाणु इन्हें अम्ल में बदल देते हैं, जो दाँतों की ऊपरी परत को धीरे-धीरे नष्ट करता है। यही प्रक्रिया आगे चलकर कैविटी, संवेदनशीलता और दर्द का कारण बनती है। 


दाँतों का दर्द एक ऐसी शिकायत है, जो हर उम्र में अचानक कभी भी हो जाती है। मिठाइयों और जंक फूड (तथाकथित फास्ट फूड) जैसे पिज्जा, बर्गर, चाऊमीन, समोसा, पेट्टीज, चिप्स, चाकलेट आदि का अधिक सेवन करने और हरी सब्जी तथा सलाद कम खाने के कारण दाँतों में कीड़ा लग जाता है और वे खराब होने लगते हैं। आम तौर पर उपयोग किये जाने वाले टूथपेस्ट दाँतों में कीड़ा लगने से नहीं रोक पाते, भले ही वे विज्ञापनों में कितने भी दावे करते हों। इसके विपरीत वे दाँतों के ऊपर के इनेमिल की पर्त को खुरच देते हैं, जिससे दाँत कमजोर हो जाते हैं। इसका परिणाम आगे चलकर भयंकर दाँत-दर्द के रूप में भुगतना पड़ता है।


*प्राकृतिक उपचार*


दाँत-दर्द होने पर सबसे पहले टूथपेस्ट तत्काल बन्द कर देने चाहिए। इसके स्थान पर कोई आयुर्वेदिक मंजन करना चाहिए। वैसे महीन पिसा हुआ सेंधा नमक और उसमें दो-चार बूँद सरसों का तेल डालकर बनाया हुआ मंजन सर्वश्रेष्ठ होता है। मैं पिछले 28 वर्षों से निरन्तर यही मंजन करता आ रहा हूँ और मेरे दाँतों में पहले जो बहुत तकलीफ होती थी, पूरी तरह समाप्त हो गयी है और मैं दोनों ओर से हर चीज चबा लेता हूँ। सेंधा नमक-तेल के मंजन से दाँतों पर इनेमिल की पर्त जम जाती है, जिससे दाँतों में ठंडा-गर्म पानी लगने की शिकायत भी समाप्त हो जाती है। 


एक अध्ययन के अनुसार दाँतों की सफाई में टूथपेस्ट की भूमिका केवल 5 प्रतिशत होती है, शेष 95 प्रतिशत कार्य ब्रश करता है। इसलिए यदि सोने से पहले एक बार केवल खाली ब्रश ही गीला करके दाँतों पर भीतर-बाहर मार लिया जाये, तो दाँतों में फँसे हुए कण निकल जाते हैं और उनमें कीड़ा लगने की संभावना लगभग समाप्त हो जाती है। टूथपेस्ट की जगह उसके आदर्श विकल्प के रूप में नीम या देशी बबूल या मौलश्री की दातुन सर्वश्रेष्ठ है, परन्तु शहरी क्षेत्रों में इनका मिलना बहुत कठिन होता है।


यदि किसी दाँत में असहनीय दर्द हो रहा हो, तो मिट्टी का पेड़ा इसमें बहुत लाभदायक होता है। कोई साफ पिसी हुई मिट्टी लेकर उसमें थोड़ा ठंडा पानी मिलाकर एक छोटा-सा पेड़ा बना लेना चाहिए। उस पेड़े को दर्द वाले दाँत के मसूड़े पर रखकर गाल में दबा लेना चाहिए। इससे 5-10 मिनट में ही आराम मिल जाता है। वैसे यह पेड़ा 20-25 मिनट तक अवश्य रखना चाहिए। लार में मिल जाने वाली मिट्टी को जहाँ तक हो सके मुँह में ही रोकना चाहिए। यदि ज्यादा न रोका जाये तो थूक देना चाहिए। इससे दाँतदर्द जड़ से गायब हो जाएगा। यदि एक बार में पूरा लाभ न हो, तो दूसरा पेड़ा रखना चाहिए।


