उत्तम आकिंचन्य: परिग्रह त्याग और आत्म रमणता
Listen Dr Sanjeev Godhha
24 Sept 2026
प्रस्तुत स्रोत उत्तम आकिंचन्य धर्म के वास्तविक स्वरूप की व्याख्या करता है, जिसमें लेखक ने स्पष्ट किया है कि परिग्रह का संबंध केवल बाहरी धन-संपत्ति से नहीं बल्कि आंतरिक आसक्ति और ममत्व के परिणामों से है।
डॉ. संजीव गोधा के अनुसार, मात्र घर छोड़ देना धर्म नहीं है, बल्कि पर-पदार्थों से मोह हटाकर स्वयं के शुद्ध स्वभाव में लीन होना ही सच्चा त्याग है। इस विवेचन में उदाहरणों के माध्यम से बताया गया है कि बाहरी वैभव के बीच रहते हुए भी व्यक्ति अपरिग्रही हो सकता है, यदि उसका अभिप्राय विरक्त हो।
अंततः, यह पाठ सिखाता है कि आत्मा ही आत्मा का वास्तविक परिग्रह है और पर-द्रव्यों में सुख बुद्धि का निषेध करना ही मुक्ति का मार्ग है। इस प्रकार, आकिंचन्य धर्म हमें झूठे स्वामित्व को छोड़कर अपने शाश्वत ज्ञानमय वैभव को पहचानने की प्रेरणा देता है।
क्या आप जानते हैं कि बिना एक भी पैसा छोड़े आप पूर्णतः अपरिग्रही (detached) हो सकते हैं, और सब कुछ छोड़ देने के बाद भी घोर परिग्रही बने रह सकते हैं? पूरी दुनिया जिसे धन-दौलत और मकान का त्याग समझती है, जैन दर्शन में परिग्रह का असली अर्थ उससे बिल्कुल अलग और गहरा है! आइए जानते हैं कि उत्तम आकिंचन्य धर्म का वास्तविक मर्म क्या है।
इस पाठ को पूरा करने के बाद आप सीखेंगे:
• आकिंचन्य धर्म और परिग्रह का वास्तविक अर्थ क्या है।
• परिग्रह के 24 भेदों (अंतरंग और बहिरंग) का वर्गीकरण।
• 'मूर्छा' या आसक्ति का सिद्धांत और इसका हमारे जीवन पर प्रभाव।
• बाहरी त्याग और आंतरिक ममत्व-त्याग के बीच का अंतर।
परिग्रह क्या है और क्या नहीं?
हम अक्सर सोचते हैं कि रुपया-पैसा, धन-दौलत और आलीशान मकान ही परिग्रह हैं। लेकिन जैन आचार्यों ने परिग्रह को इस तरह परिभाषित नहीं किया है। आचार्यों ने परिग्रह के 24 भेद बताए हैं, जिनमें 'पैसा' या 'करेंसी' नाम की कोई चीज़ सीधे तौर पर शामिल ही नहीं है!
परिग्रह को मुख्य रूप से दो भागों में बांटा गया है:
• अंतरंग परिग्रह (14 भेद): इसमें मिथ्यात्व (गलत धारणा), क्रोध, मान, माया, लोभ, हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा (घृणा), और तीन प्रकार के वेद (स्त्री, पुरुष, नपुंसक वेद) शामिल हैं।
• बहिरंग परिग्रह (10 भेद): इसमें धन-धान्य, दासी-दास, क्षेत्र-वास्तु (जमीन-मकान), हिरण्य-स्वर्ण आदि शामिल हैं।
यदि केवल बाहरी संपत्ति को ही परिग्रह मान लिया जाए, तो एक बड़ी समस्या खड़ी हो जाएगी:
• पशु-पक्षियों के पास न तो घर होता है और न ही वस्त्र, तो क्या वे पूरी तरह अपरिग्रही हो गए?
• दूसरी ओर, तीर्थंकर परमात्मा के पास समवशरण की महान विभूति होती है, तो क्या वे परिग्रही कहलाएंगे?