*परम्परागत भारतीय उपचार*


​पुरानी भारतीय जीवनशैली में दाँतों के डॉक्टर के पास जाने की आवश्यकता इसलिए नहीं पड़ती थी कि उनकी जीवनशैली पूरी तरह प्राकृतिक और दाँतों के अनुकूल होती थी। इसमें आवश्यकता पड़ने पर निम्नलिखित क्रियाओं को अपनाया जाता था-


​1. तेल का कुल्ला (मुख प्रक्षालन)- सुबह खाली पेट एक बड़ा चम्मच तिल या नारियल का तेल मुंह में भर लें। इसे 5 से 10 मिनट तक मुंह में चारों ओर घुमाएं और फिर थूकने के बाद साफ पानी से कुल्ला कर लें। इससे दाँत सड़ानेवाले बैक्टीरिया समाप्त होते हैं और मसूड़ों की सूजन कम होती है। 


​2. आयुर्वेदिक मंजन- महीन पिसे सेंधा नमक और सरसों के तेल के मिश्रण का मंजन ऊपर बताया जा चुका है, जो सर्वश्रेष्ठ है। कुछ लोग इसमें नाममात्र की हल्दी भी मिला लेते हैं। इस मंजन को बीच की उँगली से दाँतों और मसूड़ों पर मला जाता है, जिससे दाँत मजबूत होते हैं। यह मंजन प्रतिदिन करने से दाँतों पर इनेमिल की पर्त जम जाती है।


3. दाँत दर्द होने पर नमक मिले गुनगुने पानी से कुल्ला करना मसूड़ों की सूजन कम करने और मुख को साफ रखने में सहायक होता है।


4. लौंग और लौंग का तेल- असहनीय दर्द में तात्कालिक उपचार के रूप में लौंग का तेल रुई के फाहे में लेकर मसूड़ों पर लगाया जाता है।


यदि हम अपना भोजन सात्विक रखें और प्रतिदिन ऊपर बतायी गयी विधियों से अपने दाँत साफ करते रहें, तो दाँतों में किसी कष्ट के होने की संभावना नहीं होती। फिर भी अधिक कष्ट होने पर या दाँतों में बहुत अधिक कीड़ा लग जाने पर किसी अनुभवी डॉक्टर के पास जाकर आधुनिक दंत चिकित्सा का उपयोग करना चाहिए। वैसे भी साल में एक-दो बार अपने दाँतों का परीक्षण करा लेना उचित रहता है।


अगली कड़ी इस लेखमाला की अन्तिम कड़ी होगी, उसमें हम पूरे शरीर के दर्द की चर्चा करेंगे। 


*दर्दमुक्त जीवन - 15 (अन्तिम)*


*बदन का दर्द*


पिछली कड़ी में हमने दाँतों के दर्द का प्राकृतिक उपचार बताया था। इस अन्तिम कड़ी में हम पूरे बदन के दर्द की चर्चा करेंगे और उसका उपचार बतायेंगे।


बदन का दर्द एक ऐसी स्थिति है जिसमें पीड़ित व्यक्ति के हाथ, पैर, सिर, पीठ यानी लगभग सारे शरीर में दर्द होता है। ऐसी स्थिति में वह न तो कोई काम कर पाता है और न अच्छी तरह खा-पी सकता है, बस सोते रहने का मन करता है। यदि यह स्थिति कभी-कभी आती है, तो पीड़ित उसको झेल जाता है, लेकिन जब यह स्थायी बन जाती है, तो बहुत कष्टकर हो जाती है। बदन दर्द कोई बीमारी नहीं, बल्कि एक लक्षण है। यह आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में एक आम समस्या बन चुका है। यह किसी व्यक्ति की दैनिक कार्यक्षमता, मूड और जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित करता है।


शरीर दर्द के कई कारण हो सकते हैं, जिनमें मुख्य निम्नलिखित हैं- 

1. बुखार तथा बीमारियाँ- जब व्यक्ति को बुखार आ जाता है, तो पूरा शरीर दुखने लगता है। उसकी भूख मर जाती है और बस लेटे रहने का मन करता है। इसी प्रकार गठिया जैसे कारणों से भी सारे बदन में दर्द हो सकता है। 

2. अत्यधिक थकान - अपनी क्षमता से अधिक कार्य प्रतिदिन करने और विश्राम का पर्याप्त समय न मिलने से व्यक्ति के पूरे शरीर में दर्द होने लगता है। 

3. नींद की कमी - कई बार पर्याप्त नींद न मिलने के कारण भी शरीर में दर्द होने लगता है। जब यह स्थिति बहुत दिनों तक बनी रहती है, तो उसका जीवन कष्टमय हो जाता है।

4. अत्यधिक व्यायाम- कई बार अपनी क्षमता से अधिक व्यायाम कर जाने और विश्राम न करने के कारण भी व्यक्ति लगातार शरीर में दर्द अनुभव करता है। 

5. शारीरिक कमजोरी - कभी-कभी शरीर में पानी की कमी तथा आयरन, विटामिन बी12 कैल्शियम या विटामिन डी की कमी के कारण भी शरीर में दर्द हो सकता है। 

6. कई बार घंटों तक एक ही स्थिति में यां गलत तरीके से बैठकर कार्य करने से भी शरीर जकड़ जाता है और दर्द होने लगता है। 


बदन दर्द दो प्रकार का हो सकता है- अस्थायी और स्थायी। अस्थायी दर्द किसी कारण से अचानक प्रारम्भ होता है, और पर्याप्त विश्राम करने या वैसे ही अपने आप ठीक भी हो जाता है। परन्तु स्थायी दर्द किसी ठोस कारण से होता है, जो हफ्तों या महीनों तक बना रहता है।


*उपचार*


1. यदि बदन का दर्द बुखार के कारण है, तो सबसे पहले बुखार का ही इलाज करना चाहिए। बुखार में भूख खत्म हो जाती है, इसलिए यदि पीड़ित न चाहे तो उसे खाने के लिए कुछ न दें। लेकिन शरीर में तरल पदार्थ कम नहीं होने चाहिए, इसलिए उसे उबला हुआ पानी कमरे के तापमान तक ठंडा करके एक गिलास (लगभग एक पाव) हर एक या डेढ़ घंटे बाद पिलाते रहें। पीड़ित का मन हो, तो एक-दो बार ताजे फलों का जूस भी दे सकते हैं। 


पीड़ित को बुखार रहने तक पूर्ण विश्राम करना चाहिए और अच्छी पुस्तकें पढ़नी चाहिए। यदि बुखार 100 डिग्री से अधिक हो, तो उसके पेड़ू और माथे पर आवश्यकता के अनुसार दिन में तीन-चार बार तक ठंडे पानी की पट्टियाँ भी दो-दो मिनट बाद बदलकर 20-25 मिनट रखनी चाहिए। ऐसा करने से कैसा भी बुखार हो, अधिक से अधिक तीन-चार दिन में नियंत्रण में आ जाएगा और शीघ्र ही चला जाएगा। बुखार की गोली देकर बुखार उतारना उचित नहीं है। बुखार शरीर के विकारों को मिटाने के लिए आता है। उसे अपना काम करने देना चाहिए। साल में एकाध बार हल्का बुखार आ जाना स्वास्थ्य के लिए अच्छा ही होता है। 


यदि बदन दर्द किसी बीमारी के कारण है, तो उस रोग का पूर्ण इलाज कराना चाहिए। 


2. यदि शरीर में दर्द कार्य की थकान के कारण हो रहा है, तो पीड़ित को काम से घर लौटकर पहले पर्याप्त विश्राम करना चाहिए। विश्राम करने का सबसे अच्छा उपाय शवासन करना है। 5 से 10 मिनट का शवासन सभी तरह की थकान मिटाने में रामबाण है। शवासन में चित लेटकर शरीर को किसी शव की तरह पूरी तरह ढीला छोड़ दिया जाता है और साँस भी इस प्रकार ली जाती है कि उसकी आवाज स्वयं को भी सुनायी न पड़े। इस आसन से कुछ ही मिनटों में थकान एकदम गायब हो जाती है। इससे नाड़ी तंत्र शान्त और रक्तचाप सामान्य होता है और हृदय को भी बहुत लाभ पहुँचता है। 