स्पष्ट है कि परिग्रह का संबंध बाहरी परिस्थितियों से नहीं, बल्कि आत्मा के भीतर के भावों से है।
मूर्छा परिग्रह - आसक्ति का असली खेल
आचार्य उमास्वामी ने तत्वार्थ सूत्र में परिग्रह की बेहद सटीक परिभाषा दी है: "प्रमत्तयोगात मूर्छा परिग्रह" अर्थात प्रमाद के योग से जो 'मूर्छा' होती है, वही परिग्रह है।
आचार्य अमृतचंद्र देव ने इसे और स्पष्ट करते हुए लिखा: "मूर्छा तु ममत्व परिणामः" यानी किसी भी वस्तु के प्रति जो ममत्व का परिणाम है, जो लगाव या आसक्ति (attachment) है, वही वास्तव में परिग्रह है।
आप कहाँ बैठे हैं, यह महत्वपूर्ण नहीं है; आपके मन के भीतर क्या बैठा हुआ है, यह महत्वपूर्ण है। इसे दो उदाहरणों से समझें:
• मुनीम और सेठ का उदाहरण: एक सेठ अपनी दुकान से दूर घर पर बैठा है और दुकान में मुनीम काम कर रहा है। यदि डाकू आकर दुकान लूट लें, तो सबसे ज्यादा दर्द किसे होगा? मुनीम को नहीं, बल्कि सेठ को, क्योंकि उस धन के प्रति ममत्व का भाव सेठ के भीतर था।
• वारिषेण और पुष्पडाल मुनि की कहानी: पुष्पडाल मुनि घर-बार छोड़कर जंगल में थे, लेकिन मन में अपनी पत्नी के प्रति तीव्र आसक्ति थी, इसलिए वे वन में रहकर भी परिग्रही थे। इसके विपरीत, वारिषेण मुनि राजमहल में अपनी रानियों के बीच बैठे होने पर भी पूर्णतः वैरागी और अपरिग्रही थे क्योंकि उनका ममत्व टूट चुका था।
आसक्ति बनाम अनासक्ति का अंतर
यह स्लाइड डेक व्यावहारिक कहानियों और उदाहरणों के माध्यम से समझाता है कि ममत्व भाव (आसक्ति) किस प्रकार मनुष्य को बांधती है और अनासक्ति किस प्रकार मुक्त करती है।
परिग्रह का त्याग कैसे करें?
जैन शास्त्र हमें समझाते हैं कि परिग्रह का त्याग केवल जंगल जाने से नहीं होता। असली परिग्रह त्याग 'घर छोड़ने' का नाम नहीं, बल्कि अपने 'निज घर' (अपनी आत्मा) में वापस आ जाने का नाम है।
तत्वार्थ सूत्र का एक बहुत ही महत्वपूर्ण सूत्र है:
जो वस्तु हमारी है ही नहीं (जैसे बाहरी जड़ पदार्थ), उसे हम भला कैसे छोड़ सकते हैं? पर-द्रव्य तो हमेशा हमसे छूटे हुए ही हैं। असली त्याग अपने अभिप्राय (intentions) और परिणामों से होता है। जब हम अपनी आत्मा के सच्चे वैभव को पहचान लेते हैं, तो पर-पदार्थों से हमारी दृष्टि अपने आप हट जाती है।
इंद्रिय विषय और परिग्रह त्याग
एक गहन ऑडियो चर्चा जो यह समझाती है कि कैसे पांचों इंद्रियों के प्रिय और अप्रिय विषयों में समता भाव रखना ही वास्तविक परिग्रह त्याग है।
पाठ के मुख्य बिंदु:
• आकिंचन्य धर्म का अर्थ है पर-पदार्थों से अपनी दृष्टि हटाना, जबकि ब्रह्मचर्य का अर्थ है अपनी आत्मा में लीन हो जाना।
• परिग्रह का संबंध बाहरी वस्तुओं की संख्या या मात्रा से नहीं है, बल्कि उनके प्रति हमारी आसक्ति (मूर्छा) और ममत्व से है।
• परिग्रह के 24 भेद होते हैं, जिनमें 14 अंतरंग (आंतरिक विकार) और 10 बहिरंग (बाहरी वस्तुएं) हैं।