वैसे सबसे अच्छा तो यह है कि कार्य से लौटते ही एक गिलास सादा पानी पीकर और शौच आदि से निवृत्त होकर मौसम के अनुसार सादा या ठंडे जल से स्नान करें। फिर थोड़ा विश्राम करे। 


स्नान करने के लिए गर्म या गुनगुना जल लेना उचित नहीं है। यूरोप के ठंडे देशों में तो यह कुछ सीमा तक स्वीकार्य भी है, परन्तु भारत जैसे गर्म देशों में बिल्कुल नहीं। गुनगुने जल में नमक डालकर स्नान करने से जो फुर्ती आती है, वह शरीर को विश्राम मिलने से नहीं होती, बल्कि नसों में आयी उत्तेजना के कारण होती है, जैसे चाय पीने से हल्का सा नशा हो जाता है। शरीर को वास्तविक आराम शीतल जल से स्नान करने पर ही मिलता है, क्योंकि उससे रक्त संचार ठीक हो जाता है। शीतल जल, शर्बत, लस्सी, ठंडाई आदि पीने से शरीर में जो ताजगी आती है, वह चाय से कमी नहीं आ सकती। 


3. नींद की कमी के कारण शरीर में दर्द होना एक चिन्ताजनक स्थिति है, क्योंकि लम्बे समय तक यह स्थिति बने रहने पर अनेक नयी समस्याएँ पैदा हो सकती हैं, जैसे- चिड़चिड़ापन, अवसाद, चक्कर आना आदि। इसलिए ऐसी स्थिति में पर्याप्त समय तक अर्थात् 7-8 घंटे की नींद प्रतिदिन लेनी चाहिए। यदि सोने के समय नींद न आ रही हो, तो देर तक शवासन करना चाहिए। इससे नींद का बहुत कुछ लाभ मिल जाता है। लेकिन किसी भी हालत में नींद की गोली का सेवन नहीं करना चाहिए। 


4. यदि बदन दर्द अधिक व्यायाम के कारण हो रहा है, तो अपने व्यायाम की मात्रा 20 से 25 प्रतिशत कम कर देनी चाहिए और पर्याप्त विश्राम भी करना चाहिए। इससे शरीर का दर्द चला जाएगा। लेकिन किसी भी हालत में व्यायाम पूरी तरह बन्द नहीं करना चाहिए। 30 मिनट से 45 मिनट तक का व्यायाम सामान्य व्यक्ति के लिए पर्याप्त है। इससे अधिक की आवश्यकता केवल एथलीटों और खिलाड़ियों को होती है। इसलिए व्यायाम करते समय अपनी शारीरिक क्षमता का ध्यान रखें। जिम में व्यायाम करने वाले लोग प्रायः यह गलती कर जाते हैं और जिम-ट्रेनर भी अपने स्वार्थ के कारण उनका सही मार्गदर्शन नहीं करते। 


5. शरीर में किसी तत्व की कमी से होनवाली कमजोरी के कारण दर्द होने पर उस तत्व की पूर्ति करने वाले खाद्यों का सेवन करना चाहिए, जैसे- हरी सब्जियाँ, अंकुरित अन्न, श्रीअन्न (मिलेट), सलाद, फल, सूखे मेवा आदि और प्रतिदिन पर्याप्त मात्रा में जल पीना चाहिए। विटामिन डी की कमी होने पर सप्ताह में एक बार शरीर पर सरसों का तेल लगाकर एक घंटा धूप सेवन करना चाहिए। 


6. एक ही स्थिति में बहुत लम्बे समय तक लगातार न रहें, बल्कि घंटे-आधा घंटे बाद अपने शरीर की स्थिति बदलते रहें। बीच-बीच में चहलकदमी भी कर सकते हैं। इससे शरीर जकड़न से मुक्त रहेगा। 


इस प्रकार बदन दर्द की उपेक्षा करने के बजाय अपनी जीवनशैली को सुधारकर और शरीर के संकेतों के अनुसार उचित उपाय करके इससे बचा जा सकता है।


*आलोक-* यह महत्वपूर्ण लेखमाला यहाँ समाप्त हुई। इसके लेखन और प्रस्तुतीकरण में मुझे *माननीय श्री जग मोहन जी गौतम* (नौयडा निवासी) का बहुत सक्रिय सहयोग मिला है, इसके लिए मैं उनके प्रति हार्दिक कृतज्ञता प्रकट करता हूँ। आप सभी से अनुरोध है कि इस लेखमाला में बताये गये उपायों के बारे में अपने अनुभव साझा करें और सुझाव भी दें। धन्यवाद। 


*-- डॉ. विजय कुमार सिंघल*

प्राकृतिक चिकित्सक एवं योगाचार्य

मो. 9919997596



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मुंह में लार (Saliva) न बनना या कम बनना, जिसे डॉक्टरी भाषा में **जेरोस्टोमिया (Xerostomia) या ड्राई माउथ (Dry Mouth)** कहा जाता है, एक आम समस्या है। लार हमारे पाचन, दांतों की सुरक्षा और मुंह को साफ रखने के लिए बेहद जरूरी है।

नीचे लार न बनने के मुख्य कारण और इसे दोबारा सामान्य करने के आसान व प्रभावी उपाय दिए जा रहे हैं:


*लार न बनने या कम बनने के कारण*


 1. *पानी की कमी (Dehydration):* शरीर में पानी की कमी होना इसका सबसे प्राथमिक और आम कारण है।

 2. *बढ़ती उम्र (Aging):* उम्र बढ़ने के साथ शरीर में लार ग्रंथियां (Salivary Glands) स्वाभाविक रूप से कम सक्रिय हो सकती हैं।

 3. *दवाइयों के दुष्प्रभाव (Side Effects of Medicines):* बीपी, एलर्जी, डिप्रेशन, नींद की दवाएं और पेनकिलर्स जैसी कई दवाइयों के सेवन से मुंह सूखने लगता है।

 4. *मुंह से सांस लेना:* रात को सोते समय या नाक बंद होने पर मुंह से सांस लेने के कारण लार सूख जाती है।

 5. *बीमारियां:* डायबिटीज (Sugar), थायराइड या कुछ ऑटोइम्यून बीमारियां (जैसे जोग्रेन सिंड्रोम) लार ग्रंथियों को प्रभावित करती हैं।

 6. *चाय, कॉफी या तंबाकू का सेवन:* ज्यादा कैफीन, सिगरेट या तंबाकू का सेवन लार के उत्पादन को सीधे तौर पर कम करता है।



*लार बढ़ाने और मुंह के सूखेपन को दूर करने के उपाय* 

प्राकृतिक रूप से लार का उत्पादन बढ़ाने के लिए आप निम्नलिखित उपाय अपना सकते हैं:

 *1. खान-पान और जीवनशैली में बदलाव*


 **घूंट-घूंट करके पानी पिएं:* दिनभर में पर्याप्त पानी पिएं। पानी को एक बार में पीने के बजाय थोड़ा-थोड़ा करके मुंह में घुमाते हुए पिएं, इससे मुंह नम रहता है।

 *सौंफ और मिश्री:* सौंफ चबाने से लार ग्रंथियां सक्रिय होती हैं। भोजन के बाद सौंफ और थोड़ी सी मिश्री चबाना बहुत फायदेमंद है।