• सच्ची मुक्ति और आकिंचन्य धर्म तब प्रकट होता है जब हम यह मानते हैं कि 'आत्मा ही आत्मा का वास्तविक परिग्रह (वैभव) है' और बाहरी चीजों से अपनापन तोड़ लेते हैं।
24 Sept 2026
प्रस्तुत स्रोत उत्तम आकिंचन्य धर्म के वास्तविक स्वरूप की व्याख्या करता है, जिसमें लेखक ने स्पष्ट किया है कि परिग्रह का संबंध केवल बाहरी धन-संपत्ति से नहीं बल्कि आंतरिक आसक्ति और ममत्व के परिणामों से है।
डॉ. संजीव गोधा के अनुसार, मात्र घर छोड़ देना धर्म नहीं है, बल्कि पर-पदार्थों से मोह हटाकर स्वयं के शुद्ध स्वभाव में लीन होना ही सच्चा त्याग है। इस विवेचन में उदाहरणों के माध्यम से बताया गया है कि बाहरी वैभव के बीच रहते हुए भी व्यक्ति अपरिग्रही हो सकता है, यदि उसका अभिप्राय विरक्त हो।
अंततः, यह पाठ सिखाता है कि आत्मा ही आत्मा का वास्तविक परिग्रह है और पर-द्रव्यों में सुख बुद्धि का निषेध करना ही मुक्ति का मार्ग है। इस प्रकार, आकिंचन्य धर्म हमें झूठे स्वामित्व को छोड़कर अपने शाश्वत ज्ञानमय वैभव को पहचानने की प्रेरणा देता है।
क्या आप जानते हैं कि बिना एक भी पैसा छोड़े आप पूर्णतः अपरिग्रही (detached) हो सकते हैं, और सब कुछ छोड़ देने के बाद भी घोर परिग्रही बने रह सकते हैं? पूरी दुनिया जिसे धन-दौलत और मकान का त्याग समझती है, जैन दर्शन में परिग्रह का असली अर्थ उससे बिल्कुल अलग और गहरा है! आइए जानते हैं कि उत्तम आकिंचन्य धर्म का वास्तविक मर्म क्या है।
इस पाठ को पूरा करने के बाद आप सीखेंगे:
• आकिंचन्य धर्म और परिग्रह का वास्तविक अर्थ क्या है।
• परिग्रह के 24 भेदों (अंतरंग और बहिरंग) का वर्गीकरण।
• 'मूर्छा' या आसक्ति का सिद्धांत और इसका हमारे जीवन पर प्रभाव।
• बाहरी त्याग और आंतरिक ममत्व-त्याग के बीच का अंतर।
परिग्रह क्या है और क्या नहीं?
हम अक्सर सोचते हैं कि रुपया-पैसा, धन-दौलत और आलीशान मकान ही परिग्रह हैं। लेकिन जैन आचार्यों ने परिग्रह को इस तरह परिभाषित नहीं किया है। आचार्यों ने परिग्रह के 24 भेद बताए हैं, जिनमें 'पैसा' या 'करेंसी' नाम की कोई चीज़ सीधे तौर पर शामिल ही नहीं है!
परिग्रह को मुख्य रूप से दो भागों में बांटा गया है:
• अंतरंग परिग्रह (14 भेद): इसमें मिथ्यात्व (गलत धारणा), क्रोध, मान, माया, लोभ, हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा (घृणा), और तीन प्रकार के वेद (स्त्री, पुरुष, नपुंसक वेद) शामिल हैं।
• बहिरंग परिग्रह (10 भेद): इसमें धन-धान्य, दासी-दास, क्षेत्र-वास्तु (जमीन-मकान), हिरण्य-स्वर्ण आदि शामिल हैं।
यदि केवल बाहरी संपत्ति को ही परिग्रह मान लिया जाए, तो एक बड़ी समस्या खड़ी हो जाएगी:
• पशु-पक्षियों के पास न तो घर होता है और न ही वस्त्र, तो क्या वे पूरी तरह अपरिग्रही हो गए?
• दूसरी ओर, तीर्थंकर परमात्मा के पास समवशरण की महान विभूति होती है, तो क्या वे परिग्रही कहलाएंगे?