 *नींबू या खट्टी चीजें:* पानी में थोड़ा सा नींबू का रस मिलाकर पीने से लार का उत्पादन तेजी से बढ़ता है। (ध्यान रखें, बहुत ज्यादा खट्टा दांतों के लिए नुकसानदेह हो सकता है, इसलिए सीमित मात्रा में लें)।

 *च्युइंग गम (Sugar-free):* बिना चीनी वाली च्युइंग गम चबाने से मुंह में लगातार लार बनती रहती है।


 *2. आयुर्वेदिक व घरेलू उपचार*


 *आंवला:* आंवला लार ग्रंथियों को उत्तेजित करने के लिए बेहतरीन माना जाता है। आप सूखे आंवले का टुकड़ा मुंह में रख सकते हैं या आंवले का रस पी सकते हैं।

 *इलायची:* मुंह में एक-दो इलायची रखकर चबाने से न केवल मुंह की दुर्गंध दूर होती है, बल्कि लार का प्रवाह भी सुधरता है।

 *अदरक:* अदरक का एक छोटा टुकड़ा चबाने या अदरक की चाय पीने से भी लार बनने में मदद मिलती है।

 *कुल्ला (Oil Pulling):* सुबह खाली पेट एक चम्मच नारियल या तिल के तेल को मुंह में लेकर 5-10 मिनट तक घुमाएं (थूक दें, निगलें नहीं)। यह मुंह के स्वास्थ्य और लार के लिए बहुत प्रभावी है।


*3. इन बातों से परहेज करें*


 चाय, कॉफी, और कोल्ड ड्रिंक्स का सेवन कम से कम करें क्योंकि ये मुंह को और सुखाते हैं।

 ज्यादा तीखा, नमकीन और सूखा भोजन (जैसे बिस्कुट, टोस्ट) खाने से बचें।

 अल्कोहल युक्त माउथवॉश का उपयोग न करें, क्योंकि अल्कोहल से मुंह और सूखता है। बिना अल्कोहल वाला माउथवॉश ही चुनें।


 यदि यह समस्या लंबे समय से बनी हुई है और पानी पीने या घरेलू उपायों से भी आराम नहीं मिल रहा है, तो एक बार डॉक्टर या डेंटिस्ट से संपर्क जरूर करें। वे यह जांच कर सकते हैं कि कहीं यह किसी दवा के साइड इफेक्ट या किसी अन्य छुपी हुई बीमारी के कारण तो नहीं है।


*मुंह से लार न टपके इसके लिए सुझाव*


लार की महत्ता हमको स्वस्थ रखने मैं अद्भुत भूमिका निभाती है। 

मुँह में सामान्य से अधिक लार (Saliva) बनना और उसका बाहर टपकना, जिसे आयुर्वेद में *'मुखस्राव'* या लार की अधिकता कहा जाता है, आमतौर पर *यह पाचन तंत्र की गड़बड़ी, पेट में कीड़े, या कफ दोष के असंतुलन के कारण होता है।* यदि हम इन को दूर कर दें तो लार की अधिकता नहीं होगी एवं न ही यह टपकेगी/निकलेगी।

इसे नियंत्रित करने के लिए आयुर्वेद, घरेलू और प्राकृतिक चिकित्सा में बहुत ही सरल और प्रभावी उपाय बताए गए हैं। यहाँ क्या करना चाहिए और क्या नहीं, इसकी  सूची दी हम दे रहे है:


 *क्या करना चाहिए (प्राकृतिक व आयुर्वेदिक उपाय)*


 1. *घरेलू और आयुर्वेदिक औषधियाँ*


 -- *आँवला और सौंफ:* भोजन के बाद आधा चम्मच सौंफ और आधा चम्मच आँवला पाउडर मिलाकर गुनगुने पानी के साथ लें। यह लार ग्रंथियों (Salivary glands) को संतुलित करता है।

 -- *तुलसी के पत्ते:* तुलसी में एंटी-बैक्टीरियल और कफ को शांत करने वाले गुण होते हैं। दिन में दो बार 2-3 तुलसी के पत्ते चबाने से लार का अत्यधिक बनना कम होता है।

 -- *दालचीनी का काढ़ा:* थोड़ी सी दालचीनी को पानी में उबालकर, उसमें थोड़ा सा शहद मिलाकर चाय की तरह पिएं। यह मुँह के अतिरिक्त कफ को सुखाती है।

 -- *सुपारी या लौंग:* भोजन के बाद एक छोटी सी सुपारी का टुकड़ा या एक लौंग मुँह में रखकर चूसने से लार ग्रंथियां नियंत्रित होती हैं और पेट भी साफ रहता है।


 2. *कुल्ला और गरारे (Gargling & Oil Pulling)*


 -- *तिल के तेल से कवल (Oil Pulling):* सुबह खाली पेट एक चम्मच तिल के तेल या नारियल के तेल को मुँह में भरकर 5-10 मिनट के लिए घुमाएं (थूकना नहीं है, बस मुँह में रोकना है), थोड़ी देर के बाद आप अनुभव करेंगे कि तेल की मात्रा मुंह मैं कम हो रही है और लार बढ़ रही है। इसके बाद फिर थूक दें और गुनगुने पानी से कुल्ला कर लें। यह लार ग्रंथियों को स्वस्थ रखता है।

 -- *फिटकरी या नमक का पानी:* गुनगुने पानी में चुटकी भर भुनी हुई फिटकरी या सेंधा नमक मिलाकर दिन में दो बार गरारे और कुल्ला करें। इससे मुँह का ढीलापन दूर होता है और लार टपकना बंद होती है।


3. *पाचन और पेट की सफाई*


 -- *पेट साफ रखें:* अक्सर पेट में कब्ज या कीड़े होने से लार अधिक बनती है। इसके लिए रात को सोते समय आधा चम्मच *त्रिफला चूर्ण* गुनगुने पानी के साथ लें।



*क्या नहीं करना चाहिए* (परहेज)


 -- *तुरंत सोने से बचें:* भोजन करने के तुरंत बाद सीधे बिस्तर पर न जाएं। रात के भोजन और सोने के बीच कम से कम 2 घंटे का अंतर रखें और सोते समय थोड़ा ऊंचा तकिया लगाएं। पीठ के बल सोएं न कि करवट से या पेट के बल

 -- *ठंडी और कफ बढ़ाने वाली चीजें बंद करें:* फ्रिज का ठंडा पानी, आइसक्रीम, अत्यधिक मीठी चीजें, और दही का सेवन (विशेषकर रात में) बिल्कुल न करें। ये चीजें कफ बढ़ाकर लार अधिक बनाती हैं।

 -- *अत्यधिक खट्टा और तीखा न खाएं:* बहुत अधिक खट्टी चीजें (जैसे नींबू, इमली) और ज्यादा मसालेदार भोजन लार ग्रंथियों को उत्तेजित करते हैं, जिससे लार का स्राव बढ़ जाता है।

 -- *भोजन के तुरंत बाद ज्यादा पानी न पिएं:* भोजन के अंत में सिर्फ एक या दो घूंट पानी पिएं। आधे से एक घंटे बाद ही पेट भरकर पानी पिएं।


*उपयोगी योग/प्राणायाम*


सुबह के समय *'उज्जायी प्राणायाम'* और *'भ्रामरी प्राणायाम'* का 5-10 मिनट अभ्यास करें। यह गले और मुँह के स्नायु तंत्र (Nervous system) को मजबूत करता है, जिससे लार की ग्रंथियों पर बेहतर नियंत्रण मिलता है।



 यदि इन घरेलू उपायों के बाद भी 1-2 सप्ताह में लार टपकने की समस्या में सुधार न हो, तो किसी योग्य आयुर्वेदिक चिकित्सक या डॉक्टर से परामर्श अवश्य लें, क्योंकि कभी-कभी यह *न्यूरोलॉजिकल (नासूर) या दांतों की किसी अंदरूनी समस्या* के कारण भी हो सकता है।

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