स्पष्ट है कि परिग्रह का संबंध बाहरी परिस्थितियों से नहीं, बल्कि आत्मा के भीतर के भावों से है।
मूर्छा परिग्रह - आसक्ति का असली खेल
आचार्य उमास्वामी ने तत्वार्थ सूत्र में परिग्रह की बेहद सटीक परिभाषा दी है: "प्रमत्तयोगात मूर्छा परिग्रह" अर्थात प्रमाद के योग से जो 'मूर्छा' होती है, वही परिग्रह है।
आचार्य अमृतचंद्र देव ने इसे और स्पष्ट करते हुए लिखा: "मूर्छा तु ममत्व परिणामः" यानी किसी भी वस्तु के प्रति जो ममत्व का परिणाम है, जो लगाव या आसक्ति (attachment) है, वही वास्तव में परिग्रह है।
आप कहाँ बैठे हैं, यह महत्वपूर्ण नहीं है; आपके मन के भीतर क्या बैठा हुआ है, यह महत्वपूर्ण है। इसे दो उदाहरणों से समझें:
• मुनीम और सेठ का उदाहरण: एक सेठ अपनी दुकान से दूर घर पर बैठा है और दुकान में मुनीम काम कर रहा है। यदि डाकू आकर दुकान लूट लें, तो सबसे ज्यादा दर्द किसे होगा? मुनीम को नहीं, बल्कि सेठ को, क्योंकि उस धन के प्रति ममत्व का भाव सेठ के भीतर था।
• वारिषेण और पुष्पडाल मुनि की कहानी: पुष्पडाल मुनि घर-बार छोड़कर जंगल में थे, लेकिन मन में अपनी पत्नी के प्रति तीव्र आसक्ति थी, इसलिए वे वन में रहकर भी परिग्रही थे। इसके विपरीत, वारिषेण मुनि राजमहल में अपनी रानियों के बीच बैठे होने पर भी पूर्णतः वैरागी और अपरिग्रही थे क्योंकि उनका ममत्व टूट चुका था।
आसक्ति बनाम अनासक्ति का अंतर
यह स्लाइड डेक व्यावहारिक कहानियों और उदाहरणों के माध्यम से समझाता है कि ममत्व भाव (आसक्ति) किस प्रकार मनुष्य को बांधती है और अनासक्ति किस प्रकार मुक्त करती है।
परिग्रह का त्याग कैसे करें?
जैन शास्त्र हमें समझाते हैं कि परिग्रह का त्याग केवल जंगल जाने से नहीं होता। असली परिग्रह त्याग 'घर छोड़ने' का नाम नहीं, बल्कि अपने 'निज घर' (अपनी आत्मा) में वापस आ जाने का नाम है।
तत्वार्थ सूत्र का एक बहुत ही महत्वपूर्ण सूत्र है:
"मनोज्ञामनोज्ञेंद्रियविषयरागद्वेषवर्जनानि पंच"।
इसका अर्थ है कि हमारी पांचों इंद्रियों के विषयों में:
• जो अनुकूल (मनपसंद) लगें, उनके प्रति राग न करना।
• जो प्रतिकूल (नापसंद) लगें, उनके प्रति द्वेष न करना।
यदि कोई व्यक्ति जंगल में है और उसे सुहावना मौसम या हरी-भरी प्रकृति देखकर बहुत आनंद आ रहा है, तो वह इंद्रिय विषय में राग कर रहा है, जो कि परिग्रह ही है।
• जो अनुकूल (मनपसंद) लगें, उनके प्रति राग न करना।
• जो प्रतिकूल (नापसंद) लगें, उनके प्रति द्वेष न करना।
यदि कोई व्यक्ति जंगल में है और उसे सुहावना मौसम या हरी-भरी प्रकृति देखकर बहुत आनंद आ रहा है, तो वह इंद्रिय विषय में राग कर रहा है, जो कि परिग्रह ही है।
जो वस्तु हमारी है ही नहीं (जैसे बाहरी जड़ पदार्थ), उसे हम भला कैसे छोड़ सकते हैं? पर-द्रव्य तो हमेशा हमसे छूटे हुए ही हैं। असली त्याग अपने अभिप्राय (intentions) और परिणामों से होता है। जब हम अपनी आत्मा के सच्चे वैभव को पहचान लेते हैं, तो पर-पदार्थों से हमारी दृष्टि अपने आप हट जाती है।
इंद्रिय विषय और परिग्रह त्याग
एक गहन ऑडियो चर्चा जो यह समझाती है कि कैसे पांचों इंद्रियों के प्रिय और अप्रिय विषयों में समता भाव रखना ही वास्तविक परिग्रह त्याग है।
पाठ के मुख्य बिंदु:
• आकिंचन्य धर्म का अर्थ है पर-पदार्थों से अपनी दृष्टि हटाना, जबकि ब्रह्मचर्य का अर्थ है अपनी आत्मा में लीन हो जाना।
• परिग्रह का संबंध बाहरी वस्तुओं की संख्या या मात्रा से नहीं है, बल्कि उनके प्रति हमारी आसक्ति (मूर्छा) और ममत्व से है।
• परिग्रह के 24 भेद होते हैं, जिनमें 14 अंतरंग (आंतरिक विकार) और 10 बहिरंग (बाहरी वस्तुएं) हैं।
• सच्ची मुक्ति और आकिंचन्य धर्म तब प्रकट होता है जब हम यह मानते हैं कि 'आत्मा ही आत्मा का वास्तविक परिग्रह (वैभव) है' और बाहरी चीजों से अपनापन तोड़ लेते हैं।

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